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सत्य में ही जीवन की संतुष्टि

सत्य में ही जीवन की संतुष्टि

जीवन की परिभाषा भाग-दौड़ और विषय-वासनाओं की पूर्ति करने के लिए वस्तुओं का संग्रह करना मात्र ही रह गया है। अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए भौतिक वस्तुओं को अपने जीवन में स्थान देना और सुख-सुविधाओं को भोगना भले ही मनुष्य जीवन का अंतिम उद्देश्य बन गया हो, लेकिन जीवन का पूर्ण सत्य यह नहीं है। जीवन के सत्य को जानना और उसकी गहराई को समझने की ललक आज के विलासितापूर्ण जीवन में किसी में देखने को नहीं मिलती। लेकिन, इसके बिना व्यक्ति का जीवन पूर्ण नहीं है। इसी सत्य से मनुष्य को अवगत कराने की कोशिश है पुस्तक ‘सत्य कहूं तो एक संन्यासी के संस्मरण’ जिसके लेखक स्वयं ‘ओम स्वामी’ हैं।

27-03-2016लेखक ‘ओम स्वामी’ ने पुस्तक ‘सत्य कहूं तो एक संन्यासी के संस्मरण’ में अपनी आत्मकथा के सहारे लोगों को ये समझाने का प्रयास किया है कि व्यक्ति के लिए भले ही एक निश्चित समय तक भौतिक सुख बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन एक वक्त बाद ये सभी वस्तुएं मिथक प्रतीत होने लगती हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार का धार्मिकता से गहरा नाता रहा और उनका जीवन भी इसी धारणा से पोषित हुआ। परिणामस्वरूप वह सामान्य लोगों की तरह जीवन यापन तो करने लगे, लेकिन उनका मन सदैव सत्य की तलाश में ही लगा रहता। भौतिक जीवन और सत्य की खोज की ऊहांपोह में यौवन की दहलीज तक पहुंच गये और उन्होंने अपने जीवन का वह उद्देश्य भी पूर्ण कर लिया जिसके लिए युवक लालयित रहते हैं। उन्होंने ऑस्ट्रेलिया से एमबीए कर व्यवसाय में स्नातक की डिग्री प्राप्त की और मात्र दो वर्ष के कठिन प्रयास के बाद ही वह सभी वस्तुएं हासिल कर लीं जो भौतिक जीवन के लिए आवश्यक होती हैं। 26 वर्ष की आयु तक उनकी गणना धनी व्यक्तियों में होने लगी, पर उनका मन अभी भी कुछ तलाश रहा था, वह था जीवन का सत्य। जिसे वह हर हाल में पाने के इच्छुक थे।

सत्य कहूं तो….

एक संन्यासी के संस्मरण

लेखक             : ओम स्वामी

प्रकाशक   : जयको पब्लिशिंग हाऊस

मूल्य                        : 250 रु.

पृष्ठ                          : 226  

ओम स्वामी ने मात्र 8 वर्ष की आयु में स्वप्न में ईश्वर के दर्शन किए इसके बाद उन्हें जिस आनंद और शांति की अनुभूति हुई वह किसी भी दूसरी वस्तु से हासिल न हो सकी। वर्षों तक एक भौतिक जीवन जीने के बाद भी उनके अंतर्मन में अशांति थी, जिसकी वह अधिक समय तक उपेक्षा नहीं कर सके। सांसारिक सुख अंतरमन की शून्यता को नहीं भर सका और वह ऑस्ट्रेलिया से भारत वापस आ गये। भारत वापस आने के बाद उन्होंने वही किया जिसके लिए उनकी आत्मा उन्हें सदैव प्रोत्साहित करती थी। जिससे उन्हें शांति और संतुष्टि मिल सकती थी। उन्होंने संसार का त्याग कर संन्यास ले लिया और सत्य की खोज में हिमालय की गोद में शरण ली।

ओम स्वामी अब जीवन के उस चरम पर पहुंच चुके थे, जहां सांसारिक इच्छाओं का त्याग होता था और आत्मा और परमात्मा के मिलन का मार्ग प्रशास्त होता था। ओम स्वामी ने इस मार्ग पर चलना शुरू कर दिया। उन्होंने हिमालय की घोर निस्तब्धता और एकाकीपन के बीच तीव्र ध्यान की गहन साधना आरम्भ कर दी। जलवायु की भयानक प्रतिकूलताओं तथा वन्यप्राणियों की निकटता के कारण मृत्यु प्राय: आसन्न जान पड़ती। परंतु यह भय उनकी साधना को बाधित नहीं कर सका। साधना के बल पर उन्होंने वह प्राप्त किया, जिसे हम परमात्मा से साक्षात्कार या सत्य का साक्षात्कार कहते हैं।

पुस्तक ‘सत्य कहूं तो एक संन्यासी के संस्मरण’ वर्तमान की चुनौतीपूर्ण तथा भ्रामक युग में लोगों का पथ प्रदर्शन करती है। लोगों को इस सत्य की अनुभूति करवाती है कि जीवन में हर वह वस्तु जिसे पाने को मन लालायित रहता है वह सत्य नहीं है मात्र मिथ्या है। इस पुस्तक में आध्यात्मिक जीवन के निर्माण के विस्मयकारी संस्मरण है जो किसी भी व्यक्ति के जीवन में उसका पथ आलोकित करने में सक्षम है।

प्रीति ठाकुर

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