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राजनीतिक इच्छा का अभाव है, आतंकवाद से निपटने में

बिहार सरकार आतंकवादियों के प्रति कृपालु बनी रही। खुंखार आतंकवादी यासीन भटकल के खिलाफ कोई मामला न होने का बहाना कर बिहार सरकार ने उसके विरूद्ध कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था। यह काम उस पार्टी ने किया, जो सत्ता में है और देश की रक्षक होने की बजाय, अल्पसंख्यक वोट बैंक की रक्षक होने का दिखावा करने में ज्यादा उत्साहित नजर आई।

आतंकवाद एक वाइरस की तरह है, जो भारत में बहुत तेजी से फैल रहा है। लेकिन ज्यादातर राज्य सरकारें उस कबूतर की तरह व्यवहार कर रही हैं, जो खतरे को देखकर अपनी आंखें इस गलतफहमी में मूंद लेता है कि बिल्ली उसे देख नहीं पाएगी और वह सुरक्षित बच जाएगा। इतना ही नहीं आतंकवाद की लड़ाई को राजनीति के साथ घालमेल कर दिया गया है। इसका असर चुनावों के नजदीक आने पर अधिक दिखाई देता है। आतंकवाद से ग्रस्त राज्यों में एक राज्य बिहार भी है, जहां आतंकवादियों ने एक साल में दो बार बड़े पैमाने पर आघात किया। पहला आघात जुलाई 2012 में किया, जब म्यांमार में मुसलमानों पर हमले के विरोध में बोधगया में मंदिर में हमला किया।

दूसरा हमला 27 अक्टूबर 2013 को पटना में भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी की सभा से पहले सीरियल धमाकों के रूप में किया। भारत में ही पैदा हुए इंडियन मुजाहिदीन के इस हमले में 6 लोगों की मौत हो गई और 83 लोग घायल हो गए। इस सीरियल धमाके के पीछे मुजफ्फरनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों में मुसलमानों के मारे जाने की वजह बताया गया।

हमेशा की तरह इस बार भी बिहार सरकार आतंकवादियों के प्रति कृपालु बनी रही। खुंखार आतंकवादी यासीन भटकल के खिलाफ कोई मामला न होने का बहाना कर बिहार सरकार ने उसके विरूद्ध कोई कार्रवाई करने से इंकार कर दिया था। यह काम उस पार्टी ने किया, जो सत्ता में है और देश की रक्षक होने की बजाय, अल्पसंख्यक वोट बैंक की रक्षक होने का दिखावा करने में ज्यादा उत्साहित नजर आई।

राज्य पुलिस, कोई स्वतंत्र निकाय नहीं है। यह राज्य सरकार के अंतर्गत कार्य करती है। 22 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश को भी उसने नजरअंदाज किया। सुप्रीम कार्ट ने थानेदार से लेकर पुलिस महानिदेशक तक के कार्यकाल को निश्चित करने जैसे सीमित पुलिस सुधार की बात कही थी। लेकिन दुर्भाग्य से बिहार सहित किसी राज्य ने इसे लागू नहीं किया।

कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक शायद ही ऐसा कोई राज्य होगा, जहां आतंकवादियों ने अपनी कार्रवाईयों को अंजाम नहीं दिया हो। नागरिकों की सुरक्षा और आतंकवादियों से निपटना न तो उत्तर प्रदेश की सरकार की प्राथमिकता में शामिल है और न ही बिहार सरकार की प्राथमिकता में। भारत सरकार ने लोकसभा में कहा था – ”भारत में पुलिस-जनसंख्या (एक लाख की जनसंख्या पर पुलिस की संख्या) का अनुपात 134 है, जबकि संयुक्त राष्ट्र के मानदंड के अनुसार इसकी न्यूनतम सीमा 220 होनी चाहिए। लेकिन बिहार और उत्तर प्रदेश क्रमश: 63 और 74 के अनुपात के साथ सबसे बुरी स्थिति में है।’’

दिसंबर 2012 में केन्द्रीय गृहमंत्रालय द्वारा इक्कठा किए गए आंकड़ों के अनुसार दिसंबर 2011 तक देश में पुलिसकर्मियों की जनसंख्या 16.60 लाख थी, जबकि स्वीकृत पद 20.86 लाख हैं। बिहार के 55 हजार पुलिसकर्मी आधुनिक हथियारों की कमी से जुझ रहे हैं। उनके पास न तो ऐंटी-लैंडमाईन गाडिय़ां हैं और न ही बुलैटप्रूफ जैकेट। बम निरोधक उपकरणों की कमी इस सीरियल ब्लास्ट के दौरान पूरा देश देख चुका है।

बिहार पुलिस एसोसिएशन के अनुसार नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के 300 पुलिस स्टेशन, 92 पुलिस पिकेट और सैकड़ों आउट-पोस्ट में से ज्यादातर आधारभूत संरचना की कमी से बुरी तरह प्रभावित हैं। बिहार पुलिस संयुक्त राष्ट्र के मानदंड का 25 प्रतिशत और समस्त भारत के स्तर पर कुल पुलिस औसत का 50 प्रतिशत है। केन्द्रीय गृहमंत्रालय का कहना है कि भाजपा के प्रधानमंत्री के उम्मीदवार की रैली में आतंकी हमले को लेकर खुफिया जानकारी बिहार सरकार को दे दी गई थी।

पहले तो राज्य सरकार ने इससे इंकार किया और यह मान लिया गया कि जो बिहार सरकार कह रही है, वह सच है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि उसकी अपनी खुफिया विभाग क्या कर रही थी। लेकिन सत्ता के शिखर पर बैठे व्यक्ति की जानकारी के बिना, पुलिस से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि राजधानी पटना को छोड़कर शेष राज्य को उसके भाग्य के भरोसे छोड़ दे।

गृहमंत्रालय के पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो द्वारा जारी ताजा आंकड़ों (1 जनवरी 2013 तक) के अनुसार, देश के 14,842 वीआईपी राज्य सुरक्षा का लाभ उठा रहे हैं और जितने के हकदार हैं, उससे ज्यादा पुलिस सुरक्षा का लाभ ले रहे हैं। 3,030 पुलिस सुरक्षा प्राप्त वीआईपी के साथ इस सूची में बिहार पहले स्थान पर है। बिहार के कुल 55,000 पुलिसकर्मी में से 10,000 पुलिसकर्मी वीआईपी की सुरक्षा में तैनात हैं। यानि कुल पुलिस संख्या का 20 प्रतिशत वीआईपी सुरक्षा में तैनात हैं। इस सूची में मंत्री, जज, विधायक और अन्य वीआईपी शामिल हैं। लेकिन सुरक्षा पाने वाले इन वीआईपी लोगों की कुल संख्या 1500 से ज्यादा नहीं है। फिर सवाल यह उठता है कि अन्य वीआईपी कौन हैं? एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के अनुसार अन्य वीआईपी लोगों में राजनीतिक कार्यकर्ता, ठेकेदार और व्यवसायी शामिल हैं, जो सत्ता के करीब हैं। तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार स्वीकृत संख्या में बिना किसी वृद्धि के, सामान्यत: सुरक्षा जरूरत वाले लोगों की सुरक्षा उपलब्ध संसाधनों में से दी जाती है। इससे सीमित मानव संसाधनों वाले राज्य में पुलिस की स्थिति विकट हो गई है।

किसी भी हादसे या आतंकवादी घटना होने की स्थिति में राजनेताओं या सरकारों के स्टैंडर्ड बहाने हैं। पहला यह षड्यंत्र है, दूसरा यह झूठ है, तीसरा यह कि सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से ऐसा किया गया है।
लेकिन कोई भी स्थिति से निपटने के लिए दिए गए, उपकरणों की क्षमता के बारे में एक शब्द भी नहीं कहता। विनाशकारी या देशद्रोही गतिविधियों में सरकार या संबंधित एजेंसियों द्वारा कोर्ट में उसे साबित करने की जवाबदेही को छोड़कर, भारत में हर विषय के लिए कानून है। आतंकवादी घटनाओं जैसे मामलों में, जहां आधा दर्जन से ज्यादा नागरिक मारे जाते हैं और सैकड़ों घायल होते हैं, लोग अपनी जान बचाने के लिए भागते हैं, वहां गवाह कहां खोजे जाएंगे, इन घृणित कारनामों को अंजाम देने वाले आतंकवादियों को कौन पहचानेगा? ऐसे अपराधों में, जो सावधनीपूर्वक योजनाबद्ध होता है, आतंकवादी मीलों दूर बैठे होते हैं। जिनका इरादा अधिक से अधिक लोगों को मारना है। ऐसे में किसी वीआईपी की हत्या जरूरी नहीं की बम ही माध्यम से हो, बल्कि भगदड़ द्वारा अपने उद्देश्य को प्राप्त करना भी उनका एक लक्ष्य होता है।
ऐसे मामलों में पुलिस के पास कोई जादू की छड़ी नहीं होती कि उसे लहराकर आरोपी का पता और सबूत जुटाया जा सके। यह सही है कि हर दुर्घटना को रोका नहीं जा सकता, लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम के दुव्र्यवहार के शिकार पुलिस बल, जो प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरणों की कमी से जुझ रही है, उस अपर्याप्त पुलिस बल से बहुत ज्यादा की उम्मीद नहीं की जा सकती।
आतंकवाद से निपटने में सबसे बड़ी कमी शक्ति का बहुकेन्द्रीयकरण है। आतंकवाद से लडऩे के लिए एक कमांडर-इन-चीफ होना चाहिए। कुछ राज्यों के पास ऐंटी-टेररिस्ट स्क्वैड के साथ पुलिस महानिदेशक के अंतर्गत अन्य फंक्शन भी हैं, जो सीधे मुख्यमंत्री और अन्य राजनीतिज्ञों से निर्देश लेता है। राजनेता आतंकवाद को मिटाने बजाय वोट बैंक के प्रति ज्यादा चिंतित होते हैं, जिससे आतंकवादी सहानुभूति महसूस करते हैं। इसके लिए राज्य सरकारें केन्द्र से पारा मिलिट्री फोर्स की मांग करती हैं और उससे या तो बुरी तरीके पेश आती हैं या फिर उनका इस्तेमाल नहीं करती हैं। कश्मीर में तो राज्य सरकार का आदेश है कि पारा मिलिट्री फोर्स के जवान घातक हथियार के बजाय सिर्फ लाठी अपने साथ रखेंगे। इससे जवान न सिर्फ कमजोर बनते हैं, बल्कि दुबक कर रहने के लिए भी बाध्य होते हैं।
 

जोगिन्दर सिंह

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