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आस्था का पावन पर्व है छठ

छठ का व्रत चार दिन तक चलता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुरू होता है तथा सप्तमी को सुबह के सूर्य को अघ्र्य अर्पण के साथ समाप्त हो जाता है। वैसे छठ का त्योहार वर्ष में दो बार मनाया जाता है। एक बार कार्तिक मास में तथा दूसरा चैत्र मास में। किन्तु कार्तिक मास में मनाया जाने वाला छठ का व्रत अधिक प्रचलित है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला छठ का त्योहार ‘चैती छठ’ के नाम से भी जाना जाता है।

इस धरा पर ऊर्जा के अक्षय स्रोत के रूप में भगवान भास्कर की पूजा की जाती है। धरती के समस्त चर-अचर प्राणियों में सूर्य की ऊर्जा जीवन का संचार करती है। भारत के पावन पुण्य वसुंधरा पर जितने भी देवी-देवताओं का प्रादुर्भाव हुआ है, उनमें भगवान दीनानाथ ऐसे अधिष्ठाता हैं, जो सर्वदृश्य एवं साक्षात हैं। धरती पर सभी प्राणियों में जीवन की धारणीयता के पोषक के रूप में दुनिया के प्राय: सभी मुल्कों के लोग किसी न किसी रूप में सूर्य देव की पूजा करते हैं। असीम आस्था एवं अगाध विश्वास, कठिन तप एवं कठोर अनुष्ठान का त्योहार छठ, जिसे कि ‘डाला छठ’ भी कहा जाता है। यह जीवनदायी एवं वरदायी भगवान सूर्य की उपासना को समर्पित होता है। कहा जाता है कि सम्पूर्ण अनुष्ठान एवं पूर्ण भक्ति-भाव से इस व्रत का पालन करने से जीवन में सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती है तथा एक साधक उन सभी सिद्धियों को प्राप्त करने में सफल होता है, जिनकी प्राप्ति के लिए देवी-देवता भी कठिन साधना करते हैं।

पौराणिक एवं लोक कथाओं में छठ
छठ का पर्व मुख्य रूप से सूर्य-उपासना का पर्व होता है। भारत में सूर्य-उपासना का इतिहास वेदों जैसा ही प्राचीन तथा पवित्र है। ऋग्वेद में इस पर्व के उल्लेख के अतिरिक्त इसकी चर्चा भगवत पुराण, ब्रह्म वैवर्त पुराण तथा विष्णु पुराण आदि धर्मग्रंथों में भी पाई जाती है। भगवान सूर्य को समर्पित होने के कारण छठ के व्रत को ‘सूर्य षष्ठी’ भी कहा जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भगवान सूर्य की उपासना मानव को कई असाध्य रोगों से मुक्ति दिलाती है। उन्हें आरोग्यता एवं दीर्घायु की अवस्था का देवता माना जाता है। क्योंकि सूर्य की किरणों में असाध्य रोगों के निवारण की आलौकिक क्षमता होती है। कुष्ठ जैसे रोग के बारे में कहा जाता है कि इसका इलाज केवल सूर्य भगवान की पूजा से ही संभव है। प्राचीन समय में ऋषि-मुनियों का विश्वास था कि किसी खास दिन सूर्य की किरणों में सर्वाधिक आलौकिक ईश्वरीय माहात्म्य छिपा होता है और उस दिन यदि विधानपूर्वक सूर्यदेव की उपासना की जाए तो जीवन में सारी कामनाओं की सिद्धि हो जाती है। तभी से अति माहात्म्य तथा आशीर्वाद का यह पावन दिवस छठ का उद्भव काल माना जाता है। फिर सूर्य भगवान की ऊर्जा दुनिया में सभी प्राणियों में जीवन एवं स्वास्थ्य का संचार करती है और इस लोक कल्याणकारी माहात्म्य के लिए सूर्य की पूजा की परम्परा वैदिक काल से ही चली आ रही है। कालान्तर में सूर्य को मानवीय रूप में प्रतिस्थापित करने के युग की शुरुआत हुई, जो धीरे-धीर सूर्य की मूर्ति-पूजा के रूप में परिणत हो गई। इसी क्रम में कई स्थानों पर सूर्य मंदिरों की भी स्थापना की गई जहां पर छठ के अवसर पर आज भी पूजा-अर्चना की जाती है। इस प्रकार सूर्य की मूर्ति पूजा के पारम्परिक अनुष्ठान में छठ के पावन त्योहार की शुरुआत हुई।

पाणिनि के पूर्व काल के महान् व्याकरणाचार्य यक्ष के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने ‘निरुक्त’ नाम के ग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ संस्कृत शब्दों की उत्पत्ति का दुर्लभ विज्ञान माना जाता है। उन्होंने भी अपनी इस रचना में सभी देवताओं में सूर्य को प्रथम देवता का सम्मान दिया है तथा उनकी पूजा के फलस्वरूप समस्त प्रकार के कामनाओं की सिद्धि की बारे में बताया है। कहते हैं कि महाभारत काल में भी द्रौपदी एवं पांडव बंधुओं ने भी धौम्य ऋषि के कथनानुसार छठ के व्रत का अनुष्ठान किया था। महाभारत में ऐसी भी मान्यता है कि द्रौपदी के द्वारा छठ व्रत के पालन की महिमा के फलस्वरूप ही पांडवों को फिर से हस्तिनापुर का राज्य हासिल हो पाया था। एक अन्य मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस व्रत का पालन सूर्य पुत्र एवं अंग देश के नरेश महावीर कर्ण के द्वारा भी किया गया था। महाभारत की कथा के अनुसार महावीर कर्ण सरोवर में कमर भर जल में खड़े होकर सूर्य को अघ्र्य देते थे। इसके फलस्वरूप वे आलौकिक तेज एवं शौर्य से परिपूर्ण हो गए। तब से अब तक उगते सूर्य को जलार्पण की परम्परा हमारे लौकिक जीवन में आज भी विद्यमान है। एक पौराणिक कथा के अनुसार छठ व्रत का आरम्भ शाक्य द्विपी ब्राह्मणों के द्वारा सूर्य पूजन के रूप में किया गया, जो कि कालांतर में छठ के रूप में प्रचलित हुआ। एक अन्य लौकिक मान्यता यह भी है कि लंका पर विजय के पश्चात् मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामचंद्रजी तथा जनकनंदिनी माता सीता ने अयोध्या में रामराज्य की स्थापना के पूर्व कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को उपवास किए थे और भगवान भास्कर की आराधना की थी। तब से इस तिथि को धन-धान्य की प्राप्ति के लिए छठ के व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। एक ऐसी कथा भी प्रचलित है कि राजा प्रियवंद निस्संतान थे। महर्षि कश्यप ने उनसे पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। उसके पुण्य प्रताप से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, किन्तु दुर्भाग्यवश वह मृत पैदा हुआ। इस वियोग में वह श्मशान घाट पर अपनी जीवनलीला खत्म करने लगे। तभी भगवान की मानस कन्या ‘देवसेना’ प्रकट हुईं और उन्होंने कहा – ‘मैं सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश के रूप में जन्म लेने के कारण षष्ठी कहलाती हूं। जो कोई भक्ति-भाव से मेरा ध्यान कर मेरी पूजा करता है, उसके मन की सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। मेरी पूजा करने वाले की सारी मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं।’ देवी के इस वचन से प्रेरित होकर राजा प्रियंवद ने पुत्र की कामना से देवी की अनुष्ठानपूर्वक पूजा की और कुछ समय पश्वात् ही उन्हें पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। माना यह जाता है कि यह पूजा कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को की गयी थी। तब से इस दिन को छठ व्रत मनाने की परम्परा की शुरुआत हुई। कहते हैं कि छठ के पावन अवसर पर जिस देवी मां की पूजा की जाती हैं, वह ‘छठ माता’ के नाम से जानी जाती है। ‘छठ माताज् को वेदों में सूर्य भगवान् की अर्धांगिनी ‘उषा’ के नाम से भी जाना जाता है। साहित्य में ‘उषा’ का अर्थ वैसे तो प्रभात होता है, लेकिन वेदों में ‘उषा’ का अर्थ दार्शनिक रूप से साधक में दैवी जागरण की उत्पत्ति है। मां छठ अपने भक्तों में दैवी गुणों का संचार करती हैं, जिसके पुण्य-प्रताप से भक्तों के समस्त दैहिक तथा सांसारिक कष्ट मिट जाते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल की षष्ठी के सूर्यास्त तथा सप्तमी के सूर्योदय के मध्य देवमाता गायत्री जी का अवतरण हुआ था। माना जाता है कि माता गायत्री का प्रादुर्भाव सूर्य देव की पूजा के परिणामस्वरूप ही संभव हो पाया था। इस कारण से षष्ठी के दिन से मां छठ की पूजा होती है।
छठ का व्रत चार दिन तक चलता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को शुरू होता है तथा सप्तमी को सुबह के सूर्य को अघ्र्य अर्पण के साथ समाप्त हो जाता है। वैसे छठ का त्योहार वर्ष में दो बार मनाया जाता है। एक बार कार्तिक मास में तथा दूसरा चैत्र मास में। किन्तु कार्तिक मास में मनाया जाने वाला छठ का व्रत अधिक प्रचलित है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला छठ का त्योहार ‘चैती छठ’ के नाम से भी जाना जाता है।

नहाय खाए
छठ व्रत का प्रथम दिन ‘नहाय खाय’ कहलाता है। यह कार्तिक या फिर चैत्र मास के चतुर्थी तिथि को सम्पन्न होता है। इस दिन विशेष रूप में घर की सफाई की जाती है। आंगन को गोबर से लीपा जाता है। छठ के व्रती इस दिन स्नान कर शुद्ध शाकाहारी भोजन करते हैं। व्रती विशेषरूप से किसी सरोवर या फिर गंगा नदी में स्नान करते हैं। इस अवसर पर व्रती कद्दू की सब्जी एवं चने के दाल के साथ अरवा चावल का भात खाते हैं। इसलिए इस दिन को कदवा भात भी कहा जाता है। खाना बनाने के लिए ईंधन के रूप में आम की लकडिय़ां तथा नए बर्तनों का उपयोग किया जाता है। यह अनुष्ठान व्रत के दूसरे दिन कार्तिक या चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की पंचमी को होता है। इस दिन व्रतधारी दिन भर उपवास के उपरांत रात में भोजन करते हैं। भोजन के रूप में गुड़ तथा दूध से खीर तथा शुद्ध घी से पूडिय़ां बनाई जाती हैं, जिन्हें सुहारी कहा जाता है। खरना का भोजन व्रती रात में ऐसे समय में करते हैं, जब वातावरण पूरी तरह से शांत हो तथा किसी भी जीव या मनुष्य की आवाज सुनाई न दे रही हो। व्रती के भोजन ग्रहण करने के समय यदि उनके खाने में कंकड़ या अन्य कोई अवांछित वस्तु मिल जाए तो व्रती उसी वक्त भोजन करना बंद कर देते हैं। यही कारण है कि भोजन बनाने के लिए खाद्य पदार्थों की साफ -सफाई तथा पवित्रता पर काफी ध्यान दिया जाता है। खरना के दिन व्रती द्वारा भोजन ग्रहण करने से पूर्व घर के सभी सदस्य अर्ध्य अर्पण करते हैं। यह अर्ध्य जल या फिर गाय के दूध से भी किया जाता है। इसीलिए खरना के दिन अर्पित किए गए अर्ध्य को छठ व्रत का पहला तथा सर्वाधिक महत्वपूर्ण अघ्र्य माना जाता है। व्रती के भोजन ग्रहण करने के पश्चात घर के सभी सदस्यों के बीच प्रसाद का वितरण किया जाता है। वैसे इस प्रसाद को आस-पास के लोगों के बीच में भी बांटा जाता है। हर भक्त अगाध श्रद्धा के साथ यह प्रसाद ग्रहण करता है। इस दिन के भोजन या प्रसाद में चीनी अथवा नमक का प्रयोग बिलकुल नहीं किया जाता है। इस दिन के बाद से व्रती का उपवास शुरू हो जाता है। यह निर्जला तथा निराहार उपवास लगभग दो दिन तक चलता है।

छठ का सांध्य अर्ध्य
यह दिन कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन छठ व्रत के उपवास का प्रथम दिन होता है। पास के नदी या तालाब के तट पर घाट का निर्माण किया जाता है, जहां सजावट के साथ रंग-बिरंगी रोशनी की व्यवस्था की होती है। घर की महिलाएं प्रसाद बनाने में व्यस्त होती हैं। प्रसाद के रूप में मुख्य रूप से ठेकुआ बनाया जाता है, जो कि गेहूं के आटे को गुड़ के साथ मिलाकर शुद्ध घी में तैयार किया जाता है। फिर गुड़ तथा घी के साथ सूखी मिठाई के रूप में चावल के आटे से एक विशेष पकवान बनाया जाता है जिसे कि भूसवा या चावल का लड्डू या फिर कसार कहा जाता है। इन पकवानों को घर की महिलाएं तैयार करती हैं। उन्हें स्नान कर अध्र्य पडऩे तक उपवास करना होता है। पकवान बनाने के दौरान बातें करने के क्रम में महिलाओं के मुंह से कोई थूक वगैरह निकल कर पकवानों पर गिर कर अशुद्ध होने से रोकने के लिए पकवान बनाने वाली महिलाएं अपने मुंह पर कपड़ा लपेट कर रखती हैं। इसके अलावा गन्ना, सिंघाड़ा, बोरा, हल्दी तथा अदरख की जड़ सहित पौधे, टाभा, नींबू, नारियल इत्यादि विविध प्रकार के मौसमी फल भी पूजा में शामिल किए जाते हैं। इन सब पकवानों तथा फलों को बांस से निर्मित सूप में रखा जाता है। विभिन्न प्रकार के पकवानों से भरे इन सूपों को बड़े से बांस की टोकड़ी (जिसे चांग कहा जाता है।) में रखा जाता है। इस बांस की टोकड़ी को पीले रंग से रंगे हुए नए कपड़े से बांधा जाता है। भक्तजन चांग को नदी या सरोवर पर अपने सिर पर तथा खुले पांव पर उठा कर लाते हैं। यहां प्रत्येक सूप में घी के दीपक, अगरबत्तियां और मोमबत्तियां जलाई जाती हैं। एक विशेष प्रकार का धूमन भी जलाया जाता है। कहते हैं कि धूमन का यह धुआं जिन-जिन दिशाओं में जाता है, वहां से कष्ट एवं संकट नाष्ट हो जाते हैं। जब भगवान भास्कर अस्त होने वाले होते हैं तो उससे कुछ देर पहले व्रती जल में प्रवेश कर अरदास कर अस्ताचलगामी सूर्य भगवान से अपने परिवार की सुख-समृद्धि एवं धन-धान्य के लिए हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं। सूर्य भगवान के डूबने के वक्त व्रती भगवान भास्कर को अघ्र्य देते हैं। श्रद्धालु भी अस्ताचल गामी सूर्य की तरफ खड़े होकर गाय के कच्चे दूध या फिर जल से अर्ध्य अर्पित करते हैं। इस अवसर पर भक्तिभरे छठ के लोकगीत गाए जाते हैं।

प्रात:कालीन अर्ध्य और पारण
यह अनुष्ठान छठ व्रत का चौथा और अंतिम दिन होता है। कार्तिक या चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को यह संपन्न होता है। इस दिन सूर्योदय के बहुत पहले से ही घर के सभी सदस्य स्नान कर लेते हैं। व्रती के साथ परिवार के सदस्य उसी घाट पर, जहां कि सांय अर्ध्य अर्पित किया गया था, वहां पुन: लौट आते हैं। इससे पूर्व सांय के अध्र्य से वापस लौटने के बाद प्रसाद एवं पकवान से भरे चांग को पूजा घर में रखा जाता है। उस रात सब लोगों के सोने के बाद फिर सभी सूपों में पुन: नए पकवान एवं फलों भरे जाते हैं। उन्हें चांग में बांध कर रख दिया जाता है। घाट पर पहुंच कर व्रती जल में प्रवेश करते हैं और उदित होते सूर्य को अर्ध्य अर्पित करते हैं। यहां पर भी प्रत्येक सूप में शुद्ध घी के दीपक जलाए जाते हैं और सुगन्धित धूमना जला कर सूर्य भगवान का आह्वान करते हैं। उस वक्त अन्य सभी श्रद्धालु भी उगते सूर्य को अर्ध्य अर्पित करते हैं और अपने मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। अर्ध्य अर्पण के बाद व्रती श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण करते हैं। सुहागिन स्त्रियां व्रती के चरण स्पर्श कर अपने सुहाग की लम्बी उम्र के लिए आशीर्वाद मांगती हैं। घर लौटकर व्रती कच्चे दूध तथा शर्बत ग्रहण कर अपने व्रत का समापन करते हैं।

कोसी
छठ के अनुष्ठान के तीसरे दिवस की शाम को अर्थात अस्ताचलगामी सूर्य को अर्ध्य अर्पित करने के पश्चात घर पर गन्ने के पांच पौधों को खड़ा करके एक छतरी जैसा आकार दिया जाता है। इसके अन्दर मिट्टी के दीप जलाए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि गन्ने के वे पांच पौधे पंचतत्व (क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर) जिनसे मानव शरीर का निर्माण हुआ है, उस के प्रतीक माने जाते हैं। कहते हैं कि कोसी का अनुष्ठान उन परिवारों में किया जाता है, जिनमें हाल में ही या तो कोई विवाह संस्कार संपन्न हुआ हो या फिर किसी बच्चे का जन्म हुआ हो। यह अनुष्ठान अगले प्रात: उगते सूर्य को अर्ध्य अर्पित करने के पूर्व घाट पर भी किया जाता है। मिट्टी के दीप की रोशनी ऊर्जा की प्रतीक है और इसके द्वारा साधक अपने तथा अपने परिवार के जीवन में शक्ति, सौभाग्य एवं सामर्थ्य की कामना करते हैं।

 

श्रीप्रकाश शर्मा

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