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शताब्दी की पहली फिल्मी हस्ती: वहीदा रहमान

दादा साहब फालके अवार्ड के समतुल्य भारत सरकार ने ‘सेंटीनरी अवार्ड ऑफ फिल्म पर्सनेलिटी ऑफ इंडिया’ नाम से एक पुरस्कार प्रारंभ किया है, जो हर वर्ष गोवा के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के उद्घाटन के मौके पर दिया जाया करेगा। इस वर्ष का यह पुरस्कार 60-70 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान को दिया गया है। 14 मई 1926 को तमिलनाडू के चेंगलपट्टू में जन्मी वहीदा रहमान को हिंदी फिल्मों में लाने का श्रेय गुरु दत्त को है। गुरू दत्त ही वहीदा को मुम्बई लाए और पहला मौका देव आनंद के साथ फिल्म सीआईडी (1956) में दिया।

गो वा में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के मौके पर भारत सरकार ने भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने के मौके पर एक ‘सेंटीनरी अवार्ड ऑफ फिल्म पर्सनेलिटी ऑफ इंडिया’ नाम से एक पुरस्कार प्रारंभ किया है। दादा साहब फालके अवार्ड के समतुल्य यह पुरस्कार हर वर्ष गोवा के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह के उद्घाटन के मौके पर दिया जाया करेगा। इस वर्ष का यह पुरस्कार 60-70 के दशक की प्रसिद्ध अभिनेत्री वहीदा रहमान को दिया गया है। 14 मई 1926 को तमिलनाडू के चेंगलपट्टू में जन्मी वहीदा रहमान को हिंदी फिल्मों में लाने का श्रेय गुरु दत्त को है। वही उन्हें मुम्बई लाए और पहला मौका देव आनंद के साथ फिल्म सीआईडी (1956) में दिया। फिल्म का निर्देशन उन्होंने अपने सहायक रह चुके राज खोसला को सौंपा। फिल्म की नायिका शकीला थी और वहीदा रहमान को लगभग उसी तरह की भूमिका दी गई थी, जैसी उन्होंने बाजी में गीता बाली को दी थी। फिल्म और वहीदा रहमान दोनों ही हिट हुई। इसके बाद तो वहीदा रहमान गुरु दत्त की लगभग हर फिल्म में मौजूद थीं। अपने करियर की शुरुआत में ही प्यासा (1957), कागज के फूल (1959), चौदहवीं का चांद (1960) और साहब बीवी और गुलाम (1962) में वहीदा रहमान जितनी परिपक्व भूमिकाएं कर चुकी थीं, वैसी भूमिकाएं अन्य अभिनेत्रियों को बहुत बाद में नसीब होती हैं। इसी दौरान गुरु दत्त ने दूसरे निर्माताओं से भी अपने साथ वहीदा रहमान को लेने के लिए सिफारिश की। प्रमोद चक्रवर्ती की 12’ओ क्लॉक (1959) में गुरु दत्त के साथ वहीदा रहमान मौजूद थीं। प्यासा में वह वेश्या गुलाब की और कागज के फूल में एक उभरती हुई अभिनेत्री शांति की भूमिका में हैं।

हिंदी की एक प्रारंभिक हॉरर फिल्म बीस साल बाद (1962) में नए अभिनेता विश्वजीत के साथ काम करने की हिम्मत वहीदा रहमान ने अपनी करियर की लगभग शुरू में ही दिखाई और यह दांव सफल भी रहा। फिल्म हिट थी। फिल्म का गाना ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’ आज भी लोगों की जुबान पर है। सुनील दत्त के प्रोडक्शन अजंता आट्र्स की पहली फिल्म मुझे जीने दो (1963) की अभिनेत्री वहीदा रहमान ही थीं। जिस देश में गंगा बहती है और गंगा जमुना के बाद डाकुओं की समस्या पर बनी यह तीसरी हिट फिल्म थी, जो एक सकारात्मक संदेश के साथ आई थी। हिचकॉक की फिल्म रेबेका पर आधरित कोहरा (1963) में वहीदा एक बार फिर विश्वजीत के साथ रही।

देव आनंद के साथ पहली ही फिल्म सी.आई.डी. की सफलता के बाद देव आनंद के साथ भी उनकी जोड़ी काफी लोकप्रिय हुई। सोलहवां साल (1958), काला बाजार (1960), रूप की रानी चोरों का राजा (1961), बात एक रात की (1962) के बाद गाईड (1965) इस जोड़ी की सबसे बड़ी फिल्म थी। यह फिल्म नायक और निर्माता देव आनंद, निर्देशक विजय आनंद और नायिका वहीदा रहमान की करियर की सर्वोच्च बिंदु थी। देव आनंद और वहीदा रहमान की जोड़ी की आखिरी फिल्म प्रेम पुजारी (1970) थी जिसका निर्देशन खुद देव आनंद ने किया था।

तीसरी कसम (1966) वहीदा रहमान के करियर में एक और मील का पत्थर थी। निर्माता के रूप में शैलेंद्र की यह अकेली फिल्म थी, जिसमें उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था, लेकिन फिल्म फ्लॉप हो गई। वहीदा रहमान की खूबसूरती को दो ही फिल्मों में पूरी तरह से उभारा गया है। पहली थी – चौदहवीं का चांद और दूसरी – तीसरी कसम।

दिलीप कुमार के साथ वहीदा रहमान ने तीन ही फिल्में की थीं। पहली थी – दिल दिया दर्द लिया (1966), जो बहुत ज्यादा अवसाद से भरी होने के कारण दर्शकों को पसंद नहीं आई। दूसरी फिल्म – राम और श्याम (1967) सफल रही थी।

एक मानसिक चिकित्सालय की नर्स राधा की कहानी पर आधारित खामोशी (1969) वहीदा रहमान के करियर की एक और मील का पत्थर रही। इसमें भी एक अभिनेत्री के तौर पर वहीदा रहमान हमें उसी ऊंचाई पर दिखाई देती हैं, जहां गाइड में दिखाई दी थीं। फर्क इतना है कि यहां उसके बराबर कोई नहीं दिखाई देता। 1974 में वहीदा रहमान ने एक व्यवसायी कमलजीत से शादी कर ली। कमलजीत ने फिल्मों में भी अपनी किस्मत आजमाई थी। महबूब खान की आखिरी फिल्म सन ऑफ इंडिया में वह कुमकुम के साथ दिखे थे। वहीदा रहमान ने भी उनके साथ एक फिल्म शगुन (1964) की थी, लेकिन फिल्म चल नहीं पाई थी।

शादी के बाद वहीदा रहमान मां की भूमिका में पहली बार फिल्म अदालत (1976) में नजर आई। इसमें अमिताभ बच्चन का डबल रोल था। वह पिता अमिताभ की पत्नी और पुत्र अमिताभ की मां की भूमिका में थीं। त्रिशूल (1978) में भी वह अमिताभ की मां की भूमिका में थीं। यश चोपड़ा की लम्हे (1991) के बाद 90 के दशक में वह फिल्मों से विदा लेकर बंगलूरु में बस गई। लेकिन हिंदी फिल्म उद्योग उन्हें वापस बुला लाया। अनुपम खेर के निर्देशन में बनी ओम जय जगदीश (2002) में वह तीन नायकों अनिल कपूर, फरदीन खान और अभिषेक बच्चन की मां थी। रंग दे बसंती (2006), 15 पार्क एवेन्यू (2005) और दिल्ली 6 (2009) उनकी बाद की कुछ महत्वपूर्ण फिल्में हैं।

वहीदा रहमान को उनकी उपलब्धियों के लिए भारत सरकार ने 1972 में पद्मश्री और फिर 2011 में पद्मभूषण से सम्मानित किया था। पिछले साल उन्हें मुम्बई फिल्म समारोह में उनकी अब तक की उपलब्धियों के लिए भी सम्मानित किया गया था।

 

सुरेश उनियाल

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