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जाट आरक्षण आंदोलन के निहितार्थ

जाट आरक्षण आंदोलन के निहितार्थ

भारत देश भी निराला है, यहां जितने देशभक्त हैं लगभग उतने ही देशद्रोही भी हैं। देशद्रोही इस मायने में कि स्वार्थपरता की भावना इतनी तीव्र होती जा रही है, जिसमें देश हित के मायने अलग होते जा रहे हैं। मतलब साफ है कि नियति की विडम्बना ने ही हमें इस तरह एक छत के नीचे रखा हुआ है, वरना तो हम कब के टूट चुके होते। टूटने की यह बानगी लगातार सामने आ रही है। रोहित वेमूला की आत्महत्या से लेकर जेएनयू अर्थात जेहादी निर्माण यूनिवर्सिटी में भारत के टुकड़े करने की कवायद के साथ-साथ हरियाणा में जाटों द्वारा फैलायी गयी आरक्षण की आग ने हरियाणा का तो नाम खराब किया ही साथ ही देशभक्ति के जज्बे वाली तथा बॉर्डर पर मर मिटने वाली जाति के ऊपर कभी न मिटने वाला दाग भी चस्पा कर दिया। जाट ऐसे तो न थे। ऐसे हो कैसे गये? इस प्रश्न का जबाब तलाशना इतना मुश्किल नहीं, क्योंकि यह कार्य पूर्णत: साजिशाना अंदाज में दबंगई के साथ किया गया है। तभी तो एक तरफ हुड्डा साहब जंतर-मंतर पर थोथी सद्भावना दिखाते रहे और उनके सिपहसालार व सहयोगी प्रो. ओम वीरेन्द्र हरियाणा को लुटवाते रहे। क्या ऐसा हो सकता है कि कांग्रेस पार्टी इस ज्ञान से अछूती हो। खैर, यह तो उसी समय सिद्ध हो गया था जब 1966 के बाद लालों की राजनीति को ठेंगा दिखाकर 2014 के चुनावों में बीजेपी ने पहली बार सत्ता पाई वह भी पूर्ण बहुमत से। यह तय था कि किसी भी प्रकार हरियाणा, खट्टर और केन्द्र तीनों को अस्थिर करना है। जेनयू के समर्थन से राहुल गांधी जी की छवि को धक्का जो लगा था, अत: इस आग में उस आग को बुझाना जो था, सो कर दिया। भाईचारे की मिसाल वाले राज्य को साजिशाना रंग में रंग कर ऐसी स्थिति बना डाली है कि भविष्य में भी जातीय दंगे हरियाणा की खास पहचान न बन जायें। जिस तरह सैनी एवं जाटों में खूनी भिडंत हुई हैं उससे तो यही लगता है कि दबंग जाटों के खिलाफ और भी ओबीसी जातियां एकत्र हो सकती हंै और भविष्य में भी खूनी खेल खेला जा सकता है। आरक्षण स्वयं में भी इस तरह का गंभीर मुद्दा बन चुका है कि इसमें वह सब कुछ है जो एक देश को बिखेरने के लिए आवश्यक होता है। कभी पाटीदार एकता का सवाल पैदा किया जाता है, तो कभी जाट एकता का कहीं कापू समुदाय है, तो कहीं गुर्जरों की जंग जारी है। लेकिन, यह जबाब कहीं से नहीं आता कि इसी तरह हम लड़ते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब दुश्मन अपने मंसूबों में आसानी से सफल हो जाएगा। अब वो समय दूर नहीं जब आरक्षण का मुद्दा गृहयुद्ध की स्थिति न ले आये और जेनयू में लगे नारों को सही साबित कर दे। भारत के टुकड़े भारत के लाल स्वता कर डालेंगे, ऐसा इस और ऐसे अनेक आंदोलन सिद्ध कर देते हैं।

खैर जो भी हो नारे साबित हो या न हो, लेकिन इतना तो प्रथम दृष्ट्या सिद्ध हो चुका है कि हरियाणा के दबंगों की दबंगई ने खरे और दिलवालों का खिताब पाने वाले राज्य को कटघरे में ला खड़ा किया है। इन परिस्थितियों ने यह जाहिर कर दिया है कि हिंसा से आप कुछ भी प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन, काबिले गौर यह तथ्य है कि कभी देश के लिए इस तरह की हिंसा क्यों नहीं होती। क्या बंटने और टूटने के लिए स्वार्थ इतना महत्वपूर्ण है कि जीवन का मोल, भाईचारे के बोल सब धुल जाते हैं? आप कितने भी सामर्थ हों, लेकिन आरक्षण एक ऐसा नासूर बन चुका है कि पूरी की पूरी जाति ही एक रंग मे रंग जाती है। फिर चाहे आरक्षण स्वयं को मिले न मिले, लेकिन जातिगत भावना इतनी बलवती हो चुकी है कि लगता है कि अपना ही हक मारा जा रहा है। इसके साथ-साथ आर्थिक आधर पर आरक्षण का भी प्रभाव आरक्षण पाने वालों पर विपरीत ही पड़ा है। 6.50 लाख रू प्रतिवर्ष क्रीमीलेयर के साथ खुला मजाक किया जा रहा है। नौकरियों में चयन छन-छन कर ऊपर के लोगों का ही हो रहा है। बेचारा निम्न परिवार का व्यक्ति तो हाथ मलता ही रह जाता है। किसी भी कैटेगरी में सही रूप से वंचितों को कोई अधिकार नहीं मिल पा रहा है, क्योंकि उसके पास संसाधन नहीं है। मतलब साफ है कि संसाधनवान ही आगे जा रहे हैं। एक मीणा परिवार से लगातार चयन हो रहा है, जबकि दूर-दराज की जनजातियों से चयन हो पाना दूर की कौड़ी हो गयी है। राजस्थान की मीणा जनजाति ने आदिवासी आरक्षण का तीन-चौथाई हिस्सा अपने नाम कर रखा है, जबकि पूरे भारत में इनकी आबादी 5 प्रतिशत भी नहीं है। इसी प्रकार एस.सी. की आबादी में पासवान, जाटव और अन्य उभरती जातियां ही मलाई खा जाती हैं, जबकि बहुत सी जातियां तरसने के अलावा कुछ नहीं कर सकती हैं। ऐसे ही हालिया समय में ओबीसी आरक्षण का 70 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ तीन-चार जातियों के हिस्से आ जाता है। जैसे-यादव, कुर्मी, गुप्ता, (तेली), गुर्जर आदि। अब ऐसे में यदि जाट, पटेल और कापू समुदाय के लोग आ गये तो इनको भी चयन का खतरा नजर आने लगता है। यही मूल कारण हरियाणा के जाट और गैर जाट दंगों का पर्याय बन गया। कुरूक्षेत्रा के सांसद राजकुमार सैनी द्वारा जाट आरक्षण के खिलाफ दिये गये तीखे बयानों ने कहीं न कहीं सैनियों के हक मारे जाने का अंदेशा दिखा दिया और जाटों को यह नागवार गुजरा तथा रोहतक की सरजमी से बेइंतहा आगजनी और मारकाट मे सब कुछ पाने को आतुर दिखे। सफीदों में हुये जाट-सैनी दंगों ने तथा कुछ जगह बाल्मीकियों के प्रतिरोध से हरियाणा की राजनीति को भविष्य में जाट बनाम अन्य के रूप में देखा जा सकता है। इसका प्रभाव अनिल विज और जाट मंत्रियों की बहस से भी लगाया जा सकता है। खैर, जो भी हो सबसे बढिय़ा तरीका जातिगत आधार पर जनगणना कराकर जितनी जो जाति है उसको उसी अनुपात में आर्थिक आधर पर आरक्षण देकर संतुष्ट कर दिया जाए, जिसका प्रतिरोध भी नहीं होगा और भविष्य में इस आरक्षण की बंदरबांट से किसी भी राज्य को 35,000 करोड़ का नुकसान भी नहीं होगा। इससे जो सबसे बड़ी बात होगी वह नव सामंतवाद के उभार को भी रोकने में सक्षम हो पायेगी।

आर.के. चौहान

(लेखक जाकिर हुसैन कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, में गेस्ट लेक्चरर हैं)

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