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चीन का मनोवैज्ञानिक युद्ध चर्च के मतांतरण आंदोलन के बीच फंसा अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल प्रदेश को चीन अपने आधिकारिक प्रकाशनों में चीन का हिस्सा दिखाता है और उसे दक्षिणी तिब्बत कहता है। वह इस प्रदेश पर अपना दावा भी जताता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने 1962 से ही इस प्रदेश में मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ा हुआ है। ईसाई मिशनरियों की रणनीति में भी यह प्रदेश पूर्वोत्तर भारत में उनकी रणनीति का शेष बचा हुआ भाग है, जिसे वे जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहते हैं। नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में लगभग सभी जनजातियों को ईसाई सम्प्रदाय में मतान्तरित कर चर्च इस रणनीति को काफी सीमा तक सफल बना चुका है। अब केवल अरुणाचल प्रदेश बचा है, इसलिए इस प्रदेश में मतान्तरण अभियान को जल्दी से जल्दी पूरा करने के उद्देश्य से विदेशी या विदेशी धन से संचालित मिशनरियां अपने सारे साधन यहां झोंक रहीं हैं।
भारत के पूर्वोत्तर छोर पर स्थित, 83743 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और 1382611 की जनसंख्या वाले अरुणाचल प्रदेश (इसका पहला नाम नेफा था) की सर्वाधिक लम्बी सीमा तिब्बत से लगती है। लेकिन तिब्बत पर 1950 से चीन ने कब्जा किया हुआ है। इसलिए कुछ लोग इसे भारत-चीन सीमा भी कहते हैं। प्रदेश में लगभग 28 जनजातियां हैं, जिनका उपविभाजन उन्हें 130 तक पहुंचा देता है। सभी कबीलों की भाषा अलग-अलग है, इसलिए हिन्दी उनके आपसी सम्पर्क की भाषा बन गई है। आपस में जय हिन्द कह कर अभिवादन करने वाले अरुणाचली मोटे तौर पर प्रकृति के साथ एकाकार हैं। प्रदेश की जनजातियों को सामाजिक सांस्कृतिक नजदीकी के हिसाब से एलविन वेरियर ने तीन समूहों में बांटा है। पश्चिमी कामेंग और तवांग जिला में रहने बाले मोन्पा और शेरदुकपेन महायानी बौद्ध हैं। पश्चिमी सियांग जिले के खाम्बा और मेम्बा भी महायानी बौद्ध हैं। राज्य के पूर्वी भाग में रहने वाले खाम्पती और सिंगफो हीनयानी बौद्ध हैं। आदी, अका, अपातानी, मीरी, मिशमी, निजी, निशी और तांगिन जनजातियां तानी समूह की मानी जाती हैं और ये सभी सूर्य और चन्द्र की पूजा करते हैं। इन्हें डोनी पोलो कहा जाता है। नागालैंड के साथ लगते दो जिलों-तिराप और चांगलांग में नोक्टे, टांग और वांचू रहते हैं, जिनमें कुछ पर वैष्णव मत का प्रभाव है।अरुणाचल प्रदेश को चीन अपने आधिकारिक प्रकाशनों में चीन का हिस्सा दिखाता है और उसे दक्षिणी तिब्बत कहता है। वह इस प्रदेश पर अपना दावा भी जताता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने 1962 से ही इस प्रदेश में मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ा हुआ है। ईसाई मिशनरियों की रणनीति में भी यह प्रदेश पूर्वोत्तर भारत में उनकी रणनीति का शेष बचा हुआ भाग है, जिसे वे जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहते हैं। नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में लगभग सभी जनजातियों को ईसाई सम्प्रदाय में मतान्तरित कर चर्च इस रणनीति को काफी सीमा तक सफल बना चुका है। अब केवल अरुणाचल प्रदेश बचा है, इसलिए इस प्रदेश में मतान्तरण अभियान को जल्दी से जल्दी पूरा करने के उद्देश्य से विदेशी या विदेशी धन से संचालित मिशनरियां अपने सारे साधन यहां झोंक रहीं हैं। अरुणाचल प्रदेश के लोग अपने अस्तित्व और संस्कृति को बचाने के लिए, इन दोनों मोर्चों पर अकेले लड़ रहे हैं। दुर्भाग्य से भारत सरकार इन दोनों मुहाजों पर अरुणाचलियों के साथ खड़ी दिखाई नहीं देती।

चीन का मनोवैज्ञानिक युद्ध
अरुणाचल प्रदेश पर चीन ने पिछले कुछ समय से अपने दावे को बार-बार ही नहीं बल्कि जोरदार ढंग से दोहराना शुरु किया है। भारत सरकार भी उतनी ही बार उसका खंडन कर देती है। इस खंडन के बाद दिल्ली अपनी पीठ थपथपाना शुरु कर देती है कि उसने चीन के दावे का माकूल जवाब दे दिया है। शायद उसकी दृष्टि में राष्ट्रीय हितों के लिए बनाई गई उसकी रणनीति की यह पराकाष्ठा है। इसके बाद भारत सरकार सेना को चीन की सेना के साथ साझे युद्धाभ्यास के काम में लगा देती है और प्रधानमंत्री चीन की मैत्री यात्रा पर निकल जाते हैं। हिन्दी-चीनी, भाई-भाई का वातावरण फिर से निर्मित किया जा रहा है। अपने विदेश मंत्री रहे नटवर सिंह पंचशील संधि के लाभ बताने के लिए सेमिनारों के आयोजन में जुट जाते हैं। उधर चीन एक लम्बी रणनीति के तहत अरुणाचल में एक मनोवैज्ञानिक लड़ाई को अधिक मजबूत करने लगता है। उसकी कोशिश है कि अरुणाचल के लोगों में यह भाव गहराई से पैठ जाए कि इस प्रदेश में उनकी राष्ट्रीयता को लेकर भारत और चीन में विवाद है। इस विवाद के चलते अब तक यह निर्णय होना बाकी है कि अरुणाचली चीनी हैं या भारतीय? चीन का सारा जोर इसी विवाद को बढ़ाने में लगा है और अब भारत सरकार ने भी कहना शुरु कर दिया है कि यह सीमा विवादास्पद है। प्रश्न अरुणाचल प्रदेश में चीन के केवल भौगोलिक दावे का नहीं है, बल्कि असली प्रश्न इस मनोवैज्ञानिक लड़ाई का है। भारत सरकार की दृष्टि में यह लड़ाई महत्वहीन है, जबकि देर-सवेर यही लड़ाई फैसलाकुन होने वाली है। चीन ने इस लड़ाई को लडऩे के फिलहाल चार महत्वपूर्ण मोर्चे तय किए लगते हैं। इनमें अरुणाचल पर बार-बार दावा जताने के साथ-साथ केन्द्र सरकार के किसी मंत्री द्वारा अरुणाचल में जाने का विरोध करना, वहां के लोगों को भारतीय पासपोर्ट पर वीजा देने के स्थान पर अतिरिक्त कागज पर वीजा देना, दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा का जोरदार विरोध करना और अरुणाचल प्रदेश में बार-बार चीनी सेना का प्रवेश करवाना शामिल है। यह उसकी इस नीति का हिस्सा बन गया है। भारत सरकार इन चारों मोर्चों पर अनिश्चय, भ्रम और ऊहापोह की स्थिति में दिखाई देती है। लगता है उसके पास चीन की इस नीति की कोई धारदार काट नहीं है या फिर वह जानबूझ कर इससे बचना चाहती है। वह केवल अपनी प्रतिक्रिया देकर कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है, लेकिन इससे अरुणाचल में भ्रम का कोहरा घना होता जाता है। पिछले सात साल से अरुणाचल में रह कर वहां के सामाजिक सांस्कृतिक परिदृश्य का अध्ययन कर रहे नरेन्द्र कुमार सिंह मानते हैं कि इससे अरुणाचलियों के मन में भ्रम पैदा होता है।

कुछ दिन पहले भारत के तीरंदाजों का एक दल चीन के वूजी नामक स्थान में 13 से 20 अक्टूबर तक होने वाली विश्व तीरंदाजी प्रतियोगिता में भाग लेने जा रहा था। इस भारतीय दल में अरुणाचल प्रदेश की सोलह साल की दो लड़कियां- सोरांग यूमी और मसेलो मीहू भी शामिल थीं। चीनी दूतावास ने बाकी सभी खिलाडिय़ों को तो चीन जाने का वीजा दे दिया, लेकिन अरुणाचल प्रदेश की इन दोनों लड़कियों को वीजा देने से इन्कार कर दिया। चीन का तर्क सीधा सपाट था। अरुणाचल प्रदेश उनकी दृष्टि में चीन का हिस्सा है। इसलिए दोनों लड़कियां चीन की नागरिक ही हुईं। अब चीन के नागरिकों को भला चीन जाने के लिए वीजा की क्या जरुरत है? इसलिए चीनी दूतावास ने कहा कि आप जब चाहें चीन जा सकती हैं। लेकिन जब इन लड़कियों को भी वीजा देने के लिए बहुत जिद की गई, तो बच्चों को बहलाने की शैली में, दूतावास ने पास पड़े एक सफेद कागज को उठा कर उस पर ठप्पा लगा दिया। यह लो आपका वीजा भी हो गया। चीन के इस व्यवहार से पूरा देश सकते में था। अरुणाचल प्रदेश में तो बहुत ज्यादा जन आक्रोश था। यह अरुणाचल का ही नहीं, बल्कि सारे देश का अपमान था। अरुणाचल के लोगों को लगता था कि चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के इस अपमान पर पूरा देश उनके साथ खड़ा होगा। चीन की इस हरकत का
जबाब देने के लिए भारत सरकार सारे दल का ही चीन प्रवास रद्द कर देगी। लेकिन हुआ इस के उलट। भारत सरकार ने उन दोनों अरुणाचली लड़कियों को छोड़ कर बाकी सारे खिलाड़ी दल को चीन भेज दिया। चीन सरकार अरुणाचल प्रदेश के लोगों को संदेश देना चाहता था कि भारत उनकी कोई चिन्ता नहीं करता और उसने अरुणाचल में यह संदेश भारत सरकार के व्यवहार की सहायता से सफलतापूर्वक दे दिया है। ऐसा नहीं कि अरुणाचल प्रदेश के लोगों को वीजा देने के मामले में चीन ने ऐसा व्यवहार पहली बार किया हो। वह पिछले कई साल से ऐसा ही कर रहा है। कुछ वर्ष पूर्व 2007 में उसने अरुणाचल के एक आई.ए.एस. अधिकारी गणेश कोऊ को इसी आधार पर वीजा देने से इंकार कर दिया था। जनवरी 2011 में चीन के फुजियान प्रान्त में हो रही भारोत्तोलन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए अरुणाचल प्रदेश के भी दो खिलाड़ी जाने वाले थे। दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने इन दोनों को भी अलग से एक कागज पर ही वीजा दिया। जाहिर है ये खिलाड़ी प्रतियोगिता में जा नहीं पाए। दुर्भाग्य से इन सभी मामलों में भारत सरकार का रवैया और भी आपत्तिजनक होता, यदि इन मामलों में पूरे दल के चीन प्रवास को ही रद्द कर दिया जाता। तब अरुणाचलवासियों को एक प्रकार का सुकून मिलता और वे समझते की उनके इस अपमान में पूरा देश उनके साथ है। लेकिन सरकार दल के बाकी सदस्यों को चीन रवाना कर देती है और चीन के इस व्यवहार की काट भी नहीं निकालती है।
प्रधानमंत्री की चीन यात्रा
इस ताजी घटना के तुरन्त बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह चीन जा रहे थे, इसलिये अरुणाचल प्रदेश के लोगों को विश्वास था कि यकीनन वे अरुणाचल प्रदेश के इस अपमान का मसला चीन सरकार के साथ उठायेंगे। लेकिन दुर्भाग्य से प्रधानमंत्री ने इस मसले को भारत चीन की दोस्ती के सम्बंधों में आड़े नहीं आने दिया। वे बीजिंग में चीन से दोस्ती बढ़ाने के पुराने नेहरुवादी सूत्र ही रटते रहे। इन्हीं सूत्रों ने 1962 में अरुणाचल प्रदेश की छाती पर अनेकों घाव किये थे। अब सोनिया कांग्रेस की सरकार अरुणाचलवासियों को उसी प्रकार के घाव अपने तरीके से दे रही है। मनमोहन सिंह ने यह मुद्दा उठाने की बजाय 23 अक्तूबर को चीन के साथ सीमा सुरक्षा सहयोग समझौता सम्पन्न किया। मोटे तौर पर इस समझौते में भारत सरकार ने स्वयं स्वीकार कर लिया है कि अरुणाचल और तिब्बत की सीमा फिलहाल विवादास्पद ही नहीं अस्पष्ट भी है। इस अस्पष्टता के कारण यदि दोनों देशों की सेनाओं में से किसी की भी सेना तथाकथित विवादास्पद इलाके में चली जाती है तो दूसरे देश की सेना उसे उस क्षेत्र से निकालने के लिये न तो उसका पीछा करेगी और न ही बल प्रयोग करेगी बल्कि चीन के साथ बातचीत करेगी। ऊपर से देखने पर लगता है कि यह समझौता दोनों देशों पर एक समान रुप से लागू होता है, इसलिये निर्दोष समझौता है। लेकिन दिल्ली ने यह बताने का कष्ट नहीं किया कि सीमा का उल्लंघन कर घुसपैठ चीन की ओर से ही होती है, भारत की ओर से नहीं। बातचीत के बहाने चीन अरुणाचल में अपनी सेना की घुसपैठ को लम्बे समय तक जारी रख सकेगा। अरुणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री दोर्जी खांडू ने तो सार्वजनिक तौर पर कहा था कि प्रदेश में चीनी सेना वर्ष में सैकड़ों बार सीमा का उल्लंघन करती है। इस समझौते का अर्थ हुआ कि अब भारत सरकार चीनी घुसपैठ को बाहर निकालने में भी समर्थ नहीं हो पायेगी और इसका अरुणाचल प्रदेश में बहुत गलत संदेश जायेगा।चीन पिछले कुछ सालों से अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को लेकर मुखर हो गया है। दावा वह इस क्षेत्र पर पहले भी जताता रहा है, लेकिन पहले वह केवल प्रतीकात्मक ही होता था। पिछले कुछ सालों से वह मुखर ही नहीं हुआ बल्कि इस दावे को पुख्ता सिद्ध करने के लिए उसने व्यवहारिक कदम उठाने शुरु कर दिये हैं। अरुणाचल प्रदेश में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह तक के जाने पर उसने आपत्ति उठायी। नवम्बर 2009 में दलाई लामा तवांग गये थे, तो चीन ने बाकयदा अपना विरोध ही दर्ज नहीं करवाया, बल्कि लगभग धमकी देने तक उतर आया। यह ठीक है कि भारत सरकार ने दलाई लामा को तवांग जाने की अनुमति दे दी ( शायद यदि न देती तो अरुणाचल प्रदेश के लोग भी विरोधस्वरुप सड़कों पर आ जाते) लेकिन सरकार ने उनकी तवांग की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर पाबंदी लगा दी। यदि दलाई लामा दिल्ली या धर्मशाला में प्रेस वार्ता कर सकते हैं तो तवांग में क्यों नहीं? जाहिर है सरकार स्वयं ही तवांग को दिल्ली से अलग मानने की बात स्वीकार करने लगी है। चीन का भी यही कहना है कि तवांग भारत के अन्य नगरों के जैसा नहीं है, बल्कि वह भारत और चीन के बीच विवादास्पद है। अत: वहां कोई ऐसा काम नहीं किया जाना चाहिए जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बढे। दिल्ली ने भी तवांग को शायद ऐसे ही दृष्टिकोण से देखा होगा, इसलिये वहां दलाई लामा को प्रेस वार्ता की अनुमति नहीं दी। चीन सरकार ने भारत पर अनेक तरह से दबाव डाला कि दलाई लामा के इस प्रवास को हर हालत में रोका जाना चाहिए। परन्तु उस समय तक वह यात्रा इतनी चर्चित हो चुकी थी कि भारत सरकार यदि इस यात्रा पर प्रतिबन्ध लगाती तो पूरे देश में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हो सकती थी। अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री तो इस यात्रा के लिए कई महीनों से तैयारियां कर रहे थे। दुनिया के अनेक देशों की भी इस यात्रा पर आंखें लगी हुई थीं। इसलिए भारत सरकार के लिए दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा को रोकना शायद संभव नहीं रहा। लेकिन साउथ ब्लॉक में जो दबाव समूह चीन के तुष्टीकरण को ही भारतीय हितों की रक्षा मानता है उसने चीन को प्रसन्न करने के लिए इसका रास्ता भी खोज निकाला। भारत सरकार ने अप्रत्यक्ष रूप से मानो चीन को सफाई देते हुए ही यह कहना शुरू कर दिया कि दलाई लामा एक संप्रदाय के धर्म गुरू हैं, उसके प्रचार-प्रसार के लिए उन्हें कहीं भी जाने का अधिकार है। लेकिन चीन शायद इतने पर ही संतुष्ट नहीं था तो एक कदम और आगे बढ़ते हुए भारत सरकार ने दलाई लामा द्वारा तवांग में पत्रकारों से बातचीत को भी प्रतिबन्धित कर दिया।

मुख्य प्रश्न यह है कि यदि दलाई लामा दिल्ली या धर्मशाला में पत्रकारों से बातचीत कर सकते हैं और भारत सरकार को उस पर कोई ऐतराज नहीं है तो तवांग में पत्रकारों से बातचीत पर आपत्ति का क्या अर्थ है? यह संकेत स्पष्ट करता है कि भारत सरकार दिल्ली और तवांग को एक समान नहीं मानती। तवांग को लेकर चीन सरकार का जो मत है, भारत सरकार के इस कदम से क्या कहीं अप्रत्यक्ष रूप से उसकी पुष्टि तो नहीं होती? साउथ ब्लॉक की चीन समर्थित लॉबी इस निहितार्थ को अच्छी तरह समझती है। भारत सरकार का कहना है कि ‘यह सब कुछ चीन के साथ मधुर सम्बन्ध बनाने में सहायक होगा।’

परन्तु चीन दलाई लामा की तवांग यात्रा से शायद इतना ‘आहत’ था कि यात्रा के अन्तिम दिन तक भारत सरकार क्षमा याचना की मुद्रा में आ गई। दलाई लामा का तवांग में सार्वजनिक कार्यक्रम था, जिसको लेकर अरुणाचल प्रदेश के लोगों में बहुत उत्साह था। दुनिया भर की आंखें भी दलाई लामा के इसी भाषण पर लगी हुई थीं। भारत के हर हिस्से में इस भाषण की उत्सुकता से प्रतीक्षा की जा रही थी। लेकिन चीन शायद इस भाषण को सुनना नहीं चाहता था। उसकी इस ‘इच्छा’ का ध्यान रखते हुए भारत सरकार ने व्यावहारिक रूप से इस सार्वजनिक कार्यक्रम को ही प्रतिबंधित कर दिया। लेकिन सरकार यह भी जानती थी कि यदि उसने प्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया तो अरुणाचल प्रदेश में उसकी तीखी प्रतिक्रिया होगी। जो अरुणाचल प्रदेश इतने दिनों से जयहिन्द के घोष से गूंज रहा है उसकी प्रतिक्रिया के दूरगामी परिणामों को भारत सरकार भी सूंघ ही सकती थी। इसलिए साउथ ब्लॉक ने उसका भी रास्ता निकाला। दलाई लामा का सार्वजनिक कार्यक्रम तो हुआ, लेकिन उसमें दलाई लामा केवल धर्म के गूढ़ रहस्यों की विवेचना करते रहे। लोगों को यह समझते देर नहीं लगी कि दलाई लामा के शब्दों पर यह तालाबंदी किसने की है। लगता है एजेंडा चीन सरकार तय करती है और उसे लागू करने का काम भारत सरकार करती है। दलाई लामा की इस अरुणाचल प्रदेश यात्रा से भारत सरकार की ओर से चीन को जो सख्त संदेश जाना चाहिए था, साउथ ब्लॉक की इस भितरघात से वह नष्ट ही नहीं हुआ बल्कि चीन के मुकाबले भारत की एक कमजोर छवि ही उभरी।
दिल्ली के इसी रवैये से चीन की हिम्मत बढ़ी। पहले वह अरुणाचल के सरकारी अधिकारियों को ही भारतीय पासपोर्ट पर वीजा देने को लेकर नये नये प्रयोग करता था, लेकिन अब उसने अरुणाचल प्रदेश के आम लोगों को भी भारतीय पासपोर्ट पर वीजा देना बंद कर दिया और कागज पर वीजा देने की प्रक्रिया शुरु कर दी। भारत सरकार ने विरोध किया तो इस बार चीन की भाषा बदली हुई थी। उसने स्पष्ट कहा कि अरुणाचल प्रदेश के बारे में वह अपनी नीति नहीं बदलेगा। वह अरुणाचल प्रदेश के सरकारी अधिकारियों को तो किसी भी हालत में वीजा नहीं देगा बाकी लोगों को साधारण कागज पर ही बीजा मिलेगा। लगता है अरुणाचल प्रदेश को लेकर एजेंडा चीन तय करता है, भारत सरकार केवल प्रतिक्रिया करती है। जबकि चाहिये तो यह था कि भारतीय दूतावास भी तिब्बत, मंचूरिया और सिक्यांग के नागरिकों को चीनी पासपोर्ट के बजाय अलग कागज पर वीजा देना शुरु कर देती। चीन अरुणाचल प्रदेश को विवादास्पद मान कर केन्द्रीय सरकार के किसी भी मंत्री के वहां जाने पर आपत्ति दर्ज करवाता है। भारत सरकार को भी चाहिए कि वह आपत्ति दर्ज करवाये कि जब तक तिब्बत विवाद सुलझ नहीं जाता तब तक चीन का कोई भी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति या कोई अन्य मंत्री तिब्बत में न आये। चीन से उत्पन्न सीमांत खतरे को लेकर भारत सरकार की इस चुप्पी के अनेक कारणों में से एक कारण यह भी है कि विदेश मंत्रालय में अभी भी पणिक्कर की शिष्य मंडली प्रभावी भूमिका में बैठी है। उनकी दृष्टि में चीन अरुणाचल प्रदेश में जिन क्षेत्रों की मांग कर रहा है उन्हें दे लेकर उसके साथ समझौता कर लेना चाहिए। लेकिन संभावित जन आक्रोश के खतरे को भांप कर वह ऐसा कहने का साहस तो नहीं जुटा पाते। अलबत्ता चीनी आक्रामक कृत्यों पर परदा डालने का काम अवश्य करते रहते हैं। वैसे दिल्ली में ऐसे अनेक तथाकथित विदेश नीति विशेषज्ञ आसानी से मिल जायेंगे जिन की दृष्टि में चीन से कुछ ले देकर सीमा समझौता कर लेना चाहिये। चीन नीति को लेकर पंडित नेहरु का नाम लेकर रोने से ही कर्तव्य की इतिश्री नहीं हो जाती। यदि चीन अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा बंद नहीं करता तो भारत सरकार तिब्बत को विवादास्पद मसला क्यों नहीं मान सकती। तिब्बत में तिब्बती लोग स्वतंत्रता हेतु संघर्ष कर रहे हैं। भारत सरकार उन्हें कूटनीतिक समर्थन तो दे ही सकती है। जब चीन के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति दिल्ली आते हैं, तो उनसे आग्रह कर सकती है कि तिब्बत समस्या सुलझाने के लिए दलाई लामा से बातचीत करे।
चीन के मामले में भारत को केवल प्रतिक्रिया और औपचारिक विरोध दर्ज तक सीमित न रह कर स्वतंत्र नीति का अनुसरण करना होगा। भारत सरकार चीन के इस मनोविज्ञान को समझ कर भी अनजान बनने का पाखंड कर रही है और उधर अरुणाचल प्रदेश के लोग चीनी अतिक्रमण को लकेर दिल्ली से गुहार लगा रहे हैं, लेकिन दिल्ली में उनकी सुनने वाला कोई नहीं है।
भारत सरकार तो हस्बे मामूल इन सभी घटनाओं पर चुप्पी धारण कर लेती है। लेकिन अरुणाचल प्रदेश का युवा चुप नहीं बैठ सकता। भारत सरकार की चीन के आगे इसी घुटना टेक नीति के विरोध में 2011 में अरुणाचल छात्र संघ ने 26 जनवरी के सरकारी कार्यक्रमों का बहिष्कार करने का निर्णय ले लिया था। कारण? भारत सरकार अरुणाचल को लेकर चीन के आगे घुटने क्यों टेक रही है। जो लड़़ाई दिल्ली को लडऩी चाहिए वह हिमालय की उपत्यकाओं में अरुणाचल प्रदेश के युवक लड़ रहे हैं। अपनी अपनी प्राथमिकताएं हैं। कभी नेहरु ने चीन की इसी आक्रमणकारी नीति के बारे में वहां घास का तिनका तक नहीं उगता, कह कर बचाव किया था। आज भारत सरकार लगभग उसी तर्ज पर अरुणाचल को बचाने से ज्यादा चीन से व्यापार बढ़ाने में उत्साह दिखा रही है। अभी तक चीन अरुणाचल के साथ लगती तिब्बत की सीमा को विवादास्पद ही बता रहा था, जिसे चीनी प्रधानमंत्री इतिहास की विरासत बताते थे, लेकिन पिछले दिनों चीन सरकार ने आधिकारिक तौर पर गुगल अर्थ के मुकाबले जो विश्व मानचित्र जारी किया है, उसमें अरुणाचल प्रदेश को चीन का हिस्सा ही दिखाया गया है। भारत सरकार का विरोध सब मामलों में आपत्ति दर्ज करवाने तक सीमित हो कर रह जाता है। ताज्जुब तो इस बात का है कि अरुणाचल, लद्दाख इत्यादि जिन क्षेत्रों पर चीन अपना दावा पेश करता है उन क्षेत्रों में रहने वाले लोग चीन के दावे का ज्यादा सख्त तरीकों से विरोध करते हैं। राज्य सरकारें, जिनकी सीमा तिब्बत (चीन) से लगती है,
वे केन्द्र सरकार से बार बार आग्रह कर रही हैं कि सीमाओं पर आधारभूत संरचनाओं को चुस्त-दुरुस्त किया जाए, क्योंकि सीमा विवादों से ज्यादा नुकसान सीमांत क्षेत्रों को ही उठाना पड़ता है।किसी भी प्रदेश के लोगों को आपस में और देश के शेष हिस्सों से जोडऩे के लिये संचार व्यवस्था महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। संचार व्यवस्था जितनी दुरुस्त और प्रभावी होगी, उतना ही लोगों का मानसिक अलगाव कम होगा। लेकिन यदि संचार व्यवस्था आधी अधूरी होगी तो लोगों में मानसिक अलगाव बढ़ेगा। अरुणाचल प्रदेश में संचार की व्यवस्था कैसी है, इसका उदाहरण दिया जा सकता है। तेजपुर से प्रवेश कर भालुकपोंग अरुणाचल का प्रवेश द्वार है। यह पश्चिमी कामेंग जिला है। भालुकपोंग से तवांग की सड़क राष्ट्रीय राजमार्ग 13 कहलाती है। इस पर चलने की कल्पना से रूह कांप जाती है। यह सड़क सेना की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, लेकिन साथ ही यहां के लोगों की जीवन रेखा भी है। लेकिन यह जीवनरेखा पिछले दस साल से अवरूद्ध है। मोन्पा जनजाति के इस पूरे क्षेत्र में टेलीफोन में करंट आ जाये वह उत्सव का ही दिन बन जाता है। सर्वर डाउन रहना, यहां सामान्य बात है, कभी ठीक हो जाये तो उसे अपवाद मानना चाहिये। तवांग जिला मुख्यालय है लेकिन वहां कोई कॉलेज नहीं है। बिजली और मोमबत्ती के प्रकाश में अन्तर करना मुश्किल हो जाता है, लेकिन मोमबत्ती नुमा बिजली के प्रकाश के लिये भी घंटों प्रतीक्षा करनी पड़ती है। पूरा इलाका एक टापू बन गया है। इस टापू में अलगाव के बीज बोने में चीन मनोवैज्ञानिक युद्ध में संलग्न है, लेकिन भारत सरकार आंखें मूंद कर बैठी है। सरकार यह बहाना नहीं कर सकती है कि इस क्षेत्र में जनसंख्या कम है, इसलिये यहां ज्यादा बजट खर्च नहीं किया जा सकता। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि तवांग पूर्वोत्तर भारत का दर्रा खैबर बना हुआ है। मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत पर हमले दर्रा खैबर के रास्ते से ही हुये। चीन के हमलों के लिये वही स्थिति तवांग की बनी हुई है। इसलिये भारत सरकार इस इलाके में संचार व्यवस्था के लिये जनसंख्या को आधार नहीं बना सकती। सुरक्षा की दृष्टि से यहां विकास को प्राथमिकता देनी होगी। लेकिन यह केवल सेना के बल पर नहीं हो सकता। उसके लिये अरुणाचल के निवासियों को इस हेतु तैयार करना होगा। उनकी संवेदनाओं एवं भावनाओं का सम्मान करना होगा। पूर्वोत्तर में अरुणाचल को भारत की खड्ग भुजा बनाना होगा। भारत सरकार अरुणाचल को देश का पिछवाड़ा मान कर नहीं चल सकती। लेकिन बदकिस्मती से दिल्ली में बैठी नौकरशाही अरुणाचलवासियों के मनोविज्ञान को समझने में दिलचस्पी नहीं रखती है। यहां तक राजनैतिक दलों का प्रश्न है, उनके लिये अरुणाचल का अर्थ लोकसभा की महज दो सीटें हैं।
यह ठीक है कि चीन निकट भविष्य में अरुणाचल प्रदेश पर कब्जा करने के लिए आक्रमण नहीं करेगा। हो सकता है अभी उसकी व्यापक रणनीति में ऐसा करना शामिल न हो। लेकिन उसने अरुणाचल प्रदेश में भारत से जो मनोवैज्ञानिक युद्ध छेड़ रखा है, उसका भी प्रदेश में व्यापक प्रभाव पड़ रहा है। भारत सरकार के अरुणाचल प्रदेश में किये जा रहे व्यवहार से कोहरा ज्यादा बनता है, धूप कम निकलती है। ऐसी स्थिति में यदि अमरीका के राष्ट्रपति चीन को दक्षिण एशिया की ठेकेदारी देने का दंभ पालना शुरू कर दें तो आश्चर्य कैसा? जरूरी है कि उन लोगों की शिनाख्त की जाये जो चीन की विदेश नीति को भारतीय हितों की पोषक मान कर दोगली चालें चल रहे हैं।
अरुणाचल में चर्च की गतिविधियां
प्रदेश में मिशनरियों के इरादों को भांपकर, अरुणाचल प्रदेश विधानसभा ने 1978 में मुख्यमंत्री प्रेम खांडू थुंगन के कार्यकाल में मजहब स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया था। लेकिन राज्यपाल ने इस पर हस्ताक्षर करने की बजाय इसे राष्ट्रपति के पास भेज दिया। नागालैंड की विधानसभा ने तो बाकायदा एक प्रस्ताव पारित कर राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि बिल को मंजूरी न दी जाये। भारत सरकार ने बिल वापस राज्य सरकार के पास भेज दिया। लेकिन अरुणाचल प्रदेश विधान सभा ने फिर उसे कुछ संशोधनों के साथ पारित कर दिया। प्रदेश की चर्च समर्थित पीपुल्स पार्टी ने इस बिल को निरस्त करने के लिये बाकायदा अभियान चलाया। तब मदर टेरेसा के नाम से विख्यात कोलकाता में रहने वाली मकदूनिया की नन Anjeze Gonxhe Bojaxhiu ने कोलकाता की सड़कों पर इस अधिनियम के खिलाफ स्वयं प्रदर्शन किया था। लेकिन अन्तत: 25 अक्तूबर 1978 को इस बिल को स्वीकृति मिल ही गई। यह ठीक है कि उस समय अपनी पूजा पद्धति छोड़ कर ईसाई मजहब अपनाने वाले लोगों की संख्या नगण्य थी। लेकिन यह प्रदेश वेटिकन की हिट लिस्ट में आ चुका था और इस को मतान्तरित करने के लिये करोड़ों रुपये की धनराशि प्रदेश में विविध मिशनरियों के माध्यम से झोंकी जा रही थी। प्रदेश सरकार ने अरुणाचल पर हो रहे इस विदेशी सांस्कृतिक आक्रमण को रोकने के लिये उस समय यह अधिनियम पारित किया था। जाहिर है चर्च अपनी पूरी ताकत इस अधिनियम के प्रभाव को किसी भी तरह रोकने में लगाता और उसने वह लगाया भी। अगले ही साल मुख्यमंत्री को अपनी कुर्सी छोडऩी पड़ी और उनके स्थान पर चर्च समर्थक पीपुल्स पार्टी के टोमा रीबा मुख्यमंत्री बने। कहा जाता है कि थुंगन को हटाने के लिये चर्च ने अकूत धनराशि का प्रयोग किया। चर्च ने अपने प्रयासों, साजिश और पैसे से इतना तो सुनिश्चित कर ही लिया की प्रदेश में व्यावहारिक रुप से इस कानून को क्रियान्वित न किया जाये। यही कारण है कि इस के पारित होने के बाद प्रदेश में ईसाईकरण की गति अत्यन्त तेज हुई है। पिछले दिनों पूर्वोत्तर के प्रसिद्ध अखबार मोयरंग एक्सप्रेस में कोरनियस लानाह ने लिखा कि अब यह अधिनियम मृतक के समान है। 1951 की जनगणना में प्रदेश में एक भी व्यक्ति ने अपने आप को ईसाइ दर्ज नहीं करवाया था लेकिन 1981 की जनगणना में प्रदेश की कुल आबादी में से 18.70 प्रतिशत मतान्तरित होकर ईसाई बन चुकी थी। जनजाति समाज में से तो 29.12 प्रतिशत लोग चर्च की गिरफ्त में आ चुके थे। नागालैंड के साथ लगते तिराप जिला में तो 50 प्रतिशत मतांतरण का काम चर्च ने 2001 तक निपटा लिया था। 1978 के अधिनियम के अनुसार जब भी कोई व्यक्ति ईसाई बनता है तो पादरी को इसकी सूचना संबंधित जिलाधिश को देनी होती है। लेकिन प्रदेश के 16 जिलों में से किसी एक के पास भी ऐसी सूचना नहीं है, जबकि लाखों की संख्या में लोगों को ईसाई बनाया जा चुका है। प्रदेश में ईसाईकरण की प्रक्रिया 1961 के बाद बहुत तेज हुई जब गृहमंत्रालय नीलम तारक के पास आ गया। अब तो प्रदेश में सभी चर्चों ने मिल कर अरुणाचल ईसाई फोरम का गठन कर लिया है, जो सरकार पर निरन्तर दबाव डालता रहता है कि प्रदेश में मतान्तरण के अभियान में कोई बाधा न पहुंचाई जाये। 2007 में दोर्जी खांडू के मुख्यमंत्री बनने से ऐसी आशा जगी थी कि प्रदेश में चर्च की राष्ट्र विरोधी गतिविधियों पर लगाम लगाई जायेगी, लेकिन 2011 में एक हेलीकॉप्टर दुर्घटना में उनकी रहस्यमय मौत ने उस आशा को भी धूमिल कर दिया। शायद इसके बाद सोनिया कांग्रेस ने पूरी तरह से प्रदेश को चर्च के हवाले करने का ही निर्णय कर लिया और उसके लिये बहुत ही सावधानी से योजना तैयार की। खांडू की रहस्यमय मौत के बाद जारों गामलिन मुख्यमंत्री बने।
लेकिन उनके खिलाफ सोनिया कांग्रेस की पार्टी के अन्दर ही विद्रोह भड़काया गया और सड़कों पर प्रदर्शन किये गये। इन प्रदर्शनों का बहाना बना कर 6 महीने बाद ही प्रदेश की सोनिया कांग्रेस विधायक दल पार्टी ने राज्य के लिये मुख्यमंत्री मनोनीत करने का अधिकार सोनिया गांधी को दे दिया और मैडम ने चर्च की इच्छा को पूरी करते हुये ईसाई संप्रदाय में मतांतरित हो चुके नबम टुकी को राज्य के मुख्यमंत्री की बागडोर सौंप दी। टुकी को सोनिया कांग्रेस ने राज्य इकाई का अध्यक्ष बना कर प्रदेश की भावी रणनीति का संकेत पहले ही दे दे दिया था। ईसाई देश, अरुणाचल को मतांतरित करने को कितनी गंभीरता से ले रहे हैं इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वेटिकन देश के राष्ट्रपति ने 7 दिसम्बर 2005 को इटानगर में डायकोजी स्थापित करने की घोषणा की और 12 मार्च 2006 वहां जोहन थॉमस की नियुक्ति भी कर दी। इस संस्था का उद्देश्य प्रदेश में मतांतरण की गतिविधियों को गति प्रदान करने के साथ उनमें समन्वय भी स्थापित करना भी है। चर्च जानता है कि मतांतरण से राष्ट्रांतरण होता है। इसलिये वह पूरी शिद्दत से अरुणाचल के मतान्तरण में जुटा हुआ है। लेकिन भारत सरकार इस मुद्दे पर बात करने को भी कुफ्र मानती है, क्योंकि इससे उसकी पंथ निरपेक्षता खतरे में पड़ जाती है। अरुणाचल क्षेत्र का जिक्र पुराणों में आता है। वहां परशुराम ने तपस्या की थी, इसका जिक्र भी मिलता है। मालिनीथान में कृष्ण से संबधित प्रसंग बिखरे पड़े हैं। गांव-गांव में डांगरिया बाबा के नाम से भगवान शिव की पूजा होती है। विश्वकर्मा की पूजा का यहां व्यापक प्रचलन है। अपनी तीसरी यात्रा में गुरु नानक देव जी ने तवांग से आगे एक गुफा में तपस्या की थी। इसके प्रमाण भी मिलते हैं। सरकार की नजर में शायद यह प्रदेश की सांप्रदायिक विरासत है, जिस पर पर्दा डाल कर यह स्थापित करना है कि प्रदेश के लोगों को सभ्यता के दर्शन मिशनरियों ने ही करवाये। प्रदेश की जनजातियां मिशनरियों के आक्रमणों का विरोध कर रहीं हैं, लेकिन दुर्भाग्य से सरकार उनके साथ खड़ी दिखाई नहीं देती। क्या देश सुन रहा है?
 डॉ. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

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