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विकासोन्मुख बजट

विकासोन्मुख बजट

वर्ष 2016 के बजट को भारत में बदलाव की रफ्तार तेज करने वाला बजट कहा जा सकता है क्योंकि इसका लक्ष्य देश को विकसित और समृद्ध आर्थिक ताकत के रूप में बदलना है। पहली दफा कृषि, ग्रामीण विकास और सिंचाई को नीतियों में प्राथमिकता दी गई है। पिछले बजटों की तुलना में यह तकनीकी आधार के साथ पेशेवर बजट है। यह अर्थव्यवस्था के समावेशी विकास के उद्देश्य से बड़े विचारों का बजट है। बजट का सार सरकार के उन नौ आधारभूत प्राथमिकताओं में निहित है जो व्यापक अर्थव्यवस्था का मजबूत स्तंभ हैं।

ये नौ मुख्य आधार हैं : पांच साल में किसानों की आमदनी दोगुनी करने के लिए कृषि और किसानों का कल्याण। ग्रामीण रोजगार और बुनियादी संरचना पर जोर के साथ ग्रामीण क्षेत्र की मजबूती। सभी कमजोर तबकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं के साथ सामाजिक क्षेत्र पर जोर। भारत को ज्ञान आधारित और उत्पादक समाज बनाने के लिए शिक्षा, हुनर और रोजगार सृजन को प्राथमिकता। जीवन स्तर और क्षमता में वृद्धि के लिए निवेश और बुनियादी संरचना को प्राथमिकता। स्थायित्व और पारदर्शिता लाने के लिए वित्तीय सुधार। लोगों को अपनी क्षमताओं के अनुरूप कामयाबी दिलाने के लिए सुशासन और कारोबार में सहूलियत का माहौल बनाना। सरकारी व्यय के कुशल प्रबंधन और जरूरतमंदों तक लाभ पहुंचाने के लिए वित्तीय अनुशासन। लोगों को भरोसे के साथ कर देने का माहौल बनाने के लिए कर सुधार। ये आधारभूत स्तंभ ऐसे हैं जिन पर सवार होकर भारत दुनिया में सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था बना रह सकता है।

कहने की दरकार नहीं कि राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 3.5 प्रतिशत पर सीमित रखने का लक्ष्य सरकार के वित्तीय अनुशासन कायम रखने के पुख्ता इरादे को जाहिर करता है। इसके अलावा, इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में जान फूंकने के लिए बजट में 2.21 लाख करोड़ रु. का आवंटन किया गया है जिसका मकसद आर्थिक सुधारों को आगे ले जाना है। इसलिए मैं वित्त मंत्री अरुण जेटली को आम आदमी के चेहरे पर मुस्कान लाने वाला बजट पेश करने के लिए बधाई देना चाहता हूं। आखिर आम आदमी आजादी के बाद से ही एक के बाद एक नाकारा सरकारों को झेलता रहा है।

ऐसा लगता है कि हमारी पहले की सरकारों में इस राष्ट्र को गौरवशाली ऊंचाइयों पर ले जाने की राजनैतिक इच्छाशक्ति ही नहीं रही है। उन सरकारों की गलत आर्थिक नीतियों के चलते जब देश कई तरह के संकटों से घिरता रहा है तब अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने के लिए मरहम लगाने के बदले तब के वित्त मंत्री बेमानी बजट पेश करने में ही अपनी महारथ दिखाते रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में उम्मीद यही थी कि अरुण जेटली आर्थिक वृद्धि की चुनौतियों से मूलभूत सुधारों के साथ निबटेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया।

सरकार के फोकस में अहम बदलाव के लिए इस वास्तविकता को ध्यान में रखा जा सकता है कि विदेशी बाजारों के कमजोर होने की वजह से वित्त मंत्री को घरेलू मांग पर भरोसा करना पड़ा। साथ ही लगातार कई मौसमों में मानसून कमजोर रहने से किसानों की हालत खस्ता हो गई है। दरअसल, प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही नरेंद्र मोदी कहते आए हैं कि वे देश में कृषि व्यवस्था को सुधारेंगे। उन्होंने इसी दिशा में कदम बढ़ाया है। 2022 तक कृषि आय को दोगुना करने का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है, बशर्ते मानसून मेहरबान रहे और संसाधन पर्याप्त मात्रा में जुटाए जाएं। साथ ही, हर साल खेती-बाड़ी में लगने वाले लोगों में कमी के मद्देनजर विकसित देशों के किसानों की तरह खेती-किसानी के तरीके भी इस क्षेत्र को अधिक फायदेमंद बना सकते हैं। इसी मामले में तकनीक फर्क डाल सकती है। किसानों को पर्याप्त पानी, बिजली और संसाधन मुहैया कराने के अलावा सरकार को उन्हें कृषि उपकरणों में तकनीकी सुधारों से भी रू-ब-रू कराना चाहिए और एक ऐसा बोर्ड बनाया जाना चाहिए जो किसानों को खेती के नए तरीके बताए।

सिर्फ इसी तरीके से कृषि और उसकी आमदनी में इजाफा किया जा सकता है। इस बजट में लिए गए फैसले उसे टिकाए रखने के लिए हैं, न कि उसमें सुधार लाने के लिए। बजट 2016 के प्रावधान और नरेंद्र मोदी के लक्ष्य दोनों में एका दिख रहा है। बजट की मुख्य बातों से साफ है कि मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ अभियान कमोवेश इसी बजट पर निर्भर है, जिसका फोकस ग्रामीण और कृषि क्षेत्र पर है क्योंकि इससे किसानों और गरीब तबकों को जीवन स्तर उठाने में मदद मिलेगी। रसोई गैस सब्सिडी, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, वरिष्ठ नागरिकों को बीमा और सिंचाई सुधार जैसे कदमों से ग्रामीण भारत की सेहत सुधरेगी।

हालांकि वेतनभोगी वर्ग और निजी करदाताओं को अधिभार बढ़ाने और कर छूट में इजाफा न करने से झटका लगेगा। कुल मिलाकर 2016 के बजट में हर किसी के लिए कुछ न कुछ है। इंफ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सेहत सुधारने का असर दूसरे क्षेत्रों पर भी पड़ेगा और पूरी अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी। इसलिए घाटे को काबू में रखकर प्रगति के पहलुओं पर फोकस करने के लिए वित्त मंत्री सराहना के पात्र हैं। अगर भारत की वृद्धि दर आठ प्रतिशत पर पहुंच जाती है तो देश के लोगों की ही विजय होगी, खासकर हमारे युवाओं की, जिन्हें नए उत्पादक रोजगार अवसरों की बेहद दरकार है।

दीपक कुमार रथ

दीपक कुमार रथ

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