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धनेश साहू की लम्बोर्गिनी और सचिन

‘मेरा सपना लम्बोर्गिनी खरीदने का है’ इंटरव्यू के दौरान दंतेवाड़ा से आए धनेश साहू ने जब यह कहा तो मैं जैसे नींद से जागा। यह लड़का न तो अंग्रेजी बोल पा रहा था और न ही उसकी हिन्दी बहुत प्रभावशाली थी। उसने मैली लाल कमीज के ऊपर गहरा नीला कोट डाला था। गले में किसी तरह सलेटी टाई लपेटी थी, जिसका फंदा बड़ा अटपटा था। कमीज का कॉलर भी टाई की गांठ के ऊपर बेतरतीब ढंग से उठा हुआ था। रायपुर के हमारे दिशा कैंपस में पिछले हफ्ते एक बहुराष्ट्रीय कंपनी जेनपैक्ट नौकरी के लिए विद्यार्थियों का इंटरव्यू लेने आई थी। उसी दौरान धनेश साहू से पूछा गया था कि वह जिंदगी में क्या हासिल करना चाहता है? इसी सवाल के जवाब में उसका यह यह सीधा जबाव था।

पांच भाई-बहनों वाले धनेश साहू के पिता गांव के सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं। मां गृहणी हैं। उसके पिता बैंक से कर्जा लेकर उसे पढ़ा रहे हैं। पढऩे में वह औसत विद्यार्थी है। मगर वह बहुत स्पष्ट था कि नौकरी मिलने के बाद पहले घर की जिम्मेदारियां पूरी करेगा और फिर वह कार खरीदेगा, जो उसने अभी तक टीवी और चित्रों में ही देखी थी। धनेश ने मुझे सोचने पर मजबूर किया कि यह सपना देखने का साहस उसमें कहां से आया?

क्या सम्बन्ध है धनेश के सपने और सचिन तेंदुलकर में? आप कह सकते हैं कि यह बात बेतुकी-सी है। पर मुझे लगता है कि सोच के स्तर पर ये दोनों बहुत गहरे जुड़े हैं। सोचिए, सचिन तेंदुलकर होने के मायने क्या हैं? सबसे ज्यादा शतक और रन बनाने वाला बल्लेबाज? अच्छी तकनीक रखने वाला एक संपूर्ण क्रिकेटर? ब्रैडमैन जैसा कद रखने वाला खिलाड़ी वगैरह-वगैरह। यह सब तो है ही। मगर इन सब तथ्यों से भी परे सचिन के उदय को एक और अलग स्तर पर देखा जा सकता है।

सचिन 1989 में भारतीय टीम में पदार्पण करते हैं। इसके बाद का तकरीबन पूरा दशक भारत और भारतीयों के लिए आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर उथल-पुथल, बेचैनी, मार-धाड़ का समय रहा। उस दौरान ऐसा लगता था कि जैसे कि पूरे समाज को कोई मथ रहा है। मंडल आयोग, उदारीकरण की प्रक्रिया, कश्मीर में अलगाववादी हिंसा, कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन, जातिगत राजनीति का उफान, केंद्र में गठबंधन की अस्थिर सरकारें – यह बड़े उहापोह भरे परिवर्तनों का दौर था। पर, इसी मंथन से निकल रहा था – नया हिन्दुस्तान। देश में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक बदलाव का यह दौर सामानांतर रूप से तकरीबन भारतीय क्रिकेट टीम में भी दिखाई दिया।

एक ओर देश में यह हो रहा था, तो दूसरी ओर 1990 के दशक से अमेरिका की सिलिकॉन वैली में भारतीय मेधा अपने झंडे गाडऩा शुरू करती है। इस पीढ़ी की उपलब्धियों ने भारत को आईटी महाशक्तिबनने और उसके आर्थिक विकास में अहम् भूमिका निभाई।

इस दौरान लगा कि एक नया भारत जन्म ले रहा था, जो एक सामान्य मध्यवर्गीय परिवार से आता है। उसके पास सिर्फ अपनी मेहनत, बुद्धि, लगन और कार्य कुशलता है। वह आत्मविश्वास से लबरेज है, जो दुनिया को जीतने का दमखम और विश्वास रखता है। वह न सिर्फ सिलिकॉन वैली में अपना झंडा लहराता है, बल्कि क्रिकेट के गढ़ माने-जाने वाले इंग्लैंड के लॉड्र्स के मैदान में अपनी कमीज उतार कर लहरा भी सकता है। यह भारतीय दुनिया की आंखों में आंख डाल कर बात करने का माद्दा रखता है।

तेंदुलकर समग्र रूप से इस नई भारतीय पहचान का प्रतिनिधित्व करते हैं। अपनी सफलता के साथ ही शालीनता, सुसंस्कृत व्यवहार, भद्रता, संयम, विनम्रता और परिवार के प्रति गहरा जुड़ाव – इन सारे पारम्परिक भारतीय गुणों को बनाए रखना ही सचिन को सचिन बनाता है। सचिन ने बड़ा सपना देखा ही नहीं, बल्कि अपने संकल्प और लगन के सहारे उसे जिया भी। इससे भी बढ़कर उन्होंने करोड़ों को यह सपना देखना सिखाया भी। बताया कि मैं ही नहीं, तुम भी कर सकते हो। एक पूरी की पूरी भारतीय पीढ़ी अगर अब बड़े से बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस और दमखम रखती है, तो इसमें सचिन का एक बड़ा योगदान है। दंतेवाड़ा के धनेश साहू ने सवाल-जवाब के दौरान अपनी

हॉबी क्रिकेट और अपना आदर्श सचिन तेंदुलकर बताया था। फरारी की सवारी फिल्म आपने देखी हो, तो कायो नाम का पात्र भले ही सचिन की चोरी की हुई फरारी कार में सफर करता है, मगर धनेश जैसे लाखों युवाओं ने सचिन की जिंदगी से जो सपने चुराए हैं, वे निश्चित ही उन्हें उनकी लम्बोर्गिनी तक ले ही जाएंगे।

सचिन के साथ ही इस नए भारतीय और उसके जज्बे को सलाम!

 

उमेश उपाध्याय

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