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जन-जन का औषधीय पोषक ‘खजूर’

जन-जन का औषधीय पोषक ‘खजूर’

 

खजूर मूलत: उतरी अमेरिका, ईराक, उत्तरी अफ्रीका, मिश्र, पश्चिम एशिया, स्पेन, ईटली, ग्रीस एवं सउदी अरब तथा समस्त भारत के शुष्क क्षेत्रों मुख्यत: राजस्थान, गुजरात एवं पंजाब में पाया जाने वाला वृक्ष है।

बाह्य स्वरूप

लगभग 30-36 मी ऊंचा, एकलिंगाश्रय, वृक्ष के पत्र लगभग 5 मी लंबे, पुष्प एकलिंगी, अनेक छोटे, पीताभ वर्ण के होते हैं। इसमें 2.5-7.5 सेमी लंबा, दीर्घायत, पक्वावस्था में रक्ताभ अथवा पीताभ भूरे वर्ण के सरस फल होते हैं। फलभित्ती मांसल तथा मधुर होती है। फल के अंदर एक बेलनाकार, कठोर, मांसल बीज होता है। खजूर का पुष्प एवं फलकाल फरवरी से अक्टूबर तक होता है।

रासायनिक संघटन

खजूर से प्राप्त तेल में केप्पेरिक अम्ल, लौरिक, लिनोलिक अम्ल, मिरिस्टिक अम्ल, ओलिक अम्ल, पॉमिटिक अम्ल तथा स्टीयरिक अम्ल एवं खजूर के काण्ड में हाइड्रोकार्बन्स, ल्युपिऑल, बेन्जोईक अम्ल पाया जाता है। खजूर के फल में एराबिनोस, गैलेक्टोस, जायलोस, रैहम्नोस, युरोनीक अम्ल, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, म्युसिलेज, कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह तथा विटामिन ए एवं बी मिलता है।

27-03-2016


आयुर्वेदीय गुण


  • खर्जूर मधुर, शीत, गुरु, स्निग्ध, वातपित्त शामक, रूचिकारक, तर्पण, विष्टम्भी, शुक्रल, बलकारक, दीपन, बृंहण, वृष्य, पुष्टिकारक तथा श्रमहर होता है।
  • यह ज्वर, अतिसार, क्षत, तृष्णा, कास, श्वास, मद, मूच्र्छा, कोष्ठगतवात, छर्दि, क्षय, रक्तपित्त, मदात्यय तथा दाहनाशक होता है।
  • खजूर फल मज्जा शीत, वृष्य तथा पित्तशामक होता है।
  • उपक्व खजूर त्रिदोषप्रकोपक होता है। पक्व खर्जुर हितकारी तथा त्रिदोषशामक होता है।
  • इसका सार शक्तिशाली अनॉक्सीकारक क्रियाशीलता प्रदर्शित करता है।
  • इसके फल का जलीय एवं ऐथेनॉल सार चूहों में ऐथेनॉल प्रेरित आमशयिक व्रण के प्रति सुधारात्मक प्रभाव प्रदर्शित करता है।
  • इसके फल का जलीय सार अनॉक्सीकारक एवं उत्परिवर्तनरोधी गुण प्रदर्शित करता है।
  • इसका फल सार महिलाओं में झुर्रीरोधी प्रभाव प्रदर्शित करता है।

औषधीय प्रयोग एवं विधि

27-03-2016शिरो रोग

  • शिर:शूल- खर्जूर के बीजों को पीसकर मस्तक पर लेप करने से सिरदर्द तथा आधासीसी की वेदना का शमन होता है।

नेत्र रोग

  • नेत्रभिष्यंद- खर्जूर बीजों को पीसकर आंखों में लगाने से नेत्रभिष्यंद(आंख आना) में लाभ मिलता है।
  • नेत्र विकार- खर्जूर के बीजों को पीसकर आंखों के बाहर चारों तरफ लेप करने से नेत्र की सूजन मिटती है।

मुख रोग

  • खर्जूर फलों का क्वाथ बनाकर गरारा करने से मसूड़ों तथा दंत विकारों का शमन होता है।

वक्ष रोग

  • श्वास दौर्गन्ध्य- खर्जूर के 1-2 फलों को नित्य सेवन करने से श्वास की दुर्गन्ध मिटती है।
  • प्रतिश्याय (सर्दी/जुकाम)- खजूर के 5-10 फलों को 100 मिली दूध में पकाकर पीने से प्रतिशयाय में लाभ होता है।
  • सूखी खांसी- 5-10 छुहारे,1 ग्राम शतावरी चूर्ण तथा मिश्री को मिलाकर दूध में पकाकर पिलाने से सूखी खांसी मिटती है।
  • श्वास- 2 ग्राम छुहारे के चूर्ण में 500 मिग्रा. सोंठ चूर्ण मिलाकर पान में रखकर खाने से श्वास में लाभ होता है।
  • शुष्क कास- समभाग छुहारे तथा शतावर को दूध में पकाकर छान लें व इसमें 100-200 मिग्रा. मिश्री मिलाकर पिलाने से शुष्क कास में लाभ मिलता है।

उदर रोग

  • अतिसार- 10-15 ग्राम छुहारा चूर्णा को 100 मिली दूध में पकाकर सेवन करने से अतिसार बंद होते हैं।

तृष्णा (प्यास)- छुहारे की गुठली को पानी में घिसकर पिलाने से तृष्णा का शमन होता है।

  • 50 ग्राम छुहारे के फलों के बीज निकालकर उसमें 20 ग्राम मुनक्का, 5 ग्राम मुलेठी तथा 20 ग्राम खांड, पिप्पली 5 ग्राम, दालचीनी 2 ग्राम, इलायची 1 ग्राम तथा तेजपत्ता 5 ग्राम मिलाकर पीस लें व इसमें शहद मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियां बनाकर प्रात: सायं 1-1 गोली चूसें, इससे दाह, तृष्णा तथा रक्तपित्त में लाभ मिलता है।
  • अरूचि- छुहारों को नीबू के रस में भिगोकर उसमें नमक तथा जीरा आदि मसाले मिलाकर नित्य 1 या 2 छुहारों का सेवन करने से अरूचि में लाभ होता है।

यकृतप्लीहा रोग

  • पाण्डु- 12 ग्राम सनाय, 200 ग्राम छुहारा तथा 3 ग्राम मंजिष्ठा के चूर्ण को रात को जल में भिगोकर प्रात: काल छानकर सेवन करने से रक्त की कमी, पित्त विकार, रक्तविकार, खुजली तथा ज्वर में लाभ होता है।

वृक्कवस्ति रोग

  • प्रमेह- समभाग खर्जूर फल, सोंठ तथा गोक्षुर के सुक्ष्म चूर्ण में आधा भाग मिश्री मिलाकर रख लें व उसे 5-6 ग्राम मात्रा में लेकर उसमें घी मिलाकर प्रतिदिन प्रात:काल सेवन करने से प्रमेह में लाभ होता है।
  • मूत्रकृच्छू- खर्जूर के रस में मिश्री मिलाकर पीने से मूत्रकृच्छ में लाभ होता है।

प्रजननसंस्थान रोग

  • उपदंश- 12-12 ग्राम खर्जूर तथा सनाय में, 6 ग्राम मृद्दार श्रृंग चूर्ण मिलायें और इसे 5-6 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन प्रात:काल शीतल जल के साथ लेने से उपदंश में लाभ मिलता है।

त्वचा रोग

  • घाव/क्षत- खजूर के बीजों को पीसकर घाव या क्षत में लगाने से घाव जल्दी भर जाते हैं।

मानस रोग

मदात्यय- 10-20 मिली खर्जुरादिमन्थ का सेवन करने से मदात्यय में लाभ होता है।

सर्वशरीर रोग

  • रक्तपित्त- छुहारे के चूर्ण में पुराना शहद मिलाकर, अवलेह बनाकर 5 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से रक्त पित्त में लाभ होता है।
  • 8 ग्राम फल चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर खिलाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।
  • दौर्बल्य- खर्जूर के 2 से 5 फलों को दूध में पकाकर ठंडा करके सेवन करने से दौर्बल्य का शमन होता है।
  • खर्जूर के 5-10 फलों को नित्य सेवन करके ऊपर से 1 गिलास दूध पीने से शरीर पुष्ठ होता है।
  • 8-10 खर्जूर फलों के साथ 1 ग्राम सोंठ तथा 5-10 ग्राम मुनक्का मिलाकर दूध में पकाकर पिलाने से ज्वर जन्य दौर्बल्य का शमन होता है।
  • सर्वांग दाह- 4-10 छुहारों को पानी में भिगोयें इसे मसल कर छानकर पिलाने से सर्वांग दाह का शमन होता है।

रसायन वाजीकरण

  • वाजीकरणार्थ- दूध में भिगोकर खर्जूर फल की गुठली निकाल दें, उसमें तालमखाने के बीज भरकर गेहूं के आटे में लपेटें व घी में पकाकर फिर चार गुने मधु में डुबाकर, चूल्हे के गर्त में 21 दिन तक के लिए दबाकर रखें, तत्पश्चात उसे निकाल कर प्रतिदिन 1-1 फल को दूध के साथ सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।

अंतत: कह सकते हैं कि खजूर पूर्णत: निरापद पुष्टदायी वनौषधि है, इसका औषधीय प्रयोग चिकित्सक के मार्गदर्शन में करने पर अधिक उत्साहजनक परिणाम आते हैं।

                (साभार: योग संदेश)

आचार्य बालकृष्ण

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