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महानायक कभी रिटायर नहीं होते!

सचिन के प्रशंसकों ने खचाखच भरे वानखेड़े स्टेडियम में जिस प्रकार इस महान् खिलाड़ी को टेस्ट क्रिकेट जीवन से विदाई दी, वह उस महानायक की तपस्या के अनुरूप ही थी। अब लाख टके का प्रश्न लिए सचिन के प्रशंसक उनके जीवन की अगली पारी की इंतजार में हैं, क्योंकि समाज के लिए प्रेरणास्रोत बनने वाले महानायक कभी रिटायर नहीं होते। अमिताभ बच्चन को देख कर भी क्या इस दिशा में कुछ कहने की जरूरत होगी!

क्रिकेट भद्रजनों का खेल है। इसका अर्थ यह नहीं कि भद्रजन केवल वही है जो क्रिकेट का दिवाना हो। इन पंक्तियों के पाठक कहने का मेरा आशय समझ ही गए होंगे और उन्हें संकेत मिल ही गया होगा कि क्रिकेट में मेरी कितनी रूचि है। भारत के अन्तरराष्ट्रीय मैच के दौरान कोई टीवी देखता मिला तो उससे स्कोर पूछ लिया। कोई भारतीय खिलाड़ी अपना शतक बनाने के नजदीक है, तो उसका शतक बनने तक टीवी स्क्रीन पर नजरें गड़ा लीं। कोई भारतीय खिलाड़ी आक्रामक हो कर चौक्के-छक्के की बरसात कर रहा है, तो कुछ देर उसका खेल देख लिया। भारतीय टीम का कोई मैच रोमांचक क्षणों में पहुंच गया तो उसका आनन्द ले लिया। केवल इतनी ही रूचि है क्रिकेट में मेरी।

भारत और वेस्ट इंडीज के बीच 14 नवम्बर 2013 को शुरू हुए टेस्ट में मेरी रूचि केवल मैच के शुरूआत से ही नहीं, बल्कि उससे भी पहले से बनी और इस मैच के अन्त तक ही नहीं बल्कि तब तक बनी रही, जब तक कि टीवी में वानखेड़े स्टेडियम से प्रसारण बंद नहीं हो गया। इस टेस्ट मैच में धोनी की टीम ने वेस्ट इंडीज को ऐसा धो डाला था कि मेहमान टीम ने पांच दिन के इस टेस्ट में अपनी पराजय एक पारी और 126 रन से स्वीकार कर तीन दिन में ही अपनी विकेटें समेट ली थीं। भारत ने यह टेस्ट श्रंखला 2-0 से जीती।

खिलाडिय़ों के प्रदर्शन को लेकर इस मैच में मेरी रूचि थी, लेकिन मेरी रूचि का कारण केवल इतना ही नहीं था। यह मैच उस महान खिलाड़ी का अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट में अन्तिम प्रदर्शन था जिसने विश्व क्रिकेट में भगवान का दर्जा पा लिया था। इस टेस्ट के बाद स्टेडियम की दर्शक दीर्घाओं से आसमान को गुंजाती ‘सचिन…सचिन’ की आवाजें अब सुनाई नहीं देगी। सचिन ने इस टेस्ट के बाद विकेटों के बीच 22 गज की वानखेड़े स्टेडियम की जमीन को छू कर नम आखों से अपने 24 वर्ष के टेस्ट कैरियर को अलविदा कह दिया। इस दृश्य को देख कर किस की आंखें नम न हुई आई होंगी।

सचिन के अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट जीवन का यह 200 वां शतक था और मैच शुरू होने से पहले मेरे जैसे भद्रजनों की जिज्ञासा अन्य किसी खिलाड़ी के प्रदर्शन से अधिक सचिन के प्रदर्शन पर थीं। सबकी इच्छा थी कि सचिन अपने टेस्ट क्रिकेट जीवन के इस अन्तिम मैच में शतक जरूर बनाएं। सचिन शतक तो नहीं, बल्कि शानदार 74 रन बना कर पवेलियन लौटे। सचिन के इस मैच में शतक न बनाने पर उनके प्रति उनके प्रशंसकों का प्यार कम नहीं हुआ। टीम के अन्य भारतीय खिलाडिय़ों का प्रदर्शन भी काबिले तारीफ रहा, लेकिन उन क्षणों में उससे अधिक महत्वपूर्ण सचिन की विदाई के लम्हे बन गए थे। अन्तरराष्ट्रीय क्रिकेट जगत में ऐसी भावनापूर्ण और सम्मानजनक विदाई किसी खिलाड़ी की नहीं हुई, जैसी सचिन को मिली।

सचिन इसी सम्मान और प्यार के लायक ही थे। उनका जीवन खुद में एक तपस्वी का जीवन रहा। बेहद अनुशासित और संतुलित। इस जीवन के लिए उनका साथ देने वालों में से सचिन इन क्षणों में किसी को नहीं भूले। मां-बाप, पत्नी-बच्चे परिवारजन आदि को तो ऐसे क्षणों में याद रखा जाता है,

लेकिन गुरूजनों और दोस्तों को अपनी भावनाओं में भी सदा साथ रखना, सचिन ने दिखा दिया। 21 मिनट की अपने विदाई-धन्यवाद ज्ञापन में सचिन ने सुनने वालों की भी आंखें कई बार नम की।

इस मौके पर एक सवाल जेहन में उठता है। सचिन का इतना सम्मान क्या क्रिकेट के अपने खेल के कारण था, जिसमें उन्होंने रिकॉड्र्स के रिकार्ड तोड़े। इस संबंध में केवल एक नजर उनके रिकॉड्र्स पर डालें: उन्होंने सबसे कम उम्र 16 साल 238 दिन में वनडे इंटरनेशनल खेलना शुरू किया। वह सबसे कम उम्र के कप्तान बने। छक्के मारने वालों में वह सबसे आगे रहे। उन्होंने अपने कैरियर में 195 छक्के मारे। 463 वनडे इंटरनेशनल मैचों की 452 पारियों में 49 शतक, 96 अद्र्धशतक और 18426 रन बनाए। 200 टेस्ट मैचों में सबसे अधिक 329 पारियां खेल कर सबसे अधिक 15921 रन और सबसे अधिक शतक 51 बनाए। यहां तक कि देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ पाने में भी वह रिकॉर्ड बनाने में पीछे नहीं रहे। वह पहले खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि सबसे कम उम्र के व्यक्ति हैं जिन्हें यह सम्मान दिया जा रहा है। इससे पहले राजीव गांधी के नाम यह रिकॉर्ड था। वह 47 वर्ष की उम्र के थे। सचिन केवल 40 साल के हैं और उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिल रहा है।

वास्तव में सचिन संपूर्ण रूप से एक ऐसे इंसान हैं जिन्होंने अपने जीवन को गंगा की अविरल बहती धारा की भांति केवल आगे बढ़ाने की तपस्या की। जीवन में आई अनेक रूकावटों को दरकिनार करते हुए उन्होंने केवल आगे बढऩे की शिक्षा को ही आत्मसात् किया। पाकिस्तान में अपने जीवन की पहली क्रिकेट सीरीज खेलते हुए वकार युनुस की तेज गेंद जब किशोर सचिन की नाक पर लगी तो खून की धार बहती देख उनके साथी नहीं चाहते थे कि घायल सचिन पिच पर रहें, लेकिन सचिन का खेलने का जुनून ‘मैं खेलेगा’ ने उन्हें जो पिच पर जमाया, वह वानखेड़े स्टेडियम तक 24 साल जमा ही रहा।

महाभारत के प्रमुख पात्र अर्जुन को जिस तरह चिडिय़ा की आंख के अपने लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं देता था, उसी प्रकार सचिन को भी पिच पर गेंद के अतिरिक्त कुछ और दिखाई नहीं देता था। सचिन के कलात्मक शाट्स ने क्रिकेट प्रेमियों को दिखा दिया कि क्रिकेट कैसे खेली जाती है। इस टेस्ट को यदि ‘सचिन टेस्ट’ की संज्ञा दी जाए तो अतिश्योक्ति बिलकुल नहीं होगी। क्रिकेट प्रेमियों और सचिन के प्रशंसकों ने खचाखच भरे वानखेड़े स्टेडियम में जिस प्रकार इस महान् खिलाड़ी को टेस्ट क्रिकेट के जीवन से विदाई दी, वह उस महानायक की तपस्या के अनुरूप ही थी। ऐसे में भारत सरकार ने भी सचिन को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा कर यह बता दिया कि महानायकों की विदाई कैसे की जाती है। अब लाख टके का प्रश्न लिए सचिन के प्रशंसक उनके जीवन की अगली पारी की इंतजार में हैं, क्योंकि समाज के प्रेरणास्रोत बनने वाले महानायक कभी रिटायर नहीं होते। अमिताभ बच्चन को देख कर भी क्या इस दिशा में कुछ कहने की जरूरत होगी!

 

श्रीकान्त शर्मा

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