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संतुलन साधने में गड़बड़ाए

संतुलन साधने में गड़बड़ाए

कहावत पुरानी है कि बजट सरकार का राजनैतिक दस्तावेज होता है। इसलिए मौजूदा राजनैतिक झंझावातों से वह अलग हो, इसकी कल्पना तो वही कर सकता है, जिसके पांव जमीन पर न हों। फिर भी जमीन का एहसास कुछ मजबूरियों के चलते हो तो उलझन बेपनाह बढ़ जाती है। सो, मोदी सरकार के तीसरे बजट में यह उलझन कई स्तरों पर दिखाई देती है। बेमेल संतुलन साधने की कोशिशों और उलझनों की गांठें सिर्फ कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) पर कर लगाने के मामले में ही नहीं खुलीं, बल्कि बजट में कई आंकड़ों को लेकर भी गफलतों की बातें बताने वाले जानकारों की कमी नहीं है। कुछ आंकड़े तो अवास्तविक उम्मीदों पर आधारित बताए जा रहे हैं। बावजूद इसके कमोवेश वित्तीय संतुलन बरकरार रखने की कोशिश की गई है।

इसी वजह से पहले दिन शेयर बाजार के होश फाख्ता हो गए लेकिन, दूसरे दिन जब यह अंदाजा हुआ कि यह कलाबाजी भारतीय रिजर्व बैंक की दरों में कटौती के लिए की गई है तो बाजार की बाछें खिल गईं। लेकिन सरकार अपने मुरीद मध्यवर्ग और छोटे-बड़े व्यापारियों को थोड़ी भी राहत देने या आश्वस्त करने में गड़बड़ा गई। अब उसकी नाराजगी उसे बाहर से ही नहीं, बल्कि अपनी पार्टी और सहयोगियों से भी झेलनी पड़ रही है।

बजट से ठीक कुछ पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जगह-जगह किसान रैलियां करके यह संदेश तो लगभग दे दिया था कि इस बार बजट ग्रामीण अर्थव्यवस्था की खस्ताहाली को कुछ दुरुस्त करने की ओर रहेगा। बजट की पूर्व संध्या पर तो उन्होंने ऐलान ही किया, ”कल हमारा इम्तिहान है, जिसे सवा सौ करोड़ देशवासी लेंगे। यह कहकर शायद यह संकेत दे दिया था कि इस बजट में वित्त मंत्री अरुण जेटली से अधिक उनकी छाप दिखेगी। यानी इस बार के बजट में किसानों और गरीबों की बात ज्यादा होगी, गांवों के लिए सपने भी होंगे।

गरीबों और निम्न वर्गीयों को सहूलियत की बात होगी और मध्यवर्गीयों तथा कॉरपोरेट जगत को फिलहाल थोड़ा इंतजार ही नहीं करना होगा, बल्कि कुछ अधिक देना होगा। बजट में एक हद तक यह दिखता है।

हालांकि, इसमें कई किंतु-परंतु हैं। लेकिन, पहले यह बताना जरूरी है कि वित्त मंत्री जेटली के पिछले बजटों का इसमें खास अक्स नहीं दिख रहा है। स्मार्ट सिटी, इंडस्ट्रीयल कॉरीडोर, बंदरगाहों के निर्माण, नमामि गंगे, डिजिटल इंडिया, निर्भया फंड, महंगाई फंड जैसी बातों को लगभग भुला दिया गया है। जिसे नई सरकार के महत्वाकांक्षी नए विचार और महाभियानों की तरह पेश किया गया था। सरकार ‘कारोबारी सहूलियत का माहौलÓ बनाने के अपने वादे को भी लगभग भूल-सी गई है। इसी तरह पूंजीगत लाभांश पर छूट और करों के ढांचे में आमूलचूल परिवर्तन की ओर कदम उठाने की बातें भी भुला दी गई हैं। इसके बदले अमीरों और मध्यवर्ग पर कई तरह के शुल्क जड़ दिए गए हैं। एक मायने में किसान शुल्क भी उन पर थोपा गया है। यह अलग बात है कि ये शुल्क अंतत: आम आदमी की जेब ही खंगालते हैं। ‘स्र्टाट अप इंडिया’ के नारे पर भी खास तवज्जो नहीं दिखती है।

मध्यवर्ग को खुश करने और उसे अपना वोट बैंक बनाने की कोशिशें भी कम से कम इस बजट में छोड़ दी गई हैं। याद कीजिए, मोदी जी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नव-मध्यवर्ग के निर्माण की बात किया करते हैं और जेटली जी भी विपक्ष में रहते आयकर छूट की सीमा 5 लाख रु. तक करने की बातें किया करते थे। इस बार सभी उम्मीद कर रहे थे कि आयकर छूट की सीमा कम से कम 3 लाख रु. तक तो की ही जाएगी, लेकिन शायद जमीनी वास्तविकताओं ने सरकार को ऐसा करने से रोक दिया। आयकर की छूट सीमा ज्यों की त्यों रहने दी गई। मकान किराया भत्ता में कटौती की सीमा बढ़ाकर 60,000 रु. और पहली बार मकान खरीदने पर 50,000 रु. की छूट का असर भी खास नहीं होने वाला है। इसके बदले सेवा कर की दरों में आधा प्रतिशत के कृषि अधिभार जोड़कर उसे 14.5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत करने से खाना-पीना, यात्रा करना, बिजली-मोबाइल का बिल और तमाम चीजें महंगी हो जाएंगी। इसका दंश भी सबसे अधिक शहरी मध्यवर्ग और आम आदमी को झेलना पड़ेगा।


19-03-2016जैम्स और ज्वैलरी सेक्टर को इस बजट से काफी निराशा हुई है, क्योंकि इस क्षेत्र के समर्थन के लिए किसी भी तरह की कोई घोषणा नहीं कि गई है। जैम्स और ज्वैलरी सेक्टर के बहुत सारे प्रतिवेदनों के बावजूद माननीय वित्त मंत्री ने इस क्षेत्र की किसी भी मांग को ध्यान में नहीं रखा। जैसा कि जैम्स और ज्वैलरी सेक्टर विश्व अर्थव्यवस्था में मंदी के कारण पहले से ही कई चुनौतियों से जूझ रहा है उस पर भी वित्त की अनुउपलब्धता, सोने और अन्य मुद्दों पर भारी आयात की समस्या। बजट में इनमें से किसी भी समस्या पर चिंतन नहीं किया गया। पिछले कई दशकों में पहली बार आभूषण उत्पादों पर उत्पादन शुल्क लगाने पर हम आशंकित हैं।

दिनेश नावडिया,प्रेसिडेंट, सूरत डायमंड एसोसिएशन



19-03-2016कुल मिलाकर बजट अच्छा रहा लेकिन, वस्त्र उद्योगों के लिए जो प्रोत्साहन आवश्यक था और जिसकी उम्मीद भी की जा रही थी उसे बजट में नजरअंदाज कर दिया गया है। रेडीमेड कपड़े जो चीन, बंग्लादेश और कई अन्य एशियाई देशों से आयात किये जाते थे उन पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी लगाना वस्त्र उद्योग को बचाने के लिए बेहतर हो सकता था, पर इसे नहीं किया गया। आयकर स्लैब और दरों को अपरिवर्तित रखा गया। कुछ छूट की उम्मीद थी लेकिन, ऐसा कार्यान्वित नहीं किया गया।

जितेन्द्र वखारिया, अध्यक्ष, साउथ गुजरात टेक्सटाइल प्रोसेसर्स एसोसिएशन



 19-03-2016केन्द्रीय बजट 2016-17 से टेक्सटाइल उद्योग को काफी आशाएं थीं। परन्तु, कपड़ा उद्योग के लिए ऐसा कुछ भी नहीं किया गया। सूरत के मैनमेड फाइबर का विश्व में एक्सपोर्ट बढ़े तथा चीन में भी हमारा कपड़ा बिके उसके लिए हमें पॉलीस्टर यार्न में 12.5 प्रतिशत एक्साईज डयूटी में बदलाव की उम्मीद थी, साथ ही एक्सपोर्ट को बढ़ावा देने तथा कपड़ा बाजार में रोजगार के अवसर बढ़ें ऐसा प्रयास होना चाहिए था। साथ ही टेक्सटाईल उद्योग को कम ब्याज में लोन मुहैया कराने की नीति लानी चाहिए थी।

मनोज अग्रवाल, फेडरेशन ऑफ सूरत टेक्सटाइल ट्रेडर्स एसोसिएशन (फोस्टा)


 

अलबत्ता किसानों की आमदनी 2022 तक दोगुनी करने के सपने जरूर दिखाए गए हैं, लेकिन उसके उपाय विस्तार से नहीं दिखते। जिस मनरेगा को सरकार कोसती रही है और मोदी जी ”कांग्रेस की साठ साल की विफलता का दस्तावेज’’ बताते रहे हैं, उसमें पिछले दो बजटों के मुकाबले अधिक जोर दिया गया है। हालांकि इस मद में भी महज 4,000 करोड़ रु. का ही इजाफा किया गया है। वैसे भी जिस 38,500 करोड़ रु. के आवंटन को अभूतपूर्व बताया जा रहा है, उससे अधिक करीब 41,000 करोड़ रु. से अधिक का आवंटन यूपीए के राज में 2011-12 में ही हो चुका है। फसल बीमा और किसानों को कर्ज देने की बातें भी की गई हैं, लेकिन बैंकों की खस्ताहाली के मद्देनजर इसका कितना लाभ मिलेगा, कहना मुश्किल है। हालांकि प्रधानमंत्री सिंचाई योजना और प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के मद में बढ़ोतरी दिखती है। इसी तरह गांवों में बीपीएल परिवारों के लिए एलपीजी कनेक्शन के मद में 2,000 करोड़ रु. का आवंटन है। ग्रामीण और लघु उद्योगों के लिए भी रियायतों का ऐलान किया गया है। लेकिन, इन सभी से ग्रामीण आमदनी में कितना इजाफा होगा और इसका कितना हिस्सा सेवाकर वगैरह में बढ़ोतरी से महंगाई मार ले जाएगी, कहना मुश्किल है।

कुल मिलाकर किसानों के कल्याण के मद में करीब 35,984 करोड़ रु. का आवंटन है। हालांकि, करीब 36,000 करोड़ रु. का आवंटन यूपीए सरकार 2008 में ही कर चुकी थी। किसानों को इस बार कर्ज माफी के ऐलान की भी उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सभी गांवों को 2018 तक बिजली से रोशन करने का भी वादा किया गया है और राजमार्गों तथा रेल परिवहन में भी निवेश बढ़ाया गया है। लेकिन, इन परियोजनाओं में अगर सरकारी बैंकों से धन जुटाने की सोच है तो वह भी संदिग्ध लगती है। सरकारी बैंक करीब 5 लाख रु. डूबते खाते की राशि से जूझ रहे हैं और उन्हें मात्र 25,000 करोड़ रु. की राशि से पुनर्जीवन की उम्मीद दी गई है। इसी तरह कोयले जैसे ईंधन के बुनियादी स्रोतों पर शुल्क बढ़ाने से भी महंगाई में इजाफा हो सकता है।

बहरहाल, सरकार की कोशिश अपने ऊपर लग रहे अमीरों की पक्षधर और ‘सूट-बूट’ की सरकार होने के आरोपों से निजात पाने की दिखती है, लेकिन इस चक्कर में उसके गणित बुरी तरह गड़बड़ा भी रहे हैं। जैसे रेल बजट मिशन बजट ही ज्यादा था, उसी तरह केंद्रीय बजट का जोर भी सपने दिखाने और सियासी लाभ लेने पर ज्यादा है।

इस सियासी लाभ का गणित भी कोई अजूबा नहीं है। हाल में चारों ओर से यह खबरें आ रही थीं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक मंदी है। लगातार तीसरे साल मौसम की मार और कृषि सामान से सब्सिडी लगातार घटने से बेहाल किसान की क्रय शक्ति घटने से औद्योगिक उत्पादों की बिक्री भी बेहद घट गई थी। खासकर ट्रैक्टर, ट्राली, दोपहिया वाहनों की खरीद लगभग बैठ गई थी। सीमेंट, सरिया और मकान निर्माण उत्पादों का भी बाजार बेहद मंदा हो गया था। जरूरी जिंसों और रोजमर्रा की जरूरतों के सामान की बिक्री बैठने लगी थी। फिर, भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर विवाद से सरकार की छवि किसान विरोधी होने लगी थी। इसका खामियाजा उसे दिल्ली और बिहार के चुनावों में उठाना पड़ा था। यह खतरे के संकेत की तरह था।

19-03-2016

हालांकि, अभी भी यह देखना बाकी है कि सरकार की इस कोशिश से उसके दो बजटों और दूसरी नीतिगत पहलों से हुए नुकसान की भरपाई कितनी हो पाती है। पहले दो बजटों में बिलाशक मध्यवर्ग और नए विकास के आकांक्षी वर्ग की ओर झुकाव था। यह भी देखना होगा कि सरकार शहरी मध्यवर्ग की नाराजगी से बचने के लिए और क्या करती है। उसका पहला दंश तो बजट के अगले ही दिन ईपीएफ पर बवाल के रूप में दिख चुका है। इस मामले में सरकार सफाई देने के चक्कर में और उलझ गई।

यह बताने की कोशिश की गई कि यह रकम निकासी के ब्याज पर लगाई गई है, ताकि ऊंचा वेतन पाने वालों को बचत न करने से रोका जा सके। लेकिन असल में वही वर्ग तो खासकर मोदी के समर्थन की उग्र भूमि तैयार करता है, इसलिए शायद सरकार के पास इसे पूरी तरह वापस लेने के अलावा कोई उपाय नहीं है।

इसी तरह उत्पादन और निर्यात बढ़ाने पर खास तवज्जो न देने से भी नाराजगी मध्यवर्ग और छोटे व्यापारियों में सबसे ज्यादा होगी। इससे रोजगार सृजन में भी बढ़ोतरी की गुंजाइश कम है। सड़क और रेलवे में निवेश की गुंजाइश बनाई गई है, लेकिन सार्वजनिक बैंकों की हालत खस्ता होने से उसमें भी शंकाएं हैं। इसी वजह से बैंकों में निजी निवेश को बढ़ावा देने के लिए सरकार हिस्सेदारी घटाकर 51 प्रतिशत कर देने का प्रस्ताव है। कुल मिलाकर सरकार को उम्मीद है कि इससे रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ब्याज दरों में कटौती की इजाजत देंगे। इससे बैंकों में नकदी का अनुपात बढ़ेगा।

कम ब्याज दरों से उद्योगों पर बोझ घटेगा और उत्पादन बढ़ेगा, लेकिन यह सब अवास्तविक उम्मीदों पर आधारित है। वजह यह कि निर्यात तो वैश्विक बाजार की स्थितियों पर निर्भर है। फिर भी उम्मीद यह है कि राजन रुपए को भी और गिरने की छूट दे सकते हैं। इससे हमारा निर्यात सस्ता होगा और आयात महंगा हो जाएगा। इसका असर भी उद्योगों को आगे बढऩे का शह देगा। इसी तरह सड़क और बुनियादी संरचना में भी एफडीआई बढऩे की उम्मीद की जा रही है। बहरहाल, संभव है, सरकार को अभी और कुछ उलझनों को दूर करने पर मजबूर होना पड़े और बजट प्रस्तावों में कुछ और सुधार करना पड़े। आखिर सही संतुलन साधने की कोशिश तो दिखानी ही होगी, तभी सियासी लाभ भी मिल सकेगा। हालांकि सरकार के पास अभी दो बजट और पेश करने का मौका है, वह आगे भी अपनी सियासी लकीरें दुरुस्त कर सकती है।

हरिमोहन मिश्र

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