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भारत के किसानों की समकालीन सामाजिक-आर्थिक समस्याएं एवं निदान

आबादी बढऩे व जोतों के घटते आकार के कारण अधिसंख्य किसानों के लिए कृषि अलाभकारी व्यवसाय बनता जा रहा है। मध्यम या वृहद श्रेणी का किसान ही अपनी आय से अपने उपभोग व्यय की पूर्ति कर पाता है।

70 के दशक तक भारत खाद्यान्न की आवश्यकता की पूर्ति अन्य देशों से प्राप्त सहायता व आयात से करते था। 70वें दशक में योजनाबद्ध तरीके से ‘हरित क्रान्ति’ का श्रीगणेश हुआ। इसकी सफलता में हरियाणा, पंजाब व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों ने खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि कर उल्लेखनीय योगदान दिया। परन्तु आर्थिक-उदारीकरण के बाद के वर्षो में कृषि क्षेत्र की उपेक्षा के कारण इन अग्रणी राज्यों की उत्पादकता में ठहराव आया तथा अन्य राज्यों में उत्पादकता में वृद्धि नहीं हुई। कृषि क्षेत्र व गैर-कृषि क्षेत्र में आर्थिक असमानताएं बढ़ीं। कृषि आय में कमी आई और बेरोजगारी बढ़ी। फलस्वरूप कृषि एक अलाभकारी व्यवसाय बनने लगा। आज भी देश की 70 फीसदी आबादी गावों में रहती है और किसी न किसी रूप में कृषि पर निर्भर है। अत: इस बहुसख्यंक जनजीवन की सामाजिक आर्थिक समस्याओं पर गम्भीरता से विचार कर ऐसी कार्यनीति बनाने की आवश्यकता है, जिससे इन समस्याओं का देशहित में सामयिक समाधान हो सके।

कृषि जोतों का विखण्डन
आबादी बढऩे के साथ जोतों की संख्या बढ़ रही है और जोत का आकार घट रहा है। वर्ष 1960-61 से 2010-11 की अवधि में देश में जहां कृषि क्षेत्र 133.48 मिलियन हैक्टेयर से बढ़कर 159.20 मिलियन हैक्टेयर हुआ, वहां जोतों की संख्या 50.77 मिलियन से बढ़कर 137.80 मिलियन हो गई। परिणामस्वरूप इस अवधि में जोत का औसत आकार 2.63 हैक्टेयर से घटकर 1.16 हैक्टेयर रह गया। वर्ष 2000-01 के बाद कृषि क्षेत्र में वृद्धि नहीं हुई, परन्तु जोतों की संख्या निरन्तर बढ़ी है।

इस अवधि में लघु व सीमान्त कृषकों का प्रतिशत बढ़ा है। मध्यम व वृहद कृषकों का प्रतिशत कम हुआ है। स्पष्ट है कि वृहद जोत मध्यम में, मध्यम अद्र्धमध्यम में, अद्र्धमध्यम लघु में और लघु जोत सीमान्त में परिवर्तित हो रही हैं। यह प्रक्रिया भविष्य में अबाध गति से चलती रहेगी। शनै: शनै: सीमान्त श्रेणी के किसान भूमि विहीन या नगण्य भूमि के स्वामी रह जाएंगे। वर्तमान में भी भूमि विहीन किसानों की संख्या 31.12 प्रतिशत है।

कम होती आय और बढ़ती बेरोजगारी
आबादी बढऩे व जोतों के घटते आकार के कारण अधिसंख्य किसानों के लिए कृषि अलाभकारी व्यवसाय बनता जा रहा है। मध्यम या वृहद श्रेणी का किसान ही अपनी आय से अपने उपभोग व्यय की पूर्ति कर पाता है। इस प्रकार देश के 4.95 प्रतिशत किसान ही अपने परिवार का व्यय अपनी आय से निकाल पाते हैं, शेष 95.05 प्रतिशत किसान अभाव में जीवन व्यतीत करने को विवश है।

कृषि क्षेत्र व गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक की आय में भी भारी अन्तर है। कृषि क्षेत्र के श्रमिक की औसत आय लगभग 12371.00 है, जबकि गैर-कृषि क्षेत्र के श्रमिक की आय लगभग 61432.00 रुपए है।

इस अन्तर के कारण श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करने के बजाय गैर-कृषि क्षेत्र में काम करने को वरीयता देते हैं। इससे भी लघु व सीमान्त कृषकों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनके कृषि उत्पादन कार्य मूलत: श्रम आधारित होते हैं।

ग्रामीण व शहरी क्षेत्र में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय मे भारी अन्तर है। ग्रामीण क्षेत्र में प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय 1054.00 रुपए है, जबकि शहरी क्षेत्र में 1984.00 रुपए है। इससे शहरी व ग्रामीण जीवन की असमानता साफ दिखाई देती है।

अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किसान ऋण लेने को विवश है। भारत में 48.6 प्रतिशत परिवार ऋणग्रस्त हैं और औसत ऋण 12858.00 रुपए है। (जनवरी-दिसम्बर 2003) यह आंकड़े पुराने हैं और भारत सरकार व राज्य सरकारों ने किसी हद तक इन्हें माफ भी किया है। जब भी किसानों के ऋण माफ किए जाते हैं, तब विभिन्न क्षेत्रों से आलोचनाएं की जाती हैं। उद्योग के क्षेत्र में 40,000 करोड़ से अधिक ऋण की वसूली नहीं हो सकी है, परन्तु इस बारे में ध्यान नहीं दिया जाता।

स्थिति यह बन गयी है कि आय की कमी व ऋण ग्रस्तता के कारण किसान जगह-जगह पर आत्महत्या कर रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार वर्ष 1997 से 2006 की अवधि में 1,66,304 किसानों ने आत्महत्या की। कृषि जोतों के निरन्तर विखण्डन, गैर-कृषि रोजगार के अभाव, रोजगार परक शिक्षा के न होने और ग्रामीण क्षेत्र में कृषि आधारित लघु उद्योगों के अभाव के कारण गांवों में तेजी से बेरोजगारी बढ़ रही है।

ग्रामीण बेरोजगारी दूर करने के लिए भारत सरकार ने समय-समय पर कई योजनाएं प्रारम्भ कीं, लेकिन ये योजनाएं अपने उद्देश्यों में सफल नहीं रहीं। उनके द्वारा न तो स्थाई परिसम्पत्तियों का सृजन हुआ और न रोजगार के स्थायी अवसर सृजित हो सके।

स्वतंत्रता के पश्चात सिंचाई सुविधाओं और प्रसार सेवाओं का विस्तार होने से फसलों की उत्पादकता व उत्पादन में वृद्धि हुई। ‘हरित क्रान्ति’ के बाद तो उत्पादकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। वर्ष 1951 में खाद्यान्न की उत्पादकता केवल 522 कि. ग्राम प्रति हैक्टेयर थी, जो बढ़कर 1876 कि. ग्राम प्रति हैक्टेयर हो गई। परन्तु गत वर्षो में प्रगति में ठहराव आ गया है। वर्ष 1990 के बाद उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई।

पंजाब व हरियाणा में खाद्यान्न उत्पादकता अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर है, परन्तु यहां भी वर्ष 1990-2000 की तुलना में नगण्य वृद्धि हुई है। अन्य राज्य अभी पीछे हैं। नि:संदेह अच्छी प्रसार सेवाओं, सिंचाई सुविधा, अच्छे बीज, खाद्य व अन्य तकनीकि के उपयोग से उत्पादकता में कई गुना वृद्धि की जा सकती है।

विकास की यह स्वाभाविक प्रकिया है कि उद्योग तथा अन्य क्षेत्रों में प्रगति के साथ सकल घरेलू उत्पाद में उद्योग व सेवा क्षेत्रों का प्रतिशत योगदान बढ़ाता है। परिणामस्वरुप कृषि क्षेत्र का योगदान घटता है। परन्तु यह स्वागत योग्य तभी है जब कृषि में कार्यरत जनसंख्या का भार भी तुलनात्मक रूप से कम हो। वर्ष 1950-51 में लगभग 70 प्रतिशत जनजीवन कृषि कार्य में लगा था तथा सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 55.4 प्रतिशत था। वर्ष 2011-12 में लगभग 50 प्रतिशत लोग कृषि कार्य में लगे थे, परन्तु सकल घरेलू उत्पाद में उनका योगदान 14.10 प्रतिशत रह गया है। इसे सन्तुलित विकास नहीं कहा जा सकता।

यह भी तथ्य है कि योजना परिव्यय में कृषि क्षेत्र का भाग घट रहा है। प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर वर्ष 1979-80 तक यह भाग औसतन 10 से 17 प्रतिशत तक रहा परन्तु उसके बाद घटकर औसतन 4 से 5 प्रतिशत ही रह गया।

आधारभूत सुविधाओं का अभाव
ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, उर्जा परिवहन, स्वास्थ्य आदि सामाजिक सुविधाओं का अभाव है। कानून व्यवस्था में भी गिरावट आ रही है। फलस्वरूप कुछ लोग तो रोजगार के लिए गांव छोड़ रहे हैं और कुछ लोग सामाजिक सुविधाओं के लिए गांव छोड़ रहे है। जनजीवन के पलायन से शहरों पर आबादी का दबाव बढ़ रहा है। गांव अभाव के केन्द्र बन रहे है। आकलन से यह बात सामने आती है कि शहरी आबादी में वृद्धि का लगभग 50 प्रतिशत भाग ग्रामीण क्षेत्र से पलायन से आया है।

विकास का मॉडल
विकास का वत्र्तमान मॉडल कृषि क्षेत्र की समस्याओं का निराकरण करने मे असमर्थ है। इसका मूल कारण है कृषि अर्थतन्त्र का आबादी बढऩे के साथ संकुचित होना, जबकि गैर-कृषि क्षेत्र का अर्थतन्त्र आबादी बढऩे के साथ विस्तार पाता है। आबादी बढऩे के साथ जोतों का विखण्डन अपरिहार्य है। इसलिए खेती की आय पर किसानों की निर्भरता को कम करने के उपाय खोजने होंगे। चीन में औसत जोत का आकार भारत से कम है, परन्तु वहां कृषि उत्पादकता व विकास भारत से कहीं अधिक है। चीन में कृषि आबादी के बड़े भाग को अन्य व्यवसायों में प्रशिक्षित कर रोजगार के स्थायी अवसर उपलब्ध कराते हुए कृषि पर आबादी भार को कम करके उसे लाभकारी बनाया गया है। फलस्वरूप चीन ने गरीबी के स्तर को 80 प्रतिशत (1980) से घटाकर 15 प्रतिशत (2005) करने में सफलता प्राप्त की है। भारत में भी विकास के वत्र्तमान मॉडल पर पुन: विचार कर इसमें वांछनीय परिवर्तन करने होंगे।

इस कार्य नीति के निम्न अवयव होंगे:
• उत्पादकता में वृद्वि।
• कृषि उत्पादों के भण्डारण व विक्रय की सुव्यवस्था।
• उचित व संतुलित कृषि उत्पाद समर्थन मूल्य।
• ग्रामीण क्षेत्र में सेवा क्षेत्रों का विस्तार।
• ग्रामीण क्षेत्र में कृषि आधारित लघु व कुटीर उद्योगों की स्थापना व विस्तार।
• शिक्षा का विस्तार व व्यवसायिक बनाना।
• ग्रामीण क्षेत्र में सुविधाओं का विस्तार।

उत्पादकता में वृद्वि
• यह निर्विवाद है कि प्रभावी कृषि प्रबन्धन से भारत में उत्पादकता में कई गुना वृद्वि की सम्भावना है। परन्तु इसके लिए आवश्यक है कि किसान को आवश्यक कृषि निवेश, यथा, 1. अच्छा बीज, 2. खाद व कीटनाशक दवाएं 3. सिंचाई 4. ऋण 5. सब्सिडी व तकनीकि जानकारी उपयुक्त मात्रा व समय पर मिले। वत्र्तमान में प्रसार सेवाओं की अदक्षता के कारण ये निवेश समय पर नहीं मिल पाते। अत: उत्पादकता कुप्रभावित होती है।
• पंजाब, हरियाणा व पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खाद के अत्यधिक उपयोग, जल ठहराव व भूमि उपचार न करने के कारण उत्पादकता प्रभावित हुई है। अत: इस बारे में अनुसन्धान कर उपयुक्त कार्यवाही की आवश्यकता है।
• यह आवश्यक है कि प्रत्येक किसान को अच्छी से अच्छी तकनीकी की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। वस्तुत: वर्तमान कृषि पद्धतियों में सुधार की आवश्यकता है, क्योंकि न तो ये किफायती हैं और न पर्यावरणीय दृष्टि से धारणीय। कई फसलों की उत्पादकता कम है, जिसके लिए अदक्ष सिचांई व्यवस्था व प्रसार सेवाओं की कमी जिम्मेदार है। इस बारे में कृषि अनुसन्धान संस्थाओं व कृषि विश्वविद्यालयों को किसानों के साथ मिलकर कार्यवाही करनी होगी। दुर्भाग्यवश कृषि से सम्बन्धित कई तकनीकियों का विकास तो हुआ है, परन्तु वे किसानों तक नही पहुंची है। प्रसार सेवाओं का लाभ भी किसानों को नहीं मिला है। वस्तुत: हरित क्रान्ति के बाद कृषि अनुसंधान व प्रसार के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य नहीं हुए हैं। यह तो सही है कि अनुसंधान संस्थाओं के प्रायोगिक फार्मस में कृषि उत्पादकता विश्वस्तर की है, परन्तु किसानों के खेतों में यह आधी रह जाती है। स्पष्टत: किसानों के पास वे सुविधाएं नहीं हैं, जो अनुसंधान संस्थाओं के पास उपलब्ध है। आवश्यकता इस बात की है कि किसान की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक तकनीकी विकसित की जाए।
• विभिन्न गतिविधियों के सम्पादन हेतु कृषकों को कई तरह के ऋण उपलब्ध कराने की व्यवस्था है। परन्तु प्रणाली की जटिलता, जानकारी के अभाव, कर्मचारियों के नकारात्मक दृष्टिकोण व निहित स्वार्थ के कारण प्राय: लघु व सीमान्त कृषक सरकारी ऋण सुविधा से वंचित रह जाते हैं और निजी संस्थाओं/व्यक्तिओं से उच्च ब्याज दर पर ऋण लेने को विवश हो जाते हैं। ये लोग किसानों का शोषण करते हैं। सरकारी व संस्थागत बैंकों से कार के लिए ऋण प्राप्त करना आसान है, परन्तु ट्रैक्टर के लिए ऋण प्राप्त करना मुश्किल है। वस्तुत: वर्तमान व्यवस्था में सुधार करने की आवश्यकता है ताकि एक आम किसान को, बिना किसी बाहरी सहायता के, उचित मात्रा में समय पर ऋण मिल सके। ऋण प्राप्त करने की प्रक्रिया सरल हो और ब्याज दर 4.00 प्रतिशत हो, जैसा कि नेशनल कमिशन फार फार्मस के द्वारा संस्तुति की गई है।
• इस समय किसानों को विभिन्न मदों मे सब्सिडी दिए जाने का प्रावधान है। सब्सिडी एक वृहद योजना का अंग होना चाहिए, जिसका लक्ष्य लघु व सीमान्त कृषकों को सहायता पहुंचाना हो, ताकि वे खेती में उर्जा सहित विभिन्न निवेशों पर आ रहे अतिरिक्त व्यय को वहन कर सके।

भण्डारण व विक्रय की सुव्यवस्था
• इस समय भण्डारण की आधुनिक सुविधाओं का अभाव है। फलस्वरूप फसल उठाने के बाद काफी हानि उठानी पड़ती है। एक आकलन के अनुसार हानि की मात्रा 30 प्रतिशत तक आंकी गई है। इसमें सुधार करने कि आवश्यकता है।
• कृषि उत्पादों कि वर्तमान व्यवस्था भी बिचौलियों व व्यापारियों के हक में कार्य करती है। सरकारी एजेन्सी भी प्राय: किसानों के बजाय इन बिचौलियों का साथ देती है। जब किसान अपना उत्पाद लेकर सरकारी केन्द्रों पर जाता है तो वे कई बार अनावश्यक आपत्तियां लगाकर उत्पाद लेने से मना कर देती है। फलस्वरूप किसान समर्थन मूल्य से कम दर पर अपना उत्पाद बिचौलियों को बेचने को विवश हो जाता है। लघु व सीमान्त कृषकों कि आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती की वे अपने उत्पाद का भण्डारण करें, क्योंकि उन्हें साहुकारों का ऋण चुकाना होता है।
• ये बिचौलिए कृषि उत्पाद को उच्चतर मूल्य पर उपभोक्ताओं को बेचते हैं। इस प्रकार एक तरफ उपभोक्ताओं का शोषण होता है और दूसरी तरफ किसानों का। एक अध्ययन के अनुसार उपभोक्ता कृषि उत्पाद का जो मूल्य चुकाता है उसका मात्र 10 से 23 प्रतिशत ही किसानों को प्राप्त होता है। आधिकांश भाग हानि, अदक्षता व बिचौलियों की भेंट चढ़ जाता है। विकासशील देशों में भण्डारण व विक्रय की अच्छी व्यवस्था होने के कारण किसान को 64 से 80 प्रतिशत मूल्य मिल जाता है। यह विडम्बना है कि कुछ वर्षो में ही व्यापारी तो कृषि उत्पाद का विक्रय कर धनवान हो जाता है, परन्तु उसका उत्पादन करने वाला किसान गरीबी और अभाव से जूझता रहता है। वस्तुत: कई कारणों से किसान बिचौलियों को अपना उत्पाद बेचने को विवश है। ये है बाजार से गांव की दूरी, परिवहन पर व्यय, ऋण व इन्श्योरेन्स उपलब्धता की कमी, भण्डारण का अभाव, उत्पाद को रोकने की अक्षमता, निजी श्रोतों के ऋण लौटाने का दबाव आदि। किसान व उपभोक्ता के हित में इन कारकों को दूर करना आवश्यक है।
• आवश्यकता इस बात की है कि विक्रय की ऐसी व्ययस्था की जाए जिसमें कृषि उत्पाद के विक्रय का लाभ किसान, उपभोक्ता व व्यापारी को न्यायोचित व अनुपातिक आधार पर मिले। इसके लिए या तो किसानों को अपना उत्पाद सीधे विक्रय करने के लिए आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं या किसानों और उपभोक्ताओं की सहकारी समितियां बनायी जाएं। यह भी उपयुक्त होगा कि सम्पूर्ण भारत को एक बाजार के रूप में मानते हुए किसानों को अपना उत्पाद किसी भी स्थान पर विक्रय करने की स्वतंत्रता हो।

संतुलित कृषि उत्पाद सर्मथन मूल्य
• सर्मथन मूल्य र्निधारित करने की वर्तमान अवधारणा भी किसानों के हित मे नहीं है। यह आदर्श मूल्य के बजाय प्रारम्भिक मूल्य है। आदर्श समर्थन मूल्य का अर्थ है कृषि तथा गैर कृषि उत्पाद के मूल्यों में सन्तुलन। कृषि उत्पाद की इकाई की तुलनात्मक अर्थात क्रय क्षमता मे गिरावट को रोका जाए। आज किसान एक क्विंटल खाद्यान्न से उतना गैर-कृषि सामान नहीं खरीद सकता, जितना पहले खरीद सकता था। इस प्रकार वह इस बात से अनजान है कि वह निरन्तर गरीबी की ओर बढ़ रहा है। स्पष्टत: कृषि उत्पाद का समर्थन मूल्य समानता के आधार पर निर्धारित होना चाहिए।
• इस बारे में राष्ट्रीय किसान आयोग की संस्तुतियां विचारणीय हैं। इनके अनुसार किसी भी कृषि उत्पाद का सर्मथन मूल्य आ रहे इकाई व्यय का 150 प्रतिशत होना चाहिए (कृषि व्यय–50 प्रतिशत)।

गांव में सेवा क्षेत्रों का विस्तार
• ग्रामीण क्षेत्र में आवश्यक सेवाओं का विस्तार नहीं हो पाया है। इसके विपरीत गांव के कारीगर रोजगार व बेहतर कमाई की आशा में शहर की ओर पलायन कर रहे हैं। यदि गांव की रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था गांव के पास की जाए तो इससे उन्हें लाभ तो होगा ही, गांव के नवयुवकों को रोजगार भी मिलेगा।
• गांव के नवयुवकों को प्रशिक्षित कर तथा उनके प्रभावी ग्रुप बनाकर विभिन्न सेवा क्षेत्रों में लगाया जा सकता है। इनमें शामिल हैं
• कृषि उत्पाद के लिए वांछित विभिन्न निवेशों की टे्रडिंग।
• नर्सरी का कार्य।
• बायो गैस यन्त्रों की स्थापना व अनुरक्षण।
• सामाजिक वानिकी योजनाओं का प्रबन्धन।
• फूड प्रोसेसिंग कार्य
• हैण्डपम्प, पम्प सेट्स, ट्रैक्टर आदि तथा उनके पूर्जो की ट्रेडिंग व मरम्मत के कार्य।
• कृषि उपकरणों की ट्रेडिंग व मरम्मत के कार्य
• भवन निर्माण सामग्री की ट्रेडिंग
• कम्पाउंडर एवं नर्सों के प्रशिक्षण केन्द्र

कृषि आधारित लघु व कुटीर उद्योग
• गांव की बेरोजगारी दूर करने तथा गैर कृषि आय में वृद्वि करने के लिए आवश्यक है कि वहां कृषि आधारित लघु व कुटीर उद्योगों का जाल फैलाया जाए। आधुनिक उद्योग प्राय: रोजगार रहित विकास को प्रोत्साहित करते हैं। कृषि ही ऐसा क्षेत्र है जो रोजगार आधारित विकास की सुविधा प्रदान कर
• गांव के लोग आर्थिक दृष्टि से इतने सम्पन्न नहीं हैं कि उद्योगों का जाल फैला सकें। उद्योगों के लिए आवश्यक इन्फ्रास्ट्रक्चर, परिवहन, संचार व बिजली की कमी है। वत्र्तमान तकनीकी एवं औद्योगिकी ग्रामीण क्षेत्र के लिए बहुत उपयोगी नहीं है। आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसी औद्योगिकी की जरूरत है, जिसमें स्थानीय प्रतिभा, स्थानीय कृषि उत्पाद व स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग हो सके। प्रति इकाई पूंजी से वाछिंत उत्पादन हो सके तथा अधिकतम रोजगार की व्यवस्था हो सके।

• सरकार को आवश्यक पूंजी, इन्फ्रास्ट्रक्चर व तकनीकी उपलब्ध कराने के साथ ही किसानों तथा ग्रामीण नवयुवकों के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की व्यवस्था करनी होगी।

शिक्षा का विस्तार व व्यवसायीकरण
• ग्रामीण क्षेत्र में शिक्षा के विस्तार व व्यवसायीकरण को रोजगार सृजन का सशक्त माध्यम बनाने के लिए शैक्षिक प्रशासन, शिक्षा व्यवस्था, अध्यापक प्रशिक्षिण, पाठ्यक्रम आदि में सुधार करने की आवश्यकता है, जिसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति या आयोग का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें ग्रामीण पृष्ठभूमि के विद्वान भी सदस्य हों।
• शिक्षा को रोजगार से जोडऩे के लिए प्रायमरी स्तर से लेकर डिग्री स्तर की शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई के साथ-साथ क्राफ्ट, कुटीर धन्धों के प्रशिक्षण की भी व्यवस्था हो।
• ग्रामीण क्षेत्रों मे ग्रामीण तकनीकी इन्सटीट्यूट और ग्रामीण पोलीटेकनीक खोले जाएं।
सामाजिक सुविधाओं का विस्तार
• गांव को रहने योग्य बनाने के लिए आवश्यक है कि वहां सामाजिक सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
• आज विभिन्न राज्यों में 20 से 50 ऐसे कृषक हैं जो कृषि का धन्घा छोडऩा चाहते हैं। परन्तु वैकल्पिक धन्धा न मिलने के कारण छोड़ नहीं पा रहे हैं। विश्व के विकासशील देशों में गांव तथा शहर की सामाजिक सुविधाओं में लगभग समानताएं हैं। यदि भारत में इस स्थिति का निराकरण नहीं किया गया, तो एक दिन शहर और गांव के बीच संघर्ष होगा।

(लेखक ग्रामीण क्षेत्र की समस्याओं के अध्ययन तथा समाधान हेतु कार्यरत -‘ग्रामीण कल्याण संस्थान’ के अध्यक्ष हैं।)

 इ. कप्तान सिंह

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