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पाक-चीन दोस्ती और अरूणाचल का संकट

पाकिस्तान के पास आज प्लूटोनियम बम तैयार है। एटोमिक साइंटिस्ट की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा आण्विक बम है। अत्याधुनिक प्लूटोनियम बमों को पाकिस्तान नए प्रक्षेपास्त्रों के सहारे भारत के किसी भी कोने में गिरा सकता है। पाकिस्तान की ‘फतेह जंग’ मिसाइल इस्लामाबाद से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर है।
अपने पड़ोसी देशों के साथ चीन के संबंधों का सबसे बड़ा खतरा भारत को चीन की पाकिस्तान के साथ हुई दोस्ती से माना जाता है और यही यथार्थ भी है। इसकी सबसे बड़ी वजह दोनों देशों के साथ हुए 1962, 1965, 1971 और कारगिल के युद्धों को माना जाता है। इस लिहाज से चीन और पाकिस्तान को भारत का स्वभाविक शत्रु भी माना जाता है। ये दोनों देश तथाकथित सीमा विवाद को लेकर भारत के साथ बराबर की दूरी बनाए रखने के पक्षधर हैं और इसी पक्षधरता के चलते वे एक-दूसरे के मित्र भी बन गए हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ दशकों में चीन ने पाकिस्तान से मिले अपनत्व को आधार बनाते हुए अपनी कश्मीर नीति में बदलाव का संकेत देने के साथ ही भारतीय सुरक्षा में नए सिरे से सेंध लगाने की तैयारी शुरू कर दी है। हिमालय के काराकोरम मुहाने पर चीन-पाक की संयुक्त घेराबंदी ने भारतीय सुरक्षा को घेर लिया है। इस गठबंधन को ‘ची-पाक’ के नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि इस घेराबंदी की ताकत आण्विक प्रक्षेपास्त्रों के बूते पर टिकी हुई है। चीन ने सामरिक चाल के जरिए पाकिस्तान को आण्विक हथियारों से पूरी तरह लैस कर दिया है।

पाक-चीन गठबंधन की शुरूआत शीतयुद्ध के दौरान हुई। शीतयुद्ध के दौरान पाकिस्तान चीन संबंध की बुनियाद सामरिक समीकरणों के तहत बनी। पाकिस्तान 1971 के युद्ध में भारत से बुरी तरह परास्त होने के बाद एक ऐसे सहयोगी की खोज में था, जो उसकी भारत-विरोधी यात्रा में उसका साथ दे। इसी समीकरण के कारण चीन और पाकिस्तान एक दूसरे के नजदीक आए। शुरूआती दौर में चीन ने कश्मीर को विवादास्पद मुद्दा बनाकर पाकिस्तान की नीति का प्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया। चीन पाकिस्तान को अस्त्र-शस्त्र की सप्लाई सहजता से करने लगा। विदित है कि चीन का सीधा भूमिगत संपर्क दक्षिण एशिया के किसी देश से नहीं था, लेकिन काराकोरम हाइवे बन जाने के बाद दक्षिण एशिया और हिंद महासागर से उसका सीधा संपर्क कायम हो गया। इस मुहिम में चीन का दबदबा सियाचीन ग्लेशियर पर भी बनने लगा। सियाचीन कश्मीर मुद्दे से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ है। सियाचीन भारत के जम्मू-कश्मीर राज्य के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में स्थित है। दूसरी तरफ सियाचीन से चीन की दक्षिणी सीमा मिलती है, जहां से पूर्वी काराकोरम पहाडिय़ां नजदीक हैं। यहीं पर अक्साई चीन भी मिलता है। 1985 में पाकिस्तान ने चीन को गिलगिट क्षेत्र में सैनिक छावनी बनाने की इजाजत दे दी। 1985 में चीन-पाकिस्तान ने मिलकर सियाचीन और नुब्राघाटी क्षेत्रों में संयुक्त सैनिक अभ्यास किया।

चीन ने हाल के वर्षों में सुनियोजित ढग़ से भारतीय सीमाओं में अपनी सैन्य गतिविधियां भी बढ़ा दी हैं। हिमालय के उत्तर में घुसपैठ के अलावा इसने तिब्बत के पठारी इलाकों में सुखोई-27 लड़ाकू विमानों और अत्याधुनिक सेनाओं के साथ जमीनी और हवाई सैन्य अभ्यास किया। चीन पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में उत्तर कोरिया के रूप में खड़ा करना चाहता है। उसने पाकिस्तान को कई तरह की मिसाइलों की आपूर्ति की है, जिनका मुख्य निशाना भारत है। विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान का अपना कोई परमाणु कार्यक्रम नहीं है, चीन का आदेश ही वहां लागू होता है। विश्व के अन्य देशों ने चीन की मदद के जरिए खुशाब द्वितीय और खुशाब तृतीय एटमी संयंत्रों का निर्माण पूरा कर लिया है। पाकिस्तान के पास आज प्लूटोनियम बम तैयार है। एटोमिक साइंटिस्ट की रिपोर्ट में इस बात का जिक्र है कि पाकिस्तान के पास भारत से ज्यादा आण्विक बम है। अत्याधुनिक प्लूटोनियम बमों को पाकिस्तान नए प्रक्षेपास्त्रों के सहारे भारत के किसी भी कोने में गिरा सकता है। पाकिस्तान की ‘फतेह जंग’ मिसाइल इस्लामाबाद से महज 50 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं पर शाहीन प्रथम और शाहीन द्वितीय प्रक्षेपास्त्रों का निर्माण हुआ है। ये दोनों अंतर्देशीय प्रक्षेपास्त्र पाकिस्तान को चीन की भेंट है।

  1. अंतर्राष्ट्रीय विश्लेषक यह मानते हैं कि अगर चीन की मिलीभगत पाकिस्तान के साथ नहीं होती और पाकिस्तान ने पाक-अधिकृत कश्मीर का हिस्सा चीन को नहीं दिया होता तो शायद कश्मीर समस्या का हल खोज लिया जाता। पाकिस्तान के दिवंगत प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने 17 जुलाई 1963 को पाकिस्तान के संसद में यह कहा था कि अगर कश्मीर मुद्दे को लेकर भारत के साथ युद्ध होता है तो चीन पाकिस्तान की हर संभव मदद करेगा। तब पाकिस्तान की टिप्पणी की चीन के प्रधानमंत्री ने भी पुष्टि की थी। 1979 में भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पेचिंग यात्रा के दौरान चीन की मौलिक सोच में बुनियादी परिवर्तन दिखा। एक विदेश मंत्री के रूप में वाजपेयी ने डेंश्ग्योपेंग को यह समझाने की कोशिश की कि कश्मीर मुद्दे पर चीन के अनावश्यक मतभेद से दोनों देशों के संबंधों को चोट पहुंच रही है। इससे लाभ किसी को नहीं मिल रहा। वाजपेयी की स्पष्टवादिता ने डेंग की कश्मीर नीति बदली। चीन कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा मानने लगा और इस बात की वकालत करने लगा कि कश्मीर का हल भारत और पाकिस्तान द्वारा सौहाद्र्रपूर्ण वातावरण में ढूंढा जाना चाहिए। चीन की यह सोच तकरीबन तीन दशक तक कायम रही। हाल के वर्षों में चीन की सोच में पुन: कटुता नजर आने लगी। चीन की वर्तमान व्यवस्था ने डेंग की बातों को भुलाकर कश्मीर विरोधी तेवर अपना रखा है। यही कारण था लद्दाख को चीन का हिस्सा मानना, इंटरनेट पर कश्मीर के नक्शे को तोड़ मरोड़ कर दिखाना और जम्मू-कश्मीर को लूज पेपर वीजा की परंपरा शुरू करना।
    सुरक्षा विशेषज्ञ भास्कर राव के अनुसार चीन सीमा लद्दाख के नजदीक ‘पागोंज तासो’ में अपनी पहुंच बना ली है। चीन के सैनिक विस्तार से भारतीय सुरक्षा प्रबंधतंत्र चिंतित है।

    लद्दाख का सीमाई क्षेत्र एक हाथ की मुट्ठी जैसा दिखता है, जिसके तीन महत्वपूर्ण हिस्से चीन के प्रभाव में हैं। चीन चौथे मुहाने को अपने कब्जे में करने की कोशिश कर रहा है, जिसे ‘ट्रींग हाईट’ के नाम से जाना जाता है। प्रो. कोंडापल्ली (प्रोफेसर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) के अनुसार चीन के इस विस्तार से भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। वर्ष 2009 में जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार और केंद्रीय सरकार को इस खतरे की सूचना थी। लेह में चीन की घुसपैठ की जानकारी थी। यह क्षेत्र हिमाचल प्रदेश से बिल्कुल सटा हुआ है। अगर पश्चिमी मुहाने पर चीन की घुसपैठ को भारत सरकार नजरअंदाज करती रही तो जम्मू-कश्मीर से लेकर हिमाचल का रेंज भी चीन के कब्जे में आ जाएगा और भारत का पश्चिमी मुहाना पूरी तरह से असुरक्षित हो जाएगा। 22 दिसंबर 1959 को संसद में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने चीन की हरकतों को देखते हुए यह कहा था – ”अक्साईचीन में चीन द्वारा बनाई जा रही सड़क का उपयोग सैन्यतंत्र के लिए होगा या आम लोगों की सुविधा के लिए, इस बात का फैसला कौन करेगा? दरअसल चीन की मानसिकता को देखते हुए इस बात की पूरी उम्मीद है कि इसका प्रयोग सैन्यतंत्र के लिए ही होगा।’’ आज एक बार फिर से चीन भारतीय सीमा में अतिक्रमण कर रहा है। इसलिए उसने पाक-अधिकृत कश्मीर को जायज और भारत के हिस्से वाले असल कश्मीर को विवादास्पद मानकर अपनी मंशा जाहिर कर दी है। कुल मिलाकर चीन की पाकिस्तान के साथ दोस्ती भारत को बहुत भारी पड़ रही है और इसका असर उत्तर-पूर्व के सीमांत राज्य अरूणाचल पर साफ देखा जा सकता है।

    अरूणाचल प्रदेश को लेकर चीन की हरकतों को देखते हुए ऐसा लगता है कि चीन भारत के इस सीमांत राज्य को हड़प लेना चाहता है। वजह साफ है कि नवंबर 2006 में जब चीन के प्रधानमंत्री हू-जिंताओ भारत की यात्रा पर थे, उसी दौरान भारत में चीन के राजदूत सन यूक्सी ने यह कहकर हंगामा खड़ा कर दिया था कि पूरा का पूरा अरूणाचल प्रदेश चीन का हिस्सा है, तवांग उसी हिस्से का एक अंग है, इसलिए उस पर पूरा अधिकार चीन का है। उसी दौरान चीन के एक सरकारी संस्था द्वारा प्रकाशित पत्र में यह कहा गया था कि चीन 1962 जैसी भूल नहीं करेगा। विजित इलाकों को लौटाया नहीं जाएगा। भारत को यह बात अच्छी तरह से समझ में आनी चाहिए। विगत में चीन न केवल भारत के साथ बल्कि अन्य देशों के साथ युद्ध की महज संभावना से निपटने के लिए व्यापक स्तर पर सैनिक अभ्यास किए गए हैं। मसलन 1950, 1962, 1969 और 1979 में ऐसे प्रयास चीन के द्वारा किया जा चुका है। ये सारे अभ्यास चीन द्वारा उस समय किए गए, जब चीन सैनिक रूप से बहुत मजबूत नहीं था। आज तो चीन एक महाशक्ति का रूप ले चुका है। चीन की चाल का अंदाजा एक ऑनलाईन मैपिंग से भी होता है। यह ऑनलाईन सरकारी तंत्र का हिस्सा है। ऑनलाईन गूगल के प्रतिद्वंद्वी के रूप में खड़ा किया गया है। यह ऑनलाईन चीनी भाषा में है, जिसके 40 करोड़ से भी ज्यादा लोग पाठक हैं। इस मानचित्र में अरूणाचल प्रदेश को चीन का भाग दिखाया गया है। इस मानचित्र में दक्षिण हिस्से को गौण मानकर उत्तर-पूर्वी हिस्सा असम तक को चीन के हिस्से के रूप में दिखाया गया है। यह सब कुछ चीन की साम्यवादी सरकार के सर्वे और मानचित्र विभाग ने तैयार किया है। अरूणाचल प्रदेश की कुल सीमा तकरीबन 90 हजार वर्ग किलोमीटर है, जिसमें चीन 83 हजार 7 सौ 43 किलोमीटर तक के हिस्से पर अपना पुश्तैनी अधिकार मानता है। इस पूरे उपक्रम से मैकमहोन लाईन और वास्तविक सीमा रेखा की मान्यता पूरी तरह से ध्वस्त हो जाती है। जैसा कि सभी जानते हैं कि चीन शुरू से ही मैकमहोन लाईन को मानने से इंकार करता रहा है, जबकि भारत इस लाईन को आज भी भारत और चीन की अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा मानता है।

    चीन अपने प्रयास को सफल बनाने के लिए भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में अलगाववादी तत्वों को बढ़ावा दे रहा है। भारतीय गुप्तचर संस्थाओं की रिपोर्ट में यह बात कही गई है कि चीन उत्तर-पूर्वी राज्यों में तैनात भारतीय सैन्य तैयारियों की पूरी जानकारी अलगाववादी तत्व चीन तक पहुंचाते हैं। ऐसा होने से चीन को हर भारतीय पहल की जानकारी रहती है। हाल ही में नागालैंड का अलगाववादी संगठन नागालीम के नेता एंथोनी को जब नेपाल में पकड़ा गया तो उसने यह बात कबूल की कि कैसे चीन को भारतीय सैन्य समीकरण की पूरी जानकारी रहती है। चीन के एक सरकारी थिंक टैंक ने एक पत्र प्रकाशित कर भारत को कई खंडों में तोडऩे की मंशा जाहिर की है। चीन का मानना है कि भारतीय संघ पूरी तरह से बालू की भीत पर टिका हुआ है। महज एक धक्का देने से बालू की भीत कई खंडों में टूटकर बिखर जाएगा।

    रक्षा विश्लेषक भारत वर्मा कहते हैं कि माओ ने तिब्बत को लेकर 1949 में ही कहा था कि हिमालय के तटवर्ती इलाके दांत की तरह हैं, जिनके बंद हो जाने से जिह्वा सुरक्षित रहता है, अन्यथा बाहरी शक्तियों की घुसपैठ का खतरा हमेशा बना रहेगा।

    (साभार: भारत नीति प्रतिष्ठान)

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