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बाल संस्कार

बाल संस्कार

आज अचानक एक चौथी कक्षा के बच्चे के मुंह से यह सुनकर मन जितना व्यथित हुआ, उससे अधिक हैरान रह गया कि उसकी कक्षा के सहपाठी ने गुस्से में आकर दूसरे बच्चे का गला इतनी जोर से दवा दिया कि उस लड़के का हाल बेहाल हो गया। एक बालक जो भगवान का रूप होता है, उसके अंदर इतना गुस्सा बहुत ही अस्वाभाविक है। देखा जाए तो हमारे पूरे समाज में आजकल हर बच्चे में अस्वाभाविक आचरण परलक्षित हो रहा है। बच्चों के अंदर सहनशीलता का घोर आभाव हम महसूस कर सकते हैं। असल में एक शिशु के विकार के लिए उसके माता-पिता, उसका पूरा परिवार, उसका समाज, जहां पर वह पल-बढ़ रहा है, सभी जिम्मेदार है। यह हम सभी को पता है कि छोटा बच्चा कच्चे घड़े के समान होता है, हम ही उसे आकार देते हैं। उसके अंदर आने वाले समस्त गुणों के लिए हम ही जिम्मेदार हैं। हम अपने समाज अपने देश की प्रगति की बात करते हैं, लेकिन अपने घर में पलने वाले अपने बच्चे के सम्पूर्ण विकास को ध्यान में नहीं रख पाते हैं। आज के शिशु के ऊपर हमारे देश का भविष्य निर्भर करता है। अगर शिशु का विकास मानसिक और शारीरिक रूप से नहीं हो पाएगा तो हमारा समाज भी ठीक से विकसित नहीं हो पाएगा और धीरे-धीरे हमारा समाज बीमार हो जाएगा।

जब हम एक परिवार बनाने बैठते हैं, तो पहले हम अपने मकान को दृष्टि में लाते हैं। हमारा मकान बाहरी लोगों को कितना अधिक आकर्षित करता है उसका ध्यान रखते हैं। हमारे घर की सजावट हमारे दोस्तों को आकर्षित करती है। फिर हम अपनी वेशभूषा और पोषाक पर ध्यान देते हैं। फिर हम अपने तथा अपने बच्चों की शिक्षा के ऊपर जोर देते हैं। ऐसा करते हुए हम शिशु के अंदर के विकास को बहुत पीछे छोड़ देते हैं। जब तक एक शिशु को हम पूरी तरह से खुलकर विकसित होने का मौका नहीं देंगे तब तक उसके उत्तम भविष्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कहा जाता है इस ब्रह्मांड में जन्म लेने वाला हर प्राणी दूसरों से अलग है। एक शिशु क्या चाहता है, क्या करने के लिए उसका मन व्याकुल है, इन समस्त चीजों का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है। इन समस्त चीजों के लिए  माता का सहयोग बहुत जरूरी होता है। एक मां ही एक शिशु को सही तरीके से समझ सकती है। इसके लिए जरूरत है उसे समय देने की। अपने नित्य कार्यों से कुछ वक्त निकाल कर अपना कर्तव्य समझते हुए अपने बच्चे के साथ बैठ कर खुशी-खुशी कुछ वक्त गुजारे। अधिक-से-अधिक कोशिश करे बच्चों को विकारों से दूर रखने की। कई घरों में यह पाया जाता है कि शिशु का समय कैसे गुजरना चाहिए, यह माता-पिता द्वारा पहले से निर्धारित होता है। इसके द्वारा हम कुछ हद तक अपने बच्चों को अनुशासित तो बना लेते हैं, लेकिन विकसित नहीं कर पाते हैं।

शिशु का मन निर्मल होता है। इस निर्मल हृदय में हम किसी भी चीज को आसानी से अंकित कर सकते हैं। सर्वप्रथम हमें अपने खुद के आचरण पर ध्यान देने की बहुत जरूरी है। जो चीज हम बच्चों के सामने करते हैं वह हमारे बच्चे जरूर अनुकरण करेंगे उसका ध्यान हमें हमेशा रखना चाहिए। हम अपने जीवन को एक अध्यात्मिक आधार पर आगे बढ़ाएं, साथ-साथ बच्चों को भी अपने साथ जोड़ लें। बच्चों के पास बैठकर कहानी के माध्यम से आदर्श बातों से उन्हें अवगत करायें। जिन सद्गुणों के आधार से अनेक पुरुष, महापुरुष बन सकते हैं, उन सभी गुणों की अपने जीवन में क्या जरूरत है, उसकी जानकारी देना जरूरी है। दया, क्षमा, सहनशीलता, परिश्रम, सत्यपरायणता, निष्ठा यह समस्त गुणों का बचपन से ही बच्चों में अभ्यास कराया जाना चाहिए। शिशु के विकास पर अधिक-से-अधिक बल देने से ही पूरे देश का विकास हो सकता है।

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