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गुस्सा क्यों हैं प्रभुजातियां?

गुस्सा क्यों हैं प्रभुजातियां?

पिछले दिनों हरियाणा जाट आरक्षण आंदोलन की हिंसा की आग में जलता रहा। आखिरकार उसके सामने सरकार को झुकाना पड़ा। उनकी आरक्षण की मांग माननी पड़ी। यह तो सरकार का सौभाग्य है कि राज्य में अनुसूचित जनजाति न होने के कारण उनके कोटे का उपयोग का नहीं हो पाता है इसलिए राज्य सरकार के लिए मांगे मानना आसान था। लेकिन इस बीच यह आंदोलन 20 लोगों की बलि ले चुका था। 20हजार करोड़ रुपयों की संपत्ति स्वाहा हो चुकी थी। जिस तरह राज्य में जानमाल का नुक्सान हुआ उसे देखकर तो लगता है कि यह हाल के समय में हुए आरक्षण आदोलनों में सबसे हिंसक आंदोलनों में एक था। इसने सरकारी संपत्ति ही नहीं, गैर-जाट जातियों को अपनी हिंसा का निशाना बनाकर राज्य को जातीय तनाव की आग में धकेल दिया। लेकिन आंदोलन का इससे भयावह पक्ष यह था कि इस आंदोलन के दौरान कई जगह सामूहिक बलात्कार हुए। यह इस बात का प्रतीक था कि आंदोलनकारी किस कदर वहशीपन पर उतर आए थे। इस तरह की घटनाएं जहां जाट समुदाय को कलंकित करती हैं और सरकार की अपराधिक लापरवाही पर भी सवाल खड़ा करती हैं, जो पहले आंदोलन को गंभीरता से नहीं लेती है और बाद में आंदोलन उग्र होने पर बिना कुछ सोचे-समझे समर्पण कर देती है। हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर सरकार इसकी जीती-जागती मिसाल है। लेकिन किस किस को रोयें! इन दिनों देश में प्रभु जातियों के आरक्षण आंदोलनों की बाढ़ आई हुई है।

जाट, कापू, पटेल, गूजर और मराठा जातियां हरियाणा से लेकर आंध्र प्रदेश तक फैली हुई हैं लेकिन उनमें एक बात समान है कि वे अपने-अपने क्षेत्रों की प्रभुत्वसंपन्न, ताकतवर और अमीर जातियां हैं। इसके बावजूद ये पिछले कुछ समय से आरक्षण के लिए कोहराम मचाए हुई हैं। देश की ऐसी जातियों को पांचवे दशक में जाने-माने समाजशास्त्री एमएन श्रीनिवास ने प्रभु जातियां या प्रभुत्वशाली जातियां कहा था। जाट तो उनकी प्रभुत्वशाली जाति की कसौटी पर सौ फीसद खरे उतरते हैं। श्रीनिवास ने यह नाम उनको दिया था, जिनका अपने इलाकों में अच्छी-खासी तादाद के कारण अहम स्थान होता है फिर उनके पास इतनी बड़ी तादाद में जमीन होती है जिसके जरिये वे सत्ता के केंद्र बन जाते हैं। हरियाणा के जाटों की तादाद एक चौथाई से ज्यादा है मगर उनके पास हरियाणा की तीन-चौथाई जमीन है। इस कारण जाट शब्द जमींदार का पयार्य बन गया है। लेकिन हाल में हुए उनके आरक्षण आंदोलनों में इन जातियों में जैसा आक्रोश नजर आया उससे यह स्पष्ट हो गया कि उनके लिए सबकुछ ठीकठाक नहीं है। तबसे लोगों के मन में सवाल है कि वे प्रभु जातियां होने के बावजूद आरक्षण को लेकर इतनी बेकरार क्यों हैं?

जवाब बहुत आसान है कि भारत तेजी से इंडिया बनने की ओर बढऩे लगा है। उसमें प्रभुत्वशाली जातियों का खिताब ज्यादा मायने नहीं रखता। खासकर देश का आर्थिक चेहरा-मोहरा बदल गया है। कभी यह समीकरण काम करता था जितनी ज्यादा जमीन उतनी ज्यादा संपन्नता और उतना ज्यादा दबदबा। लेकिन वे दिन हवा हो चुके हैं। तब भारत कृषि और ग्राम प्रधान देश था। कवि भारतमाता ग्राम्यवासिनी, अपना हिन्दुस्तान कहां वो बसा हमारे गांवों में जैसे गांवों की आरती उतारनेवाले गीत गाते थे। भारत की नई अर्थव्यवस्था ने कुछ ऐसी करवट बदली है कि पलड़ा शहरों और उद्योंगों की तरफ झुकता जा रहा है। दूसरी तरफ कृषि कमाऊ पेशा नहीं रहा, जमीन से दाल-रोटी भले ही किसी तरह चल जाए मगर अब दबदबा ज्यादा नहीं बढ़ता। लेकिन ये किसान जातियां बदलते वक्तके साथ तालमेल बिठाने में नाकाम रही है। भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था के गहराते संकट और शहरों की चकाचौंध की तरफ लोगों में बढ़ते आकर्षण के कारण उन्हें कृषि में कोई उज्ज्वल भविष्य नजर नहीं आता।

आखिरकार ये सारी अमीर और ताकतवर जातियां क्यों ओबीसी कोटे में आरक्षण पाना चाहती है? इसकी एक बड़ी वजह यह है कि आरक्षण अब सामाजिक न्याय का औजार नहीं रहा, वह ताकतवर जातियों को अपने वर्चस्व को मजबूत करने का खेल लगने लगा है। इसमें सरकारी नौकरियां बहुत अहमियत रखती हैं। बढ़ती बेरोजगारी ने उन्हें और भी अमूल्य बना दिया है। इसका अंदाज आप इस बात से लगा सकते हैं कि कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश की 368 चपरासी के पदों के लिए 23 लाख आवेदन आए थे। जब नौकरियों के लिए इस कदर मारामारी मची हो तब अपने समुदाय के लोगों के लिए नौकरियां पक्की करने का लोगों को एक ही रास्ता नजर आता है वह है आरक्षण।

गुजरात के पटेल आंदोलन के पीछे एक ऐसी ही घटना थी। वहां राज्य सरकार ने 1000 पद निकाले थे मगर पटेलों को उसमें काफी पद नहीं मिले। विश्लेषण करने पर उन्होंने पाया कि आरक्षण न होने के कारण पटेल नुक्सान में रहे। दरअसल जिस तरह देश में आबादी बढ़ती जा रही है और हमने जो विकास का मॉडल अपनाया है उसमें नए रोजगार का सृजन कम होता जा रहा है और उसमें सरकारी नौकरियों जैसे सुरक्षित और स्थायी नौकरियां तो और भी कम होती जा रही हैं। उन्हें पाने के लिए विभिन्न समुदायों में होड़ चल रही है। खासकर शादी के बाजार में सरकारी नौकरियों की बड़ी पूछ है। स्थायी और सुरक्षित सरकारी नौकरी वाले दूल्हे को जॉबवाली दामाद कहा जाता है जिसे खेती-बाड़ी करनेवाले व्यक्ति से बेहतर माना जाता है। इन नौकरियों को अपने समुदाय के लिए सुरक्षित रखने के विभिन्न जातियों को एक ही कारगर उपाय नजर आता है वह है आरक्षण। इन प्रभु जातियों को लगता है कि आरक्षण के कारण जैसे ओबीसी जातियों के दिन फिरे उसी तरह आरक्षण मिलने भर से उनके भी दिन फिर सकते हैं। लेकिन सरकारें उन्हें ओबीसी कोटा में आरक्षण देने को तैयार नहीं होतीं क्योंकि उससे नए झंझट और सामाजिक तनाव पैदा हो जाएंगे। दरअसल वर्तमान ओबीसी जातियां राजनैतिक तौर पर कम ताकतवर नहीं हैं। उनको लगता है यदि ओबीसी सूची में ताकतवर जातियां शामिल हो गईं तो आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा वही हजम कर जाएंगी।

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इन जातियों के पास पिछड़ी जाति का आरक्षण पाने के पीछे क्या दलील है? इस मामले में सभी अमीर जातियों का लगभग एक ही तर्क होता है कि उनके समुदाय के सभी लोग संपन्न नहीं हैं, वरन 20-30 प्रतिशत लोग गरीब और पिछड़े है। इसलिए उन्हें भी आरक्षण मिलना चाहिए। इस बात में थोड़ा दम भी है पर यह दलील तो सवर्णों पर भी लागू होती है। बहुत सारे राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि नए हालात में इन ताकतवर जातियों का वर्चस्व कम हो गया है जिसे वे आरक्षण के जरिये पूरा करना चाहती हैं।

लेकिन क्या सचमुच ताकतवर जातियों का वर्चस्व कम हो रहा है जिससे उन्हें अन्य क्षेत्रों में संभावनाएं खोजने को मजबूर होना पड़ रहा है। हाल में हुए कुछ सर्वेक्षणों से इसकी पुष्टि होती है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित गिरि इंन्स्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंटल स्टडीज के अजितकुमार सिंह द्वारा पश्चिम उत्तर प्रदेश के पांच जिलों के 2000 घरों के सर्वेक्षण के मुताबिक जाट और ओबीसी के तहत आनेवाली जातियों में आर्थिक आधार पर बहुत कम फर्क है। औसत जाट घर की आय 31,202 रुपये है जो यादव 37,478 और गूजरों 32,954 से कम है। सरकारी नौकरियों में यादवों की स्थिति बेहतर है। इसके बाद जाट और गूजरों का नंबर आता है। निजी क्षेत्र में यादव और गूजर बेहतर स्थिति में हैं यानी क्रमश: 2.3 प्रतिशत,1.7 प्रतिशत है जबकि जाट मात्र 1.3 प्रतिशत हैं। और जब उनकी जैसी हैसियत वाली अन्य जाति आरक्षण से बेहतर स्थिति में पहुंच जाती है तो उनमें आरक्षण की इच्छा पनपती है।

महाराष्ट्र में भी सर्वेक्षण में यह बात पाई गई कि 20 मराठा खेतिहर मजदूर थे जबकि 15 प्रतिशत के पास तीन एकड़ से कम जमीन थी। इसी तरह पटेलों का कहना है 60 प्रतिशत पटेल गांवों में रहते हैं जिनमें से 30 प्रतिशत छोटे किसान हैं। ये आंकड़े अपनी जगह सही हैं लेकिन आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होता है।

ये आंदोलन बताते हैं कि हमारे देश के राजनैतिक दलों पर एक टिप्पणी है कि वे वोटबैंक के दबाव के सामने तुरंत समर्पण कर देते हैं। दरअसल ताकतवर और संपन्न जातियों को आरक्षण देना आरक्षण के सिद्धांत का मजाक उड़ाना है। लेकिन राजनैतिक दल इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं। कई बार तो ऐसी जातियों को खुश करने के लिए सरकारे आरक्षण दे भी देती है जिससे उलटी धारा बह चलती है।

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महाराष्ट्र में ऐसा ही हुआ। सरकार को पता था मराठा समुदाय को आरक्षण देने पर आरक्षण पचास प्रतिशत से ज्यादा हो जाएगा और कोर्ट उसे खारिज कर देगा तो भी महाराष्ट्र सरकार ने आरक्षण दिया जिसे हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया। पटेलों ने इससे सबक लेकर अपने को ओबीसी सूची में शामिल करने की बात की है। इससे ओबीसी जातियों और पटेलों में तनाव पैदा होगा। आखिर ओबीसी जातियां नहीं चाहेंगी कि उनके आरक्षण में पटेल समुदाय की भी हिस्सेदारी हो जाए। इस तरह पटेल आरक्षण की मांग ने गुजरात भाजपा के लिए नया सिरदर्द पैदा कर दिया है जिससे छुटकारा पाना आसान नहीं है। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि ताकतवर जातियां भी आरक्षण को मुक्ति का रास्ता मानती हैं और उसे पाने के लिए पिछड़ी जातियों का हिस्सा मारना चाहती हैं और इसके लिए सरकारों मजबूर कर रही हैं।

आरक्षण को अमीर होने का आसान जरिया समझने वाले इन समुदायों के इस लालच को नेताओं ने बहुत जल्दी समझ लिया। चंद्रबाबू नायडू ने वादा किया था कि वे सत्ता में आए, तो कापू समुदाय को ओबीसी का दर्जा दिया जाएगा। जगमोहन रेड्डी और कापू नेता पद्मनाभन अब नायडू को याद दिला रहे हैं कि वादा पूरा करने का वक्त आ चुका है। नायडू ने उनसे फिर वायदा किया है। इस वायदे वे कैसे पूरा करेंगे ये तो वही जानें, क्योंकि कापू को अलग आरक्षण देने पर वह आरक्षण की सीमा पार कर जाएगा। ओबीसी भी नहीं चाहेंगे कि उनके कोटे में हिस्सेदारी करने के लिए कापू भी आ जाएं। ऐसा होने पर सामाजिक तनाव ही बढ़ेगा।

सवाल यह है कि इन अमीर जातियों को आरक्षण का ही चांद चाहिए कुछ और क्यों नहीं। असल में यह उस आर्र्थिक व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा है जिसने उन्हें सपने दिखाए लेकिन उन्हें पूरा नहीं किया। इसलिए अब उन्हें लगता है कि आरक्षण सब मर्जों की एक दवा है। लेकिन उन्हें जल्दी ही पता चलनेवाला है कि अब इस दवा ने काम करना बंद कर दिया है क्योंकि सरकारी क्षेत्र दिन ब दिन छोटा होता जा रहा है और सरकारी नौकरियां भी कम होती जा रही हैं। अब तो एक अनार हजार बीमार वाला हाल है। शायद आरक्षण का फल पाने में उन्होंने देर कर दी। यदि आरक्षण उन्हें मिल जाए वे इस बात पर खुश हो सकते हैं कि आरक्षण का चांद उनके पास भी है।

सतीश पेडणेकर

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