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दल-बदल निषेध कानून अर्थहीन : योगेन्द्र नारायण

राज्यसभा के पूर्व महासचिव योगेन्द्र नारायण की राय में दल-बदल निषेध कानून की कोई आवश्यकता नहीं है। उनका मानना है कि भारत में लोकतंत्र इतना परिपक्व हो चुका है कि इस कानून की अब कोई जरूरत नहीं है। दल-बदल निषेध कानून राजनेताओं को मौका परस्ती में दल-बदल करने से रोकने के लिए बनाया गया था। राजनेता चुनाव जीत कर सत्ता सुख के लिए एक पार्टी से दूसरी पार्टी में चले जाते थे। जनता यदि उन्हें पार्टी के चुनाव घोषणा पत्र के मुताबिक उम्मीदों में अपना प्रतिनिधि बना कर यदि लोकसभा या विधानसभा में भेजती थी तो अनेक बार वे उस पार्टी को छोड़ कर दूसरी पार्टी में चले जाते थे। कई राजनेता तो दल बदलने का रिकॉर्ड ही तोड़ देते थे। लेकिन संविधान विशेषज्ञ योगेन्द्र नारायण अब उस कानून की आवश्यकता को ही नहीं मानते जो राजनेताओं को दल बदलने पर रोक लगाता है। दिल्ली में ईस्ट एंड क्लब के स्टडी सर्किल में इस विषय पर बोलते हुए योगेन्द्र नारायण ने भारत में लोकतंत्र को पूर्णतया परिपक्व बताते हुए कहा कि इस कानून की अब कोई जरूरत ही नहीं है।

राज्यसभा के पूर्व महासचिव का कहना था कि भारतीय संविधान में विचारों की स्वतंत्रता के मद्देनजर यह कानून लोकतंत्र की मूल भावना के विरूद्ध है। उन्होंने राजनैतिक पार्टियों की विचारधारा और टिकटों के बंटवारे पर भी तीखी टिप्पणी की। उनका कहना था कि राजनीतिक दलों की कोई विचारधारा होती भी है या नहीं, यह एक विचारणीय प्रश्न है। आजादी के छ: दशक बाद भी पार्टी हाईकमान के आदेश अथवा पार्टी व्हिप के नाम पर जन भावनाओं की अनदेखी अनुचित है। वैसे भी हर बिल पर व्हिप जारी करना भी उचित नहीं है। बेहतर होगा कि राजनीतिक दल अपने कायदे-कानून ठीक और मजबूत बनाएं।

अपने अमेरिका प्रवास से लौटे योगेन्द्र नारायण ने कहा कि मिस्र में रासायनिक गैसों पर रोक लगाए जाने के संदर्भ में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को कांग्रेस से अनुमति की जरूरत नहीं थी, फिर भी ओबामा ने जन-भावनाओं की कद्र करते हुए कांग्रेस के फैसले का सम्मान किया। विश्व में 40 देशों में, जहां लोकतंत्र परिपक्व हो रहा है और सुधार जारी हैं, वहां ऐसा ही विधान है। इस्रायल में पार्टी हाईकमान तथा व्हिप की अनदेखी पर तत्काल हटाने का प्रावधान तो नहीं है, किन्तु अगले चुनाव में उस सदस्य को टिकट नहीं दिया जाता। इस तरह स्लोवाकिया में एक निश्चित राशि का जुर्माना देने पर फिर से चुनाव की अनुमति मिल जाती है।

इस स्टडी सर्किल के अध्यक्ष दिल्ली उच्च न्यायालय के रिटायर्ड जज व इंडियन लॉ कमिशन के सदस्य न्यायमूर्ति एस.एन. कपूर ने श्रीलंका में प्रधानमंत्री के दौरे के संदर्भ में कहा कि संसद और विधानसभाओं में चुने गए सदस्यों को राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना चाहिए। श्रीलंका में राष्ट्रमंडल सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के दौरे का जिक्र करते हुए उनका कहना था कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार में एक दल विशेष के विरोध का क्या औचित्य था? जस्टिस कपूर ने खेद व्यक्त किया कि देश में नैतिक मूल्यों का हनन हो रहा है और चुनाव महज एक विनियोजन का तरीका बन चुके हैं। ऐसे में देश में जहां पार्टी सदस्यों को सार्थक अभिव्यक्ति की भी स्वतंत्रता न हो, वहां लोकतंत्र अथवा पार्टी व्हिप का कोई अर्थ नहीं है।

(उदय इंडिया संवाददाता)

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