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गहलोत वसुंधरा में तीसरा घमासान

राहुल गांधी ने अगस्त माह में पार्टी प्रत्याशियों के नाम घोषित करने की बात कही थी। ब्लाक से जिला स्तर पर फीडबैक, मंथन, साक्षात्कार, विभिन्न स्तरों पर पर्यवेक्षकों के दौरे तथा पिछले एक माह से अधिक अवधि से चल रही कवायद के बावजूद कांग्रेस की पहली सूची 63 अंक के अनुरूप पार्टी में एकजुटता की परिचायक नहीं बन सकी है। राज्य की राजनीति में ‘गॉड फादर’ की भूमिका में उभरे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पंसद को सूची में विशेष तरजीह मिली और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. सी.पी. जोशी के कई प्रमुख समर्थक अभी प्रतीक्षा में रखे गए हैं।
चौदहवीं राजस्थान विधानसभा के गठन के लिए प्रमुख प्रतिपक्षी दल – भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने पहले झटके में भाईदूज के अवसर पर दो सौ सदस्यीय सदन में 176 उम्मीदवारों की सूची जारी कर चुनावी घमासान की राजनीति में मनोवैज्ञानिक बढ़त हासिल कर ली है। संख्या की दृष्टि से यह सूची सत्तारूढ़ कांग्रेस की पहली सूची के मुकाबले ढाई गुने से अधिक है। कांग्रेस ने दीपावली की पूर्व संध्या पर 63 प्रत्याशियों की सूची जारी की थी।

राजस्थान के प्रभारी कांग्रेस महासचिव गुरूदास कामत के माध्यम से चुनावी रणनीति को अंजाम देने वाले पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अगस्त माह में पार्टी प्रत्याशियों के नाम घोषित करने की बात कही थी। ब्लाक से जिला स्तर पर फीडबैक, मंथन, साक्षात्कार, विभिन्न स्तरों पर पर्यवेक्षकों के दौरे तथा पिछले एक माह से अधिक अवधि से चल रही कवायद के बावजूद कांग्रेस की पहली सूची 63 अंक के अनुरूप पार्टी में एकजुटता की परिचायक नहीं बन सकी है। राज्य की राजनीति में ‘गॉड फादर’ की भूमिका में उभरे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की पंसद को सूची में विशेष तरजीह मिली और पूर्व केन्द्रीय मंत्री पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव डॉ. सी.पी. जोशी के कई प्रमुख समर्थक अभी प्रतीक्षा में रखे गए हैं। यही नहीं गहलोत मंत्रिमंडल के तीन प्रमुख कैबिनेट मंत्री श्रीमती बीना काक, हरजीराम बुरडक और हेमाराम चौधरी, राज्यमंत्री वीरेन्द्र बेनीवाल, रामकिशोर सैनी, डॉ. राजकुमार शर्मा, श्रीमती नसीम अख्तर इंसाफ को पहली सूची में जगह नहीं मिली तो तेरह संसदीय सचिवों में महज दो के अलावा सभी टिकट से वंचित रखे गए हैं। पिछले चुनाव में निर्वाचित बसपा के सभी छ: विधायकों ने कांग्रेस सरकार को समर्थन देकर पार्टी का विलय भी कर लिया था। इनमें केवल दो को अभी पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाया है। तीसरे डॉ. राजकुमार शर्मा ने बगावत कर निर्दलीय चुनाव लडऩे की घोषणा की है। केन्द्रीय मंत्री शीशराम ओला उनका टिकट कटवाने में सफल रहे हैं। अलबत्ता विधानसभा अध्यक्ष दीपेन्द्र सिंह शेखावत (श्रीमाधोपुर) मुख्य सचेतक डॉ. रघु शर्मा (केकड़ी) तथा उपसचेतक रतन देवासी (रानीवाड़ा) को पहली सूची में जगह मिली है, जबकि तीन साल की अवधि निकलने के बाद बनाए गए विधानसभा उपाध्यक्ष रामनारायण मीणा को अभी हरी झंडी नहीं मिली है। टिकट वितरण के लिए आयु, हार-जीत के अंतर इत्यादि मापदण्डों को भी दरकिनार किया गया है। अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी कृष्णा पूनिया ने रेलवे की नौकरी छोड़ कर, राजनीति में कदम रखा है और उन्हें सादुलपुर से चुनाव लड़ाया जा रहा है। वर्तमान विधायक निर्मला सहरिया के स्थान पर उनकी मां चतरीबाई को (किशन गंज बांरा) से प्रत्याशी बनाया गया है। नए चेहरों में महंत निर्मलदास (सिवाना-बाड़़मेर), उर्मिला जोगी (थानागाजी-अलवर), भंवर सिंह भाटी (कोलायत-बीकानेर), और जगदीश जॉदू (गंगानगर) शामिल हैं। पिछले चुनाव में पराजित आठ प्रत्याशियों को फिर मौका दिया गया है। इनमें पूर्व सांसद और पूर्व भरतपुर राजघराने के वारिस विश्वेन्द्र सिंह (डीग-कुम्हेर), पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नारायण सिंह (दांतारामगढ़-सीकर), पूर्व मंत्री और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. बी.डी. कल्ला (बीकानेर-पश्चिम), जुबेर खान (रामगढ़-अलवर), नईमुद्दीन (लाडपुरा-कोटा), संयम लोढा (सिरोही), प्रतिभासिंह (नवलगढ़-झुंझुनू) और शकुंतला रावत (बानसूर-अलवर) को चुनाव मैदान में उतारा गया है।

वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुन्धरा राजे ने सुराज संकल्प यात्रा के दौरान जनता की नब्ज टटोलने के साथ संभावित प्रत्याशियों के बारे में फीडबैक तथा धौलपुर के राजमहल तथा विरोध के स्वर उठने पर राणकपुर पाली में जिला एवं संभागवार पार्टी पदाधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों से चर्चा की प्रक्रिया अपनाई। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों से सलाह मश्विरा किया। संघ के सर कार्यवाह भैय्या जी जोशी तथा अन्य प्रमुख लोगों से सवाई माधोपुर में मुलाकात की। दिल्ली में अपने निजी आवास पर फीडबैक लेते हुए विभिन्न बैठकों में चिंतन मनन के बाद पहली बार में 176 प्रत्याशियों की घोषणा कर सभी को चौंका दिया। सत्ता की दौड़ में सफलता पाने की मशक्कत में वसुन्धरा ने सभी पक्षों को ध्यान में रखा और अपने धुर विरोधियों तक को यथासम्भव स्थान देकर राजनीतिक समझबूझ और सहिष्णुता को दर्शाया है। पहली सूची के विश्लेषण से पता चलता है कि
लगभग दो दर्जन ऐसे प्रत्याशी बनाए गए हैं, जो सीधे पार्टी संगठन में विभिन्न स्तरों पर पदाधिकारी या सक्रिय कार्यकर्ता हैं। चुनावी गणित के हिसाब से एक पूर्व विधायक और एक वर्तमान विधायक के पुत्र को टिकट दिया गया है तो अपने पिछले शासनकाल के समय सहयोगी रहे अथवा पिछले चुनाव में पराजित हुए प्रत्याशियों को भी मौका दिया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीधे जुड़े हुए प्रत्याशियों सहित चार-पांच उम्मीदवारों को नौकरी छुड़वा कर चुनाव लड़वाने का निर्णय लिया गया है। नरेन्द्र मोदी की जयपुर रैली में भाजपा में शामिल हुई जयपुर के पूर्व राजघराने की दीया कुमारी को सवाई माधोपुर से प्रत्याशी बनाया गया है। घराने का इस जिले से जुड़ाव रहा है। राजस्थान की चुनावी राजनीति में सत्ता का मार्ग मारवाड़ अंचल से माना जाता है। इसके मद्देनजर दीपावली पर्व पर जद(यू) छोड़कर भाजपा में शामिल हुए आदिवासी बहुल जिले बांसवाड़ा के कुशलगढ़ क्षेत्र से भीमाभाई डामोर को प्रत्याशी बनाया गया है। इसी तरह हनुमानगढ़ के भादरा निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस से अलग हुए संजीव बेनीवाल के नाम पर मोहर लगाई गई है। भाजपा से निलम्बित विधायक हुनमान बेनीवाल सहित कुल नौ विधायकों के टिकट काट दिए गए हैं। दिवंगत विधायक अनंग कुमार जैन के पुत्र खानपुर से अनिल जैन का नाम प्रमुख है। अनिल जैन कभी वसुन्धरा के खास सिपहसालार रहे एस.एन. गुप्ता के करीबी हैं। पिछले कुछ अर्से से वसुंधरा और गुप्ता में 36 का आंकड़ा है। मौजूदा 66 विधायकों को अगली पारी खेलने का अवसर मिला है। अप्रत्याशित रूप से पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और अब उपाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी को जयपुर के सिविल लाइंस से प्रत्याशी बनाकर कांग्रेस के मुखर विधायक और भाजपा के दिग्गज नेता स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत के भतीजे प्रतापसिंह खाचरियावास के खिलाफ ताल ठोकने की चुनौती दी गई है। राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष एवं युवा मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक लाहोटी पिछले चुनाव में खाचरियावास से पराजित हुए थे और क्षेत्र में सक्रिय रहकर नवमतदाता अभिनंदन अभियान से जुड़े हुए थे। लाहौटी के बगावत पर उतरने या निष्क्रिय रहने पर चतुर्वेदी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को उनके गृहजिले जोधपुर के सरदारपुरा निर्वाचन क्षेत्र में घेरने के मकसद से शंभुसिंह खेतासर को दांव पर लगाया है। परिसीमन के बाद सरदारपुरा निर्वाचन क्षेत्र में बी.जे.एस. कॉलोनी के जुडऩे से राजपूत मतदाताओं की संख्या 32 हजार आंकी गई है। माली समुदाय के मतदाताओं की संख्या इससे अधिक है। क्षेत्र में 26 हजार मुस्लिम मतदाता हैं।

वहीं पूर्व मुख्यमंत्री और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष श्रीमती वसुन्धरा राजे ने सुराज संकल्प यात्रा के दौरान जनता की नब्ज टटोलने के साथ संभावित प्रत्याशियों के बारे में फीडबैक तथा धौलपुर के राजमहल तथा विरोध के स्वर उठने पर राणकपुर पाली में जिला एवं संभागवार पार्टी पदाधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों से चर्चा की प्रक्रिया अपनाई। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्षों से सलाह मश्विरा किया। संघ के सर कार्यवाह भैय्या जी जोशी तथा अन्य प्रमुख लोगों से सवाई माधोपुर में मुलाकात की। दिल्ली में अपने निजी आवास पर फीडबैक लेते हुए विभिन्न बैठकों में चिंतन मनन के बाद पहली बार में 176 प्रत्याशियों की घोषणा कर सभी को चौंका दिया। सत्ता की दौड़ में सफलता पाने की मशक्कत में वसुन्धरा ने सभी पक्षों को ध्यान में रखा और अपने धुर विरोधियों तक को यथासम्भव स्थान देकर राजनीतिक समझबूझ और सहिष्णुता को दर्शाया है। पहली सूची के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग दो दर्जन ऐसे प्रत्याशी बनाए गए हैं, जो सीधे पार्टी संगठन में विभिन्न स्तरों पर पदाधिकारी या सक्रिय कार्यकर्ता हैं। चुनावी गणित के हिसाब से एक
पूर्व विधायक और एक वर्तमान विधायक के पुत्र को टिकट दिया गया है तो अपने पिछले शासनकाल के समय सहयोगी रहे अथवा पिछले चुनाव में पराजित हुए प्रत्याशियों को भी मौका दिया गया है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सीधे जुड़े हुए प्रत्याशियों सहित चार-पांच उम्मीदवारों को नौकरी छुड़वा कर चुनाव लड़वाने का निर्णय लिया गया है। नरेन्द्र मोदी की जयपुर रैली में भाजपा में शामिल हुई जयपुर के पूर्व राजघराने की दीया कुमारी को सवाई माधोपुर से प्रत्याशी बनाया गया है। घराने का इस जिले से जुड़ाव रहा है। राजस्थान की चुनावी राजनीति में सत्ता का मार्ग मारवाड़ अंचल से माना जाता है। इसके मद्देनजर दीपावली पर्व पर जद(यू) छोड़कर भाजपा में शामिल हुए आदिवासी बहुल जिले बांसवाड़ा के कुशलगढ़ क्षेत्र से भीमाभाई डामोर को प्रत्याशी बनाया गया है। इसी तरह हनुमानगढ़ के भादरा निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस से अलग हुए संजीव बेनीवाल के नाम पर मोहर लगाई गई है। भाजपा से निलम्बित विधायक हुनमान बेनीवाल सहित कुल नौ विधायकों के टिकट काट दिए गए हैं। दिवंगत विधायक अनंग कुमार जैन के पुत्र खानपुर से अनिल जैन का नाम प्रमुख है। अनिल जैन कभी वसुन्धरा के खास सिपहसालार रहे एस.एन. गुप्ता के करीबी हैं। पिछले कुछ अर्से से वसुंधरा और गुप्ता में 36 का आंकड़ा है। मौजूदा 66 विधायकों को अगली पारी खेलने का अवसर मिला है। अप्रत्याशित रूप से पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और अब उपाध्यक्ष अरूण चतुर्वेदी को जयपुर के सिविल लाइंस से प्रत्याशी बनाकर कांग्रेस के मुखर विधायक और भाजपा के दिग्गज नेता स्वर्गीय भैरोसिंह शेखावत के भतीजे प्रतापसिंह खाचरियावास के खिलाफ ताल ठोकने की चुनौती दी गई है। राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष एवं युवा मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष रहे अशोक लाहोटी पिछले चुनाव में खाचरियावास से पराजित हुए थे और क्षेत्र में सक्रिय रहकर नवमतदाता अभिनंदन अभियान से जुड़े हुए थे। लाहौटी के बगावत पर उतरने या निष्क्रिय रहने पर चतुर्वेदी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति के तहत मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को उनके गृहजिले जोधपुर के सरदारपुरा निर्वाचन क्षेत्र में घेरने के मकसद से शंभुसिंह खेतासर को दांव पर लगाया है। परिसीमन के बाद सरदारपुरा निर्वाचन क्षेत्र में बी.जे.एस. कॉलोनी के जुडऩे से राजपूत मतदाताओं की संख्या 32 हजार आंकी गई है। माली समुदाय के मतदाताओं की संख्या इससे अधिक है। क्षेत्र में 26 हजार मुस्लिम मतदाता हैं।

बगावती सुर के बीच जाति समीकरण की राजनीति
सुधीर गहलोत
राजस्थान में राजनीति के मोहरे बिछने शुरू हो चुके है। शह-मात के इस खेल में कांग्रेस और भाजपा, दोनों दलों के बागी, अपनी ही पार्टी की लुटिया डूबोने को तैयार बैठे हैं। कांग्रेस की मुश्किलें भाजपा की अपेक्षा, ज्यादा बड़ी हैं। लेकिन भाजपा की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। जयपुर की सिविल लाइंस सीट से अरुण चतुर्वेदी को उम्मीदवार बनाने से नाराज 400 से अधिक भाजपा के कार्यकर्ताओं, वार्ड अध्यक्षों एवं पदाधिकारियों ने त्यागपत्र दे दिया। जयपुर की ही बगरू विधानसभा क्षेत्र से उम्मीदवार कैलाश वर्मा के विरोधी, खुलकर सामने आ गए हैं। आमेर की हालत इससे अलग नहीं है। यहां से दो बार पार्टी के प्रत्याशी रहे नवीन पिलानिया भाजपा छोड़कर, राजपा में शामिल हो चुके हैं।

क्षेत्रों का परिसीमन, जाति समीकरण की विश्लेषण में कमी आदि कई ऐसे कारण हैं, जो 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को करारी हार के कारण बने। बावजूद इसके, वसुंधरा राजे ने ज्यादातर ऐसे लोगों को उम्मीदवार बनाया है, जो पिछली चुनाव में अपनी किस्मत अजमा चुके हैं। इनमें ऐसे भी उम्मीदवारों की कमी नहीं है, जो पिछला चुनाव उसी क्षेत्र से हार चुके हैं, जहां से उन्हें अभी टिकट मिला है। इसके पीछे जाति समीकरण या चर्चित चेहरा होना एक बड़ा कारण हो सकता है।

हवामहल सीट से भाजपा के दुर्जेय उम्मीदवार सुरेन्द्र पारीक के खिलाफ कांग्रेस के मंत्री बृज किशोर शर्मा मैदान में हैं। शहरी विकास मंत्री शांति धारीवाल के खिलाफ कोटा (उत्तरी) से भाजपा के प्रह्लाद गुंजाल मैदान में है, तो सिविल लाईंस सीट से राजस्थान भाजपा के पूर्व अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी के खिलाफ कांग्रेस ने प्रताप सिंह कचारिया को मैदान में उतारा है। इसके साथ ही भाजपा ने अपने चर्चित चेहरों, देवी सिंह भाटी (कोलायत), राव राजेन्द्र सिंह (शाहपुरा), गुलाबचंद कटारिया (उदयपुर) और डॉ. दिगंबर सिंह (डिग कुम्हेर) को उनके पूर्ववर्ती क्षेत्रों से टिकट दिया है। दारा सिंह एनकाउंटर के मुख्य आरोपी राजेन्द्र राठौड़ को तरंगनगर के बजाय चुरू से टिकट दिया गया है।

कांग्रेस के चर्चित चेहरों को उनके ही घर में घेरने की वसुंधरा की रणनीति, कांग्रेस के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। आमेर के राजपूत उनकी उपेक्षा की शिकायत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ वसुंधरा राजे पर राजपूत कार्ड खेलने के भी आरोप लग रहे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सरदारपुरा क्षेत्र से मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ कद्दावर राजपूत नेता शंभू सिंह खेतासर को उतारना है। खेतासर भू-माफिया के रूप में विवादास्पद हैं। पाकिस्तान से लगने वाली सीमा के दो जिलों, बाड़मेर और जैसलमेर में जमीनों के बदले हजारों करोड़ रूपए का डील करने का उन पर आरोप है।

माना जाता है कि राजपूतों के बीच अशोक गहलोत की छवि अच्छी नहीं है। सरदारपूरा राजपूत बहुल क्षेत्र है। यहां से कांग्रेस के मानसिंह देवड़ा जीतते रहे हैं। 1998 के मध्यावधि चुनाव में देवड़ा ने अशोक गहलोत के लिए सीट खाली किया था। तब से गहलोत यहां से चुनाव जीतते आ रहे हैं। राजपूतों को लूभाने के लिए कई राजघराने के सदस्यों को भाजपा ने अपना चेहरा बनाया है।

बिकानेर राजघराने की राजकुमारी सिद्धि कुमारी बिकानेर (पूर्वी) से मैदान में हैं। उनके दादा डॉ. करणी सिंह पांच बार निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लोकसभा का सदस्य रह चुके हैं। करौली राजघराने की राजकुमारी रोहिणी कुमारी करौली विधानसभा क्षेत्र से मैदान में हैं। जयपुर राजघराने की राजकुमारी दीया कुमारी को उनकी ख्वाहिश हवामहल के बजाय सवाई माधोपुर से उम्मीदवार बनाया गया है। इस क्षेत्र में राजपूत वोटरों की संख्या कम होने के कारण दीया कुमारी के लिए यह कड़ी परीक्षा होगी। दीया कुमारी का मुकाबला कांग्रेस प्रत्याशी दानिश अबरार से है। दानिश के पिता अबरार अहमद केन्द्रीय मंत्री रह चुके हैं।

भाजपा के 176 उम्मीदवारों की सूची में 24 उम्मीदवार अनुसूचित जनजाति और 30 उम्मीदवार अनुसूचित जाति के हैं। पार्टी ने दो अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को सामान्य सीट से प्रत्याशी बनाया है। इस बार भाजपा की टिकट पर 20 महिला उम्मीदवार मैदान हैं, तो 35 युवा उम्मीदवारों को मौका दिया गया है।

वसुंधरा राजे ने 2008 की गलतियों से सबक लेते हुए, कई हेर-फेर किए हैं। लेकिन 2013 के चुनाव में सफलता के लिए और बागियों पर लगाम लगाने के लिए वसुंधरा राजे ने जाति समीकरण को विशेष रूप से ध्यान में रखा है। 8 दिसंबर को होने वाली मतगणना से यह साफ हो जाएगा, उनका क्षेत्रीय विश्लेषण कितना सही था।

मनसिंह देवड़ा के त्यागपत्र के बाद वर्ष 1999 में हुए उपचुनाव में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भाजपा के मेघराज लोहिया के मुकाबले 69856 मत मिले थे। वर्ष 2003 में उन्हें 58509 वोट मिले तब भाजपा के प्रत्याशी महेन्द्र झाबक थे। पिछले चुनाव में भाजपा के राजेन्द्र गहलोत को मिले 39736 वोटों के मुकाबले अशोक गहलोत को 55284 मत मिले थे, जबकि राजेन्द्र गहलोत देवड़ा से 17881 मतों से पराजित हुए थे। राजेन्द्र गहलोत 1990-93 का चुनाव जीत चुके है। अशोक गहलोत 1971 में सरदारपुरा से पराजित भी हुए थे।

मारवाड़ के दिग्गज राजपूत नेता खेतासर ने पिछले चुनाव में ओसियां से कांग्रेस के दिग्गज नेता परसराम मदेरणा के पुत्र महिपाल को बतौर निर्दलीय प्रत्याशी टक्कर दी, जिससे भाजपा के नारायण राम बेड़ा तीसरे स्थान पर रहे। बाद में वह बसपा में शामिल हो गए थे और वापस भाजपा से जुड़े हैं। पाकिस्तान से लगती अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर जमीनों की खरीद फरोख्त मामले में भी खेतासर का नाम चर्चित हुआ था। वहीं महिपाल मदरेणा नर्स भंवरी देवी हत्याकांड के आरोप में जेल में बंद है।

गहलोत मंत्रिमंडल के प्रभावी मंत्री शांति धारीवाल के खिलाफ भाजपा ने गुर्जर नेता प्रहलाद गुंजल को चुनाव मैदान में उतारा है। पूर्व प्रदेशाध्यक्ष ललित किशोर चतुर्वेदी के विश्वस्त रहे, गुंजल ने एक बार विधायक बनने पर सदन में अपनी छाप छोड़ी थी। बाद में वह पार्टी से अलग हुए और पुन: अपनी मूलधारा में शामिल हो गए।

भरतपुर जिले के कुम्हेर-डीग निर्वाचन क्षेत्र में पिछली बार की तरह जाट समुदाय के दो दिग्गजों की कांटेदार टक्कर होगी। पूर्व सांसद एवं पूर्व राजघराने के वारिस विश्वेन्द्र सिंह कांग्रेस को भाजपा के डॉ. दिगम्बर सिंह ने पराजित किया था। पार्टी ने पुन: दिगम्बर सिंह को प्रत्याशी बनाया है। पूर्व केन्द्रीय मंत्री और दिग्गज जाट नेता नटवरसिंह के पुत्र पूर्व विधायक जगतसिंह को भाजपा ने भरतपुर जिले के कांमा क्षेत्र में दिवंगत मेव नेता चौधरी तैय्यब हुसैन की पुत्री और संसदीय सचिव जाहिदा खान के मुकाबले उतारा है। इसी तरह चूरू से भाजपा सांसद जाट नेता रामसिंह कस्बां की विधायक पत्नी कमला को सादुलपुर से पुन: टिकट मिला है। उनका अन्तरराष्ट्रीय खिलाड़ी कृष्णा पूनिया से रोचक मुकाबला होगा। पार्टी के वयोवृद्ध नेता पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भंवरलाल शर्मा की पुत्री मंजू शर्मा की जगह पूर्व विधायक सुरेन्द्र पारीक को हवामहल से पूर्व केन्द्रीय मंत्री गुजरात के राज्यपाल रहे स्वर्गीय नवलकिशोर शर्मा के पुत्र शिक्षामंत्री बृजकिशोर के खिलाफ टिकट दिया गया है।

कांग्रेस और भाजपा ने उम्मीदवारों के चयन में जातीय समीकरण के साथ-साथ जिताऊ होने की संभावना को भी अहमियत दी है। भाजपा ने रणनीति के तहत दो दर्जन निर्वाचन क्षेत्रों के लिए अभी पार्टी प्रत्याशी घोषित नहीं किए हैं और इन स्थानों के लिए कांग्रेस सूची की प्रतीक्षा की जा रही है। उधर कांग्रेस शेष निर्वाचन क्षेत्रों के लिए प्रत्याशियों की सूची को अन्तिम रूप देने में जुटी हुई है। राजपा के कार्यवाहक प्रदेश अध्यक्ष सुनील भार्गव के अनुसार पार्टी के उम्मीदवारों की सूची जारी की जा रही है। इसमें चौंकाने वाले कई नाम होंगे।

पिछले चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने 199 प्रत्याशी खड़े किए थे जिनमें से उसके छ: प्रत्याशी जीते भी थे। कांग्रेस के 36.82 प्रतिशत और भाजपा के 34.27 प्रतिशत वोटों की तुलना में बसपा को 7.60 फीसदी वोट मिले। बसपा 164 प्रत्याशी घोषित कर चुकी है। सीपीएम को 1.63 प्रतिशत मत मिले और उसके तीन विधायक चुने गए। इस बार पार्टी तीस से अधिक सीटों पर चुनाव लडऩे जा रही है। जद(यू), सपा और सी.पी.आई. से भी उसका तालमेल है। भाजपा के बागी डॉ. किरोड़ी लाल मीणा और उनकी विधायक पत्नी गोलमा देवी राष्ट्रीय जनतांत्रिक पार्टी (राजपा) का झंडा थामे हुए हैं। पार्टी के अन्य दलों से 50 सीटों पर तालमेल के साथ उन्होंने करीब 150 सीटों पर चुनाव लडऩे का मानस बनाया है। जयपुर में 24 अक्टूबर की रैली में मीणा अपना दमखम दिखा चुके है और वह भाजपा तथा कांग्रेस के खिलाफ मुखर हो रहे है। भाजपा और कांग्रेस से जुड़े सुनील भार्गव एवं शारदाकांत शर्मा इस पार्टी की चुनावी रणनीति तथा प्रत्याशी चयन में अहम भूमिका निभा रहे है। कांग्रेस के पूर्व विधायक अशोक तंवर को चाकसू तथा पूर्व पुलिस महानिदेशक एवं भाजपा सांसद डॉ. ज्ञानप्रकाश पिलानिया के पुत्र नवीन पिलानिया भी राजपा से जुड़ गए हैं। वह आमेर से भाजपा टिकट पर दो चुनाव हार चुके है।

चुनाव अधिसूचना के साथ 5 नवम्बर से नामांकन प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी है। दस नवम्बर रविवार के अवकाश के अलावा 12 नवम्बर तक नामजदगी के पर्चे दाखिल होंगे तथा 13 नवम्बर को इनकी जांच की जाएगी। दो दिन तक नाम वापसी के बाद चुनावी तस्वीर साफ होगी। एक दिसम्बर को मतदान होगा। इससे पहले सभी दलों के प्रत्याशियों के नामों का खुलासा हो चुकेगा। इसके साथ ही भाजपा और कांग्रेस के नेता अपनी पार्टी के बागियों को मनाने का सिलसिला चला कर कितनी सफलता प्राप्त कर सकेंगे, अभी कुछ कहना मुश्किल है।

उम्मीदवारों की घोषणा से पहले चुनाव अभियान में प्रमुख मुद्दे गौण हो गए तथा व्यक्तिगत आरोपों-प्रत्यारोपों की झड़ी लग हुई है। इसमें भाजपा और कांग्रेस तथा उसके वरिष्ठ नेता भी पीछे नहीं रहे हैं। इसके साथ ही आरक्षण के मुद्दे को भी गरमाया जा रहा है। जागो पार्टी तो पिछले पांच वर्षो से प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर विज्ञापनों तथा विचार गोष्ठियों के माध्यम से इस अभियान को जीवंत रखे हुए है। गुर्जर समुदाय विशेष आरक्षण की मांग पर वोट राजनीति का फैसला करने पर आमादा है। ब्राह्मण तथा वैश्य समुदाय सहित अन्य जाति वर्ग के लोगों ने भी अपनी आबादी के हिसाब से टिकट वितरण में तरजीह देने की मांग की है। इस मामले में अल्पसंख्यक समुदाय ने भी दबाव की राजनीति अपनायी है। टिकट वितरण से इनकी मांग की पूर्ति किस हद तक हो पाती है और किस दल को कितना समर्थन मिल पाता है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।

राजस्थान की वर्तमान राजनीति पर नजर दौड़ाएं तो भाजपा के दिग्गज स्व. भैरोसिंह शेखावत की लगातार दूसरी पारी के शासनकाल को कांग्रेस के तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अशोक गहलोत ने वर्ष 1998 के चुनाव में अब तक के तीन-चौथाई रिकार्ड बहुमत से उखाड़ फेंकने में सफलता हासिल की थी। शेखावत ने प्रतिपक्ष के नेता के रूप में विधानसभा में गहलोत का सामना किया और बदले राजनीतिक घटनाचक्र में वह दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय हुए तथा उपराष्ट्रपति पद पर भी आसीन हुए। शेखावत ने कांग्रेस की राजनीति में लम्बी दूरी के घोड़े के प्रतीक रूप अशोक गहलोत के मुकाबले अपने पटु शिष्य घनश्याम तिवाड़ी की अपेक्षा वसुन्धरा राजे को अपना राजनैतिक उत्तराधिकारी बनाने में तरजीह दी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के रूप में वसुन्धरा ने परिवर्तन यात्रा का आगाज कर 2003 में गहलोत से सत्ता छीनकर पहली बार भाजपा के स्पष्ट बहुमत (120) से शासन की बागडोर सम्भाली थी। लेकिन 2008 में गहलोत ने वसुन्धरा को चुनावी पटखनी देकर हिसाब बराबर कर लिया। अब दोनों नेताओं के बीच शासन सत्ता के लिए तीसरी बार घमासान हो रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षक आकलन कर रहे हैं कि इस बार कौन बाजी मारता है।

करीब सालभर पहले राजनीतिक क्षेत्रों में यह अनुमान लगाया जाने लगा था कि गहलोत अगले चुनाव में सत्ता में वापस नहीं आ पाएंगे। भ्रष्टाचार तथा मंत्रियों पर लगे आरोपों के चलते सत्तारूढ़ दल बचाव की मुद्रा में आ गया है। गहलोत ने राजनीतिक समझबूझ दिखाते हुए एक के बाद एक व्यापक जनहित एवं लोक लुभावन निर्णयों की बाढ़ लगा दी है। लैपटाप, टेबलेट, पेंशन वितरण आदि से एक बार तो लगा कि दक्षिणी राज्यों की तर्ज पर राजस्थान के मतदाताओं को लुभाने के प्रयास किए जा रहे है। हांलाकि भाजपा अध्यक्ष वसुन्धरा राजे ने इसकी प्रतिक्रिया में रेवडिय़ां बांटने का आरोप मढ़ा था। लेकिन इस मायने में ये चुनाव राज्य की राजनीति में इस बात का गवाह बनेगा कि मतदाता लोक लुभावन फैसलों से किस हद तक प्रभावित होते हैं।

दूसरी तरफ राजपा नेता डॉ. किरोड़ी लाल मीणा मतदाताओं को सचेत करते आ रहे हैं कि राज्य हित में भाजपा तथा कांग्रेस की बारी-बारी से सत्ता की लूट की साजिश को नाकाम करने की आवश्यकता है। इसलिए वह दावा कर रहे हैं कि सत्तारूढ़ दल कांग्रेस तथा प्रमुख प्रतिपक्ष भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिल पाएगा और अपने समर्थकों की चुनावी जीत से सत्ता की चाबी उनके हाथ में होगी। जयपुर रैली में मीणा यह कहने से नहीं चूके कि अब किसान का बेटा मुख्यमंत्री बनेगा और वह संतरी बन कर जनता की सेवा करेंगे। पिछली बार भाजपा से बगावत कर मीणा भाजपा की राह में बाधा बने थे। अब देखना होगा कि वह अपनी टिकट वितरण की रणनीति से क्या गुल खिलाते हैं। विशेष कर पूर्वी राजस्थान के जिलों में किरोड़ी मीणा का समर्थन, जातीय समीकरण तथा बाहुबल का मुद्दा चुनावी राजनीति में निर्णायक रहने वाला है। उन्होंने पिछले तीन सालों में राजस्थान और विशेष कर मेवाड़ तथा हाडौती के आदिवासी अंचल तथा शेखावाटी में अपनी पकड़ मजबूत बनाने की पुरजोर कोशिश की है। उधर बसपा तथा अन्य दल लोकतांत्रिक मोर्चे के प्लेटफार्म पर इस मुहिम को गति दे रहे है। यह सही है कि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में मत विभाजन से कांग्रेस और भाजपा के उम्मीदवारों को नुकसान होगा तो काफी स्थानों पर दबंग और प्रभावी नेता चुनाव जीतने की स्थिति में भी होंगे। इसका सटीक आकलन तो सभी दलों के प्रत्याशियों तथा नाम वापसी की आखरी तारीख के बाद चुनाव अभियान के आधार पर करना संभव होगा।

अन्य दलों की तुलना में भाजपा और कांग्रेस में व्याप्त गुटबाजी तथा धड़ेबंदी भी चुनाव नतीजों को प्रभावित करेगी। पिछले चुनाव में बागियों ने दोनों दलों की नाक में दम करके उनकी चुनावी उम्मीदों पर पानी फेर दिया था। इस बार यह मुद्दा कितना प्रभावी बन पाता है, यह देखना होगा। भाजपा को संघ लॉबी के सहयोग एवं समर्थन की उम्मीद है और यही उसकी ताकत है। संघ की विचारधारा से जुड़े लोगों की दृष्टि 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर है और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी उनकी आशा के प्रतीक बने हुए हैं। वहीं कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी राजस्थान पर अपना पूरा ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं। पांच राज्यों की विधानसभाओं के इन चुनावों में उन्हें कम से कम दो राज्यों में सत्ता में वापसी तथा भाजपा शासित राज्यों में से एक की शासन सत्ता लेने की उम्मीद बंधी हुई है।

राजस्थान के इतिहास में संभवत: यह पहला मौका है कि चुनाव के समय राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक का पदभार अस्थाई तौर पर अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को दिया गया है। लगभग 4 हजार करोड़ रूपए के टेन्डर प्रकरण को लेकर भाजपा द्वारा लगाए गए आरोपों से आहत मुख्य सचिव सी.के. मैथ्यू लम्बी छुट्टी पर चले गए है। इसी तरह पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा भी लम्बे अवकाश पर हैं। उनके भाई नमो नारायण मीणा केन्द्रीय वित्त राज्य मंत्री हैं। इधर चुनाव आयोग की पैनी नजर और चुनाव-प्रचार एवं खर्चों को लेकर दी गई कड़ी हिदायतों ने राजनीतिक दलों सहित उम्मीदवारों को पशोपेश में डाला हुआ है। इस माहौल में बेहतर चुनाव प्रबंधन, राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों की हार-जीत में अहम भूमिका निभाएगा। स्वयं चुनाव आयोग अधिकाधिक मतदान कराने के लिए जन-जागरण अभियान चलाए हुए हैं। युवा मतदाताओं का रूझान चुनाव मैदान में निर्णायक सिद्ध होगा।

 

गुलाब बत्रा

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