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सीमांध्र हलचल को किरण कुमार रेड्डी ने किया हाईजैक

सीमांध्र क्षेत्र में नेतृत्व की दौड़ में रेड्डी अपने प्रतिद्वंद्वी वाईएसआर कांग्रेस के वाई एस जगन रेड्डी और तेलगुदेशम पार्टी के चंद्रबाबु नायडू से जबरदस्त प्रतियोगिता का सामना कर रहे हैं। दोनों नेताओं ने खुद को साबित करने के लिए बंटवारे को लेकर केन्द्र पर निशाना साधा है। लेकिन अब तक सत्तारूढ़ कांग्रेस की तरफ से सीमांध्रा क्षेत्र का नेतृत्व के लिए सामने नहीं आया है। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी, खुद को संयुक्त आंध्र प्रदेश के अगुवा के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। 30 जुलाई 2013 को कांग्रेस कोर कमिटी ने तेलंगाना के रूप में आंध्र प्रदेश के बंटवारे की मंजूरी दी थी। तब से किरण कुमार रेड्डी यह दिखाने की कोशिश में लगे हैं कि वह इस फैसले के खिलाफ हैं। रेड्डी कई बार कह चुके हैं कि राज्य के विभाजन के खिलाफ खड़े होने वाले वह अंतिम व्यक्ति हैं।

कांग्रेस हाईकमान के विरुद्ध रेड्डी खुलेआम विद्रोही तेवर नहीं अपना रहे हैं। मीडिया में उन्होंने खुलकर इस बात को स्वीकार किया कि केन्द्र द्वारा अलग तेलंगाना राज्य बनाए जाने के फैसले के खिलाफ, वह दिल्ली जाने से भी परहेज कर रहे हैं।

हालांकि संयुक्त आंध्र प्रदेश के मामले पर आंध्र प्रदेश गैर-राजपत्रित सरकारी कर्मचारी संघ (एपीएनजीओ) को सरकार की तरफ से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिला है, लेकिन फिर भी मुख्यमंत्री से बातचीत के बाद एपीएनजीओ ने दो महीने से जारी अपनी अनिश्चितकालीन हड़ताल अचानक स्थगित कर दी है। कर्मचारियों द्वारा अचानक लिए गए इस निर्णय से मुख्यमंत्री की नियत पर शंका जाहिर की जाने लगी है। खुद को संयुक्त आंध्र प्रदेश का अगुवा साबित करने के पीछे राजनीतिक प्रेक्षक कहने लगे हैं कि किरण कुमार रेड्डी वास्तव में कांग्रेस हाईकमान के उत्साह को कमजोर करने के लिए लोगों के गुस्से को भुना रहे हैं।

20 अक्टूबर 2013 को ओडिशा के उत्तर-तटीय जिला श्रीकाकुलम का फैलिन चक्रवात से प्रभावित होने के बावजूद भी उन्होंने संयुक्त आंध्र प्रदेश की बात दोहराई। उन्होंने कहा – ‘हम प्राकृतिक चक्रवात को नहीं रोक सकते, लेकिन इस चक्रवात को निश्चित तौर पर रोक सकते हैं, जो राज्य को नुकसान पहुंचाएगा। इसे रोकने के लिए हमें आप की मदद चाहिए।’

एपीएनजीओ द्वारा 66 दिन पुरानी हड़ताल वापस लेने पर कांग्रेस कैंप में इस पूरे मामले में किरण कुमार रेड्डी की भूमिका को लेकर शंकाएं जताई जाने लगी हैं।

तेलंगाना कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि किरण कुमार रेड्डी ने एपीएनजीओ कर्मचारियों को संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्ष में हड़ताल पर जाने और हैदराबाद में आम सभा करने के लिए उकसाया है। पिछले कुछ दिनों में राज्य की राजधानी में आयोजित यह पहली सबसे बड़ी रैली थी, जो राज्य के बंटवारे के विरोध में आयोजित की गई थी। इसी वर्ष 30 सितंबर को सेवानिवृत हुए पूर्व पुलिस महानिदेशक वी. दिनेश रेड्डी ने आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ने आमसभा करने की स्वीकृति देने के लिए उन पर दबाव डाला था।

कांग्रेस वर्किंग कमिटी ने राज्य के बंटवारे से एक महीना पहले मुख्यमंत्री सहित राज्य के प्रमुख नेताओं को अपने निर्णय से अवगत करा दिया था। तब सारे नेता मौन रहे थे। यहां तक कि मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने भी कांग्रेस वर्किंग कमिटी के सामने अपनी आपत्ति दर्ज नहीं कराई। जब सीमांध्र क्षेत्र के लोगों ने सरकार के निर्णय का विरोध करना शुरू किया और वाईएसआर कांग्रेस इस विप्लव का फायदे उठाने के लिए आगे आई, तब किरण कुमार रेड्डी ने अपना सुर बदल लिया। विरोध में लोगों ने कई स्थानों पर स्व. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की प्रतिमाओं को तोड़ा और जला दिया। इतने बड़े पैमाने पर विरोध को देखते हुए कांग्रेस हाईकमान सतर्क हो गया कि विपक्षी दल कहीं इसका फायदा न उठा लें। इसके लिए कांग्रेस हाईकमान ने एक स्पष्ट नीति बनाई। अब साफ तौर पर दिखने लगा है कि किरण कुमार रेड्डी राज्य के बंटवारे के विरोध में खुद को चैंपियन साबित कर रहे हैं।

इस क्षेत्र के सभी मंत्रियों के साथ मिलकर उन्होंने पार्टी हाईकमान को एक संयुक्त पत्र लिखा, जिसमें कांग्रेस वर्किंग कमिटी द्वारा पारित प्रस्ताव को वापस लेने की बात कही गई है। साथ ही इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि इससे केन्द्र और राज्य सरकार को कोई आंच न पहुंचे। जब सीमांध्र क्षेत्र (तटीय और रायलसीमा क्षेत्र) के तकरीबन 15 मंत्रियों ने त्यागपत्र दिया, तब रेड्डी ने उस त्यागपत्र को अपने पास रख लिया और यह दिखावा किया कि उन्होंने कोई भी त्यागपत्र स्वीकार नहीं किया है। उन्होंने अपने पार्टी के विधायकों को भी त्यागपत्र न देने के लिए मनाया, ताकि राज्य में सरकार के पर किसी तरह के संकट के बादल न छाएं। कांग्रेस हाईकमान ने भी कुछ ऐसा ही किया, जब 13 सांसदों के त्यागपत्र को लोकसभा स्पीकर ने अस्वीकार कर दिया। यहां तक कि एल. राजगोपाल को दिल्ली हाईकोर्ट जाकर, लोकसभा स्पीकर को त्यागपत्र स्वीकार करने के लिए निर्देश देने के लिए कहना पड़ा।

किरण कुमार रेड्डी शुरू से ही मंत्रियों और विधायकों को यह कह कर त्यागपत्र न देने के लिए मनाते रहे कि विधानसभा में तेलंगाना पर खारिज प्रस्ताव एक बार पास हो जाने दिया जाए। लेकिन दुविधा यह है कि तेलंगाना मुद्दे पर राष्ट्रपति अपनी टिप्पणी और सहमति किस आधार पर देंगे – एक प्रस्ताव के रूप में या एक बिल के रूप में? विधानसभा के लिए राष्ट्रपति के संदर्भ के मसले पर केन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे और आंध्र प्रदेश के प्रभारी दिग्विजय सिंह विपरीत बयान दे रहे हैं, जो लोगों में भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है। दूसरी तरफ उत्तेजित कर्मचारियों के आंदोलन को अन्य राजनीतिक पार्टियों के हाथ में जाने से रोकने के लिए किरण कुमार रेड्डी पूरी तरह सक्रिय हैं। यह कांग्रेस हाईकमान का चलाकी भरा एक कदम है, ताकि संयुक्त आंध्र प्रदेश के पक्ष में उत्तेजित लोगों का नेतृत्व राज्य के बंटवारे का शुरू से विरोध करती आ रही वाईएसआर कांग्रेस और सीपीआई के हाथों में न जाने पाए।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद दो महीने से लगातार जारी अनिश्चितकालीन हड़ताल को स्थगित करने के बाद यह साफ हो गया है कि कैसे सब कुछ मैनेज किया गया है। इसके पहले एपीएनजीओ अध्यक्ष पी. अशोक बाबू ने साफ कर दिया था कि वह अपनी हड़ताल तब तक वापस नहीं लेंगे, जब तक कि केन्द्र सरकार इसके लिए ठोस आश्वासन न दे दे। मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी के किसी भी आश्वासन को यह कह कर खारिज कर दिया था कि कौन जानता है, वह कितने दिन और कुर्सी पर रहेंगे।

सीमांध्र क्षेत्र में नेतृत्व की दौड़ में रेड्डी अपने प्रतिद्वंद्वी वाईएसआर कांग्रेस के वाई एस जगन रेड्डी और तेलगुदेशम पार्टी के चंद्रबाबु नायडू से जबरदस्त प्रतियोगिता का सामना कर रहे हैं। दोनों नेताओं ने खुद को साबित करने के लिए बंटवारे को लेकर केन्द्र पर निशाना साधा है। लेकिन अब तक सत्तारूढ़ कांग्रेस की तरफ से सीमांध्र क्षेत्र का नेतृत्व के लिए सामने नहीं आया है। एक स्तर पर इस क्षेत्र से नेतृत्व के लिए केन्द्रीय मंत्री चिरंजीवी ने अपनी रुचि दिखाई थी, लेकिन लोगों का विश्वास हासिल करने में वह असफल रहे। अब यह साफ हो चुका है कि किरण कुमार रेड्डी इस शून्य को खत्म करने में लगे हैं, ताकि बंटवारे के बाद वह अपने राजनीतिक भविष्य की नींव रख सकें। इसके लिए वह पूरी सावधानी बरत रहे हैं, ताकि कांग्रेस हाईकमान भी नाराज न हो।

 

हैदराबाद से नरेन्द्र

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