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कांग्रेस के आत्मघाती चेहरों की चुनावी जंग

मध्य प्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह को महत्वहीन ही नहीं बल्कि हाशिए पर भेजने के लिए जनार्दन द्विवेदी ने कैसी रणनीति बनायी है, किस प्रकार से घेरेबंदी की है, यह सब मीडिया और कांग्रेस की राजनीति में दखल रखने वालों को अच्छी तरह से ज्ञात है। ऐसे तो जनार्दन द्विवेदी को प्रत्यक्ष तौर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर मध्य प्रदेश चुनाव की असली कमान उन्हीं के हाथ में है।

कांग्रेस को 10 साल बाद मध्य प्रदेश में फिर से सत्ता में वापसी की थोड़ी उम्मीद जगी थी, लेकिन वह कांग्रेस के आत्मघाती चेहरों की चुनावी जंग में हलकान है, जिससे उम्मीद नाउम्मीदी में बदलती जा रही है। कांग्रेस के दो महासचिवों के बीच में दिलचस्प चुनावी खेल चल रहा है, जिसमें सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की चुनावी रणनीति ही लहूलुहान होगी। कांग्रेस के महासचिव जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह में चुनावी पर्दे के पीछे वर्चस्व की राजनीतिक जंग छिड़ी हुई हैं, जिसमें दिग्विजय सिंह अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए प्रयासरत हैं। जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह, दोनों कांग्रेस के दिग्गज जरूर हैं, पर इन दोनों की राजनीतिक सोच, राजनीतिक समर्पण, राजनीतिक रणनीति अलग-अलग है। जनार्दन द्विवेदी जहां सोनिया गांधी के नजदीक हैं, वहीं दिग्विजय सिंह राहुल गांधी के नजदीक हैं। दिग्विजय सिंह राहुल मिशन के सबसे बड़े रणनीतिकार भी हैं। जनार्दन द्विवेदी का चेहरा जहां दक्षिणपंथी का है, वहीं दिग्विजय सिंह का चेहरा मुस्लिमपरस्ती का है। कांग्रेस में जनार्दन द्विवेदी को जहां अग्निशामक दस्ता माना जाता है, वहीं दिग्विजय सिंह को पेट्रोल समझा जाता है। कांग्रेस इन दोनों का उपयोग दक्षिणपंथी और मुस्लिमपरस्ती की कसौटी पर ही करती है। कांग्रेस का उग्र हिन्दू विरोध जब हानिकारक स्थिति में पहुंच जाता है, तब जनार्दन द्विवेदी से उस पर पानी डलवाया जाता है। आपको याद होगा कि जब सुशील कुमार शिंदे और पी. चिदम्बरम ने भगवा आतंकवाद का शिगुफा छेड़कर हिन्दू समर्थकों के निशाने पर कांग्रेस को खड़ा कर दिया था, तब जनार्दन द्विवेदी को आगे कर कांग्रेस ने उस पर पानी डालवाया था। जनार्दन द्विवेदी ने अपने बयान में कहा था कि आतंकवाद का कोई रंग या धर्म नहीं होता। कांग्रेस आतंकवाद को रंग और धर्म से परे मानती है। ठीक इसके विपरीत कांग्रेस को जब मुस्लिमपरस्ती दिखाने के लिए मुस्लिम तुष्टिकरण की राह पर चलना होता है, तब वह दिग्विजय सिंह जैसे ज्वलनशील पदार्थ और मुखौटे को सामने कर देती है। दिग्विजय सिंह ने बाटला कांड पर दिल्ली से लेकर आजमगढ़ तक आतंकवाद की आग कैसे भड़कायी थी, यह जगजाहिर है।

मध्य प्रदेश की राजनीति में दिग्विजय सिंह को महत्वहीन बनाने के लिए ही नहीं, बल्कि उन्हें हाशिए पर भेजने के लिए जनार्दन द्विवेदी ने कैसी रणनीति बनायी है, किस प्रकार से घेरेबंदी की है, यह सब मीडिया और कांग्रेस की राजनीति में दखल रखने वालों को अच्छी तरह से ज्ञात है। ऐसे तो जनार्दन द्विवेदी को प्रत्यक्ष तौर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन अप्रत्यक्ष तौर पर मध्य प्रदेश चुनाव की असली कमान उन्हीं के हाथ में है। मध्य प्रदेश के चुनाव प्रभारी मोहन प्रकाश शर्मा जनार्दन द्विवेदी के मोहरा मात्र हैं। मोहन प्रकाश शर्मा अप्रत्यक्ष तौर पर ऐसे समीकरण बना रहे हैं, जिससे दिग्विजय सिंह खुद ही हाशिए पर खड़े हो जाएंगे। ज्योतिरादित्य सिंधिया को चुनाव प्रचार अभियान का अध्यक्ष बनाना भी दिग्जिवय सिंह के खिलाफ में उठा एक बड़ा कदम है। दिग्विजय सिंह को माधवराव सिंधिया कभी पसंद नहीं करते थे। मध्य प्रदेश की राजनीति मे कभी अर्जुन सिंह और माधवराव सिंधिया के बीच में शह-मात का राजनीतिक खेल चलता था। उस समय दिग्विजय सिंह अर्जुन सिंह के लठैत होते थे। अर्जुन सिंह ने ही दिग्विजय सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया था। ज्योतिरादित्य सिंधिया भी दिग्विजय सिंह को पसंद नहीं करते हैं और अपने पिता के खिलाफ अर्जुन सिंह के पक्ष में खड़े होने के कारण वह दिग्विजय सिंह से नफरत भी करते हैं। दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया दोनों राजपरिवार से हैं, लेकिन दिग्विजय सिंह आम-आदमी के नजदीक हैं, जबकि ज्योतिरादित्य सिंधिया में राजतंत्र की ठसक की मानसिकता झलकती है।

दिग्विजय सिंह स्वयं कहते रहे हैं कि वह मध्य प्रदेश की आतंरिक राजनीति में लौटना नहीं चाहते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में अपने बेटे को स्थापित जरूर कराना चाहते हैं। वह विधानसभा चुनावों में अपने बेटे के लिए टिकट चाहते हैं। दिग्विजय सिंह की देखा-देखी कांतिलाल भूरिया, सत्यव्रत दूबे, पचौरी और सज्जन वर्मा आदि अपने बच्चों और रिश्तेदारों के लिए टिकट चाहते हैं। चुनाव प्रभारी मोहन प्रकाश शर्मा नहीं चाहते कि दिग्विजय सिंह के बेटे को टिकट दिया जाए, इसीलिए उन्होंने अप्रत्यक्ष तौर पर हर बड़े कांग्रेसी नेता से बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों से टिकट के लिए आवेदन करा दिया। मकसद साफ है कि बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों को टिकट देने से कांग्रेस की छवि खराब होने का बहाना बना कर दिग्विजय सिंह के बेटे का टिकट साफ कर देना। दिल्ली में हुई कांग्रेस चुनाव समिति की बैठक में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सवाल उठा दिया कि जब नेताओं के ही बेटे-बेटियों और रिश्तेदारों को टिकट देना है तो आम कार्यकर्ताओं की बात हम किस मुंह से करेंगे? प्रसंग राहुल गांधी तक पहुंचा। राहुल गांधी ने मध्य प्रदेश के नेताओं को घुट्टी पिलायी और टिकट बंटवारे में पारदर्शिता बरतने और परिवारवाद खड़ा करने के खिलाफ हड़का दिया। यह चक्र भी जनार्दन द्विवेदी ने ही पर्दे के पीछे से चलाया है।

दिग्विजय भी ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ अप्रत्यक्ष तौर पर ताल ठोंकने से पीछे नहीं हंै। मध्य प्रदेश के नेताओं और कार्यकर्ताओं में वह ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ माहौल बना रहे हैं। दिग्विजय सिंह अपने विश्वासपात्र लोगों से कह रहे हैं कि यह लोकतंत्र है, राजतंत्र नहीं है। ज्योतिरादित्य को चुनाव अभियान का प्रमुख बनाने से कांग्रेस को नुकसान हुआ है। यह बात दिग्विजय सिंह को ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष कांतिलाल भूरिया और विधायक दल के नेता अजय सिंह को भी नागवार गुजरी है। इन सभी का मानना है कि अगर मध्य प्रदेश में कांग्रेस जीतती है, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाने का दबाव रहेगा, क्योंकि वह चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष हैं। जबकि पिछले 5 सालों से शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह ने मोर्चा संभाला है और कई बार इन दोनों नेताओं ने अपनी आक्रामकता से शिवराज चौहान को पछाड़ा भी है और मुश्किल में भी डाला है। कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह को अब मुख्यमंत्री बनने का सपना ध्वस्त होते हुए प्रतीत हो रहा है। इसीलिए कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह दिग्विजय सिंह के पाले में अप्रत्यक्ष तौर पर खड़े हैं।

जनार्दन द्विवेदी अपनी रणनीति और अपने राजनीतिक हथकंडों को कभी भी उजागर नहीं होने देते हैं। हरियाणा में जनार्दन द्विवेदी ने भजनलाल जैसे शातिर राजनीतिज्ञ को हाशिए पर खड़ा करने की राजनीतिक चालबाजियां भी दिखाई थी। कभी भजनलाल की हरियाणा की राजनीति में तूती बोलती थी। कांग्रेस का केन्द्रीय कमान भी भजनलाल से रार लेने से बचता था। भजनलाल की वह ठसक जनार्दन द्विवेदी को पसंद नहीं आयी थी। जनार्दन द्विवेदी ने भूपेन्दर सिंह हुड्डा को खड़ा कर मुख्यमंत्री बनवाया और भजनलाल को हाशिए पर धकेल दिया। जनार्दन द्विवेदी ने ही मोहन प्रकाश शर्मा, अविनाश पांडे और सी.पी. जोशी जैसों की अपनी विश्वसनीय टीम खड़ी की है। पिछले चुनाव में गुजरात और उत्तर प्रदेश में टिकट भी मोहन प्रकाश शर्मा के मोहरे से जनार्दन द्विवेदी ने ही बांटी थी। जनार्दन द्विवेदी अब मध्य प्रदेश में मोहन प्रकाश शर्मा और ज्योतिरादित्य सिंधिया के माध्यम से चुनावी राजनीति को नियंत्रित कर रहे हैं और किसे टिकट मिले और किसका टिकट कटे, उस पर भी कड़ी निगाह रख रहे हैं।

अब यहां यह सवाल उठता है कि जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह के बीच में शह-मात का खेल किस प्रकार से कांग्रेस की चुनावी राजनीति पर असर डालेगा? कांग्रेस पिछले 10 सालों से मध्य प्रदेश में संघर्ष कर रही है और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। स्वतंत्र आकलन यह है कि कांतिलाल भूरिया और अजय सिंह ने कांग्रेस की कमजोर जड़ों को मजबूत किया है और शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ कांग्रेस को मजबूती से खड़ा किया है। अगर मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव पर ज्योतिरादितय सिंधिया का दबदबा रहेगा, तब कांग्रेस को नुकसान भी हो सकता है। कांतिलाल भूरिया-अजय सिंह की उपियोगिता को स्वीकार करनी ही चाहिए। निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि चुनावी पर्दे के पीछे से जनार्दन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह के बीच की जंग कहीं कांग्रेस की लूटियां ही न डूबा दे। कांग्रेस को इस जंग पर रोक लगानी ही होगी। परिवारवाद और व्यक्तिवाद की जगह आम कार्यकार्ताओं की चुनावी उपियोगिता को आत्मसात करना होगा, नहीं तो फिर शिवराज सिंह चौहान का चुनावी रथ कैसे रूकेगा?

 

विष्णुगुप्त

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