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देशद्रोह के साथ समझौता?

देशद्रोह के साथ समझौता?

बेटा: पिताजी।

पिता: हां, बेटा।

बेटा: आपको पता है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कुछ छात्र देशद्रोह के मामले में पकड़े गये हैं।

पिता: हां, मुझे पता है। जैसा कि टीवी चैनलों में दिखाया जा रहा है, उसके अनुसार तो विद्यार्थियों ने बहुत गलत काम किया है।

बेटा: पिताजी, पर हुआ क्या?

पिता: बेटा, कहते हैं कि विद्यार्थियों ने 9 फरवरी को अफजल गुरु की फांसी की बरसी मनाने का कार्यक्रम बनाया था।

बेटा: वही अफजल गुरु जिसे भारत जनतंत्र के पूजास्थल संसद भवन पर आक्रमण के लिये दोषी ठहराया गया था और जिसे देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी की सजा सुनाई थी?

पिता: हां बेटा, वही अफजल गुरु।

बेटा: तो विश्वविद्यालय के जो छात्र यह समारोह कर रहे थे अफजल उनका क्या लगता था?

पिता: मेरी सूचना के मुताबिक तो कुछ नहीं।

बेटा: क्या वह इस विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था?

पिता: नहीं।

बेटा: तो क्या वह वहां शिक्षक था?

पिता: नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं था।

बेटा: तो फिर यह आयोजन किस उपलक्ष्य में कर रहे थे?

पिता: यह तो बेटा वही जानें।

बेटा: पिताजी, यह तो सचमुच ही गलत बात हुई। जवाहरलाल विश्वविद्यालय में विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते हैं या कुछ और करने? अफजल की बरसी मनाना तो मेरे ख्याल में विश्वविद्यालय के पाठ्य कार्यक्रम का हिस्सा भी नहीं है।

पिता: यह कैसे हो सकता है?

बेटा: तो फिर वह मना क्यों रहे थे?

पिता: बेटा, अब तो सुनने में आया है कि उन्होंने विश्वविद्यालय प्रबंधन से एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के बहाने अनुमति मांगी थी। जब प्रशासन को सच्चाई का पता चला तो उन्होंने अनुमति रद्द कर दी। पर फिर भी उन्होंने यह कार्यक्रम किया।

बेटा: पिताजी, वहां तो उन्होंने अफजल गुरु को शहीद बता दिया और कहा कि उसकी फांसी एक न्यायिक कत्ल थी।

पिता: बेटा, उन्होंने जो नारे लगाये उन्हें सुनकर तो मेरा सिर ही झुक गया। मैं उन्हें दोहराना भी राष्ट्रद्रोह समझता हूं। यदि देश ही नहीं बचा, हमारा जनतंत्र ही बर्बाद हो गया तो क्या हम और यह विश्वविद्यालय ठीक से रह सकेंगे?

बेटा: यह कैसे संभव हो सकता है? पर पिताजी, क्या हमारे विद्यार्थी हमारे न्यायालय से ऊपर हैं, ज्यादा समझदार?

पिता: बेटा, हमारे देश की समस्या यही है कि यहां हर कोई अपने आपको सबसे अधिक जानकार व समझदार मानता है। व्यक्ति जो चाहता है न्यायालय का निर्णय वही आ जाता है तो वह कहता है कि न्याय हुआ वरना अन्याय। हमारे यहां तो कोई अपनी गलती या अपराध मानने को तैयार ही नहीं होता। सब समझते हैं कि अपराध करना भी उनका अधिकार है और अपने आपको निर्दोष साबित करना भी। जब अपराधी बरी नहीं हो पाता है तो वह छाती पीट-पीट कर कहता है कि देश में न्याय नाम की कोई चीज है ही नहीं।

बेटा: पर अब तो हमारे पूर्व गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कह दिया है कि अफजल गुरु के मामले में पूरा न्याय नहीं हुआ।

पिता: बेटा, गद्दी छिन जाने के बाद तो अब चिदंबरम जी के भी ज्ञान चक्षु खुल गये लगते हैं। पर उनकी आंखों पर तब कौन-सा परदा पड़ा था, जब उनकी सरकार ने अफजल की क्षमा याचना भी राष्ट्रपति महोदय द्वारा नामंजूर करवा दी थी और उसे फांसी पर लटका दिया था?

बेटा: पर पिताजी तब वह गृह मंत्री नहीं थे।

पिता: जब वह गृह मंत्री थे तब भी तो यह मामला कभी न कभी उनके विचाराधीन अवश्य आया होगा। तब उन्होंने कुछ क्यों नहीं किया?

बेटा: पिताजी, कहते तो यह भी हैं कि संविधान के अनुसार सारी मंत्रिपरिषद साझा तौर पर सरकार के हर अच्छे और बुरे कार्य के लिये उत्तरदायी होती है।

पिता: तू ठीक कह रहा है। यदि उनका विचार कुछ अलग था तो उन्हें मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र दे देना चाहिये था। तब वह कुर्सी से क्यों चिपके बैठे रहे?

बेटा: नैतिकता का तकाजा तो यही था, पिताजी।

पिता: पहले सत्ता का सुख भोगते रहे। भेड़ की तरह पीछे चलते रहे। अब वह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वह भेड़ नहीं, शेर थे।

बेटा: अब तो उनकी ही खिल्ली उड़ रही है। कांग्रेस ने भी उनके विचार से किनारा कर लिया है।

पिता: इस विषय पर तो कांग्रेस की दोगली राजनीति दिख रही है।

बेटा: कैसे?

पिता: वह तो राष्ट्रविरोधियों के साथ भी उतनी ही दृढ़ता से खड़ी दिखने का प्रयास कर रही है जितनी कि राष्ट्रभक्तों के साथ।

बेटा: यह कैसे संभव है?

पिता: तुझे पता नहीं कि जब पुलिस ने विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया को पकड़ा तो कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल जी विश्वविद्यालय परिसर में जाकर छात्रों के सामने गरजे कि छात्रों की आवाज दबाने वाले तो सब से बड़े राष्ट्रद्रोही हैं।

बेटा: छात्रों की आवाज से उनका मतलब?

पिता: यही जो छात्रों ने आयोजन किया व राष्ट्रद्रोही नारे लगाये।

बेटा: पर पिताजी कांग्रेस यह भी तो कह रही है कि हम देशद्रोही गतिविधियों के बिल्कुल खिलाफ हैं और मांग करते हैं कि दोषियों को जल्द से जल्द सख्त सजा दी जाये।

पिता: पर साथ ही पकड़े गये छात्रों के साथ सहानुभूति भी छुपा नहीं रहे हैं।

बेटा: मतलब कि प्रयास दोनों पक्षों को खुश रखने का है?

बेटा: पिताजी, अब विचार यह भी आगे आ रहा है कि भारतीय दंड संहिता में देशद्रोह का प्रावधान तत्कालीन विदेशी ब्रिटिश सरकार ने 19वीं सदी में किया था। अब भारत स्वतंत्र है और इस कानून को 21वीं सदी के अनुरूप ढाला जाये और इसे हटा ही दिया जाये।

पिता: मतलब देशद्रोह विदेशी सरकार के विरुद्ध ही होता है और यही कुछ अपनी सरकार के विरुद्ध देशभक्ती बन जाता है?

बेटा: पिताजी, हमारे यहां तो अनेक उदाहरण हैं, जहां हमारी सरकारों ने आतंकियों व सीमापार से आये घुसपैठियों को देश के हितों के विरुद्ध कार्रवाई में सम्मिलित होने या उनकी सहायता करने व शरण देने के लिये उन पर देशद्रोह के मुकदमे चलाये हैं। इन हालात में तो उनकी गतिविधियां भी देशद्रोह की न रह कर देशप्रेम बन जाएंगी। जो लोग कश्मीर को भारत से अलग करने की मुहिम चला रहे हैं या अन्य प्रदेशों में विघटनकारी गतिविधियों में संलिप्त हैं वह भी देशप्रेमी बन जायेंगे। ऐसी सूरत में जिन लोगों के विरुद्ध सरकार ने दंडात्मक कार्रवाई की है उनसे तो माफी मांगनी पड़ेगी।

पिता: हां, बेटा तब तो अफजल गुरु भी आतंकी न होकर देशभक्त बन जायेगा।

बेटा: पर पिताजी, रोहित वेमुला के मामले में तो अन्याय अवश्य हुआ है न?

पिता: बेटा, मौत किसी की हो किसी हालत में हो, दुखद ही होती है। वह तो एक होनहार लड़का था, अपने मां-बाप की आंख का तारा।

बेटा: विश्वविद्यालय ने उसकी ग्रांट रोक कर उसके साथ अन्याय तो किया ही न?

पिता: बेटा, मैं तो समझता हूं कि जब एक विद्यार्थी अपनी पढ़ाई कर रहा है तो उसे दूसरे पचड़ों में नहीं पडऩा चाहिये। एक समय व्यक्ति को या तो पढ़ाई करनी चाहिये या राजनीति।

बेटा: वह तो पढ़ाई ही कर रहा था पिताजी।

पिता: नहीं बेटा। तुझे शायद पता नहीं कि वह भी वही कर रहा था जो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने किया।

बेटा: वह भी अफजल के हक में नारे लगा रहा था।

पिता: नहीं बेटा। वह आतंकी याकूब मेमन को फांसी न दिये जाने के लिये आंदोलन कर रहा था।

बेटा: याकूब कौन था?

पिता: बेटा, याकूब 1993 के मुंबई बमकांड की घटनाओं के लिये दोषी पाया गया था। उस कांड में अनेक मासूम जानें गई थीं और अनेक जख्मी हुये थे। उच्चतम न्यायालय ने उसकी फांसी की सजा बहाल रखी थी और राष्ट्रपति महोदय ने उसकी दया व क्षमा याचिका भी नामंजूर कर दी थी।

बेटा: फिर इस मामले से विद्यार्थियों को क्या लेना-देना था? अब तो यह बात उठती ही नहीं कि किस कारण उसके छात्र संगठन के विरुद्ध कार्रवाई हुई।

पिता: बेटा, हमारे यहां तो चलन है कि लोग इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि घटना के पीछे कारण क्या थे। यदि कोई मुझे गाली देता है और मैं उसे दो चांटे लगा देता हूं, तो सब इस बात पर ही जोर देते रहते हैं कि मैंने उसे चांटे लगाये।

बेटा: रोहित ने तो आत्महत्या की थी न?

पिता: हां, पर इस तथ्य को गौण कर दिया गया है, भुला दिया गया है कि उसने अपने नोट में अपनी आत्महत्या के लिये किसी को भी दोषी नहीं ठहराया था।

पिता: बेटा, उसने तो अपने नोट में अपनी उस संस्था की भी आलोचना की है, जिसका वह स्वयं सदस्य था। यह अलग बात है कि उसने कुछ पंक्तियां स्वयं ही काट दीं थी, पर फिर भी वह अच्छी तरह पढ़ी जा सकी थीं।

बेटा: पर पिताजी, आप इतना तो मानते हैं न कि भारत के गणतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की गई है।

पिता: तो, तेरा मतलब है कि इस स्वतंत्रता की आड़ में तू मेरी मां को भी गाली दे सकता है। हमारे परिवार की बर्बादी की कामना कर सकता है। तू ऐसा करके दिखा। मैं तुझे जूते मारूंगा। तेरा मुंह तोड़कर रख दूंगा।

बेटा: पिताजी, आप यूं ही मुझ पर नाराज हो जाते हैं। दादीजी तो मेरी पूज्य हैं। मैं उनको गाली देने की बात तो स्वप्न में भी नहीं सोच सकता। आप यह क्या कह रहे हैं?

पिता: तू भी तो उसी स्वतंत्रता की बात कर रहा है जिसकी आड़ में वह और कुछ राजनीति के लोग जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों की देशद्रोही गतिविधियों पर पर्दा डालने का प्रयास कर रहे हैं।

बेटा: मैं कहां ऐसा कर रहा हूं, पिताजी।

पिता: बेटा, तू समझने की कोशिश कर। भारत हमारी माता है—मेरी, तेरी और हम सब भारतवासियों की। इसे जो गालियां देगा, इसकी बर्बादी की जो कामना करेगा। इसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जाने के जो नारे लगायेगा, वह हम देशवासियों का मित्र नहीं हो सकता। वह देशद्रोही है। हम ऐसे किसी भी व्यक्ति को माफ नहीं कर सकते।

बेटा: पिताजी, आप ठीक ही कह रहे हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब देशद्रोह की उच्छृंखलता नहीं हो सकता।

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