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गंगा के मुहाने पर अल-कायदा की दस्तक

भारत को आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी रणनीति का पुनर्परीक्षण करने की जरूरत है। बाद में इलाज करने के बजाय, प्रयास पहले रोकथाम के लिए होने चाहिए। यदि भारत पश्चिमी क्षितिज पर मंडराते खतरे को समझने में नाकाम रहता है, तो कई लोगों की आशंका कड़वी सच्चाई में बदल जाएगी और कार-बम ब्लास्ट में सैकड़ों की मौत जैसी खबरें हमारे समाचार पत्रों की सुर्खियां होंगी।

भारतीय उपमहाद्वीप में 2014 का साल अनेक कारणों से बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान से हटने के बाद क्या होगा, पाकिस्तान का सेना प्रमुख कौन होगा, भारत का प्रधानमंत्री कौन होगा के साथ-साथ, इस क्षेत्र में इनके क्या प्रभाव होंगे, जैसे मुद्दों की लंबी चर्चा टीवी, रेडियो और अखबारों में हो रही है। अनिश्चितता कंपकंपी पैदा करती है, खासकर तब जब अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठन से इस क्षेत्र का भाग्य जुड़ा हो।

इस क्षेत्र में जो लैंडमार्क घटना घटने वाली है, वह है अगले साल 2014 में अमेरिका के नेतृत्व वाली नाटो सेना की अफगानिस्तान से वापसी। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद, वहां की शक्ति शून्यता को भरने के लिए होने वाले संघर्ष का गवाह होगा, पृथ्वी का सबसे लड़ाका क्षेत्र अफगानिस्तान। अमेरिकी सेना की वापसी का क्या नतीजा होगा, इसकी चर्चा विश्लेषकों द्वारा प्राय: की जाती रही है। इन बहसों का जो निष्कर्ष निकल कर आता है, वह है पाक-अफगानिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में तालिबान और अल-कायदा के पुनर्रूत्थान की आशंका। अगर ऐसा है तो आतंकवादी संगठन अल-कायदा के विघटनकारी प्रभाव में भारत के भविष्य की संभावनाओं को बनाने की उचित धारणा होनी चाहिए। यह परिदृश्य न सिर्फ लाखों लोगों के लिए गंभीर खतरे के प्रति सचेत करता है, बल्कि आने वाले समय में भारत के वैश्विक स्तर पर आर्थिक एवं रणनीतिक खिलाड़ी होने के प्रति भी आगाह करता है।

इतिहास पर गौर करें तो भारत में दो प्रमुख धर्मों-हिन्दू और मुसलमानों में सभी विभिन्नताओं के बावजूद, सदियों से दोनों में सौहार्द्रपूर्ण रिश्ते रहे हैं। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब 1857 की स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई की तरह दोनों समुदायों ने कंधे से कंधे मिलाकर मातृभूमि के सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी। यह सहृदयता हिंदुस्तान और हिंदुस्तानियत की केन्द्रीय पहचान रही है, जो पाक-अफगानिस्तान क्षेत्र में भारत के धर्मांध लोगों द्वारा इस्लाम के नाम पर फैलाए जा रहे आतंकवाद के कारण खतरे में पड़ता जा रहा है। भारत में इस्लाम से सूफीवाद का विस्थापन और कट्टरपंथी विचारधारा के फैलाव से अल-कायदा जैसे आतंकी संगठन अपने गुप्त मंसूबे के लिए फायदे उठा रहे हैं। यह हमारे भविष्य के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण कहा जा सकता है, लेकिन इसके पीछे भी कई कारण हैं।

हाल ही में एक पाकिस्तानी पत्रकार ने भारत के नामी अखबार में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने जमात-ए-इस्लामी हिंद के सहयोग से पाकिस्तान के पंजाब में अल-कायदा के नेटवर्क स्थापित होने के सूक्ष्म तथ्यों का अवलोकन किया गया है। जमात-ए-तलाबा के रूप में जमात-ए-इस्लामी हिंद की पंजाब के स्कूलों और कॉलेजों में गहरी पैठ है। ये अफगानिस्तान में पूर्ववर्ती तालिबान सरकार के लिए भर्तियां करने के लिए उत्तरदायी हैं। पंजाबियों द्वारा तालिबान सरकार में निभाई गई भूमिका का तथ्य यह है कि अमेरिकी सेना द्वारा कैद किए गए 9 हजार तालिबानियों में 6 हजार पाकिस्तान के पंजाबी हैं। सालों बाद भी जमात-ए-इस्लामी हिंद की भूमिका में कोई बदलाव नहीं आया है और आज भी अल-कायदा, तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के लिए भर्तियां कर रहा है। जमात-उल-दावा का कुख्यात नेता हाफिज सईद, जमात-ए-इस्लामी हिंद को उभारने में मदद कर रहा है। 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिका के सैनिकों की वापसी के बाद अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अल-कायदा पंजाब में नई भर्तियां कर खुद को मजबूत करने में जुटा है।

पाकिस्तान और अफगानिस्तान में शरीयत आधारित निजामियत की स्थापना साझा मकसद के लिए लड़ रहे अफगान तालिबान और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के साथ अल-कायदा भी जुड़ चुका है। लश्कर-ए-तैयबा और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने न सिर्फ पाक-अफगानिस्तान क्षेत्र में अपने आतंकी नेटवर्क को मजबूत करने के लिए अल-कायदा से हाथ मिलाया है, बल्कि इनके गठजोड़ ने दक्षिण एशिया के देशों के लिए गंभीर खतरा पैदा किया है।

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) इन जेहादी ताकतों को पाकिस्तान के हित में साधने की कोशिश में जुटी है। हालांकि आईएसआई इसमें अब तक नाकाम ही साबित हुई है। अमेरिकी सेना की वापसी के बाद, अफगानिस्तान में अपना वर्चस्व स्थापित कर भारत के खिलाफ अपनी रणनीतिक बढ़त बनाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने तालिबान और अल-कायदा के समर्थन में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब हाल यह है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान, खुद पाकिस्तान के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। पाकिस्तानी सेना का कश्मीर जेहादी समूह से अफगानी जेहादी समूह को अलग रखने का प्रयास, पतली और खतरनाक लाईन पर पांव रखने जैसा है, जो अब नाकाम साबित हो रही है। पाकिस्तान का आने वाला भविष्य अंधकारमय है।

एनआईए की पूछताछ में यासीन भटकल ने हाल ही में यह रहस्योद्घाटन किया कि कैसे इंडियन मुजाहिद्दीन, विश्व के सबसे खतरनाक आतंकी संगठन अल-कायदा से सांठगांठ करने की प्रक्रिया के अंतिम चरण में है। सिर्फ इसी मुद्दे को अंतिम रूप देना है कि इंडियन मुजाहिद्दीन की भूमिका सहयोगी के रूप में होगी या अल-कायदा में उसका विलय कर दिया जाए।

भटकल के अनुसार, आईएम के इस कदम से आईएसआई नाराज है। आईएसआई और पाक सेना, अफगान आतंकी समूह और कश्मीरी समूह को अलग रखने में अक्षम साबित हो रही है। अल-कायदा के अंतर्गत आने वाले आतंकवादी संगठनों में ब्लूचिस्तान के ग्वादर से लेकर म्यांमार के रंगून तक और चीन के जिंगजिंयाग से लेकर दक्षिण भारत के कन्याकुमारी तक तबाही फैलाने की जबरदस्त क्षमता है।

भारतीय होने के नाते हमारी सबसे बड़ी चिंता, देश भर में, खासकर उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश और राजस्थान में मदरसों के बड़े नेटवर्क के माध्यम से कट्टर वहाबी और देवबंदी विचारधारा का फैलाव है। सरकार द्वारा जब भी मदरसों को रेगुलेट करने की कोशिश की जाती है, धार्मिक आजादी के मौलिक अधिकार के नाम पर या अल्पसंख्यकों को दबाने के नाम पर इसका व्यापक विरोध किया जाता है। प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर की जो भी मजबूरियां रही हों, मध्य-पूर्व के धन से वहाबी विचारधारा को प्रचारित करने वाले मदरसों से पढ़कर निकलने वाले छात्र सूफी संस्कृति के लिए खतरा बन रहे हैं।

जो इन मुद्दों पर अपनी निगाह रखें हैं, उन्हें पता है कि 1992 में बाबरी मस्जिद गिरने और 2002 के गुजरात दंगे के बाद बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समुदाय के रिश्तों में विचित्र बदलाव आया है। आज भारत की मुस्लिम आबादी धीरे-धीरे कट्टर देवबंदी विचारधारा की तरफ अग्रसर हो रही है। सिमी और बाद में इंडियन मुजाहिद्दीन का बनना, इस बदलाव का क्लासिकल मिसाल है। उत्तर प्रदेश और बिहार से इंडियन मुजाहिद्दीन के सर्वोच्च कमांडरों की गिरफ्तारी, इन राज्यों में इंडियन मुजाहिद्दीन के फैलाव और आतंकियों की जन्नत के रूप में पनाहगाह बनने की ओर इशारा कर रही है। सिमी की मजबूत पकड़ वाले उत्तर प्रदेश के जिले मेरठ, अलीगढ़, कानपुर, आजमगढ़ और गोरखपुर में बड़े पैमाने पर इंडियन मुजाहिद्दीन के स्लीपर सेल की सक्रियता की खबरें आती रही हैं।

अल-कायदा के साथ इंडियन मुजाहिद्दीन के विलय के बाद सुरक्षा तंत्र के लिए भारी खतरा उत्पन्न हो गया है।

अगस्त-सितंबर 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के राजनीतिक खेल के कारण सिर्फ प्रशासनिक नाकामी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह दंगा समाज में बढ़ रहे कट्टरवाद के फैलाव की आंतरिक कहानी कहता है। इस मामले में खुफिया एजेंसियों की भी नाकामी कही जाएगी कि वे ऐसे इलाकों की पहचान करने में असमर्थ रहीं, जहां बड़े पैमाने पर अत्याधुनिक हथियार बनाए जाते हैं। यह बात उजागर करना मुनासिब होगा कि 6 से 8 अलग-अलग स्थानों पर दंगों में पहली बार एके-47 का इस्तेमाल किया गया। फ्लैग मार्च के दौरान भारतीय सेना को भी नहीं बख्शा गया। ऐसे मामले सामने आए, जब भारतीय सेना पर इन हथियारों से हमले किए गए। भारतीय सुरक्षा प्रतिष्ठानों के लिए यह आश्चर्य की बात नहीं होगी, जब भविष्य में कई जगहों पर ऐसे अत्याधुनिक जंगी हथियारों का इस्तेमाल किया जाए। धर्म और जाति आधारित राजनीति, भ्रष्टाचार में डूबी नाकाम सरकार, बेराजगार युवकों की बड़ी आबादी और विकास की अनदेखी, गंगा-क्षेत्र को आतंकी गतिविधियों के लिए आदर्श मैदान बना रही हैं। इंडियन मुजाहिद्दीन और अल-कायदा का विलय करोड़ों भारतीयों के लिए मौत का आधार तैयार करेगा। अल-कायदा, इंडियन मुजाहिद्दीन के नेटवर्क का इस्तेमाल कर अपनी उपस्थिति को और मजबूत करने के लिए दंगा पीडि़तों को लुभाने की कोशिश करेगा।

इन सब चेतावनियों के बावजूद, हमारे राजनेता देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। यह बात जाहिर हो चुकी है कि गंदी राजनीति के लिए सुरक्षा तंत्र और खुफिया तंत्र को काफी नुकसान पहुंचाया जा चुका है। राजनीतिक आका राष्ट्रीय सुरक्षा को दरकिनार करते हुए, अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए एक संस्थान का इस्तेमाल दूसरे संस्थान के खिलाफ कर रहे हैं। आज इशरत जहां मुठभेड़ मामले में इंटेलिजेंस ब्यूरो की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लग चुका हैं। आतंकियों और दुश्मन देश के कमांडरों की वार्ता को मॉनिटर करने वाली भारतीय सेना की बेहद प्रभावशाली विंग ‘टेक्निकल सपोर्ट डिवीजन’ को खत्म कर दिया गया है। यह सब पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी.के. सिंह और सरकार -नौकरशाही की आपसी खींचतान का नतीजा है। इसके पीछे जो भी औचित्य ठहराए जाएं, लेकिन यह सत्य है कि इसमें सब कुछ गंवाने वाला भारत और भारतीय हैं।

भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर अपने संस्थानों को और मजबूत करने की बजाय, हमारे नेता उसे व्यवस्थित ढंग से कमजोर कर रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने अपने छोटे से शासनकाल में रॉ के विशेष ऑपरेशन को बंद करा दिया, जिसके कारण आज भारत की खुफिया क्षमता में भारी गिरावट आई है। इसी तरह का काम हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी सरकार द्वारा आईबी और मिलिट्री इंटेलिजेंस को अपाहिज बना कर की जा रही है।

अमेरिका के ‘लाईन्स ऑफ अमेरिकन होम लैंड सिक्यूरिटी’ की तर्ज पर भारत में भी ऐसे तंत्र की तुरंत आवश्यकता है। इस तरह का प्रयास पूर्व गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा ‘नेशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर (एनसीटीसी)’ का सूत्रीकरण कर किया गया था। एनआईए के साथ एनसीटीसी आतंकवाद के बढ़ते प्रभाव के लिए प्रभावकारी सिद्ध होती। लेकिन, दुर्भाग्य से ओछी राजनीति के कारण देशहित को दरकिनार कर, इस प्रयास को विफल कर दिया गया।

भारत को आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों का सामना करने के लिए अपनी रणनीति का पुनर्परीक्षण करने की जरूरत है। बाद में इलाज करने की बजाय, प्रयास पहले रोकथाम के लिए होनी चाहिए। यदि भारत पश्चिमी क्षितिज पर मंडराते खतरे को समझने में नाकाम रहता है, तो कई लोगों की आशंका कड़वी सच्चाई में बदल जाएगी और कार-बम ब्लास्ट में सैकड़ों की मौत जैसी खबरें हमारे समाचार पत्रों की सुर्खियां होंगी। अल-कायदा और इंडियन मुजाहिद्दीन के विलय के पहले ही काउंटर की रणनीति तैयार होनी चाहिए। काउंटर रणनीति के लिए निम्नलिखित सुझाव कारगर हो सकते हैं :

• रक्षा मंत्रालय के टेक्निकल सपोर्ट डिवीजन को पुनर्जीवित किया जाए।
• रॉ के विशेष ऑपरेशन डेस्क को पुनर्जीवित किया जाए और अफगान-पाक क्षेत्र के अल-कायदा, तालिबान और जमात-ए-इस्लामी नेतृत्व को निशाना बनाया जाए।
• भारत को संचालन के स्तर पर सीआईए और मोसाद के साथ सहयोग बढ़ाना चाहिए। साथ ही इसके जरिए इस क्षेत्र के प्रत्यक्ष या परोक्ष आतंकी नेतृत्व को सामूहिक स्तर पर खत्म किया जाना चाहिए।

• वहाबी विचारधारा को खत्म करने के लिए मनोवैज्ञानिक युद्ध की तरह आक्रामक अभियान चलाना चाहिए।
• सूफीवाद को बढ़ावा देने और मजबूत करने वाले धार्मिक गुरूओं, शिक्षाविदों, कलाकारों और संस्थाओं को संरक्षण दिया जाए।
• मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा और फंडिंग को मॉनिटर किया जाना चाहिए।
• आतंकवादी गतिविधियों वाले क्षेत्रों में सरकार द्वारा अन्य प्रशासनिक गतिविधियों की बजाय शिक्षा और विकास को प्राथमिकता दी जाए।

इस प्रश्न का उत्तर तलाशने की कोशिश में व्यग्रता और बढ़ जाती है कि क्या 2014 के बाद गंगा का मैदानी भाग अल-कायदा का अगला युद्धक्षेत्र होगा?

 

कर्नल दानवीर सिंह

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