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आक्रोश का जन्मदाता अकेलापन

आक्रोश का जन्मदाता अकेलापन

By शैलेन्द्र चौहान  

अकेलेपन की तुलना अक्सर खाली, अवांछित और महत्वहीन महसूस करने से की जाती है। अकेले व्यक्ति को मजबूत पारस्परिक संबंध बनाने में कठिनाई होती है। यह परित्याग, अस्वीकृति, निराशा, असुरक्षा, चिंता, निकम्मापन, अर्थहीनता और आक्रोश की भावनाओं में फलीभूत हो सकता है। अगर ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें तो वे दुर्बल बना सकती हैं और प्रभावित व्यक्ति को स्वस्थ रिश्ते और जीवन-शैली विकसित करने से रोकती हैं। एक्सपट्र्स की मानें तो, अकेलापन वही महसूस करते हैं, जो सोशलाइजेशन में रुचि नहीं लेते। ऐसे में आप इसे स्थायी स्टेज मानने की बजाय, सोशल होने के लिए मोटिवेशन समझकर चलें। जब आप खुले दिल से मिलेंगे-जुलेंगे, तो ‘गारंटी’ के साथ आपको थोड़ी तकलीफ भी मिलेगी। हर छोटी-बड़ी रिलेशनशिप में चुभन और टूटन के पल आते ही हैं।

लोग कई कारणों से अकेलेपन का अनुभव करते हैं। इसमें जीवन की कई घटनाएं साथ जुड़ी होती हैं। बचपन और किशोरावस्था के दौरान मैत्री संबंधों का अभाव या किसी व्यक्ति के आसपास सार्थक लोगों की शारीरिक अनुपस्थिति अकेलेपन, अवसाद का कारण बनती है। जीवन में किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को खोने से आम तौर पर प्रतिक्रिया दु:खद होगी; इस स्थिति में व्यक्ति अकेला महसूस कर सकता है, भले ही वह दूसरों के साथ है। अकेलापन, सामाजिक अपर्याप्तता की भावनाओं का आह्वान कर सकता है। अकेला व्यक्ति मान सकता है कि उसमें ही कुछ गड़बड़ है और कि कोई उसकी स्थिति को नहीं समझता। इस तरह का व्यक्ति आत्मविश्वास खो देता है और सामाजिक अस्वीकृति के डर से बदलने की कोशिश या नई चीजें आजमाने का प्रयास करने का अनिच्छुक होता है। चरम मामलों में, एक व्यक्ति खालीपन की भावना महसूस करता है जो नैदानिक अवसाद की स्थिति का रूप धारण कर सकता है। अकेलेपन को अनुभव करने और सेहत खराब होने के बीच, सीधा संबंध होता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी प्रभावित होती है। एक अध्ययन के मुताबिक अकेलापन दिल से सम्बंधित बीमारियों, टाइप 2 मधुमेह, अर्थराइटिस तथा अल्जाइमर्स के लिए भी जिम्मेदार होता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह स्पष्ट है कि खराब सम्बंधों के कारण कई स्वास्थ्य समस्याएं पैदा होती हैं, जिनमें असमय मौत तथा कई तरह की अन्य समस्याएं शामिल हैं। इस तरह के शोध का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य, इस बात को समझना है कि अकेलापन तथा सम्बंध किस प्रकार व्यापक रूप से हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। हम जितना इसे समझेंगे, हमें उतना ही ऐसे नकारात्मक प्रभावों से लडऩे में मदद मिलेगी। अकेलापन आधुनिक समय में विशेष रूप से समाज के हर वर्ग में प्रचलित है। बीसवीं सदी की शुरुआत में परिवार आम तौर पर बड़े और ज्यादा स्थिर थे, तलाक बहुत कम होते थे और अपेक्षाकृत कम लोग अकेले रहते थे। संयुक्त राज्य अमेरिका में, 1900 में केवल 5 प्रतिशत घर एकल थे, 1995 तक 24 मिलियन अमेरिकावासी अकेले रहते थे और अनुमान है कि 2010 तक यह संख्या बढ़कर 31 मिलियन हो गई होगी। अमेरिकन सोशियोलॉजिकल रीव्यू में 2006 के एक अध्ययन में पाया गया कि अमेरिकियों के औसतन केवल दो हमराज दोस्त थे, जबकि 1985 में औसतन तीन थे। विश्वासपात्र रहित लोगों का प्रतिशत 10 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 25 प्रतिशत हो गया और अतिरिक्त 19 प्रतिशत ने कहा कि उनका केवल एक विश्वासपात्र (अक्सर उनके पति या पत्नी) है, इससे रिश्ता खत्म होने की स्थिति में गंभीर अकेलेपन का जोखिम बढ़ जाता है। इंटरनेट का प्रयोग भी अकेलेपन से सशक्त रूप से जुड़ा हुआ है, अकेलेपन से पीडि़त अनेक लोग मदद पाने या दर्द को दूर करने के लिए इंटरनेट साइट पर जाते हैं जैसा कि ‘मैं अकेला हूं क्या कोई मुझ से बात करेगा’ विषय में देखा जा सकता है। इसलिए गप्प मारना शुरू कर दें। पिछले वीकेंड आपने क्या किया, कौन-सी मूवी देखी, क्या पढ़ा.. वगैरह वगैरह! – जैसे विषयों पर बातें कर सकते हैं। अकेलापन और अकेला होना एक समान नहीं है। अकेलेपन का अनुभव एक गहन स्तर पर असहनीय अलगाव की भावना से अभिभूत होना भी हो सकता है। बहुत से लोग अनेक बार परिस्थितियों के कारण या इच्छा से अकेले हो जाते हैं। अगर यह व्यक्ति के नियंत्रण में है तो अकेला होना एक सकारात्मक, सुखद और भावनात्मक रूप से तरोताजा करने वाला अनुभव हो सकता है। सृजन किया जा सकता है। अकेला होने और अन्य लोगों से परे रहने की अवस्था एकांत है और अक्सर इसका अर्थ अपनी इच्छा से अकेले होना है।

वैसे अकेलेपन की तुलना अक्सर खाली, अवांछित और महत्वहीन महसूस करने से की जाती है। अकेले व्यक्ति को मजबूत पारस्परिक संबंध बनाने में कठिनाई होती है। यह परित्याग, अस्वीकृति, निराशा, असुरक्षा, चिंता, नैराश्य, निकम्मापन, अर्थहीनता और आक्रोश की भावनाओं में फलीभूत हो सकता है। अगर ये भावनाएं लंबे समय तक बनी रहें तो वे दुर्बल बना सकती हैं और प्रभावित व्यक्ति को स्वस्थ रिश्ते और जीवन शैली विकसित करने से रोकती हैं। एक्सपट्र्स की मानें तो, अकेलापन वही महसूस करते हैं, जो सोशलाइजेशन में रुचि नहीं लेते। ऐसे में आप इसे स्थायी स्टेज मानने की बजाय, सोशल होने के लिए मोटिवेशन समझकर चलें। जब आप खुले दिल से मिलेंगे-जुलेंगे, तो ‘गारंटी’ के साथ आपको थोड़ी तकलीफ भी मिलेगी। हर छोटी-बड़ी रिलेशनशिप में चुभन और टूटन के पल आते ही हैं। लेकिन दूसरों से जुड़े रहने के लिए यह भी झेलना ही होगा, क्योंकि इन्हीं क्षणों से गुजरकर संबंधों में गहराई भी आती है।

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