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सचिन का जाना और राहुल का आना!

पिछले दिनों दो महत्वपूर्ण घोषणाएं हुईं। सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा की तो राहुल गांधी ने 2014 मे जिम्मेदारी लेने की बात कही। सीधे-सीधे तो नहीं, मगर उन्होंने कहा कि 2014 में युवाओं की सरकार आएगी। दोनों घटनाएं हालांकि बहुत अलग-अलग हैं। एक का संबंध क्रिकेट से है, तो दूसरी का राजनीति से। हालांकि यह भी सही है कि क्रिकेट और राजनीति हमारे देश में बहुत गहराई तक जुड़े हुए हैं। कहते हैं कि जितनी ज्यादा राजनीति क्रिकेट में होती है, उतनी तो खुद राजनीति में भी नहीं होती!

दोनों ही घटनाओं का देश पर लंबा और गहरा असर पडऩे वाला है। क्रिकेट इस देश में एक धर्म की तरह हो गया है और सचिन तेंदुलकर निर्विवाद तौर पर उसके सबसे बड़े ‘देवता’ हैं। देश की युवा पीढ़ी के लिए जो उंगलियों पर गिने जाने वाले समकालीन आदर्श बचे हैं, सचिन उनमें सबसे आगे हैं। उनका क्रिकेट के बल्ले को अलविदा कहना, न सिर्फ देश की क्रिकेट टीम पर असर डालेगा, बल्कि उन्हें आदर्श मानने वाले करोड़ों भारतियों को दूर तक प्रभावित करेगा। उसका कारण है – 1989 में पकिस्तान के दौरे से अपना अंतर्राष्ट्रीय खेल जीवन शुरू करने वाले सचिन, उन सारे मर्यादाओं और मूल्यों के प्रतीक बन चुके हैं जो आदर्शपूर्ण, उचित और श्रेष्ठतम हैं।

राहुल के बारे में कहा जाए तो अपनी राजनीतिक पारी का आगाज तो उन्होंने जोर-शोर से किया था, लेकिन इतने सालों बाद भी लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि वह राजनीति के मैदान में किस भूमिका में हैं – बल्लेबाज की भूमिका में हैं या फिर बॉलर की, कोच की या एक्स्ट्रा प्लेअर की? दरअसल देखा जाए तो अधिक से अधिक अब तक वह नॉन प्लेयिंग कैप्टन ही रहे हैं। इसलिए अब उनके कहने का निहितार्थ अगर यह है कि वह अब सिर्फ बाहर से आदेश नहीं देते रहेंगे और खुद मैदान में उतर कर बाउंसर झेलेंगे, तो देश की राजनीति इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगी। वैसे जेलबंद नेताओं पर केंद्र सरकार के अध्यादेश को ‘बकवास’ बताकर ‘रद्दी की टोकरी’ में फिंकवाने के बाद राहुल गांधी ने यह ख्याति तो अर्जित की है कि वह अपने तरीके से न सिर्फ काम करना चाहते हैं, बल्कि ऐसा करने में वह सक्षम भी हैं।

इसी कॉलम में हमने इस अध्यादेश को उनके द्वारा इस तरह से खारिज करने को गलत बताया था। तरीका यकीनन गलत था, लेकिन यह बात भी सही है कि वह अध्यादेश लाना सरकार का बेहद गलत फैसला था। राहुल ने अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा करके और फिर यह कह कर कि 2014 में देश में युवाओं की सरकार आएगी, साफ कर दिया है कि अब वह कांग्रेस का ही नहीं, सरकार का भी नेतृत्व करने को तैयार हैं। यह अच्छा ही होगा, क्योंकि सत्ता की कुंजी और ताकत किसी एक के पास हो और उसकी सांविधानिक जवाबदेही किसी अन्य के पास – यह मॉडल असफल हो गया है और देश ने इसकी बड़ी कीमत चुकाई है।

याद कीजिए जब 1989 में पाकिस्तान के दौरे पर सचिन ने टेस्ट खेलना शुरू किया था, तब उनकी उम्र सिर्फ 16 साल और 223 दिन ही थी। राहुल गांधी कोई दस साल पहले 2004 में राजनीति में आए। राहुल और सचिन दोनों ही शुरू से ही मीडिया के लाडले रहे हैं और युवाओं का एक वर्ग उनसे बड़ी उम्मीदें रखता रहा है। सचिन हमेशा इस उम्मीद पर खरे उतरे हैं, जबकि राहुल हमेशा ‘हैं भी और नहीं भी’ से बाहर नहीं आ पाए हैं। राहुल और सचिन में बस इतनी ही समानता है कि यह घोषणा तकरीबन साथ-साथ हुई है, बाकी चीजों में दोनों के सिरे कहीं जुड़ते नहीं। तैतालीस साल के राहुल के पास अभी दिखाने को खानदानी नाम ‘गांधी’ के अलावा कुछ भी नहीं है, जबकि चालीस साल के सचिन ने अपनी मेहनत, लगन और जज्बे से ‘तेंदुलकर’ को भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया भर में उस मुकाम पर पहुंचा दिया है, जहां पंहुचने की तो क्या, उसके ख्वाब की कल्पना करना भी आज तकरीबन नामुमकिन है।

सचिन की घोषणा पर मन में एक कसक सी जरूर उठती है कि वह और खेल सकते थे। उनकी उपलब्धि और गरिमा पर उनके हर फैन का सीना गर्व से भर जाता है। मगर राहुल अब भी इशारों में ही बात कर रहे हैं। उनके कहने में स्पष्टता का अभाव है। वह शायद अब भी ‘बैक सीट ड्राइविंग’ यानि पीछे बैठकर गाड़ी चलाने का विकल्प अपने पास रखकर चल रहे हैं। कोई उन्हें बताए कि ‘कभी हां और कभी ना’ के फेर में अकसर गाड़ी छूट जाती है!

 

उमेश उपाध्याय

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