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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए खतरा

जो भी कोई चैनल प्रतिस्पर्धा में प्रधानमंत्री को दिखाएगा उसके खिलाफ अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग नियमों के अंतर्गत प्रतिकूल कार्रवाई होगी। साथ ही केबल नेटवर्क (नियमन) अधिनियम के अनुच्छेद 20 के अंतर्गत दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। यह एक असंवैधानिक सेंसरशिप आदेश है, जो मोदीफोबिया से प्रेरित है।

भारत के संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकार संवैधानिक बुनियादी ढांचे का अभिन्न हिस्सा हैं। इनमें संशोधन नहीं किया जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रतिस्थापित अधिकारों में सबसे महत्वपूर्ण अधिकार बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। यह सर्वश्रेष्ठ इसलिए है, क्योंकि अन्य मौलिक अधिकारों, जिन्हें किसी निश्चित उचित प्रतिबंधों के मद्देनजर सीमित किया जा सकता है, जबकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को किसी अपरिभाषित उचित प्रतिबंधों के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 19 (2) कुछ ऐसे निश्चित हालात प्रदान करता है, जिसके अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रतिबंधित किया जा सकता है। इन प्रतिबंधों का निश्चित रूप से भारत की प्रभुसत्ता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, बाहरी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, सार्वजनिक आदेश, शालीनता या नैतिकता या अदालत की अवमानना के संबंध में, मानहानि या किसी अपराध के लिए उकसाने से संबंध होना चाहिए।

सरकार अथवा चुनाव आयोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर किसी तरह का प्रतिबंध लागू नहीं कर सकता। यह ऊपर दी गई किसी भी परिस्थिति के दायरे से बाहर है। इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के संभावित उल्लंघन शायद ही देखने को मिले।

प्रधानमंत्री औैर प्रतिकूल विचार
पहला सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा 30/10/2013 को जारी आदेश है। इस आदेश में कहा गया है कि प्रधानमंत्री देश के नेता हैं और किसी राजनैतिक दल के नेता नहीं हैं। जब प्रधानमंत्री राष्ट्रीय अवसरों पर संबोधित करते हैं, उन्हें किसी के साथ किसी ‘बनावटी स्पर्धा’ में रखना उचित नहीं है। इससे प्रधानमंत्री के पद की अवमानना होती है और यह नीतिपरक पत्रकारिता के विरुद्ध है।

आदेश में आगे कहा गया है कि केबल नेटवर्क के नियम ऐसे किसी भी प्रसारण को वर्जित करते हैं जो रुचिकर नहीं है, जिसमें शालीनता का अभाव है, जो निंदात्मक या सामाजिक/सार्वजनिक और देश के नैतिक जीवन के लिए नुकसानदेह हैं। जो भी कोई चैनल प्रतिस्पर्धा में प्रधानमंत्री को दिखाएगा उसके खिलाफ अपलिंकिंग और डाउनलिंकिंग नियमों के अंतर्गत प्रतिकूल कार्रवाई होगी। साथ ही केबल नेटवर्क (नियमन) अधिनियम के अनुच्छेद 20 के अंतर्गत दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है। यह एक असंवैधानिक सेंसरशिप आदेश है, जो मोदीफोबिया से प्रेरित है। इस आदेश का असर यह होगा कि जब प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करेंगे, किसी अन्य भाषण का प्रसारण नहीं होना चाहिए। राज्यों के मुख्यमंत्रियों का बहिष्कार होना चाहिए। विपक्ष के नेता की कोई भी टिप्पणी सेंसर होनी चाहिए। अगर इस सिद्धांत को स्वीकार कर लिया जाए तो यह वित्त मंत्री के बजट भाषण अथवा भारत की सुरक्षा के बारे में रक्षा मंत्री की टिप्पणी तक जा सकता है। लोकतंत्र में सेंसरशिप का कोई स्थान नहीं है। सेंसरशिप प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से लागू नहीं की जा सकती। टिप्पणी और आलोचना जीवन पद्धति है। यहां तक कि सर्वोच्च अदालत के फैसलों की भी आलोचना होती है। सार्वजनिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति का सूक्ष्म परीक्षण किया जाना चाहिए। जब हम गलती करते हैं, हमारी आलोचना होनी चाहिए। आलोचना जनता को जवाबदेही का एक हिस्सा है। ऐसी आलोचना जो अनुच्छेद 19(2) के प्रतिबंधों का किसी प्रकार से उल्लंघन नहीं करती, उस पर रोक नहीं लगाई जा सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के न्यायसंगत अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए केबल कानून के अंतर्गत कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। केबल विनियम के अंतर्गत प्रतिबंधों को अनुच्छेद 19(2) के संदर्भ में पढ़ा जाना चाहिए। अन्यथा केबल विनियमों के ऐसे प्रावधान अनुच्छेद 19(1)(ए) के चंगुल में फंस सकते हैं।
एयरवेव सार्वजनिक संपत्ति है। ये भारत की जनता की है न कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय की। एयरवेव के इस्तेमालकर्ता सरकार द्वारा नियंत्रित होते है। इस्तेमालकर्ता पर केवल दो आधार पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। पहला, अगर एयरवेव उपलब्ध न हों, जो स्थिति इस समय नहीं है। दूसरा, अगर एयरवेव का इस्तेमालकर्ता अभिव्यक्ति की आजादी की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करता है और भारत की संप्रभुता और अखंडता अथवा अनुच्छेद 19(2) के किसी भी प्रतिबंध के खिलाफ अपने भाषण का इस्तेमाल करता है। भारत के प्रधानमंत्री से असहमति कोई ऐसा प्रतिबंध नहीं है, जिसका जिक्र अनुच्छेद 19(2) में किया गया हो।

अमरीका के राष्ट्रपति हर साल ‘स्टेट ऑफ दि नेशन’ भाषण देते हैं। उनका भाषण पूरा होने के बाद विपक्षी दल अपने प्रतिनिधियों के जरिये ‘स्टेट ऑफ द नेशन’ के बारे में अपनी विवेचना करते हैं। इसका विश्व स्तर पर प्रसारण होता है। विचारों की बहुलता भारतीय लोकतंत्र का बुनियादी पहलू है। अगर प्रधानमंत्री राष्ट्रीय दिवस पर राष्ट्र के नाम संदेश देते हैं, तो मुख्यमंत्री और विपक्ष भी यही करता है।

विज्ञापन के समय पर प्रतिबंध
टीआरएआई की सलाह पर पहले सरकार ने एक घंटे में प्रसारित होने वाले विज्ञापनों की अधिकतम संख्या पर रोक लगा रखी थी। स्पष्ट तौर पर इससे एक न्यूज चैनल के बिजनस को नुकसान हुआ। लेकिन असल में इसने स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार को नुकसान पहुंचाया। संविधान सभा में, स्वर्गीय श्री रामनाथ गोयनका को यह आभास हो गया था कि एक दिन ऐसा समय आएगा, जब स्वतंत्र अभिव्यक्ति के अधिकार पर न केवल सेंसरशिप के जरिये प्रतिबंध लागू होंगे, बल्कि मीडिया संगठनों के कामकाज के क्षेत्र को भी तकलीफ पहुंचेगी। व्यावसायिक विज्ञापन स्वतंत्र अभिव्यक्ति का समर्थन करते हैं। अगर समाचारपत्रों और टेलीविजनों पर कोई विज्ञापन नहीं होंगे तो वे अपना अस्तित्व बनाकर नहीं रख सकेंगे। विज्ञापन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के अनुपूरक हैं। दर्शक लंबे विज्ञापनों से बोर होते हैं और उनकी बोरियत अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत स्वीकृति योग्य रोक नहीं है। अमरीका और भारत दोनों जगहों पर, अदालतों का मत है कि किसी मीडिया संगठन के व्यवसाय को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार के इस्तेमाल से अलग नहीं किया जा सकता। अगर किसी समाचारपत्र का आकार सीमित कर दिया जाए अथवा विज्ञापनों की संख्या सीमित कर दी जाए, तो इसका उसके बचे रहने पर सीधा असर पड़ेगा। यहां तक कि अगर समाचारपत्र का प्रसार अथवा चैनल की व्यूअरशिप उसके राजस्व को काटने से प्रभावित होती है, इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचता है।

चुनाव विश्लेषण
भारत में चुनाव विश्लेषण परिपक्व हो रहा है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हो रहे हैं। कुछ विश्वसनीय होते हैं और कुछ की अनदेखी की जा सकती है। कुछ ‘सहभागी चुनाव विश्लेषण’ होते हैं। इनकी विश्वसनीयता हो या न हो, क्या इन पर रोक लगाई जा सकती है? अमरीका में गैलप जैसे चुनाव सर्वेक्षण ने काफी विश्वसनीयता हासिल की है। सावधानीपूर्वक एकत्र किए गए छोटे-छोटे नमूने भी, चुनाव सर्वेक्षण में आमतौर से सही साबित हुए हैं। जब चुनाव पूर्व सर्वेक्षण के रुझान राजनैतिक दलों के विरुद्ध होते हैं, तो वे इसे बकवास बताते हैं और फिर इस पर रोक की मांग करते हैं। जब राजनीतिक दल को इससे फायदा मिलता दिखता है तब वे इसे जारी रखना चाहते हैं। इस तरह के सर्वेक्षणों पर रोक लगाने पर इस आधार पर विचार नहीं किया जा सकता कि कौन इस तरह की मांग कर रहा है। स्पष्ट रुप से सर्वेक्षण स्वतंत्र अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं। उन पर रोक लगाने की न तो संवैधानिक रुप से इजाजत है और न ही इसकी जरुरत है। इस विवाद से अलग रखने के लिए चुनाव आयोग सबसे उपयुक्त सलाहकार होगा और सर्वेक्षण के जो परिणाम हैं उसे लोकतांत्रिक व्यवस्था पर छोड़ देना चाहिए कि वह उसे स्वीकार करता है या नहीं। कानूनी रुप से यदि चुनाव पूर्व सर्वेक्षण पर रोक लगा दी जाती है तो इसके बाद राजनीतिक टिप्पणीकारों पर भी प्रतिबंध लग सकता है, जो किसी के पक्ष में या किसी के विरुद्ध संभावना व्यक्त करते हैं। हार की संभावना वाले अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नियम में बदलाव नहीं कर सकते।

अरुण जेटली
(लेखक राज्यसभा में विपक्ष के नेता हैं)

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