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दिल्ली को त्रिशंकू बनाने के लिए क्यों तैयार हैं हम?

कांग्रेस की ओर से शीला दीक्षित की हरसंभव कोशिश है कि वह लगातार चौथी बार जीतने का रिकार्ड बनाएं और अपनी पार्टी और पार्टी के बड़े दिग्गजों के बीच अग्रिम पंक्ति में स्थान लें।

बरसों से कांग्रेस और भाजपा की सशक्त दावेदारी के बीच दिल्ली विधानसभा में आम आदमी पार्टी त्रिशंकू बन बैठे, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 70 सदस्यों वाली दिल्ली विधानसभा के लिए होने वाले मतदान से करीब दो सप्ताह पहले की स्थिति कांग्रेस और भाजपा – दोनों के लिए चौंकाने वाली है। यह अभी मात्र एक अंडर करंट है। इस करंट को आम आदमी पार्टी मतदान के दिन तक बनाए रखने में सक्षम होगी, कहना मुश्किल है। इसके लिए सभी पार्टियां अंतिम तीन-चार दिन में धन, जन और बल से कितना घनघोर प्रयास करती हैं और अपने-अपने मतदाताओं को रिझाने के लिए एड़ी-चोटी का कितना जोर लगा पाती हैं, यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। इस कार्य में कांग्रेस का पलड़ा सदैव भारी रहता है। कांग्रेस ने पिछले चुनाव में बाजी हारते-हारते जीती है। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी के बारे में संभावना व्यक्त की जा रही है कि वह इन चुनावों में 15-20 स्थानों पर अपना प्रभाव दिखा सकती है। आम आदमी पार्टी यदि 15 से 20 स्थानों पर बाजी मार लेती है, तो कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियों के लिए यह चौंकाने वाली बात होगी। ऐसी स्थिति में जबकि आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल त्रिशंकू विधानसभा की स्थिति में किसी भी दल को समर्थन देने अर्थात् मिलकर सरकार बनाने से इंकार कर चुके हैं, तो क्या ऐसी स्थिति में दिल्ली की जनता त्रिशंकू विधानसभा का चयन करना चाहेगी? यह एक ऐसा सवाल है, जिसका हल दिल्ली की जनता को निकलना होगा।

दिल्ली में एक ही दिन बुधवार, 4 दिसंबर 2013 को होने वाले मतदान के लिए रविवार, 16 नवंबर को नामांकन का काम पूरा हो चुका है। अरविन्द केजरीवाल ने भी नामांकन के अंतिम दिन नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र से मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के खिलाफ पर्चा दाखिल कर दिया है। इससे इस क्षेत्र में एक बहुत ही रोचक त्रिकोणीय मुकाबला होने की संभावना पैदा हो गई है। भाजपा से दिल्ली के पूर्व अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता पहले ही नामांकन भर चुके हैं। इसे एक महासंग्राम की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। ऐसा महासंग्राम, जिसमें धन, जन और बल तीनों शक्तियों का कड़ा और रोचक मुकाबला देखने को मिल सकता है। इससे तीनों का ही अस्तित्व भी दांव पर लगा दिखाई दे रहा है।

इस चुनावी महासमर की चौसर पर महारथी आमने-सामने डट चुके हैं। अब बाजी कौन मारेगा, इस पर बड़े जोर-शोर से कयास और सट्टे, दोनों लग रहे हैं। हालांकि प्याज और टमाटर सहित अनेक सब्जियों के दाम आसमान छूने के कारण मुख्यमंत्री और कांग्रेस को चारों ओर से मार पड़ रही है। लेकिन फिर भी कांग्रेसी विश्लेषक यह कह कर डैमेज कंट्रोल कर रहें हैं कि यह समस्या खराब मौसम और केन्द्र की नीतियों की वजह से है। ऐसे भी महंगाई दशकों से चुनावी मुद्दा रही है और कांग्रेस ने प्याज की महंगाई के बल पर ही दिल्ली में खाता खोला था। इस मुद्दे को मीडिया ने भी खूब उछाला है। लेकिन इससे भी बड़ा मुद्दा महिलाओं की सुरक्षा, कानून की बिगड़ती स्थिति भी बना हुआ है। इन सभी मुद्दों को ले कर मीडिया और मीडियाकर्मियों ने उम्मीदवारों और उनकी पृष्ठभूमि का खाका तैयार कर लिया है। यही नहीं, मीडिया ने तो येन-केन-प्रकारेण पार्टियों और उम्मीदवारों की जीत-हार के दावे भी करने शुरू कर दिए हैं। तीनों ही पार्टियों ने भी बड़ी जोर-शोर से दावे और प्रतिदावे करने प्रारंभ कर दिए हैं। निस्संदेह, इस बार मुकाबला रोचक होने के साथ-साथ जानमारी वाला भी होगा।

कांग्रेस की ओर से शीला दीक्षित की हरसंभव कोशिश है कि वह लगातार चौथी बार जीतने का रिकार्ड बनाएं और अपनी पार्टी और पार्टी के बड़े दिग्गजों के बीच अग्रिम पंक्ति में स्थान लें। शीला के विरोध में ऐंटी एन्कम्बेंसी और भ्रष्टाचार के दो बड़े मुद्दे हैं, लेकिन उनकी स्थिति अपनी पार्टी और कार्यकर्ताओं के साथ-साथ केन्द्रीय नेताओं में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के बीच आज एक सबल लौह महिला नेतृत्व से कम नहीं है। वैसे भी दिल्ली की जनता उनके कामों से इतना भी रुष्ट नहीं है कि उन्हें और कांग्रेस को तीसरे पायेदान पर ला कर खड़ा कर दे। यहां, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस और कांग्रेसी नेता साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति में पूरी तरह से परिपक्व हैं।

दिल्ली के राजनैतिक जातीय समीकरणों में अग्रवाल बनियों, पंजाबी और ब्राह्मणों का सदैव करीब-करीब बराबर-बराबर और अब पिछले एक-डेढ़ दशक से पूर्वांचलियों का राजनीति में बड़ा जोड़-तोड़ है। मुसलमानों का एक बड़ा वर्ग लंबे अरसे से कांग्रेस का सहयोगी रहा है। यहां भी शीला दीक्षित अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों को मात देने में सक्षम हैं। वह पीहर से पंजाबी हैं, तो ससुराल से ब्राह्मण हैं। इसके अलावा केन्द्र की राजनीति में लालू, पासवान और अब नीतीश तथा माया और मुलायम के समर्थक भले ही एकतरफा कांग्रेस को वोट न दें, पर इतना तो निश्चित है कि वे भाजपा के साथ तो खड़े नहीं होंगे। कुल मिला कर इतना तो कहा ही जा सकता है कि शीला दीक्षित यदि अपनी टीम को किसी तरह नहीं जीता पाती है, तो भी एक कप्तान के रूप में उनकी पारी को सदैव याद किया जाता रहेगा। अनुमान है कि शीला दीक्षित निश्चित रूप से कम से कम 22 से 25 स्थानों पर बाजी मार लेंगी।

भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में प्रस्तुत डॉ. हर्ष वर्धन की अपनी छवि तो दांव पर होगी ही, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ अधिकारियों के लिए यह चुनौती भी होगी। यहां, डॉ. हर्ष वर्धन के मामले में पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देरी से की गई नियुक्ति का खमियाजा पार्टी और डॉ. हर्ष वर्धन को भुगतना पड़ सकता है। निस्संदेह डॉ. हर्ष वर्धन हरदिल अजीज हैं। उनके व्यक्तित्व और कार्यशैली के बारे में शायद ही किसी को कोई संदेह हो। किन्तु केजरीवाल की एक सटीक टिप्पणी कि डॉ. हर्ष वर्धन भाजपा में मनमोहन सिंह हैं, ने दिल्ली के जनमानस में अनेक सवाल खड़े कर दिए हैं। अब साफ-सुथरी छवि और ईमानदार व्यक्तित्व के रूप में डॉ. हर्ष वर्धन को दिल्ली भर में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी के साथ बड़े-बड़े होर्डिंग में प्रदर्शित किए जाने से दिल्ली भाजपा एक प्रबल दावेदार होने के साथ सत्तारूढ़ हो पाएगी, एक प्रश्नचिह्न लग गया है। इससे जातीय समीकरणों में पंजाबी और ब्राह्मण लॉबी को ठेस पहुंची है। इसका जनता में सन्देश भी गलत जा रहा है। पूर्वांचलियों को लुभाने में कुछ अभिनेताओं को लामबंद कर जरूर कोशिश की जा रही है। हां, लंबे समय से दिल्ली की राजनीति में मुख्यमंत्री पद के लिए किसी अग्रवाल को स्थान नहीं मिला था। इस बार डॉ. हर्ष वर्धन, जो अग्रवाल हैं, दिल्ली की अग्रवाल संस्थाएं जरूर तन, मन, धन के साथ उनके साथ जुड़ी हुई हैं।

डॉ. हर्ष वर्धन ने पोलियो उन्मूलन अभियान की शुरुआत दिल्ली से की थी। इस पर भारत में ही नहीं, विश्व भर में उनकी सराहना हुई। डॉ. हर्ष वर्धन एक अकेले ऐसे चिकित्सक हैं, जिन्हें जातीय सीमाओं से ऊपर उठकर दिल्ली के चिकित्सकों और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े लाखों लोगों में सम्मान मिला है। यह कोई छोटी बात नहीं है। संयोग देखिए कि कृष्णानगर विधानसभा क्षेत्र से डॉ. हर्ष वर्धन के विरुद्ध उनके अपने पूर्व मित्र और सहयोगी पूर्व पार्षद डॉ. मोंगा, जो भाजपा से विरुद्ध होकर अब कांग्रेस टिकट पर आमने-सामने आ टिके हैं। इस सीट पर दिल्लीवालों की नजरें टिकी हैं। यह मुकाबला रोचक तो होगा ही, दो चिकित्सकों के बीच नए आयाम भी स्थापित करेगा। डॉ. हर्ष वर्धन को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पांच-सात प्रतिशत का लाभ मिलेगा, जिससे लगातार चौथी बार जीत हासिल करने में उन्हें सफलता मिल सकती है। लेकिन देखना यह है कि कांटे की इस टक्कर में वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में अपने अन्यान्य विधानसभा क्षेत्रों में कितना समय दे पाते हैं? इस सारे प्रकरण में दिल्ली भाजपा अध्यक्ष विजय गोयल को आघात पहुंचा है। इसकी टीस उनके और उनके साथियों के मन में रहेगी। इस से डॉ. हर्ष वर्धन को कितना लाभ और नुक्सान होगा, यह वक्त ही निर्णय करेगा।

रही बात, आम आदमी पार्टी के नेता अरविन्द केजरीवाल की, तो केजरीवाल ने एक सामान्य और अपनी साफ-सुथरी छवि से आम जनता के बीच भ्रष्टाचार मुक्त नेतृत्व और सरकार देने का वादा किया है। इससे आम जनता, खासकर शिक्षित युवा पीढ़ी में जबरदस्त अंडर करंट बना है। मेट्रो अथवा बस या दिल्ली की ओर आने वाली रेलगाडिय़ों में जहां-तहां चर्चा में आम आदमी पार्टी और अरविन्द केजरीवाल होता है? इतने कम समय में अरविन्द केजरीवाल ने अपना और अपनी पार्टी का जो स्थान बनाया है, वह चौंकाने वाला है। आने वाले समय में केजरीवाल निश्चित तौर पर एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर कर सामने आ सकते हैं।

रही बात अब इन तीनों ही दलों के चुनाव घोषणा-पत्रों और कुछ कर गुजरने वाले दावों-प्रतिदावों की, तो दिल्ली में आवासीय समस्या के साथ पानी, बिजली, परिवहन, साफ-सफाई और शिक्षा आदि समस्याएं मुख्यरूप से दिल्लीवासियों को चिन्ता में डालती हैं। ये सभी समस्याएं शाश्वत हैं। जब तक दिल्ली में हर साल 35 से 40 लाख लोग आ कर बसते रहेंगे, इन समस्याओं पर काबू पाना नामुमकिन है। इन समस्याओं के साथ एक और बड़ी समस्या सामूहिक बलात्कार के अत्यन्त गंभीर अपराध की है। यह समस्या तब तक नहीं सुलझ सकती, जब तक दिल्ली को पूर्ण राज्य के दर्जे के साथ पुलिस पर नियंत्रण का अधिकार नहीं दिया जाता। इसके लिए पार्टियां हर बार दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाए जाने की बात करती हैं। इस बार की स्थिति भी पिछले चुनावों में जनता से किए गए वादों और घोषणा-पत्र की इबारत से भिन्न नहीं होगी, इसका अनुमान भी सहज लगाया जा सकता है।

 

 

ललित मोहन बंसल

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