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अन्तरिक्ष में भारत की लंबी छलांग

मंगलयान मिशन का सफल प्रक्षेपण भारत की एक उल्लेखनीय उपलब्धि और सही दिशा में उठाया गया कदम है। प्रक्षेपण रॉकेट ने मंगलयान को पृथ्वी की अंडाकार कक्षा में बहुत ही सटीक ढंग से रख दिया है। मानवरहित प्रक्षेपण यान का निरीक्षण इसरो के एक दर्जन वैज्ञानिक कर रहे थे जिनके समक्ष 1963 में शुरू हुए भारतीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम के आरम्भ से अब तक का सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण कार्य था। 350 टन के मंगलयान का आकार एक छोटी कार जैसा है जिसे 300 दिन की यात्रा पूर्ण कर मंगल ग्रह के वातावरण का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है। योजनानुसार यह अगले वर्ष सितम्बर में मंगल की कक्षा में प्रवेश कर उस लाल ग्रह के चक्कर लगाते हुए मीथेन और खनिज के चिन्ह खोजेगा। इस अभियान पर 730 लाख डॉलर यानी 450 लाख पौंड खर्च आएगा, जबकि मंगल के लिए 2011 में शुरू किया गया अमेरिका के ‘क्यूरिसिटी’ मिशन पर ढाई अरब डॉलर यानी 1.56 अरब पौंड खर्च हुआ था। भारत के लिए यह अभियान अपने वैज्ञानिकों को प्रेरित करने के लिए स्वदेशी रॉकेट और उपकरण प्रौद्योगिकी की

गुणवत्ता सिद्ध कर उसके महत्व को बता कर बेहद सस्ते अन्तरिक्ष अभियानों के लिए एक नया रास्ता खोलना है। ऐसे वक्त में जब हम केवल राजनीतिक दोषारोपणों के खेलों, आरोपों और प्रत्यारोपों तथा भ्रष्टाचार के आरोपों व समाज के कमजोर वर्ग के शोषण की खबरें पढ़ते और सुनते हैं, तब मंगल पर एक उपग्रह के साथ पीएसएलवी के सफल प्रक्षेपण की खबर मन को अच्छी और सुखदायक लगती है। हम उम्मीद करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि इस अभियान में अनेक मील के पत्थर भारत के नाम लगें, जिससे हम विश्व को सिद्ध कर सकें कि यद्यपि हम अनेक सामाजिक और आर्थिक मानकों में पिछड़ रहे हैं, लेकिन वैज्ञानिक प्रतिभाओं के मामले में हम किसी से पीछे नहीं हैं। इसके लिए इसरो के वैज्ञानिक और इंजीनियरों को साधुवाद और बधाई, जिन्होंने इस परियोजना को रिकॉर्ड गति से सीमित बजट में पूरा किया है।

यहां मैं भारत के बुद्धिजीवियों के एक वर्ग द्वारा उठाए जाने वाले एतराज का भी उल्लेख करना चाहूंगा, जो कह रहे हैं कि यदि घर में दाने न हों तो व्यक्ति को मूंछों पर तेल नहीं लगाना चाहिए। इस प्रकार का एतराज उठाने वालों से मैं पूछना चाहूंगा कि यदि इसरो ने मंगल अभियान शुरू नहीं किया होता तो क्या सभी जरूरतमंदों को खाने के लिए अनाज मिल जाता। गरीबी को शिक्षा और विकास के लिए रूकावट नहीं बनने देना चाहिए। इसलिए मंगल अभियान की आलोचना अवांछित और अनुचित है। हमने अभी दिवाली पर करोड़ों रूपए के पटाखे जला दिए। क्या हम केवल 460 करोड़ रूपए वास्तविक रॉकेट पर खर्च नहीं कर सकते? भारत में अन्तरिक्ष को समझने की जिज्ञासा वेदों जितनी ही प्राचीन है। इसरो ने अन्तरिक्ष को जानने की वसीयत को पुनर्जीवित कर दिया है। मंगल अभियान केवल दिखावा मात्र नहीं, बल्कि यह ब्रह्मांड को समझने की और एक महत्वपूर्ण कदम है। इतना ही नहीं, भारत के पास अन्तरिक्ष अनुसंधान कार्यक्षेत्र में अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों की तुलना में बेहतरीन वैज्ञानिक हैं। इसलिए सरकार को इन लोगों को उनकी योग्यता और क्षमता के अनुसार रोजगार देना होगा, नहीं तो वे कुंठित हो कर धीरे-धीरे अमेरिका और रूस की ओर बेहतर भविष्य के लिए पलायन कर जाएंगे। उम्मीद है कि जापान और चीन के विफल मंगल अभियानों के विपरीत यह मंगल अभियान सफल होगा जिससे भारतीय वैज्ञानिकों की विश्व में भारी प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

मंगल अभियान का मुख्य लक्ष्य यह जानना है कि वहां अन्तरिक्ष में मिथेन है या नहीं। इससे पता लग सकेगा कि भूतकाल में इस लाल ग्रह पर वहां कभी जीवन था। बैक्टिरिया के कारण ही मिथेन गैस का निर्माण होता है। यदि यह अभियान वहां मिथेन ढूंढने में सफल हो गया (जो मंगल की सतह पर अमेरिका के रोवर्स नहीं तलाश कर सके) तो विश्व के प्रतिन्द्वद्वियों पर उसकी यह भारी विजय होगी। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि केवल सोवियत यूनियन, अमेरिका और यूरोप ने ही सूर्य से चौथे ग्रह पर अन्तरिक्ष यान भेजने में सफलता पाई है। लेकिन मंगल की कक्षा तक 6800 लाख किलामीटर की यात्रा 300 दिन में पूरी होनी है। इतने बड़े अन्तरिक्ष अभियानों में खतरे अन्तर्निहित होते हैं, खासतौर पर उस देश के लिए जो यह प्रयास पहली बार कर रहा हो। विफलता मंगल अभियान के इतिहास को खराब कर देगी। इस परिदृष्य के विपरित इस परियोजना की सफलता के लिए अभी बहुत दूर तक जाना है। लेकिन यहां इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हर वैज्ञानिक घटनाक्रम और कदम से समाज को गहरा लाभ होता है। ज्ञान शक्ति है। हमारे युवा वर्ग को एडवांस्ड अन्तरिक्ष प्रौद्योगिकी का ज्ञान प्राप्त करने के लिए विदेश जाने की जरूरत नहीं है। भारत को प्रतिभाओं की तलाश कर उन्हें भविष्य के लिए तैयार करने की जरूरत है। इस प्रकार के अभियान हमारे राष्ट्र के विकास के लिए हमें एकजुट कर आगे ले जाएंगे। नकारा लोग इन अभियानों पर खर्च होने वाली धनराशि की उपयोगिता पर मूर्खतापूर्ण सवाल पूछते रहेंगे। इन अभियानों पर खर्च की गई धनराशि का पूरा सदुपयोग हुआ है। यह किया ही जाना चाहिए था। हमारे अन्तरिक्ष अभियानों के लाभ को कृषि, कपड़ा, मशीनरी या अन्य खाद्यान्नों के निर्माण से नहीं तोला जा सकता। यह चिकित्सा विज्ञान पर लगातार किए जाने वाले अनुसंधानों जैसा है जिसमें बीमारी को ठीक करने के लिए किसी परिणाम पर पहुंचना होता है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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