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कांटों के ताज में कदम बढ़ाते बहुगुणा

मुख्यमंत्री ने आपदा और विनाश की भयावहता को देखते हुए पुनर्वास और पुनर्निमाण प्राधिकरण का गठन किया है। सरकार उन लोगों के परिवारों को, जो आपदा के बाद अब तक लापता हैं, 5 लाख रूपए दे रही है और जिनके घर तबाह हो गए हैं, उन्हें वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने तक तीन हजार रूपए मासिक किराया दे रही है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को जब राज्य के मुख्यमंत्री का कांटों भरा ताज सौंपा गया, तब वह हरीश रावत समर्थकों के भारी विरोध को साधने में व्यस्त रहे और उन्हें याद नहीं रहा कि उनके सिर पर सोने का मुकुट है या कांटों भरा ताज। इस बीच उनके खाते में सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि विधानसभा सीट के लिए भटकते हुए उनको सितारगंज विधानसभा सीट भी मिली और उस पर ऐतिहासिक विजय भी। उनकी इस ऐतिहासिक जीत ने उनके विरोधियों को शांत करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि अब भी बहुगुणा के विरोधी उनके मुख्यमंत्री रहने न रहने को लेकर अटकलों का बाजार गर्म ही रखते हैं, लेकिन इन सब से निश्चिंत बहुगुणा अपने विकास के मंत्र को लेकर राज्य के विकास की ओर अग्रसर रहते हैं। अब जब जून 2013 को उत्तराखंड में आई विनाशकारी जल प्रलय को 5 महीने से अधिक समय हो गया है, फिर भी उनके विरोधी किसी का इलाज न होने या प्रभावी बचाव कार्य न किए जाने का राग अलाप रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार की अधिकारिक वेबसाइट से अब तक भी बचाव, राहत और चंदे का स्लोगन नहीं हटा है। वेब पेज खुलते ही उत्तराखंड सरकार की क्या प्राथमिकता है, यह किसी की भी समझ में आ सकता है। इसके बावजूद खुद बहुगुणा की सरकार के मंत्रियों और उनके विरोधियों का यह कहना कि 13 मार्च 2013 को बनी बहुगुणा की सरकार में हर मोर्चे पर फेल है, थोड़ी जल्दबाजी-सी लगती है। इस आपदा ने विश्लेषकों से बहुगुणा सरकार के काम के मूल्यांकन का हक छीना है। हालांकि आपदा के दिन तक दिल्ली-देहरादून के मीडिया और कांग्रेसियों के बीच चर्चा चलती रही कि केन्द्र बहुगुणा को हटा रही है। यह चर्चा बहुगुणा के मुख्यमंत्री बनने से लेकर अब तक उड़ती रहती है।

छोटे राज्य उत्तराखंड में कांग्रेस के अंदर ही दर्जनों संभावित मुख्यमंत्री इस बीच जनपथ से दो-चार होने के उपक्रम करते रहते हैं। कांग्रेस का आलाकमान चुनाव के तत्काल बाद थोड़ा असमंजस में भले ही रहा हो और केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत के जोरदार विरोध ने भी उसे बहुगुणा को मुख्यमंत्री बनाने के फैसले पर पुनर्विचार के लिए विवश किया हो, लेकिन जल्दी ही आलाकमान को यह समझते देर नहीं लगी कि मुख्यमंत्री के रूप हरीश रावत के भी कई विरोधी हैं। ऐसे में कांग्रेस आलाकमान ने अपने फैसले को ही तरजीह दी।

उत्तराखंड में आए भयावह जल प्रलय को उत्तराखंड के धैर्य की परीक्षा के साथ-साथ बहुगुणा की अग्रि परीक्षा भी माना गया था। उत्तराखंड कांग्रेस में बहुगुणा के विरोधी और भाजपा भले ही मुख्यमंत्री के रूप में बहुगुणा के पिछले डेढ़ वर्ष के कार्यों का मूल्यांकन कर उनका विरोध-प्रतिरोध कर रहे हों, लेकिन केन्द्र की उनकी सरकार और कांग्रेस आलाकमान आपदा में सरकार और मुख्यमंत्री की भूमिका पर ही सारा मूल्यांकन कर रही है। केन्द्र और कांग्रेस आलाकमान के आपदा बचाव, राहत और चंदा ऑपरेशन में बहुगुणा पास हैं। प्रधानमंत्री से लेकर गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और कांग्रेस आलाकमान इसे दुनिया का सबसे बड़ा सफल बचाव और राहत ऑपरेशन बताकर बहुगुणा की पीठ थपाथपा रहे हैं। दिल्ली के एक अंग्रेजी समाचार पत्र में खबर छपी कि 15 अक्टूबर तक बहुगुणा, पूर्व मुख्यमंत्री हो जाएंगे। वहीं दूसरी तरफ बहुगुणा राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन की बैठक में अपनी उपलब्धियों को सिलसिलेवार गिनवा रहे थे और अन्य राज्यों के मुख्यमंत्री उन्हें टकटकी लगाए सुन रहे थे।

उत्तराखंड में आई इस महासुनामी के बाद राज्य की प्राथमिकताएं नए सिरे से तय हो गई हैं। विध्वंस के बाद बद्रीनाथ, केदारनाथ, यमुनोत्री और गंगोत्री जैसे चार धामों की यात्रा शुरू होना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। इसके अतिरिक्त महाविनाश के गाल में समाई हजारों सड़कों, भवनों, पेयजल योजनाओं, कार्यालयों और अस्पतालों के पुनर्निमाण और उन तक आमजन की पहुंच बड़ी प्राथमिकता बन गई। इतना ही नहीं, बड़ी प्राथमिकता भूखे और आपदा से त्रस्त हाथों तक दो जून की रोटी भी पहुंचाना था। इन प्राथमिकताओं के आधार पर राज्य में मुख्यमंत्री के कार्यकलाप के मूल्यांकन हो तो, बहुगुणा अव्वल दर्जे में पास है। उन्होंने लोहाघाट, धारचुला और पिथौरागढ़ में पुनर्निमाण योजनाओं की जो झड़ी लगाई है, उससे वे कांग्रेस में अपने विरोधी धड़े को भी साधने की जद्दोजहद में कामयाब हुए हैं।

वैसे पूरी तरह से हाइटेक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बचाव, राहत ऑपरेशनों की कामयाबी के साथ केदारनाथ धाम की यात्रा आरंभ करके यह साबित कर दिया है कि मार्ग सुंदर न सही, दुरुस्त तो हो ही गए हैं। अन्य धामों की यात्रा भी चल रही है। आंकड़ों की भाषा में सरकार की माने तो राज्य में पानी की 247 लाईनें ध्वस्त हुई थी, जिसमें गढ़वाल मंडल में 200 और कुमाऊं की 38 लाईनें दुरुस्त हो चुकी हैं। 15 परियोजनाएं अभी दुरुस्त होनी हैं। आपदा के कारण राज्य की 2,419 सड़के टूट चुकी थीं, जिसमें से 2,232 सड़कों को पुन: चालू कर दिया गया है। 187 सड़कें अभी खोली जानी बाकी हैं। इस महाविनाश के चलते राज्य के 4,200 गांव सड़क मार्ग से कट गए थे। इनमें से 4,093 गांवों में बिजली लाईनें खराब हुई थी, जिन्हें फिर से ठीक कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि आपदा राहत एवं पुनर्निमाण की मद में पूरे राज्य में जिलेवार एक अरब से ज्यादा की राशि आवंटित की गई।

सरकार का दावा है कि आपदा में 1 लाख11 हजार लोगों को आपदाग्रस्त स्थानों से निकालकर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया। राज्य सरकार ने फंसे हुए यात्रियों के यात्रा के खर्चे के लिए 2 हजार रूपए दिए। सरकार ने आपदा राहत के मानदंडों को बदलकर आपदा राशि कई गुना बढ़ा दी। विस्थापितों के लिए भी सरकार ने भवन के लिए 7 लाख रूपए की राशि निर्धारित की है, जबकि पहले इसके लिए एक या दो लाख रूपए की ही राशि मिलती थी। सरकार ने आपदा में तबाह हुए लोगों को घर के बर्तन खरीदने के लिए चार हजार रूपए दिए थे। पहले आपदा में मारे गए पशुओं के लिए भी मुआवजे के मानदंड बहुत ही लचर और कमजोर थे। खच्चर के लिए 7 हजार 5 सौ रूपए मिलते थे। बहुगुणा सरकार ने इसे 6 गुणा 50 हजार रूपए कर दिया। आपदा के दौरान मारे गए सरकारी कर्मचारियों के परिवारों को सरकार ने एकमुश्त 10 लाख रूपए दिए।

इन सब तत्कालिक राहतों के साथ-साथ मुख्यमंत्री ने आपदा और विनाश की भयावहता को देखते हुए पुनर्वास और पुनर्निमाण प्राधिकरण का गठन किया है। सरकार उन लोगों के परिवारों को, जो आपदा के बाद अब तक लापता हैं, 5 लाख रूपए दे रही है और जिनके घर तबाह हो गए हैं, उन्हें वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने तक तीन हजार रूपए मासिक किराया दे रही है।

हालांकि ये आंकड़े राज्य में आपदा राहत की हकीकत बयान करने के साथ-साथ राहत एवं पुनर्वास पर उठ रहे सवालों के जवाब में भी राज्य सरकार ने सामने रखे हों, लेकिन ये आंकड़े यह बताने में तो सक्षम हैं कि राज्य में अन्य विकास कार्यों के साथ-साथ सरकार के सामने अभी सबसे बड़ी चुनौती महा जलप्रलय से स्वाहा हुए राज्य के आधारभूत ढ़ांचे को पटरी पर लाने की है। सबसे बुरी तरह तबाह हुए केदारनाथ की यात्रा को शुरू करवाकर राज्य की बहुगुणा सरकार ने राज्य की पर्यटन व्यवस्था को पटरी पर लाने की पहल तो की है, लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम को अगले यात्रा सीजन की दरकार रहेगी।

प्रमोद पंत

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