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अस्त्राखान में भारतीयों की तलाश

पुरुषोत्तम अग्रवाल की यह दूसरी किताब है। पहली किताब ‘अकथ कहानी प्रेम की’ में वह कबीर की कविता और उनके समय की थाह लेने के बहाने इतिहास के उस दौर के सामाजिक और आर्थिक समीकरणों पर एक नजर डालते हैं। इस दूसरी किताब ‘हिंदी सराय: अस्त्राखान वाया येरेवान’ को उन्होंने यात्रावृत्त के रूप में लिखा है। आरमीनिया की राजधानी येरेवान और कैस्पियन सागर पास वोल्गा नदी के थाले में बसे रूसी नगर अस्त्राखान की यात्रा उन्होंने 2011 के सितंबर महीने में की थी। यह यात्रा सिर्फ दो शहरों की भौगोलिक दूरियों में ही नहीं की गई बल्कि वे ऐतिहासिक, पौराणिक, सामाजिक, आर्थिक और नृतत्वशास्त्रीय स्तर पर भी भारत के साथ इनकी कडिय़ां जोडऩे का प्रयास करते हैं।

अस्त्राखान जाने की प्रेरणा अग्रवाल को विविध स्रोतों से प्राप्त इस जानकारी से मिली कि सत्रहवीं सदी में, मुगल लगभग जब अपने पराभव की ओर जाने लगे थे, रूस के इस शहर अस्त्राखान से भारत के व्यापारियों के व्यावसायिक संबंध बन गए थे और बहुत से व्यापारी वहां न सिर्फ रहने लगे थे, बल्कि वहां के समाज के बहुत करीबी संबंध बन गए थे। उनमें स्थानीय लोगों के अलावा तातार और आरमीनियाई भी होते थे। भारतीय व्यापारियों का एक केंद्र हिंदी सराय के रूप में विकसित हो गया था। उसी हिंदी सराय की तलाश में अग्रवाल वहां तक पहुंचे।

इस काम में स्थानीय इतिहास की जानकारी रखने वाली क्रुपस्काया सिटी लाइब्रेरी की प्रमुख जोया अलैक्सांद्रवना से काफी मदद मिली। उन्होंने उन बहुत सी पुरानी पोथियों के बारे में लेखक को बताया जहां से पुराने भारतीयों के बारे में जानकारी हासिल की जा सकती थी। अग्रवाल ने जाना कि भारतीय व्यापारी बहुत समृद्ध थे और तातार बहुत गरीब मुसलमान। इसके बावजूद तातारों के साथ भारतीयों के संबंध ज्यादा निकट के थे, क्योंकि वे लोग भारतीयों को कम अजनबी लगते थे। यह निकटता रक्त संबंधों में भी बदलती चली गई और एक नया अरगिजान समुदाय अस्तित्व में आया, जो तातार मां और भारतीय पिता की संतान होते थे। इनकी संख्या इतनी ज्यादा हो गई थी कि अस्त्राखान में एक पूरा अरगिजान मुहल्ला बस गया।

एक पुस्तक से अग्रवाल को जानकारी मिली कि ”16वीं सदी से ही सक्रिय भारतीय व्यापारी 18वीं सदी में काफी ज्यादा माल लाने लगे थे, फारस के व्यापारियों जितना ही… और इन्हें नगर के समाज में बहुत ऊंचा दर्जा हासिल था, क्योंकि रूस के कुल आयात का 10.6 प्रतिशत भारतीय ही लाते थे। कुछ चीजों पर एकाधिकार इस हद तक था कि उनका 85 प्रतिशत से ज्यादा कारोबार इन्हीं के हाथों में था। निर्यात गतिविधियों का 40 प्रतिशत अस्त्राखान में अड्डा जमाए बैठे भारतीय व्यापारियों के हाथ में ही था।’’

ये व्यापारी मास्को तक व्यापार करते थे। हालांकि उनसे जलने वाले रूसी व्यापारी नहीं चाहते थे कि उनकी व्यापारिक गतिविधियां अस्त्राखान से आगे बढ़ें।

एक भारतीय व्यापारी बारायेव का भी जिक्र आता है जिसे ‘मुगलों द्वारा शासित दिल्ली का निवासी’ बताया गया है। संभव है उसका नाम बालदेव या बलदेव रहा हो, जिसका रूसी में बारायेव हो गया हो। उसके सत्तातंत्र के साथ काफी करीबी रिश्ते थे। सम्राज्ञी अन्ना इवानोवा तक सिफारिश पहुंचाने के लिए लोग उसके पास आते थे। लेकिन अस्त्राखान के गवर्नर तातिशेव इस बात पर नाराज थे कि वह अपनी व्यापारिक गतिविधियां दूसरे शहरों में भी बढ़ा रहा था। एक बार जब वह अस्त्राखान से लौट रहा था तो उसे झूठे आरोप लगा कर बंद कर दिया गया। उसे ईसाई धर्म अपनाने के बाद ही जेल से मुक्तिमिल पाई।

येरेवान प्रकरण में भी अग्रवाल वहां के धार्मिक रिवाजों की पड़ताल करते हुए भारतीय मान्यताओं तक पहुच जाते हैं। दिलचस्प अंदाज से लिखी गई यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।

 सुरेश उनियाल

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