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मंगलम् भवति

दीपावली के बाद आए मंगलवार की दोपहर को घड़ी ने जैसे ही दो बज कर 38मिनट बजाए, वैसे ही उस दिन प्रात: छह बज कर आठ मिनट पर शुरू हुई उलटी गिनती पूरी हो गई और श्रीहरिकोटा के प्रक्षेपण स्थल से भारत का मंगलयान- पीएसएलवी 25 अन्तरिक्ष में पृथ्वी से करोड़ों मील दूर घूम रहे मंगल ग्रह की सतह और वहां के माहौल का जायजा लेने के लिए अपनी यात्रा पर रवाना हो गया। हालांकि भारतीय यान को मंगल की कक्षा में पहुंचने में अभी एक साल का वक्त लगेगा, लेकिन मंगलयान के सफल प्रक्षेपण को भारतीय वैज्ञानिकों के लिए अन्तरिक्ष तकनीक में एक बड़ी उपलब्धी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। मंगलयान यदि अगले वर्ष मंगल की कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित हो जाता है तो यूरोप, अमेरिका और रूस के साथ भारत भी विश्व के मंगल मिशन क्लब में शामिल हो जाएगा। मंगलयान प्रक्षेपण हालांकि पूरे अभियान का प्रथम किन्तु सबसे आसान चरण था, लेकिन भारतीयों के लिए इसकी सफलता इसलिए गर्व करने लायक है क्योंकि अन्य देशों अनेक मंगल अभियानों में से कई तो केवल प्रक्षेपण के चरण में ही विफल हो गए थे। लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों ने सीमित बजट से बहुत ही कम समय में तैयारी कर उसमें सफलता प्राप्त की है।

भारत का मंगलयान इसी वर्ष एक दिसम्बर तक पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाएगा और फिर सूर्य के गुरूत्वाकर्षण क्षेत्र से गुजरता हुआ 78 करोड़ मील की यात्रा पूरी कर लगभग एक साल बाद 24 सितम्बर 2014 को मंगल की कक्षा में प्रवेश करेगा। मंगल की कक्षा में प्रवेश कराने के क्रम में यान को सटीक तौर पर धीमा किया जाना है, जिससे मंगल अपने छोटे गुरूत्व बल से अपने उपग्रह के रूप में स्वीकार कर ले। मंगल की कक्षा में प्रवेश करने से पहले भारतीय यान को अनेक अग्रिपरीक्षाओं से गुजरना होगा, जिनमें से अधिसंख्य का अनुमान लगाना आसान नहीं है। रवानगी को अभी से इस अभियान की सफलता तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन जिस सफलतापूर्वक मंगलयान को उसके लक्ष्य की ओर रवाना किया गया है, उस से इस अभियान के सफल होने की उम्मीदें काफी अधिक मानी जा रही हैं। इसलिए इस अभियान की सफलता पर पूरी तरह झूमने का समय तो अगले एक साल बाद ही आएगा, अभी तो इस मंगलयान के सफल प्रक्षेपण पर खुश हुआ जा सकता है। अब तक मंगल के अधिसंख्य अभियान असफल ही रहे हैं। 51अभियानों में से केवल 21अभियान ही सफल हुए हैं जो विश्व की तीन अन्तरिक्ष एजेंसियों-यूरोपीय स्पेस एजेंसी, अमेरिकी नासा और रूस की रॉस्कॉस्मोज ने भेजे थे। इसलिए भारत के 450 करोड़ रूपए की लागत के इस अभियान पर तमाम दुनिया की नजरें गड़ी हैं। यह लागत अन्य देशों के मंगल मिशनों पर आई लागत की तुलना में बहुत कम है। इसका मुख्य कारण इसरो के मंगलयान का आकार है जो कुल डेढ़ टन का है। यह अन्य मंगल मिशनों से बहुत हल्का है।

अन्तरिक्ष के क्षेत्र में अनेक संभावनाओं को जन्म देने वाले इस अभियान पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इसे भारतीय वैज्ञानिकों को नई ऊंचाइयां हासिल करने के लिए प्रेरित करने वाला बताया, जबकि मिसाइल मैन के नाम से लोकप्रिय पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उम्मीद जताई है कि इसरो मंगलयान मिशन में कई और चुनौतियों को सफलतापूर्वक पार करेगा और इसकी प्रौद्योगिकी क्षमता मिशन उद्देश्यों को हासिल करेगा। इसरो के प्रमुख के. राधाकृष्णन का कहना है कि देश के पहले मंगल अभियान का लक्ष्य इस ग्रह पर सार्थक शोध करना है, आज से 20-30साल बाद जिसमें जीवन बसाने की संभावना बन सके।

इसरो प्रमुख ने पूजा की
ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मंगल नवग्रहों में बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है। किसी शुभ कार्य से पूर्व नवग्रहों की शान्ति कराई जाती है, जिसमें मंगल का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। वैदिक ज्योतिष बताता है कि मंगल व्यक्ति को पराक्रम देता है और कठिनाइयों से लडऩे की शक्ति देता है। भारत के पहले मंगल मिशन पर अन्तरिक्ष में यान के प्रक्षेपण से पूर्व इसरो प्रमुख के. राधाकृष्णन ने अभियान की सफलता के लिए मंगलयान की प्रतिकृति के साथ तिरूपति वेंकेटेश्वर मंदिर में पूजा की। यह पहला अवसर नहीं था जब इसरो प्रमुख ने ऐसा किया हो। के. राधाकृष्णन पहले भी ऐसा कर चुके हैं। साफ है कि अपनी मेहनत के साथ ईश्वर का आशीर्वाद भी किसी शुभ कार्य के लिए बहुत आवश्यक होता है।
कई अभियानों में मंगल पर यान उतारे जा चुके हैं। नासा के छह पहियों वाले दो रोवर-ऑपोरच्युनिटी और क्यूरॉसिटी इस वक्त मंगल पर चहलकदमी कर वहां की धरती की रासायनिक जांच करने में लगे हैं। लेकिन इसरो का इरादा मंगलयान को लाल ग्रह पर उतारने का नहीं है। इस अभियान का एक बड़ा उद्देश्य लाल ग्रह पर जीवन के संकेतों की तलाश के लिए सेंसर के जरिए पूरे ग्रह पर मीथेन की तलाश किया जाना है। यदि सब कुछ सही रहता है तो अगले साल सितम्बर में भारतीय यान मंगल की कक्षा में प्रवेश कर उसकी परिक्रमा करना शुरू करेगा। लेकिन इसरो के इस अभियान की शुरूआत में ही भारतीयों के सीने गर्व से चौड़े होने के कई कारण हैं। इनमें पहला कारण तो यही है कि भारत सरकार से अगस्त 2012 में मंजूरी मिलने के बाद केवल 15 महीनों में ही भारतीय वैज्ञानिकों ने मंगलयान के प्रक्षेपण की सफलता हासिल की है। जिस की खूबी यह है कि यह स्वदेशी उपकरणों से लैस है और इसे स्वदेशी रॉकेट के जरिए भारत की धरती से छोड़ा गया है। इसमें खुद की मरम्मत करने की क्षमता है। यह यान सूर्य से ऊर्जा हासिल करेगा। मंगल की कक्षा में भारतीय यान के पहुंचने पर वह इस लाल ग्रह की परिक्रमा करेगा। मंगल की कक्षा अंडाकार होने के कारण पृथ्वी से उसकी दूरी कभी कम तो कभी अधिक हो जाती है। पृथ्वी से इस लाल ग्रह की न्यूनतम दूरी 5.4 करोड़ मील और अधिकतम दूरी 40 करोड़ मील होती है।

इसरो अपने इस अभियान में पूरी सावधानी बरत रहा है। इसका एक कारण अपने और अन्य देशों के अन्तरिक्ष मिशनों के अनुभव तो हैं ही, साथ ही, लांचर का हल्का होना है। इसलिए मंगलयान की रफ्तार और धरती से दूरी धीरे-धीरे ही बढ़ाए जाने की इसरो की योजना है।

इस अभियान का उद्देश्य मंगल तक यान भेजने वाले उन चंद देशों के क्लब में शामिल होना है जिन्होंने अपने यान मंगल तक भेजे हैं। इसके अतिरिक्त भारतीय अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों को इससे नया वैज्ञानिक एवं तकनीकी कौशल व अनुभव भी प्राप्त होगा, जो इस अभियान के महत्व को अधिक दर्शाता है। वैसे दुनिया को चन्द्रमा पर वॉटर-मॉलिक्यूल्स की मौजूदगी की जानकारी देने के बाद माना तो यह जा रहा था कि इसरो जीएसएलवी या चन्द्रयान-2 विकसित करेगा, इसके विपरीत चन्द्रयान-2 अभियान पर अधिक ध्यान देने की बजाय मंगल अभियान पर इसरो ने ध्यान केन्द्रित कर 15 महीनों में ही मंगल की ओर कदम बढ़ा दिए। भारत के पहले मिशन चन्द्रयान-1 ने चन्द्रमा पर वॉटर-मॉलिक्यूल्स की मौजूदगी की पुष्टि की थी।

भारतीय मंगल अभियान पर आई लागत नासा के पहले मंगल मिशन का दसवां और चीन-जापान के असफल अभियानों का एक चौथाई है। फिर भी भारतीय मंगलयान के सफल प्रक्षेपण पर चीन और अमेरिकी मीडिया में इस अभियान पर खर्च की गई राशि को पूरी तरह से फिजूलखर्ची बता कर आलोचना की गई है। चीन के ग्लोबल टाईम्स और अमेरिका के न्यूयार्क टाईम्स ने यह कह कर आलोचना की है कि जिस देश में हजारों लोग हर वर्ष भूख और मलेरिया व डेंगू जैसी सामान्य बीमारियों से मर रहे हों, वहां केवल अन्तरिक्ष अभियान क्लब में शामिल होने के लिए इस प्रकार के अभियानों पर 450 करोड़ रूपए जैसी बड़ी राशि खर्च करना उचित नहीं है। चीनी मीडिया में ऐसे सफल प्रक्षेपण पर इस प्रकार की टिप्पणी केवल उनकी ईष्र्या की द्योतक हो सकती है, अन्यथा आज के युग में कौन नहीं जानता कि अन्तरिक्ष अब खुद में ही एक आर्थिक-ब्रह्मांड का रूप ले चुका है। दुनिया का अन्तरिक्ष अर्थ-जगत आज 304 अरब डॉलर से भी बहुत अधिक की ऊंचाई छू चुका है। डीटीएच से लेकर मौसम के पूर्वानुमान और आधुनिक संचार प्रणाली, शिक्षा आदि सभी क्षेत्र आज अंतरिक्ष की ऊंचाई छू रहे हैं। यह जरूर है कि गरीबी किसी देश के विकास में एक बड़ी रूकावट बनती है। लेकिन गरीबी के अंधियारों, अशिक्षा और बीमारियों से जूझने की शक्ति तो विकास के प्रकाश से ही प्राप्त होगी। इतिहास के पन्नों में झांकें तो चीनी मीडिया और अमेरिकी मीडिया की ऐसी ईष्र्या भरी आलोचनाओं के जवाब खोजने कठिन नहीं होंगे। 1970 में भारत ने आर्यभट्ट उपग्रह अन्तरिक्ष में भेजा था। दुनिया जानती है कि तब अमेरिका का नजला भारत पर गिर रहा था। यदि भारत ने उस वक्त आर्यभट्ट प्रक्षेपित नहीं किया होता तो क्या आज भारत सूचना-क्रांति की ताकत बटोर कर सिर उठा सकता था। कई बार ऐसे खर्च, जो दूसरों को हमारी ऐय्याशी या फिजूलखर्ची लग रहे होते हैं, वे विकास की दिशा में ऐसे निवेश होते हैं, जिनके परिणाम वक्त के गर्भ में होते हैं और जब वक्त आता है तो आलोचनाएं करने वाले ही आपके सम्मान में खड़े होते हैं।

 

श्रीकान्त शर्मा

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