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गुर्जर आंदोलन का असर

गहलोत सरकार ने गुर्जरों के लिए 1 प्रतिशत कोटा का प्रावधान कर शेष 4 प्रतिशत, स्वयं गुर्जरों के निर्णय पर छोड़ दिया। यह गहलोत सरकार द्वारा गुर्जरों को दिया गया लॉलीपॉप था। मामला विचाराधीन होने की बात कहकर अशोक गहलोत गेंद को हाईकोर्ट के पाले में डाल, स्वयं बच निकले। सरकारी नौकरी में 5 प्रतिशत आरक्षण की गुर्जरों की मांग को हाईकोर्ट ने यह कह कर खारिज कर दिया कि ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जिससे उनकी मांगों को न्यायसंगत माना जाए।

अशोक गहलोत के नेतृत्व में राजस्थान में 2008 में बनी कांग्रेस सरकार अपने जन्म के वक्त अल्पमत में थी। तब 200 में से 98 सीटों पर कांग्रेस और 79 सीटों पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। कांग्रेस की मानसिकता वाले निर्दलीय विधायकों के समर्थन से अशोक गहलोत राज्य में सरकार बनाने में सफल रहे थे। भाजपा ने जानबूझ कर सरकार बनाने की कोशिश नहीं की, क्योंकि उसे लगा था कि बसपा उसे समर्थन नहीं देगी। गहलोत पाला बदल कर बसपा के छह विधायकों के सहयोग से सरकार बनाने में सफल रहे थे।

ऐंटी-इंकम्बैंसी कारकों और वसुंधरा राजे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों के बावजूद, भाजपा का प्रदर्शन अधिक खराब नहीं था। भाजपा की सीटों में कमी वर्तमान विधायकों का टिकट जाने का दुष्परिणाम था। जिन विधायकों का टिकट काटा गया था, उसका आधार बताया गया था कि उन्होंने पिछले पांच सालों के दौरान स्थापित मानदंडों के अनुसार काम नहीं किया। टिकट काटने की एक वजह विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन भी था। कई विधायकों को परिसीमन के कारण अपनी सीटें गंवानी पड़ी थीं।

वसुंधरा द्वारा नए विधानसभा क्षेत्रों का अपर्याप्त अध्ययन, अनुभव की कमी, जाति समीकरण और गलत सलाह के कारण भाजपा 54 सीटों पर हार गई। 40 विधायकों के टिकट कट जाने के कारण वे बागी हो गए थे। बागी विधायकों ने अगामी चुनाव में कोई रूचि नहीं दिखाई और पार्टी के खिलाफ प्रचार किया।

भाजपा की हार के लिए क्षेत्र और संभाग स्तर पर किए गए अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ कि कांग्रेस ने परिसीमन और जाति समीकरण को बेहतर तरीके से समझा। तमाम खामियों के बावजूद, कांग्रेस ने भाजपा से कम गलतियां की।

मीणा समुदाय के डॉ. किरोड़ीलाल मीणा के साथ तथाकथित दुव्र्यहार के बाद, किरोड़ीलाल ने अपनी पत्नी गोलमा देवी के साथ निर्दलीय चुनाव लड़कर अपने समुदाय को तगड़ा संदेश भेजा। भाजपा शासन के दौरान पुलिस फायरिंग में 60 गुर्जरों को अपनी जानें गंवानी पड़ी थी। गुर्जर, मीणा समुदाय की तरह ही अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मांग कर रहे थे। तीन अलग-अलग आंदोलनों में गुर्जरों की बड़ी संख्या में मौतें हुई थीं। सैकड़ों लोग घायल हुए थे और संपत्ति का बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था।

2006 की शुरूआत से ही गुर्जर राज्य सरकार से अनुसूचित जनजाति का स्टेटस दिए जाने की मांग कर रहे थे। राज्य में अनुसूचित जनजाति के सबसे ज्यादा लाभान्वित मीणा समुदाय ने गुर्जरों की इस मांग की तीखी आलोचना की। पुलिस और आंदोलनकारियों के साथ-साथ, दोनों समुदायों के बीच भी कई हिंसक संघर्ष हुए।

गुर्जरों की मांग पर विचार करने के लिए गठित जस्टिस चोपड़ा आयोग ने गुर्जरों की मांग को दिसंबर 2007 में खारिज कर दिया। इससे गुर्जरों और भाजपा सरकार के बीच द्वेष बढ़ता गया। 2008 की गर्मी के दौरान गुर्जरों का दूसरा आंदोलन शुरू हो गया। यह आंदोलन लगभग एक महीने तक चला। यह आंदोलन पहले की अपेक्षा व्यापक, ज्यादा उग्र और हिंसक था। तब आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए भारतीय सेना बुलानी पड़ी थी। पिछली घटना की तरह, इस बार मीणा और गुर्जर समुदाय के बीच संघर्ष नहीं हुआ। आंदोलन तब शांत हुआ, जब मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, विशेष श्रेणी के तहत गुर्जरों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने को राजी हुईं।

प्रदर्शन के दौरान 37 लोगों की मौत हुई थी। इन हताहतों के अलावा बहुत से लोग घायल हुए और करोड़ों रूपए की सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ। गडिया लुहार, रेबारी और बंजारा जाति को 5 प्रतिशत आरक्षण देने के बजाय गुर्जरों ने अनुसूचित जनजाति में शामिल किए जाने की मांग रखी।

गुर्जरों को कोटा देने के कारण मीणा समुदाय को खासा नुकसान हुआ। इसके कारण पूर्वी और उत्तरी राजस्थान के अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 25 सीटों पर भाजपा को भारी नुकसान हुआ। भाजपा ऐसा समाधान निकालने में असमर्थ रही, जिससे मीणा और गुर्जर दोनों समुदायों को खुश रख सके। इसका परिणाम यह हुआ कि दोनों ही समुदायों ने भाजपा के खिलाफ वोट दिया।

मीणाओं की बड़ी आबादी होने के कारण, गुर्जरों को वसुंधरा खुश नहीं कर सकती थीं। मीणा पहले से ही अनुसूचित जनजाति का लाभ ले रहे थे और विधानसभा की 25 सीटों पर प्रतिनिधित्व कर रहे थे। गंगानगर और हनुमानगढ़ जिले के चार विधानसभा क्षेत्रों में गलत उम्मीदवारों का चयन करने के कारण हार का मुंह देखना पड़ा। जातिगत रूप से संवेदनशील शेखावती क्षेत्र में भी गलत उम्मीदवारों के चयन के कारण 10 सीटों का नुकसान हुआ। इन सीटों पर या तो कांग्रेस जीती या फिर बसपा या सीपीएम। इस तरह शेखावती क्षेत्र से भाजपा का सफाया हो गया। वर्तमान विधायकों का टिकट काटना, मीणा बहुल क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों पर गलत उम्मीदवारों का चयन करना, कुछ ऐसी गलतियां हैं, जिसके कारण दौसा, सवाई माधोपुर और जयपुर जिले की 15 सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं। मरवाड़-मेवाड़ क्षेत्र में भी भाजपा को काफी नुकसान हुआ। यहां तक की वसुंधरा के हदौती क्षेत्र में भी भाजपा की 5 सीटें कांग्रेस के हाथ में चली गई।

हाल ही में शुरू हुए तीसरे आंदोलन का आधार तब तैयार हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने गुर्जरों को दिए जा रहे 5 प्रतिशत आरक्षण पर रोक लगा दिया। इस रोक का कारण सीधा था। गुर्जरों को दिए जाने वाले आरक्षण के कारण, राज्य में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंच रही थी। साधारण परिस्थितियों में किसी भी राज्य में 50 प्रतिशत की सीमा से ज्यादा दिया जाने वाला आरक्षण असंवैधानिक है। हालांकि महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा है, लेकिन उसके लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।

राज्य में दिसंबर 2008 में जब कांग्रेस की सरकार बनी, गुर्जरों ने निर्णय किया कि वे अपनी मांगों को मनवाने के लिए, हिंसा का सहारा नहीं लेंगे। गहलोत सरकार ने गुर्जरों के लिए 1 प्रतिशत कोटा का प्रावधान कर शेष 4 प्रतिशत, स्वयं गुर्जरों के निर्णय पर छोड़ दिया। यह गहलोत सरकार द्वारा गुर्जरों को दिया गया लॉलीपॉप था। मामला विचारधीन होने की बात कहकर अशोक गहलोत गेंद को हाईकोर्ट के पाले में डाल, स्वयं बच निकले। सरकारी नौकरी में 5 प्रतिशत आरक्षण की गुर्जरों की मांग को हाईकोर्ट ने यह कह कर खारिज कर दिया कि ऐसा कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जिससे उनकी मांगों को न्यायसंगत माना जाए।

जो भी हो, वसुंधरा पहले की अपेक्षा अब ज्यादा परिपक्व हैं। उनके पास जीतने योग्य उम्मीदवारों को चुनने और बेहतरीन सलाह देने वाले लोगों की एक टीम है। यह पहली बार है कि कोई लहर या एंटी-इंक्बैंसी फैक्टर नहीं है। गहलोत सरकार द्वारा मुफ्त चिकित्सा, पेंशन और सस्ता अनाज देने की घोषणा के साथ यह अंदाजा लगाना कठिन है कि चुनावी नतीजे क्या होंगे। भाजपा की तरह कांग्रेस भी उम्मीदवारों के चयन में सावधानी बरत रही है।

 

जयपुर से पी. बी. चंद्रा

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