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‘हैरी पॉटर’ की चालों में फंसे आनंद विश्व चैक्विपयन बने कार्लसन

शतरंज की बिसात पर मोहरों को दिमाग से बुनीं चालों से चलाया जाता है। इस बात को नार्वे के (23 वर्षीय) मेगनस कार्लसन ने भारत के (43 वर्षीय) विश्वनाथन आनंद को हरा कर साबित कर दिया। कार्लसन ने विश्व शतरंज प्रतियोगिता में आनंद को 3.5 के मुकाबले 6.5 अंक से हराया। कार्लसन ने खिताब चेन्नई में खेली गई 10वीं बाजी में बेहद तनावपूर्ण व चुनौतिपूर्ण ड्रॉ के बाद जीता। आनंद इससे पहले पांच बार (2000, 2007, 2008, 2010, 2012) विश्व चैम्पियन रह चुके हैं और उनके पास यह खिताब वर्ष 2007 से था।

महज 10 वर्ष की आयु से ही अपने पिता के कहने पर कार्लसन ने शतरंज खेलनी शुरू की। 13 वर्ष की आयु में उन्होने ग्रैंडमास्टर की उपाधि प्राप्त करी। करीब 6 साल बाद विश्व के न. 1 खिलाडी बनकर कार्लसन ने विश्व में हलचल मचा दी। 22 नवंबर 2013 को पूर्व विश्व चैंपियन और भारत के विश्वनाथन आनंद को हरा कार्लसन विश्व चैम्पियन बन गए, इसके साथ ही उन्होने अपना और अपने पिता का सपना भी पूरा किया।

12 मैचों की यह प्रतियोगिता 9 नवंबर से आरंभ हुई थी। शुरूआत से ही कार्लसन को उनकी फार्म और खेलने की शैली के कारण जीत का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। इस दावे को दुनिया के न. 1 खिलाडी ने सही भी साबित कर दिखाया। मुकाबले की शरूआत से पहले ही रूस के भूतपूर्व शतरंज चैम्पियन गैरी कास्परोव ने भी कार्लसन के जीतने का दावा किया था। गैरी को कार्लसन की खेलने की शैली, प्रतिभा, भोली सूरत व शतरंज की बिसात पर उनका चालाकी भरा अंदाज उन्हें हैरी पॉटर की याद दिलाता है।

हालांकि, कार्लसन और आनंद के बीच पहले चार मैच ड्रॉ रहे। इसके बाद दोनों की कुछ आलोचना भी हुई और दर्शकों और विशेषज्ञों ने इसे ‘बोरिंग चैस’ (निरस शतरंज) का नाम दिया। लेकिन दिमागी तौर पर यह कार्लसन की जीत थी जिससे उनका हौसला बुलंद हुआ व मनोबल बढ़ा। अपने आप को विपरीत परिस्थिति में ढालने का मौका उन्हें मिल गया था और उनपर जो भी दबाव था वह बहुत हद तक कम हो गया था। इसका उदाहरण उन्होंने पाचवीं और छठी बाजी जीत कर दिया।

आनंद के लिए यह गलत रणनीति का नतीजा था। शुरूआत में आनंद अगर कार्लसन को ड्रॉ तक सीमित न रख कर एक या दो बाजी जीत लेते तो कार्लसन पर दबाव बढ़ जाता और वे अपनी ताल खो बैठते। कार्लसन इस बात को मानते हुए कहते हैं ”मेरे अनुसार तीसरी व चौथी बाजी महत्वपूर्ण थी। मैं महसूस कर रहा था कि आनंद भी मेरी तरह काफी सुरक्षात्मक तरीका अपना रहे हैं’’।

लगातार दो बाजी जीत कर कार्लसन ने आनंद को न सिर्फ चकित कर दिया बल्कि उन पर मनौवैज्ञानिक दबाव भी बना लिया। निश्चित तौर पर आनंद असमंजस मे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर प्रतियोगिता के मध्यांतर तक वे 2- 0 से पीछे कैसे हो गए। यहां से आनंद को अपना सारा अनुभव शतरंज की बिसात पर उतारने की जरूरत थी और अपनी चालों से कार्लसन को पीछे छोडऩे की चुनौति थी। वहीं कार्लसन इन दो जीतों से काफी खुश थे और यहां से उनको सिर्फ 2.5 अंक की जरूरत थी विश्व चैम्पियनशिप जीतने के लिए।

सातवीं बाजी की शुरूआत से ही आनंद पर जीत का दबाव था और शायद यह दवाब का ही नतीजा था कि आनंद ने आक्रामक शतरंज न खेलते हुए सुरक्षात्मक खेल का प्रदर्शन किया, नतीजा ड्रॉ। आनंद के खेल से लग रहा था कि वो यहां एक जीत से ज्यादा एक और हार को टाल रहे थे। इसकी पुष्टी करते हुए उन्होंने कहा ‘हार के क्रम को रोकना काफी संतोषजनक है। मै कोशिश कर रहा था कि उनपर (कार्लसन पर) दवाब बनाऊं पर उन्होंने काफी अच्छा बचाव किया।’

यहां से आंनद के लिए जीतना एंव अपने खिताब को बरकरार रख पाना लगभग नामुमकिन सा हो गया था। जीत के सूखे को वो पूरी कोशिशों के बावजूद दूर करने में विफल साबित हुए थे। नार्वे के इस प्रतिभावान खिलाड़ी को अगले पांच में से तीन मैच सफेद मोहरों के साथ खेलने थे और आमतौर पर शतरंज में इसे फायदे के तौर पर देखा जाता है। इसी का फायदा उठाते हुए कार्लसन ने अगली बाजी (आठवीं) भी आंनद को ड्रा करने पर विवश कर दिया। कार्लसन के खेल की खासियत उनका मॅास्को वेरियेशन का प्रर्दशन करना रहा जबकि विशी ने सिसिलियन डिफेंस पर भरोसा किया।

अगले मैच (नौवें) में आंनद सफेद मोहरों के साथ शतरंज की बिसात पर थे। शुरूआत से ही आंनद कार्लसन पर हावी रहे। अपने रूतबे और ख्याति के अनूरूप खेलते हुए आंनद ने कुछ बेहतरीन चालों का प्रर्दशन किया लेकिन कार्लसन के सटीक सुरक्षात्मक रवैये ने आंनद को अंतिम क्षणों में गलती करने पर मजबूर कर दिया। नतीजतन, आंनद 28 चालों में नौवीं बाजी हार गए। अब कार्लसन को विश्व चैम्पियन बनने से आंनद नहीं रोक सकते थे। कार्लसन ने माना कि ‘यह मैच काफी कठिन था। शुरूआत से ही यह बहुत असंतुलित सा था और मेरे ऊपर हार का खतरा मंडरा रहा था, जो मैने पिछले कुछ मैचों में अनुभव नहीं किया था।’

आंनद के लिए उनके द्वारा अहम मौकों पर की गई गलतियां व कार्लसन पर दवाब बरकरार न रख पाना हार की बडी वजह साबित हुई। शुरू के तीन मैचों में आंनद के पास अच्छा मौका था कि वो कार्लसन पर अपना शिकंजा कस कर एक या दो मैच जीत, कार्लसन पर दवाब डाल देते। कार्लसन शुरू में नई जगह और बडे मंच पर खेलने से थोडे घबराए हुए जरूर थे लेकिन चार ड्रा मैचों ने उनका आत्मविश्वास काफी बढा दिया। आंनद यहां पर विफल रहे और तीसरे मैच में उन्होंने काफी मौके गवां दिए।

अपनी हार स्वीकारते हुए आंनद ने कार्लसन को उनके अच्छे प्रदर्शन का पूरा श्रेय दिया। आंनद ने माना ‘मेरे द्वारा की गई गलतियां कार्लसन की बेहतरीन चालों का नतीजा थीं। कार्लसन ने मुझ पर दवाब बनाया और जल्दबाजी में मुझसे गलतियां हुईं’। भविष्य के बारे में बात करते हुए आंनद ने कहा कि दो हफ्तों में लंदन क्लासिक शतरंज प्रतियोगिता में वे भाग लेंगे। इसके बाद एक लंबी छुटटी और परिवार के साथ थोडा समय व्यतीत करेंगे। फरवरी 2014 में ज्यूरिच और इसके बाद मार्च में केंडिडेटस प्रतियोगिता में खेलेंगे।

तमिलनाडू की मुख्यमंत्री श्रीमती जे. जयललिथा ने मैगनस कार्लसन को गोल्ड कप एंव 9.9 करोड की राशि ईनाम के तौर पर दी। इसके साथ जैतून की पत्तियों से खास बनाया गया हार भी भेंट में दिया। विश्वनाथन आंनद को उपविजेता के तौर पर 6 .03 करोड का चैक दिया गया। एफ. आई. डी. ई के प्रेसिडेंट किर्सन यिलयूमजिहनोव ने कार्लसन को गोल्ड व आंनद को सिलवर पदक से सम्मानित किया।

 

सौरभ अग्रवाल

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