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महात्मा और आंबेडकर की शर्तों पर आरक्षण

महात्मा और आंबेडकर की शर्तों पर आरक्षण

यह सोच लेना अतिश्योक्ति होगी कि आरक्षण को लेकर चल रही लड़ाई के कारण देश में प्रचंड अशांति का माहौल कायम हो जाएगा। यह और बात है कि न केवल सरकारों, न्यायपालिका और आयोगों ने इस विषय पर निर्णायक भूमिका निभाई है, बल्कि विभिन्न समुदायों ने भी अपने पिछड़े होने और कोटा की मांग को लेकर जंग छेड़ रखी है। 1990 में मंडल कमीशन की सिफारिशों के विरोध में आरक्षण-विरोधियों की ओर से चलाए गए आंदोलन, तथा आरक्षण समर्थकों और विरोधियों के प्रदर्शनों और टकरावों की छिट-पुट घटनाओं को अगर सरकार ने नहीं रोका होता तो एक भयंकर तबाही मच सकती थी। चलिए इसका अध्ययन शुरुआत से करते हैं ताकि तस्वीर साफ हो सके।

मौजूदा भारत में जब आरक्षण पर चर्चा जारी है तब दो धाराएं बह रही हैं। इनमें एक वह है जिसे हम फेसबुक पेज या मोबाइल के मैसेज में कार्टूनों और उकसाने वाले लेखों के रूप में देखते हैं – सरकार के पास अवसरों की एक बड़ी टंकी है जहां से पहला नल एससी लोगों को पानी देता है, फिर दूसरा नल एसटी को, फिर ओबीसी को और अंत में सामान्य वर्ग को। यह आबादी की पहली धारा की ओर इशारा करता है जो कहता है – ‘खत्म करो आरक्षण’। दूसरी वह धारा है जिसे हमने हाल ही में हरियाणा में देखा है जहां एक विशेष समुदाय के लोग सरकारी नौकरी आदि में ‘आरक्षण’ के अपने विशेष अधिकार की मांग को लेकर सड़कों पर उतर आए।

इन धाराओं का विश्लेषण किसी एक समूह के सदस्य की नजर से करने के बजाए राष्ट्रवादी और सुधारवादी दृष्टिकोण से किया जाए, तो आप आजादी से पहले के दौर में चले जाएंगे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने उन लोगों के लिए सुधार आंदोलन की शुरुआत की, जो सबसे ज्यादा नापसंद की जाने वाली जाति के लोग थे। गांधी जी उन्हें हरिजन (भगवान के लोग) नाम दिया। इस आंदोलन ने उस कमी को पूरा किया जिसने सक्रिय (ब्रिटिश राज का प्रत्यक्ष विरोध जैसे सविनय अवज्ञा) और सहनशील विरोध के चरणों के बीच सारे भारतीयों में मानवता और राष्ट्रवाद की भावना को पैदा किया, और इस कारण ही किसी ने भी संविधान में आंबेडकर की ओर से आरक्षण के प्रस्ताव का विरोध नहीं किया। पिछडे वर्गों के साथ इतनी जोर जबरदस्ती की गई थी कि उच्च जातियों की ओर से उन पर किए गए सारे अत्याचारों के बदले उनके लिए नौकरियों तथा अन्य अवसरों में दिए गए आरक्षण की आलोचना की बजाए स्वागत किया गया।

अस्पृश्यता को लेकर चलाए गए आंदोलन के जनक आंबेडकर नहीं, गाधी जी थे। गांधी जी पिछड़े वर्ग के नहीं थे, फिर भी वह उनके दमन और क्रूर उत्पीडऩ को अच्छी तरह समझते थे। वही थे जिन्होंने महसूस किया कि उन्हें जिस अत्याचार का सामना करना पड़ा उसका कारण महज आर्थिक पिछड़ापन नहीं था बल्कि सामाजिक अपमान भी था, जिससे उनमें निराशा और अवसाद पैदा होता है। अब इसे ऊपर वर्णित पहली धारी के साथ जोड़कर देखें। वह जो एससी या एसटी समुदाय के किसी सदस्य को मोटे-ताजे व्यक्ति के रूप में दिखाता है जो प्रभावशाली सरकारी पद पर आराम से बैठा है फिर भी 1960 के बाद से (संविधान ने शुरुआती दस वर्षों के लिए अनुमति दी थी) जारी आरक्षण के मजे ले रहा है। वास्तव में वह व्यक्ति मोटा-ताजा नहीं है, न ही उतना दंभी, जितना दिखाया गया है। वह बस संतुष्ट है और वह समाजवादी तथा लोकतांत्रिक राज्य के फायदों को भी समझता है, जिसे निंदा करने वाले के रूप में हम नहीं समझ पाते।

इसलिए अगर आप आरक्षण की नीति पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग करते हैं, तो गलती आपकी है। आप तब भी गलत होंगे यदि आप पिछड़ेपन का निर्धारण करने के लिए केवल आर्थिक आधार को ही पैमाना बनाने की वकालत करेंगे। वर्तमान में आरक्षित वर्गों में से किसी एक के सदस्य की आर्थिक स्थिति अच्छी हो सकती है, लेकिन वह ढोंगियों और वर्ण व्यवस्था के स्वयंभू रक्षकों से भरे समाज से निराश और शर्मिंदा हो सकता है। इस कारण वह स्त्री/पुरुष आरक्षित वर्गीकरण के योग्य हो सकती है या सकता है। यही बात शैक्षणिक पिछड़ेपन पर भी लागू होती है तुलना किसी के आर्थिक रूप से मजबूत होने से नहीं की जा सकती है। हमने पहली धारा से पाठकों को पूर्वाग्रह से मुक्त करने के लिए तर्क दिए जिससे कि वे ‘आरक्षण खत्म करो’ और टंकी तथा नल वाले सिद्धांत से दूर जा सकें। तो चलिए अब दूसरे परिदृश्य पर नजर डालते हैं।

2014 में एक ऐतिहासिक फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने न केवल ट्रांसजेंडर की पहचान तीसरे लिंग के रूप में की, बल्कि माननीय न्यायालय ने उन्हें ओबीसी वर्ग में भी डाल दिया, जिससे उन्हें सामाजिक पिछड़ेपन के कारण आरक्षण मिल गया। यदि आप कोर्ट के इस फैसले से थोड़ा सा भी सहमत हैं, तो आप मानेंगे कि इस वर्ग को आर्थिक रूप से वंचित नहीं कहा जा सकता, फिर भी समाज में उनके साथ होने वाले भेदभाव के कारण, ओसीबी वर्ग में उन्हें शामिल करना सही ठहराया जा सकता है। यह एक ऐसी अवधारणा है जो सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों को मुख्यधारा में शामिल किए जाने को प्रोत्साहित करेगी, जिससे उनकी सामाजिक गुणात्मकता में भी बढ़ातरी होगी।

19-03-2016

किंतु जाट समुदाय क्या मांग रहा था जिसके लिए उसने हरियाणा में कानून व्यवस्था को तहस-नहस कर दिया और सारे सरकारी और सार्वजनिक तंत्र को ठप कर दिया? चलिए एक नजऱ अक्सर होने वाले हिंसक प्रदर्शनों के मुद्दे पर भी डालते हैं। रेल और सड़क यातायात को ठप कर दिया गया और आवश्यक वस्तुओं की आवाजाही भी रोक दी गई, सैकड़ों वाहनों को फूंक दिया गया और इमारतों को लूटा गया, फिर भी सरकार ने बातचीत के लिए हामी भर दी और कानून-व्यवस्था तोडऩे पर किसी जांच से भी इनकार कर दिया जो पहले कभी नहीं हुआ था। यदि भारतीय दंड संहिता ऐसे मामलों में अभियोग चलाने की अनुमति नहीं देती (जैसा कि नहीं है), तो सरकार क्यों नहीं एक विशेष कानून बनाती है जो ऐसे हिंसक प्रदर्शनों और जुलूसों के दौरान लागू हो जाए, जो कभी धर्म के नाम पर तो कभी अधिकारों और विशेषाधिकारों की मांग को लेकर शुरू हो जाते हैं? सुप्रीम कोर्ट निस्संदेह स्वत: संज्ञान ले सकता है! इसके अलावा, हो सकता है कि जाट इस कारण नौकरियों तथा अन्य अवसरों में अपना हक मांग रहे हों क्योंकि राज्य के मतदाताओं में उनका हिस्सा 27 प्रतिशत है। लेकिन क्या अन्य पैमानों पर वह खरा उतरता है?

पुख्ता रिपोर्ट के मुताबिक, अब तक हरियाणा में जाट समुदाय के सात मुख्यमंत्री बने हैं और मौजूदा विधानसभा में उनका प्रतिनिधित्व एक तिहाई है। राज्य की दोनों प्रमुख विपक्षी दलों के नेता इसी समुदाय के हैं। फिर अन्य शैक्षणिक और सामाजिक पैमाने हैं भी जिन पर हरियाण के जाट हों या गुजरात के पाटीदार (2015 के मध्य में गुजरात का आरक्षण संकट), कभी खरे नहीं उतरते, जिससे कि उन्हें ओबीसी सूची में रखा जाए। यह भी सनद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस सरकार की ओर से जाट समुदाय को ओबीसी वर्ग के अंतर्गत आरक्षण दिए जाने के फैसले को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह समुदाय पिछड़ा नहीं है। मौजूदा सरकार की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका अभी विचाराधीन है।

इस प्रकार, संविधान ने लोकतांत्रिक और सहभागी शासन को देखते हुए सभी को इक_ा होने और अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार दिया था, लेकिन आजादी के बाद के समूह इसे नए धरातल पर ले गए। यह ऐसी स्थिति थी जिसमें क्रूरता थी। कानून-व्यवस्था को रौंदा जा रहा था। यहां तक कि देश की संप्रभुता को चुनौती देने के साथ ही कोर्ट के फैसलों की अवमानना की जा रही थी। आरक्षण पर लौटें, तो कुछ पैमाने पिछड़ा वर्गों के राष्ट्रीय आयोग द्वारा तय किए जाते हैं, जिनके आधार पर तय होता है कि किस जाति को ओबीसी सूची में शामिल करना है और किसे नहीं। ये पैमाने संबंधित समुदाय के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर आधारित होते हैं। जाट या पाटीदार आंदोलन ने इस रास्ते के जरिए सूची में प्रवेश पाने का प्रयास क्यों नहीं किया यह समझ से परे है। हां, एक बात समझ आती है कि वोट बैंक और तुष्टिकरण की राजनीति के तहत यह सब किया जा रहा है।

19-03-2016

हाल के दिनों में जाटों ने अपने प्रदर्शन के दौरान जितनी हिंसा की और फिर इस समूह के दबाव के आगे जिस प्रकार सरकार ने घुटने टेक दिए (जो विशेषाधिकार की मांग करने वाले अन्य समूहों के लिए उदाहरण बन जाएगा), उससे ऐसी घटनाओं के दौरान सरकार की नीयत और रुख पर सवाल उठते हैं। आरक्षण को लेकर इन धाराओं के लिहाज से, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत में एक न्यायोचित व्यवस्था बनेगी जो दिव्यांगों, शहीद जवानों के बच्चों, तीसरे लिंग और वास्तविक रूप से आर्थिक तौर पर पिछड़े घरों (चाहे वे किसी भी जाति या समुदाय के हों) को सब्सिडी वाली सूची में शामिल करेगी। यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के क्रीमी लेयर वाले पैमाने को ओबीसी पर सही ढंग से लागू किया जाएगा तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा आरक्षण की तय की गई 50 प्रतिशत की सीमा को पिछले दरवाजे से (जैसा कि तमिलनाडु सरकार ने किया था) लांघने की कोशिश नहीं की जाएगी।

इन सारी बातों के लिए, राजनैतिक दलों को अपनी विचारधारा और वोटरों को अपनी प्राथमिकता के पुनरुत्थान की आवश्यकता पड़ेगी, तथा आम भारतीय को कोटा की भीख मांगने की बजाए सम्मानित भारतीय होने पर गर्व करना होगा।

सुनील गुप्ता

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं।)

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