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विवाह का दूसरा पहलू लिव-इन रिलेशनशिप

”लिव इन रिलेशनशिप’’ के जहां कुछ फायदे हैं, वहीं इसके कुछ नुकसान भी हैं। ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रह रही युवा पीढ़ी किसी त्याग, समझौते या जिम्मेदारी से मुक्त बन्धनहीन जीवन जीना चाहती है। इसमें शादी की तरह न तो किसी के प्रति कोई दायित्व होता है और न ही अधिकार। दोनों अपनी-अपनी तरह से आजाद होते हैं और अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। अगर चाहें तो इस रिश्ते में रहते हुए युवा जोड़ा विवाह के बंधन में भी बंध सकता है। इस रिश्ते का सबसे बड़ा नुक्सान यह है कि दोनों के मन में यह डर हमेशा बना रहता है कि साथी कहीं छोड़ कर न चल दे।
क्या भारत में विवाह संस्था पुरानी पड़ रही है ? भारत में विवाह को एक पवित्र बंधन ही नहीं जन्म-जन्म का साथ माना जाता है। प्रसिद्ध पत्रकार मुकुट बिहारी वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘स्त्री समस्या’ में लिखा है- ‘दो-चार दिन गा-बजाकर लीक पीटकर प्रचलित रस्मों को अदा कर देना विवाह नहीं है। विवाह तो वस्तुत: दो आत्माओं के, पुरुष और स्त्री के परस्पर आकर्षणों का एकीकरण है। और है उनकी अपूर्णताओं का परस्पर पूर्ण मिलन। शरीर मन्दिर में बैठी दो आत्माएं जब एक-दूसरे का आह्वान करती हैं, तब विवाह उन्हें मिला देता है।’

वास्तव में विवाह एक धार्मिक संस्कार है। सृष्टि के निर्माण के लिए इसे आवश्यक माना गया है। स्त्री और पुरुष, जीवन रूपी गाड़ी के दो पहियों के समान हैं जिसे दोनों मिल कर ही सरलता से खींच सकते हैं। इसीलिए स्त्री-पुरुष के विधिवत विवाह बंधन में आबद्ध होने को अनिवार्य माना गया है। हमारे यहां विवाह प्रथा शताब्दियों से चली आ रही है। आज भी इसे आवश्यक समझा जाता है, परन्तु समय और परिस्थितियों में परिवर्तन के साथ-साथ लोगों के विचारों में परिवर्तन हो रहा है, जिससे विवाह का स्वरूप बदल रहा है।

जब ”लिव-इन-रिलेशनशिप’’ (बिना विवाह किए लड़के और लड़की का एक साथ रहना) पर आधारित फिल्म ”सलाम-नमस्ते’’ आई थी, तब इस तरह के रिश्ते को लेकर देशभर में बहस छिड़ी थी कि क्या ये संबंध भारतीय संस्कृति के अनुकूल हैं? लेकिन अब जब बदलते परिवेश में हमारा कानून ही इस रिश्ते को मान्यता देने का मन बना रहा है, तब सवाल यह उठ रहा है कि ऐसे संबंध कितने उचित होंगे?

जब से वैश्वीकरण व उदारीकरण जैसी नीतियों के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भारत में आगमन हुआ है, हमारा मूलभूत सामाजिक ढांचा काफी हद तक प्रभावित हुआ है। व्यक्तिगत हितों के सामने आपसी रिश्तों का महत्व दिनोंदिन कम होता जा रहा है। वैवाहिक बंधन की बुनियाद सात फेरों पर टिकी होती है। भारतीय संस्कृति में तो विवाह को ”पाणिग्रहण संस्कार’’ के रूप में सामाजिक मान्यता प्राप्त है। वहीं दूसरी ओर ”लिव इन रिलेशनशिप’’ ऐसा रिश्ता है जो समाज की परवाह किए बगैर दो दिलों को जोड़ता है।

आज की पीढ़ी के अधिसंख्य लोग पश्चिमी संस्कृति के अंधानुगामी हैं और अपनी सभी परम्पराओं से मुक्ति पाकर पश्चिम के रस्मो-रिवाज अपनाने को ही आधुनिकता समझते हैं। पश्चिमी देशों की नकल कर भारत के बहुत से युवा ”लिव-इन रिलेशनशिप’’ की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। वैश्विकरण के कारण भी भारत में ”लिव-इन रिलेशनशिप’’ लोकप्रिय हुई है। इसी के चलते कुछ युवाओं को विवाह एक बंधन जैसा लगता है। इसलिए वे बिना विवाह के अपनी पसंद के साथी के साथ रहने यानी ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में अपने आपको स्वतंत्र महसूस करते हैं।
शहरों में सुविधा की दृष्टि से ”लिव इन रिलेशनशिप’’ अब आम बात हो चली है। एक समय था जब ऐसे संबंधों पर लोग खुलकर बात नहीं करते थे, लेकिन आज लोग इसे स्वीकारने में हिचकते नहीं हैं। इसके अलावा शिक्षा का प्रसार, नौकरियों में महिलाओं की बढ़ती संख्या और बढ़ते शहरीकरण का भी असर इसमें दिखाई दे रहा है। इसी कारण एक वर्ग ”लिव इन रिलेशनशिप’’ को शादी से बेहतर विकल्प मानने लगा हैं।
”लिव इन रिलेशनशिप’’ में अविवाहित लड़का और लड़की अपनी मर्जी से एक-दूसरे के साथ रहते हैं। युवक और युवती साथ रहते हुए मकान का किराया, खाने-पीने का खर्च आदि मिलकर उठाते हैं। चूंकि वे विवाह नहीं करते, इसलिए एक-दूसरे के प्रति पति-पत्नी की तरह वचनबद्ध नहीं होते। शादी की तरह इन पर कोई कानूनी बंधन या वित्तीय दबाव नहीं होता। आजकल शहरों में नौकरियों का जिस तरह का चलन है, उससे जीवन बहुत व्यस्त और तनावपूर्ण हो गया है। ऐसे में भावनात्मक मुद्दों के लिए न तो लोगों के पास समय है और न ही धैर्य। अपनी आजादी, अपनी पसंद और खुद के लिए समय ही जब लोगों की प्राथमिकता हो तो ”लिव इन रिलेशनशिप’’ उन्हें फायदे का सौदा नजर आता है।

आज बड़ी संख्या में महिलाएं भी पुरुषों की तरह आर्थिक रूप से सक्षम हैं। आजीविका या बेहतर करियर के लिए वे दूसरे शहरों में जाने से नहीं हिचकिचातीं। नौकरी के लिए जब लड़का और लड़की घर से दूर दूसरे शहरों, खासकर महानगरों में आते हैं, तो उनके सामने आवास की सबसे बड़ी समस्या होती है। फ्लैट्स के महंगे किराए और अन्य परेशानियों के चलते भी युवा ”लिव इन रिलेशनशिप’’ को प्राथमिकता देने लगे हैं। बढती महंगाई के इस दौर में साझेदारी उन्हें एक अच्छा विकल्प नजर आता है। खर्चे के बंटवारे से आर्थिक बोझ कम हो जाता है। पुरुषों को किसी पुरुष की बजाय किसी महिला के साथ रहना बेहतर लगता है, क्योंकि वे उन्हें ज्यादा विश्वसनीय लगती हैं।

”लिव इन रिलेशनशिप’’ के जहां कुछ फायदे हैं, वहीं इसके कुछ नुक्सान भी हैं। ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रह रही युवा पीढ़ी किसी त्याग, समझौते या जिम्मेदारी से मुक्त बन्धनहीन जीवन जीना चाहती है। इसमें शादी की तरह न तो किसी के प्रति कोई दायित्व होता है और न ही अधिकार। दोनों अपनी-अपनी तरह से आजाद होते हैं और अपनी-अपनी जिम्मेदारियां निभाते हैं। अगर चाहें तो इस रिश्ते में रहते हुए युवा जोड़ा विवाह के बंधन में भी बंध सकता है। इस रिश्ते का सबसे बड़ा नुक्सान यह है कि दोनों के मन में यह डर हमेशा बना रहता है कि साथी कहीं छोड़ कर न चल दे। कई बार एक-दूसरे को समझ न पाने के कारण दिक्कतें भी आती हैं। इस वजह से शुरुआत में प्यार और जिस भावना से ये जोड़े जुड़ते हैं, उसमें धीरे-धीरे कमी आने लगती है। सबसे बड़ी कमी यह है की लड़का और लड़की दोनों अपने परिवारों के सुख और प्यार से वंचित रहते हैं। देखा गया है कि भावनात्मक सुरक्षा न होने के कारण ”लिव इन रिलेशनशिप’’ ज्यादा लंबे समय तक नहीं टिकती। थोड़ी भी अनबन होने या संबंधों में थोड़ी भी कड़वाहट आने पर लड़का-लड़की एक-दूसरे का साथ आसानी से छोड़ देते हैं। ऐसे अस्थायी संबंधों के टूटने का खामियाजा महिलाओं को ज्यादा भुगतना पड़ता है। पुरुषों के मुकाबले महिलाएं अधिक संवेदनशील होती हैं। दूसरे हमारा परम्परावादी समाज ऐसी महिलाओं को गलत नजरों से देखता है और उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसकी वह अपेक्षा रखती हैं। ऐसा मानसिक आघात उनके लिए पीड़ादायक होता है।

दिक्कतें तब अधिक खड़ी होती हैं, जब इस प्रकार के संबंधों से सन्तान पैदा हो जाए। इन संबंधों से बच्चा पैदा हो जाने पर रिश्तों में जटिलता आ जाती है। ऐसे बच्चे की जिम्मेदारी उठाना दोनों के लिए समस्या

बन जाती है। हालांकि मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा है कि ऐसे रिश्ते से अगर बच्चा हो जाए और किसी कारणवश ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रहने वाले दोनों सदस्य अलग हो जाएं, तो बच्चे का खर्च पिता को उठाना होगा।
आज भारतीय समाज जिस दौर से गुजर रहा है, उसका सबसे ज्यादा असर मानवीय रिश्तों पर पड़ा है। महानगरीय संस्कृति ने यूं तो ”लिव इन रिलेशनशिप’’ को स्वीकार कर लिया है, फिर भी अभी यह बहस का मुद्दा बना हुआ है। भले ही उच्चतम न्यायालय ने इसे वैधानिक स्वीकृति प्रदान कर दी हो। सदियों पुरानी विवाह संस्था के कारण आज भी इस पर प्रश्नचिह्न लगा हुआ है। विवाह के अपने फायदे-नुक्सान हैं, फिर भी उसे सामाजिक और कानूनी मान्यता प्राप्त है। स्त्री और पुरुष शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। विवाह में प्रेम, त्याग और समझौते के साथ-साथ एक-दूसरे के प्रति समर्पण भी होता है। चूंकि विवाह को कानूनी संरक्षण प्राप्त है, इसलिए पति-पत्नी एक-दूसरे से विश्वास और ईमानदारी की उम्मीद करते हैं, जबकि ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में ऐसा नहीं है।

लिव इन रिलेशनशिप का मामला केवल युवा पीढ़ी की सोच का ही नहीं, बल्कि पारम्परिक वैवाहिक जीवन में बढ़ती जटिलताओं से भी जुड़ा है। उदारीकरण के बाद देश का आर्थिक विकास तो हुआ, लेकिन सामाजिक सुरक्षा तन्त्र कमजोर पड़ गया। एकल परिवारों के बढ़ते चलन के कारण पारिवारिक रिश्ते कमजोर पड़ते जा रहे हैं। एक-दूसरे के प्रति सहनशीलता और प्रेम कम हो रहा है। लोग आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। घरेलू हिंसा व दहेज के कारण होने वाली हत्याएं भी लोगों का विवाह से मोह भंग कर रही हैं। कानूनी बाधाओं के चलते अनेक पुरुष विवाह के नाम से तौबा करने लगे हैं। पुरुष प्रधान समाज में महिलाएं जिम्मेदारी निभाते-निभाते आजीज आ चुकी हैं। सहनशीलता के अभाव और अहम के कारण तलाक के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में युवा पीढ़ी को ”लिव इन रिलेशनशिप’’ की राह सरल लगती है। जब तक चाहो रहो, जब चाहो छोड़ दो। किसी किस्म का कोई बंधन नहीं, कोई जिम्मेदारी नहीं। बस आजाद पंछी की तरह उड़ते रहो।

”लिव इन’’ में सन्तान का हक
मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में कहा कि लिव इन रिलेशनशिप से अगर बच्चा हो जाए और किसी कारणवश महिला व पुरुष अलग हो जाएं, तो बच्चे का खर्च पिता को उठाना होगा।

अदालत ने कहा कि अगर साथ रह रहे जोड़े की रीति-रिवाज से शादी नहीं हुई तो क्या हुआ? दोनों ने अगर शारीरिक संबंध बनाए हैं तो उन्हें विवाहित माना जाएगा। उन्हें इस रिश्ते को स्वीकार करना होगा और बच्चे के पिता को उसका खर्च उठाना होगा। इतना ही नहीं अदालत ने यह भी कहा कि विवाहित संबंधों से उत्पन्न बच्चे को जो हक हासिल होते हैं, वही हक ”लिव इन रिलेशनशिप’’ से पैदा हुए बच्चे को मिलेंगे।

”लिव इन’’ जैसी प्रथाएं
अगर देखा जाए तो ”लिव इन रिलेशनशिप’’ की परंपरा हमारे देश में प्राचीन काल से ही किसी न किसी रूप में देखने को मिलती रही है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में, खासतौर से जनजातीय क्षेत्रों में इस परंपरा से मिलती जुलती कई प्रथाएं देखी जा सकती हैं। इन्ही प्रथाओं में एक प्रथा है राजस्थान की ”नाता’’ प्रथा। इस प्रथा में लड़का और लड़की पंचायत की मंजूरी मिलने के बाद शादी-शुदा युगल की तरह रहते हैं।

कुछ खबरें
हाल ही में ”लिव इन रिलेशनशिप’’ से जुडी कुछ खबरों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया है–
• नोएडा में ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रह रहे निजी कंपनी कर्मी युवक व युवती के बीच विवाद होने पर दोनों में मारपीट हो गई। इसके बाद युवती कोतवाली पहुंच गई। उसके पीछे-पीछे युवक भी पहुंच गया। कोतवाली में भी दोनों ने जमकर हंगामा किया। वहां भी दोनों के बीच मारपीट हुई। इसके बाद पुलिस ने दोनों को शांति भंग के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

• ग्रेटर नोएडा के कासना कोतवाली क्षेत्र की पॉश सोसायटी एनआरआई सिटी में एक छात्र ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह एक युवती के साथ ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रह रहा था। कुछ दिनों से वह तनाव में था। पुलिस को कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। पुलिस युवती से पूछताछ कर रही है।

• एक साथ काम करने के दौरान हुई दोस्ती के बाद एक युवक और उसकी सहयोगी युवती सात महीने तक ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रहे। इसके बाद युवक अलग हो गया और उसने दूसरी लड़की से शादी कर ली। जब ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रही युवती को पता चला, तो उसने पुलिस से शिकायत की। पुलिस ने जब शादी के घर में पहुंचकर दुल्हन के पिता को इसकी जानकारी दी, तब उसने कहा कि अब तो देर हो गई। पहले से पता चलता तो वह अपनी बेटी की उक्त युवक से शादी नहीं करते।

हालांकि इस तरह के रिश्ते दबे-छुपे तौर पर समाज में हमेशा से मौजूद रहे हैं। राजस्थान की ”नाता प्रथा’’ हो या गुजरात का ”मैत्री करार’’, उनमें ऐसे रिश्तों की ही झलक मिलती है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इन्हें सही ठहराया जा सकता है। हमारे देश में सामाजिक और नैतिक रूप से इन्हें अनुचित ही माना जाता है। लेकिन ये गैर-कानूनी नहीं कहे जा सकते। हाल ही में ”लिव इन रिलेशनशिप’’ पर विभिन्न अदालतों ने कई तरह की ”गाइड लाइन’’ तो दी हैं, पर इस पर अलग से कोई कानून नहीं है। जहां तक नैतिकता की बात है तो हर व्यक्ति इसे अपने हिसाब से परिभाषित कर सकता है।
इसमें दो राय नहीं कि विवाह एक सर्वस्वीकार्य संस्था है। इसके अपने फायदे-नुक्सान हो सकते हैं, लेकिन फिर भी यह संबंधों में स्थायित्व देती है। हमारे देश में विवाह केवल दो व्यक्तियों का ही मिलन नहीं होता, इससे दो परिवार भी आपस में जुड़ते हैं। विवाह के बाद पति-पत्नी एक-दूसरे को सहयोग देते है। मिलकर जिम्मेदारी उठाते हैं और एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार होते हैं। प्रेम, त्याग और समर्पण के बल पर ही आपसी रिश्ते दीर्घकाल तक टिक पाते हैं। समाज बाहरी रूप से चाहे कितना भी बदल जाए, पर रिश्तों को निभाने के लिए प्रेम और समर्पण हमेशा जरूरी रहेगा।

आज की युवा पीढ़ी के पास न तो इतना धैर्य है, और न ही समय है। ऐसे में ”लिव इन रिलेशनशिप’’ उन्हें सरल उपाय लगता है। शादी करना या न करना व्यक्तिगत फैसला होता है। उसमें दखलंदाजी का किसी को अधिकार नहीं है। मगर फैसला जो भी हो, सोच-समझ कर किया जाना चाहिए। पूरी समझदारी के साथ सामाजिक, कानूनी और व्यक्तिगत पहलुओं पर विचार करके ही कदम बढाना चाहिए। किसी भी रिश्ते को तोडऩा बहुत आसान है, मगर निभाने के लिए समय और ऊर्जा झोंकनी पड़ती है, विशवास जीतना पड़ता है।

”लिव इन’’ में गुजारा भत्ता
उच्चतम न्यायालय ने ”लिव इन रिलेशनशिप’’ के बारे में दिए एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि ऐसे रिश्ते को निभा रही महिला साथी कुछ मापदंडों को पूरा करने की स्थिति में ही गुजारा भत्ते की हकदार हो सकती है। केवल सप्ताहांत या रात भर एक-दूसरे के साथ समय बिताने को घरेलू संबंध नहीं कहा जा सकता।

फैसले के अनुसार गुजारा भत्ता पाने के लिए किसी महिला को चार शर्तें पूरी करनी होंगी, भले ही वह अविवाहित हो। पहली शर्त यह है कि ”लिव इन रिलेशनशिप’’ में रह रहे युवक-युवती को समाज के समक्ष खुद को पति-पत्नी की तरह पेश करना होगा। दूसरा दोनों की उम्र कानून के अनुसार शादी के लायक हो। तीसरा उम्र के अलावा भी वे शादी करने योग्य हों जिनमें दोनों का अविवाहित होना भी अनिवार्य है। चौथा दोनों स्वेच्छा से एक-दूसरे के साथ रह रहे हों और दुनिया के सामने खुद को एक खास अवधि के लिए जीवनसाथी के रूप में दिखाएं।

लिव इन रिलेशनशिप
दिब्याश्री सतपथी
भारत वह राष्ट्र है जिसने अपनी परंपराओं और संस्कृति के आधार पर विश्व स्तर पर अपनी खास पहचान बनाई हुई है। यहां रिश्तों का खास महत्व रहा है। भारतीय समाज परंपरावादी है। यहां ऐसे किसी भी रिश्ते को जायज नहीं माना जाता जो महिला या पुरुष को शादी से पहले साथ रहने की इजाजत दे। अगर ऐसे संबंधों के परिणाम, खासतौर पर महिलाओं के लिए घाटे का सौदा साबित होते हैं। 21वीं सदी पश्चिमीकरण की सदी है। भारतीयों ने पश्चिमी संस्कृति, उनकी ड्रेसिंग, भाषा, भोजन, व्यवहार से लेकर लगभग सब कुछ स्वीकार किया है और बढ़ते पश्चिमीकरण और लोगों की बदलती मानसिकता के कारण लिव-इन-रिलेशनशिप का चलन भी भारत में बढ़ता ही जा रहा है, जिसके कारण जिम्मेदारियों से जुड़े रिश्ते जैसे विवाह और परिवार की पारम्परिक मान्यताएं टूट रही हैं। ऐसे रिश्तों की बढ़ती लोकप्रियता का असर भारतिय युवा पीढ़ी पर सबसे अधिक पड़ रहा है।

कुछ मामलों में लिव-इन-रिलेशनशिप को कानूनी रूप से वैध माना गया है, परंतु उन्हें न कानून से कोई विशेष सुरक्षा प्राप्त है और न ही समाज से। इसकी बजाय समाज में ऐसे रिश्तों और इनका निर्वाह कर रहे लोगों को गलत नजरों से देखा जाता है। इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि महिलाएं आज भी सामाजिक रूप से कई बंधनों और सीमाओं में जकड़ी हुई हैं और बिना शादी किए साथ रहना उनके लिए एक अपराध माना जाता है। सामाजिक दायरों और सीमाओं की बात छोड़ भी दी जाए, तो वैयक्तिक दृष्टिकोण से भी इसके कई दुष्प्रभाव हैं। जिन संबंधों को पारिवारिक और सामाजिक रूप से मान्यता नहीं मिल पाती उनमें अक्सर देखा गया है कि संबंध स्थिर नहीं रह पाते, एवं उनके टूटने का खामियाजा केवल महिलाओं को ही भुगतना पड़ता है। इसका सबसे बड़ा कारण पुरुषों के मुकाबले महिलाओं का अधिक संवेदनशील होना है। दूसरा, ऐसी महिला जो शादी किए बगैर किसी पुरुष के साथ रहे, तो उसे भारतीय रुढि़वादी समाज हमेशा गलत नजरों से देखता है। उसे वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसकी वह अपेक्षा रखती है। यह मानसिक तौर पर उसे आघात पहुंचाता है।

पश्चिमी संस्कृति का आंख बंद कर अनुसरण करने से युवा वर्ग की प्राथमिकताएं बदल रही है। परंतु सवाल यह उठता है कि क्या कानूनन लिव-इन-रिलेशनशिप को पूरी मान्यता मिलनी चाहिए? अगर लिव-इन-रिलेशन जैसे रिश्तों को मान्यता प्रदान की जाती है तो क्या उससे भारतीय समाज की संस्कृतिक और पारम्परिक नींव के नष्ट होने कि आशंका हो सकती है। इसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव भी हो सकता है।

अदालत ने यह भी कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं को सुरक्षा संबंधी अधिनियम के लाभ पाने के लिए सभी ”लिव इन रिलेशनशिप’’ को वैवाहिक संबंधों जैसी श्रेणी में नहीं माना जाएगा। इस लाभ को पाने के लिए जो शर्तें बताई गई हैं, उन्हें पूरा करना होगा और इसे सबूत के जरिए साबित भी करना होगा।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की कोई ‘रखैल’ है, जिसकी वह वित्तीय जिम्मेदारी उठाता है और उसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सैक्स की संतुष्टि के लिए करता है या बतौर नौकरानी रखता है, तो हमारी नजर में यह ऐसा संबंध नहीं होगा, जिसे वैवाहिक संबंधों जैसा माना जा सके।

शीर्ष अदालत ने वैवाहिक मामलों की एक अदालत तथा मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा जारी किए गए आदेशों को दरकिनार करते हुए यह फैसला दिया था। दोनों अदालतों ने डी. पत्तचियामल को पांच सौ रुपए का गुजारा भत्ता दिए जाने का आदेश दिया था, जिसने दावा किया था कि वह अपीलकर्ता डी. वेलुसामी की ब्याहता है। वेलुसामी ने इस आधार पर दोनों अदालती आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी कि वह पहले से ही लक्ष्मी नामक महिला से शादी कर चुका था और पत्तचियामल से उसकी शादी नहीं हुई थी। हालांकि वह कुछ समय उसके साथ रहा था। गुजारे भत्ते के संबंध में अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 125 की व्याख्या करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि कानूनन ब्याहता पत्नी के अलावा, निर्भर माता-पिता तथा बच्चे ही किसी व्यक्ति से गुजारा भत्ता पाने के हकदार हैं।

 

सुषमा वर्मा

михаил безлепкин органыtechnical german translation

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