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नौकरशाही और राजनीति

नौकरशाही को चाहिए कि आम आदमी का जीवन आसान बनाने के लिए काम करे। सभी भारतीयों के लिए ईमानदार होना राजनेताओं का नैतिक दायित्व है। जाति, संप्रदाय, धर्म और वोट बैंक की राजनीति करने की बजाय, राजनेताओं को संपूर्ण भारतीयों के लिए काम करना चाहिए। भ्रष्टाचार देश को खोखला कर रहा है और हम सभी इसके हिस्सेदार हैं।

सन 1961 में कर्नाटक (तब मैसूर) कैडर के रूप में जब मैं भारतीय पुलिस सेवा से जुड़ा, उस समय देश उन लोगों द्वारा शासित हो रहा था, जो प्रशासन को विश्वास का प्रतीक मानते थे। वे इसे फुटबॉल के मैदान की तरह नहीं मानते थे, जहां उनकी धुन पर नहीं नाचने वाले अधिकारियों को कभी मैदान के इस कोने से, कभी उस कोने से ठोकर मारी जाए। कुछ ऐसे मामले हैं, जहां शक्तिका बेजा इस्तेमाल कर अधिकारियों का बेवजह स्थानांतरण किया गया है। लेकिन नौकरशाही में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था, जो विधायक और मंत्रियों को देवता का सम्मान देता था। विधायक भी अधिकारियों पर अपना शक्ति-प्रदर्शन नहीं करते थे।

30 अक्टूबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि नौकरशाहों के लिए न्यूनतम अवधि तय की जाए और राजनीतिक आकाओं द्वारा मनमाने स्थानांतरण पर रोक लगाई जाए। लंबे समय से विधायिका और अधिकारियों के बीच खराब रिश्ते का कारण यह हस्तक्षेप रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा – ‘हमने देखा कि नौकरशाहों में सत्यनिष्ठा और जवाबदेही में गिरावट की मुख्य वजह, राजनीतिक हस्तक्षेप या उस व्यक्ति के कारण होती है, जिनके पास अधिकर हैं। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में नौकरशाहों की भूमिका बहुत जटिल हो चुकी है। प्राय: उन्हें ऐसे निर्णय लेने पड़ते हैं, जिनका अर्थव्यवस्था और तकनीकी क्षेत्र में दूरगामी असर होता है। उनके निर्णय निश्चित रूप से पारदर्शी और लोकहित में होने चाहिएं। उन्हें जनता के प्रति पूरी तरह जवाबदेह होना चाहिए। मनमाना स्थानांतरण नौकरशाही के लिए एक डरावने सपने जैसा है, जिसे राजनेता असुविधाजनक अधिकारियों के खिलाफ इस्तेमाल करते हैं।’ यह 22 सितंबर 2006 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश की तरह ही है, जिसे नहीं लागू किया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 1997 में सीबीआई निदेशक की न्यूनतम अवधि निश्चित करने का आदेश दिया था। यह कानूनी रूप से अकेला पद है, जिसकी न्यूनतम अवधि निश्चित है। इस कारण गृह सचिव, कैबिनेट सचिव, रक्षा सचिव, इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक, रॉ सचिव और कुछ अन्य दूसरों को भी इसका फायदा मिला। एक अधिकारी उतना ही अच्छा होता है, जितना कि दूसरा, लेकिन जो सत्ता पक्ष के अनुकूल नहीं होते, उन्हें गेंद की तरह एक स्थान से दूसरे स्थान पर फेंक दिया जाता है।

देश का सबसे बड़ा राज्य, उत्तर प्रदेश इसका उदाहरण है। प्रशासनिक फेरबदल के नाम पर अप्रैल 2012 में उत्तर प्रदेश सरकार ने 32 जिलाधिकारियों और 5 मंडलायुक्त अधिकारियों सहित 70 आईएएस अधिकारियों का स्थानांतरण कर दिया था। 15 मार्च 2012 को सत्ता में आने के साथ ही उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार ने अब तक 221 आईएएस अधिकारियों के तबादले किए। उत्तर प्रदेश में कुल अधिकृत कैडर की संख्या 537 है। 2011-12 में 2 साल के दौरान वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रांतीय पुलिस सेवा के कुल 1828 अधिकारियों का तबादला किया। इसमें 478 अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और 1350 उप-पुलिस अधीक्षक शामिल हैं। 2012 में 307 सहायक पुलिस अधीक्षकों के स्थानांतरण किए गए, जबकि 2011 में 171 अधिकारियों का स्थानांतरण किया गया। 892 उप पुलिस अधीक्षक स्तर के अधिकारियों का 2012 में स्थानांतरण हुआ, जबकि 2011 में इनकी संख्या 458 थी।

किसी खास राजनीतिक दल पर कीचड़ उछालना मेरा मकसद नहीं है। अन्य दलों की सरकारों ने भी यही कहानी दुहराई थी। 1995 में बसपा सरकार ने 550 आईएएस अधिकारियों का स्थानांतरण किया था। यह सरकार मात्र 4 महीना और 14 दिन चली थी। 1997 में 6 महीने तक चलने वाली अपनी सरकार के दूसरे कार्यकाल में उसी दल ने 777 अन्य स्थानांतरण किए। बसपा ने अपने तीसरे कार्यकाल में 97 स्थानांतरण किए। पूरे 5 साल के कार्यकाल के दौरान बसपा ने स्थानांतरण के आंकड़े को 1,200 तक पहुंचा दिया। वर्तमान सपा सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर किए गए स्थानांतरण ने पिछली बसपा सरकार के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए। इनमें अंतरराज्यीय कर्मचारी या सचिवालय के कर्मचारियों के आंकड़ें शामिल नहीं हैं। हालांकि अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश की स्थिति न ही बुरी और न ही अच्छी कही जाएगी।

2011 में महाराष्ट्र सरकार उस अवैधानिक सर्कुलर को वापस लेने के लिए बाध्य हो गई, जिसमें पुलिसकर्मियों को यह निर्देश दिया गया था कि वे राजनेताओं के कॉल पुलिस स्टेशन की डायरी में दर्ज न करें। हाईकोर्ट में यह केस दर्ज है कि पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के निजी सचिव ने 2006 में बुलढ़ाना पुलिस को फोन कर कांग्रेस विधायक के ऋणदाता पिता के खिलाफ एफआईआर दर्ज न करने का निर्देश दिया था। कर्ज में डूबे विर्दभ के किसान मनी-लेडिंग रैकेट के खिलाफ शिकायत दर्ज कराना चाह रहे थे। उस कॉल को भी जांच अधिकारी ने पुलिस डायरी में दर्ज किया था। स्व. देशमुख ने कथित रूप से जिलाधिकारी को कहा था कि इस मामले में कोई कार्रवाई न करें, क्योंकि वे व्यक्तिगत रूप से इस मामले को देख रहे हैं। हाईकोर्ट ने उस सर्कुलर को निरस्त कर दिया, जिसके खिलाफ महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को न सिर्फ बरकरार रखा, बल्कि राज्य सरकार पर लगाए गए जुर्माने को 10 हजार से बढ़ा कर 10 लाख रूपए भी कर दिया।

ऊपर के उदाहरणों से मेरा मकसद यह साबित करना नहीं है कि भारतीय नौकरशाही पूरी तरह संत है और राजनीतिज्ञ बदमाश हैं। अच्छे और बुरे, दोनों लोगों का अच्छा-खासा प्रतिशत मौजूद है। दरअसल, दोष का ज्यादातर हिस्सा नौकरशाही को जानी चाहिए, जो सिर्फ विदेशियों द्वारा ही नहीं, बल्कि भारतीयों द्वारा भी अक्षम समझा जाता है।

हांगकांग स्थित ‘पॉलिटीकल ऐंड इकोनॉमिक रिस्क कंसलटेंसी’ द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार, भारतीय नौकरशाही पूरी एशिया मे सबसे अक्षम है। सर्वे के अनुसार – ‘राजनेता प्राय: भारतीय नौकरशाही को पुनर्जीवित करने के लिए सुधार का वादा करते हैं, लेकिन सिविल सेवा का अपने आप में एक शक्ति केन्द्र होने के कारण, वे ऐसा करने में प्रभावहीन सिद्ध होते हैं।’ भारतीय नौकरशाही के बारे में सर्वेकहता है – ‘विदेशी निवेशकों की बात ही छोड़ दी जाए, यह किसी भी भारतीय के लिए सबसे निराशापूर्ण अनुभव हो सकता है।’ हमारे देश में बहुत से कानून, नियम और प्रावधान हैं। देश में लगभग 1,030 केन्द्रीय और 6,727 प्रांतीय अधिनियम हैं, जो नौकरशाही को कई तरह के ऐसे अवसर देते हैं जिनसे वे नागरिकों के धैर्य की परीक्षा ले। अपने देश में किसी भी काम को शुरू करने के लिए, चाहे व्यवसाय शुरू करना हो या नए उद्योग लगाने हों या नए कार्य करने हों, कई तरह की मंजूरी और अनुमोदनों की जरूरत होती है। यहां सिर्फ पैसा ही ज्यादातर नौकरशाहों को कार्य करने के लिए प्रेरित करता है। अन्तरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार वॉचडॉग ‘ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल’ की दिसंबर 2012 को जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार, भ्रष्टाचार के मामले में भारत 183 देशों में 94वें स्थान पर है। भ्रष्टाचार बोध सूचकांक में कुल 100 अंक में से भारत को 36 अंक मिले हैं। 0 (उच्च भ्रष्ट) से 100 (एकदम साफ) के बीच दिया गया अंक, विश्व बैंक की राष्ट्रीय निष्पादन और संस्थागत आकलन तथा ग्लोबल इनसाइट कंट्री रिस्क रेटिंग सहित 10 अध्ययनों का औसत है। 2013 में भारत का रैंक श्रीलंका और चीन जैसे अपने पड़ोसी देशों से भी नीचे है।

नौकरशाही को चाहिए कि आम आदमी का जीवन आसान बनाने के लिए काम करे। सभी भारतीयों के लिए ईमानदार होना राजनेताओं का नैतिक दायित्व है। जाति, संप्रदाय, धर्म और वोट बैंक की राजनीति करने की बजाय, राजनेताओं को संपूर्ण भारतीयों के लिए काम करना चाहिए। भ्रष्टाचार देश को खोखला कर रहा है और हम सभी इसके हिस्सेदार हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने राजनीति से अपराधियों को दूर रखने की कोशिश की है। कार्यरत नौकरशाहों के साथ-साथ सेवानिवृत नौकरशाहों के द्वारा परत पर परत चढ़ाने वाली सरकार के लिए अब भ्रष्टाचार को मिटाने और तंत्र से अक्षम नौकरशाही को खत्म करने का वक्त है। नौकरशाही में अपराधियों को सुरक्षा और उनसे नम्र व्यवहार करना बंद किया जाना चाहिए। सरकार में वर्तमान स्थिति यह है कि चाहे कोई काम करे या नहीं, कोई भ्रष्ट हो या ईमानदार, प्रावधानों के माध्यम से सब सुरक्षित हैं। लेनि यह स्थिति खत्म होनी चाहिए। सुशासन आसानी से नहीं आता, इसके लिए कठोर निर्णय लेने होते हैं। चाल्र्स डिकेन का लाख टके का वाक्य है – ‘क्या वे सीखने के लिए तैयार हैं?’

 

जोगिन्दर सिंह

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