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यज्ञ, दान और तप

यज्ञदानतप: कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण जोर देकर कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप का कभी त्याग नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वे मनीषियों की आत्मशुद्धि के साधन हैं। यज्ञ से ही ब्राह्माण्ड का पालन-पोषण होता है। त्याग ही यज्ञ है। मानवता की नि:स्वार्थ-सेवा रूपी अग्नि में अपने अहंकार की आहुति देना एक महान् यज्ञ है। आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार करना महानतम यज्ञ है। यह सभी यज्ञों का जन्मदाता है। प्रत्येक नि:स्वार्थ कर्म यज्ञ है। ऐसे प्रत्येक कर्म से आपका हृदय पवित्र होता है और आप आत्म-साक्षात्कार के महान् लक्ष्य के निकट पहुंचते जाते हैं।

दान अत्यन्त आवश्यक है। केवल रूपया-पैसा देना दान नहीं है। किसी के लिए प्रार्थना करना भी दान है। किसी की सेवा करना दान है। दया और प्रेम करना दान है। किसी दूसरे के द्वारा पहुंचाई गई हानि को भूल जाना और क्षमा कर देना दान है। किसी दु:खी व्यक्ति के साथ सहानुभूति भरे शब्द बोल देना दान है। हर कोई दान कर सकता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने क्षमतानुसार किसी-न-किसी रूप में दान करना चाहिए।

शरीर, मन एवं वाणी का संयम तप है। भगवान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि शरीर को प्रताडि़त करना वास्तविक तपस्या नहीं है। अपनी इन्द्रियों को शम, दम और तितिक्षा के अभ्यास से नियंत्रित कीजिए। विचार और विवेक के अभ्यास से अपने मन को नियंत्रित कीजिए। मौन, मित-भाषण एवं मधुर-भाषण के अभ्यास से अपनी वाणी को नियंत्रित कीजिए। यही तप है।

इन कर्मों का कभी त्याग नहीं करना चाहिए। आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति को हमेशा दूसरों के हित के लिए कार्य करते रहना चाहिए, कभी अकर्मण्य नहीं होना चाहिए।

 

स्वामी शिवानंद सरस्वती

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