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किसान की माली हालत पर लहलहाता एलीट क्लास

किसान की माली हालत पर लहलहाता एलीट क्लास

भारत ने आजादी के बाद भले ही बहुत तरक्की और उन्नती कर ली हो, लेकिन एक चीज अभी भी है जिस पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है, वह है किसानों की माली हालत। भारत कृषि प्रधान देश है, तो देश का प्रधान कौन? किसान। लेकिन, विडंबना है कि देश के तमाम लोगों की भूख शांत करने वाले किसान की थाली ही खाली रह जाती है। लेखक ‘पंकज सुबीर’ ने अपने उपन्यास ‘अकाल में उत्सवÓ में किसानों की हालत और ग्रामीण जीवन पर बहुत गहनता से विचार कर रोशनी डाली है। लेखक ने इस उपन्यास में दर्शाया है कि कैसे एक छोटे से किसान की समस्त उम्मीदें उसकी फसल से लगी होती हैं। वह अपनी पकती फसल से भविष्य की खुशहाली का ताना-बाना बुनना शुरू कर देता है। 19-03-2016लेकिन, हमारे देश के किसान की हालत आज भी वहीं नजर आती है, जहां सदियों पहले थी। आज भी मौसम के उतार-चढ़ाव के साथ ही किसानों की उम्मीदों का ग्राफ सीधा संबंध रखता है। अगर किसान की फसल पर बेमौसम बारिश या पाला पड़ गया, तो उसकी सारी उम्मीदें भी फसल के साथ ही नष्ट हो जाती हैं। ऐसे में उसके पास अपने खर्चों की भरपाई के लिये दूसरा कोई विकल्प शेष नहीं रहता। ऐसे में केवल एक ही रास्ता उसे सूझता है जो साहूकार के घर तक जाता है। इसके लिये उसे अपनी पुश्तैनी चीजों को दांव पर लगाना पड़ता है। किसान के पास दो ही चीजें पुश्तैनी होती हैं जमीन और पत्नी के गहने। उपन्यास में लेखक ने बहुत ही गंभीरता से किसानों की माली हालत पर चिंतन व्यक्त किया है।

उपन्यास की खास बात ये है कि शहरी और ग्रामीण जीवन का उल्लेख लेखक ने एक साथ एक ही मंच पर किया है। लेखक ने बड़ी ही खूबसूरती से पेश किया है कि कैसे ग्रामीण परिवेश में रहने वाला किसान आज भी अपनी प्रत्येक आवश्यकता के लिये आने वाली फसल पर निर्भर है, लेकिन शहरी जीवन तेजी से विकास की ओर अग्रसार है। पूरे उपन्यास की धूरी ‘सूखा पानी’ गांव का गरीब किसान ‘रामप्रसाद’ और शहरी कलेक्टर ‘श्रीराम परिहार’ ही हैं, लेखक ने किसान ‘रामप्रसाद’ के माध्यम से भारतीय किसानों के हालतों को उकेरा है। किसान ‘रामप्रसाद’ के माध्यम से बताया गया हैं कि किस तरह से मौसम की आंख मिचौली के बीच एक किसान को बिजली, को-ऑपरेटिव बैंक, साहूकार के बकाये को तो चुकाना ही होता है, साथी ही घर-परिवार, नाते-रिश्तेदारों समेत सभी सामाजिक रस्मों को भी निभाना होता है। इसके लिये चाहे उसे पत्नी के शरीर पर बचे एक मात्र गहने चांदी की ‘तोड़ी’ को ही क्यों न गिरवी रखना पड़े।

अकाल में उत्सव

लेखक       : पंकज सुबीर

प्रकाशक: शिवना प्रकाशन

मूल्य: 150 रु.

पृष्ठ: 224

लेखन ‘पंकज सुबीर’ ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का परिचय देते हुए, उपन्यास में कृषि अर्थशास्त्री और सांख्यिकी विशेषज्ञ की हैसियत से किसान की उपज के मूल्य को आज के उपभोक्ता सूचकंकों के सापेक्ष विश्लेषण की कसौटी पर जांचा है। लेखक कहते हैं कि 1975 में एक सरकारी अधिकारी को 400 रुपये वेतन मिलता था। जो अब 40 हजार हो गया है, लेकिन देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बन पाई है, जिसमें किसान को 3 हजार रुपये प्रति माह, उसके परिवार को चलाने के लिये दिया जाए। लेखक ने सीधे तौर पर देश की व्यवस्था और सरकारी तंत्र पर कटाक्ष किया है, जहां एक तबका तो एशोआराम के जीवन में लिप्त है, लेकिन दूसरा ग्रामीण तबका आज भी छोटी-मोटी जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद और कर्ज से मुक्ति को झटपटा रहा है। उपन्यास में लेखक ने इंदौर, भोपाला, सिरोह जनपदों के आस-पास बोले जाने वाली अपभ्रंश ‘मालवी’ भाषा का प्रयोग किया है तो वहीं, संपन्न जीवन यापन करने वाले कलेक्टर और एडीएम जैसे इलीट क्लास के लोगों को लेखक ने हिन्दी मिश्रित अंग्रेजी बोलते दिखाया है। उपन्यास ‘अकला में उत्सवÓ में भाषा के बेहतरीन प्रयोग के साथ लेखक ने किसानों और शहरी पात्रों की मानसिक दशा और उनके मन में चल रहे द्वन्दों-भावों की अभिव्यक्ति जैसे की है वह सराहनीय है।

प्रीति ठाकुर

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