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किसानों की आमदनी दुगनी करने की कवायद

किसानों की आमदनी दुगनी करने की कवायद

वर्ष 2016-17 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा है कि अगले 5 वर्षों में किसानों की आमदनी दुगनी कर दी जायेगी। पिछले 25 वर्षों की भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण को बढ़ावा देने वाली नई आर्थिक नीति के चलते खेती और किसानी शायद नीति-निर्माताओं की प्राथमिकताओं से गायब हो चुके हैं। एक वक्त था जब खेती-किसानी के लिए बजट का एक चौथाई हिस्सा ही ज्यादा खर्च किया जाता था। यदि मनरेगा समेत ग्रामीण विकास के लिए किए जाने वाले खर्च को शामिल न करें तो वर्ष 2014-15 तक आते-आते वह घटकर सवा फीसदी तक पहुंच गया। ऐसे में खेती का पिछडऩा स्वभाविक ही था। सरकार गेहूं, चावल और कुछ अन्य जिंसों को किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद कर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती थी। यह सही है कि पिछले साल भी खाद के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी खेती पर किए जाने वाले खर्च से लगभग तीन गुणी रही। लेकिन, सरकार का अपना ही आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 यह बताता रहा था कि खाद के लिए दी जाने वाली सब्सिडी का लगभग एक तिहाई हिस्सा ही किसानों तक पहुंचता है और दो तिहाई कहीं बीच में ही गायब हो जाता है। खाद के नाम पर दी जाने वाली सब्सिडी (जो पिछले साल 72,400 करोड़ से भी ज्यादा थी)किसानों को नहीं, खाद कंपनियों को पहुंचती रही है, जिसका फायदा किसानों तक बहुत ही कम मात्रा में पहुंचता है।

रोजगारविहीन ग्रामीणों के लिए मनरेगा ही सहारा

खेती-किसानी की अनदेखी के चलते ग्रामीण क्षेत्र का विकास भी रूका और रसायनिक खादों, बीजों और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों और अन्य लागतों के कारण, एक ओर कृषि लागत बढ़ी और दूसरी ओर कृषि उपज का सही मूल्य न मिलने के कारण खेती घाटे का सौदा बन गया। कृषि क्षेत्र में गैर कृषि क्षेत्र की तुलना में आमदनियां घटी, जो इस बात से स्पष्ट है कि कुल जीडीपी में कृषि का योगदान अब घटकर मात्र 15 प्रतिशत से भी कम रह गया। किसानों की संतानें अब खेती करना नहीं चाहतीं। बड़ी संख्या में किसान कर्ज में डूब आत्महत्याएं कर रहे हैं। खेती में रोजगार के अवसर बढऩे के बजाय घट ही रहे हैं। ऐसे में सरकार के पास रोजगार गारंटी देकर उन्हें सालभर में 100 दिनों का रोजगार उपलब्ध कराने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं। रोजगार गारंटी की मनरेगा योजना भी ऐसी, जिससे कोई नई रचनाएं नहीं खड़ी होती, विकास योजनाओं से उसका कोई संबंध भी नहीं। हां, यह जरूर हुआ कि ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगार लोगों के लिए कुछ आमदनी का साहारा बना। लेकिन, गांवों में लाभकारी रोजगार बढ़ाने में हम असफल रहे।

कृषि और ग्रामीण विकास के लिए बजट में प्रावधान

कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों की अनदेखी की नीति को विराम लगाते हुए, एक लम्बे समय के बाद कोई सरकार बजट में प्रावधान लेकर आई है। 2016-17 में कृषि और किसान कल्याण के लिए 35,984 करोड़ रूपए का प्रावधान बजट में है, जो पिछले साल से कहीं ज्यादा है। इसके अलावा 2.23 लाख किलोमीटर ग्रामीण सड़कों के लिए 19 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान केन्द्र से किया जाएगा। सिंचाई के लिए ‘नबार्डÓ के अंतर्गत सिंचाई फंड जिसकी 20 हजार करोड़ की निधी में से 12,517 करोड़ रुपए बजट में से दिए गए हैं। इसके अलावा 6,000 करोड़ रुपए की लागत वाली भू-जल संरक्षण हेतु सिंचाई परियोजनाएं, 5 लाख तालाब और कुएं और जैविक खाद के लिए 10 लाख गड्डे बनाना और इसे मनरेगा से जोडऩा, ग्रामीण विकास के लिए एक बड़ी पहल मानी जा सकती है।

इसके अलावा फसल बीमा योजना की एक बड़ी पहल जिसकी घोषणा बजट से पहले ही हो गई है, उसके लिए 5,500 करोड़ रुपए का प्रावधान, 9 लाख करोड़ रुपए के कृषि ऋणों की योजना जैसे कुछ अन्य महत्वपूर्ण कदम बजट में उठाए गए हैं। इसके अलावा 14वें वित्त आयोग के अंतर्गत, पंचायतों और नगरपालिका के लिए 2.87 लाख करोड़ रूपए का प्रावधान है, जिसका मतलब है 80 लाख रूपए प्रति ग्राम पंचायत और 21 करोड़ रुपए प्रति ग्रामपालिका। अगले हजार दिनों में सभी गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य भी सरकार ने निर्धारित किया है।

गांवों में रोजगार सृजन की जरूरत

बजट में किए गए प्रावधान ग्रामीण क्षेत्रों में सिंचाई, सड़क और अन्य सुविधाओं के लिए एक बेहतर कदम है। गांवों में शहर जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराने की योजना, जिसे रू-अरबन स्कीम कहते हैं, एक अच्छी पहल है। लेकिन गांवों में रहने वाले लोगों के जीवन स्तर को सुधारने के लिए इन सब बातों के अलावा रोजगार के अतिरिक्त अवसर भी उपलब्ध कराने की खास जरूरत है। खेती-किसानी केवल खाद्यान्न दालें, तिलहन और नकद फसलें उगाने का ही नाम नहीं है। भारत में पशुपालन, मुर्गीपालन, मत्स्य पालन, आटा-चक्की, कोल्हू इत्यादि ग्रामीण क्षेत्रों में भारी मात्रा में रोजगार प्रदान करने वाले उद्योग रहे हैं। यह सही है कि गुजरात और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में डेयरी उद्योग खासा पनपा है। देश में कुल दुध और उसके उत्पादों का बाजार 4 लाख करोड़ रूपए से भी अधिक है। लेकिन, इसका भी विस्तार पूरे देशभर में एक जैसा नहीं है।

पशुपालन से भारी मात्रा में लाभकारी रोजगार का सृजन हो सकता है। कृषि उपज एवं सह-उत्पादों/कृषि पर आधारित कई रोजगार जैसे, मुर्गीपालन, खुम्भ उत्पादन, मधुमक्खी पालन, जैविक खाद उत्पादन, मत्स्यन जैसे लाभकारी रोजगारों की असीम संभावनाएं हैं। भंडारण, कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग की सुविधा न होने के कारण आज देश में भारी मात्रा में कृषि वस्तुएं नष्ट हो जाती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भंडारण, कोल्ड स्टोरेज और फूड प्रोसेसिंग की भारी जरूरत है, जिसे बढ़ावा देकर रोजगार भी बढ़ाया जा सकता है और आमदनी भी।

लेकिन, दुर्भाग्य का विषय है कि इन सभी अवसरों को पिछले 25 सालों की नई आर्थिक नीति के चलते हमने गंवाया है। आज जब सरकार ग्रामीण विकास की सुध ले रही है, जरूरत इस बात की भी है कि इन अवसरों का सही उपयोग हो।

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में पिछली एनडीए सरकार में एक लक्ष्य सोचा गया था कि एक करोड़ लोगों को हर साल अतिरिक्त रोजगार उपलब्ध कराया जाए। इसके लिए उस समय के योजना आयोग के सदस्य एसपी गुप्ता की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी थी, जिसने ग्रामीण क्षेत्रों में इस प्रकार के रोजगार सृजन हेतु इंगित किया था। आवश्यकता इस बात की है कि पुराने योजना आयोग की अलमारियों में से उस रिपोर्ट को निकाला जाए और ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन का एक रोड मैप तैयार हो। ऐसा करने पर वास्तव में किसानों की आमदनी अगले पांच सालों में दुगुनी तो क्या उससे भी ज्यादा बढ़ सकती है और ग्रामीण क्षेत्रों की तस्वीर बदल सकती है।

‘मेक इन इंडियाÓ स्कीम के तहत यह कहा जा रहा है कि मेन्यूफेक्चरिंग का जीडीपी में योगदान वर्तमान में 15 प्रतिशत से बढ़ाकर अगले कुछ सालों में 25 प्रतिशत तक किया जा सकता है, तो ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि कृषि और सहायक उद्योगों का जीडीपी में योगदान वर्तमान में 17 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 से 30 प्रतिशत तक नहीं किया जा सकता। सरकार डेयरी को भी कृषि का दर्जा दे, खुम्भ उत्पादन, मधुमक्खी पालन और तमाम कृषि आधारित कार्यकलापों को बढ़ाने के लिए कौशल विकास की योजना बने और खेती-किसानी दुबारा से लाभ का सौदा बने, तभी हमारे गांवों में खुशहाली आ सकती है, गांवों से शहरों की ओर पलायन रूक सकता है और ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों जैसी सुविधाएं भी विकसित हो सकती हंै। यह भी जरूरी है कि सरकार द्वारा किसान को भेजे जाने वाले पैसे में रिसाव न हो, इसके लिए जन-धन योजना के अंतर्गत खुले बैंक एकाउंट, आधार और मोबाईल बैंकिंग के आधार पर किसानों को सीधे सब्सिडी पहुंचे और उसे न तो कंपनियां हड़प कर सके और न ही बिचौलिए, ऐसी भी व्यवस्था तकनीक के माध्यम से करनी होगी।

अश्विनी महाजन

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

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