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विद्या ददाति विनयं विनयाददाति पात्रताम्

विद्या ददाति विनयं विनयाददाति पात्रताम्

तीन-चार दशक पहले भारत की जनसंख्या-वृद्धि को बड़ी चिंताजनक अवस्था माना जाता था। इधर कुछ दिनों में इसमें बड़ा परिवर्तन हुआ है। कहा जा रहा है कि भारत विश्व का सबसे युवा देश है। उम्रदराज हो रही जनसंख्या वाले विश्व के अनेक देश भारत की ओर देख रहे हैं-यहां के शिक्षित और प्रशिक्षित युवा वहां जाकर सेवाएं प्रदान करेंगे। यदि ऐसा हो तो कितना सुखकर होगा हम सबके लिए। भारत की संस्कृति, ज्ञान-परंपरा, आचार-विचार- व्यवहार सारे विश्व में फैले तो देश का मान-सम्मान और बढ़ेगा। इसके लिए आवश्यक होगा कि प्रत्येक शिक्षित युवा चाहे वह भारत में कार्यकारी जीवन बिताए या विदेश में जाय, पहले भारत को जाने, भारतीयता को जाने, यह जाने कि यहां ज्ञान की खोज की जो गरिमामयी-परंपर विकसित हुई, आध्यात्म में जो श्रेष्ठता प्राप्त की गई, उसके पीछे मूल भाव, भावना तथा लक्ष्य क्या रहे होंगे? ”यावद्जीवेत अधीयते विप्र:’’ का कोई अन्य विकल्प नहीं है। जीवनपर्यन्त अधिग्रहण के कौशल तो प्रारम्भिक अध्ययन काल में ही अन्तर्निहित करने होंगे। इसके लिए महार्षि पतंजलि ने लगभग 2200 वर्ष पहले चार सोपान निर्धारित किये थे जिनके द्वारा विद्या ग्रहण की जानी चाहिए- अध्ययनकालेन, मननकालेन, प्रवचनकालेन, प्रयोगकालेन। ये चार सोपान यदि सभी व्यक्ति विशेषकर अध्यापक और छात्र अपने जीवन में उतार लें, तो जो भी सीखा जाएगा, वह कभी भी व्यर्थ नहीं जाएगा, जो अनावश्यक है इस पर कभी समय नष्ट नहीं होगा। स्वामी विवेकानंद के अमर शब्द हैं- ”मनुष्य की अन्तर्निहित पूर्णता को अभिव्यक्त करना ही शिक्षा है।’’ अत: इसे तो जीवनपर्यान्त सुचारू रूप से चलाना ही है।

ज्ञान तथा कौशल के आदान-प्रदान में सम्मिलित दो व्यक्तियों या समूहों के बीच किसी प्रकार का संशय न रहे, इसके लिए संवाद की विधा भी स्पष्ट की गई। ”वादे वादे जायते तत्ववोध:’’ इस विधा का सिद्धांत ही निरूपित नहीं करता है वरन पूरी प्रक्रिया को भी तीन शब्दों में सम्पूर्णता प्रदान कर देता है। वे तीन शब्द हैं- प्रशन, प्रतिप्रशन और परिप्रशन। पंडित विद्यानिवास मिश्र ने मेरे अनुरोध पर एक पुस्तक में इसे यों दर्शाया है- ”प्रशन, प्रतिप्रशन और परिप्रशन- तीन प्रकार के प्रशन होते हैं। सीधा प्रशन होता है जो छात्र कहता है कि इसको फिर से समझाइये कि इसका क्या अर्थ है। फिर प्रतिप्रशन होता है कि यह तो आपने कहा, इससे मुझे संतोष नहीं हुआ है, इसका अर्थ तो यह भी हो सकता है। फिर परिप्रशन होता है कि हमने मान लिया कि यह अर्थ है, लेकिन क्या यही अर्थ वहां भी लागू होता है जहां इसका प्रयोग हुआ है? यही परिप्रशन है। इसको और व्यापक दायरा दें तो इन सभी प्रशनों से अर्थ खुलता है और तब लिखने की आवश्यकता नहीं रहती है। अब आप बाद में लिखें तो लिख लीजिये, सारा अर्थ खुल जाता है। जो इस प्रक्रिया से नहीं गुजरता है, उसके लिए सब का सब लिखा रह जाता है, तो भी वह साफ हो जाता है, भूल जाता है। आज इस प्रक्रिया को कई दबावों में पड़कर के या तो हम भूल चुके हैं या सोचते हैं कि बड़ा बोझ है, इतनी बड़ी कक्षा, इतनी बड़ी संख्या, इतना बड़ा उत्तरांश, इसका कैसे उपयोग करेंगे?’’

जब व्यक्ति आयु में बढ़ता है, तब या तो वह बड़ा भी होता रहता है या जहां तक उसकी बुद्धि, समझ, कौशल, तथा सांस्कृतिक चेतना का विकास हुआ था, वह वहीं रूक जाता है, या इसमें भी कुछ क्षीणता आ जाती है। आयु बढऩे से कोई बूढ़ा नहीं होता है, जो बड़े होना बंद कर देते हैं वे युवावस्था में भी बूढ़े हो जाते हैं। भारत की ज्ञानार्जन की गतिशील परंपरा सभी को लागतार आगे बढऩे, ज्ञान, कर्म और कौशल और जो भी नया और स्वीकार्य मिले, उसे आचार, विचार और व्यवहार में उतारने के लिए क्षमतावान बनाती है। इस सूत्र को अन्तर्निहित कर सकने वाला हर युवा सदा युवा ही रहता है, आयु कुछ भी हो। ऐसे युवा ही राष्ट्र की क्षमता और शक्ति को दर्शाते हैं, वे ही राष्ट्र को जीवंत बनाते हैं।

राष्ट्र की गतिशीलता, उसके उत्कर्ष और प्रगति के संचालकों को यह जानना आवश्यक होता है कि परिर्वतन हर तरफ है, और तेजी से हो रहा है। वह प्रकृति का नियम है, परन्तु हर परिवर्तन प्रगति का द्योतक नहीं होता है। हर परिवर्तन का विश्लेषण आवश्यक है और वही स्वीकार्य होना चाहिए, जो देश के देशवासियों के हित में हो। ऐसा वह व्यक्ति ही कर सकता है जो भौतिक, मानसिक और आध्यात्मिक पक्षों से सम्पन्न हो। जो यह जानता हो कि कब उसे फुटबॉल खेलना है, कब गीता पढऩी है और कब नहीं पढऩी है, जो यह भी जानता और समझता हो कि कब उसे पूजा या अन्य धार्मिक अनुष्ठान के लिए समय देना है और कब उसे छोड़कर प्लेग-पीडि़तों की सेवा में लग जाना है। भले ही निराशा के बादल कुछ युवाओं को लगातार उमड़ते-घुमड़ते दिखाई देते हों, मगर उन्हें रास्ता दिखाने के लिए इस देश ने स्वामी विवेकानंद -जैसे मनीषी भी पैदा किये हैं, जो आध्यात्म और जीवन की व्यवहारिकता को इस प्रकार एक दूसरे में गूंथ देते हैं कि कोई अंतर रह ही नहीं जाता है। ऐसा कौन है जो स्वामी जी के इस उद्धरण को पढ़कर और समझ कर नई ऊर्जा से नहीं भर जाएगा? ”हम गलतियां क्यों करते हैं?- इसलिए कि हम दुर्बल हैं। हम दुर्बल क्यों हैं? इसलिए कि हम अज्ञानी हैं। हमें अज्ञानी कौन बनाता है? हम स्वयं ही। हम अपनी आंखों को स्वय ही ढंक लेते हैं और अंधेरा है, अंधेरा है कहकर रोते हैं। हाथ हटा लो, तो प्रकाश ही प्रकाश है। मनुष्य की आत्मा स्वभाव से स्वयं प्रकाश है। अत: हमारे लिए प्रकाश का अस्तित्व सदा है। अपने अज्ञान के कारण हमें प्रतीत होता है कि हम बद्ध हैं और इसीलिए सहायता के लिए हम रोते चिल्लाते हैं। पर सहायता कहीं बाहर से तो नहीं आती है। वह तो हमारे भीतर से ही आती है। चाहो तो विश्व के समस्त देवताओं को पुकारते रहो, मैं भी वर्षों पुकारता रहा और अतं में देखा कि मुझे सहायता मिल रही है, पर वह सहायता मिली भीतर से।’’

27-03-2016

ज्ञान, विज्ञान, आध्यात्म ही नहीं, हर प्रकार का खजाना मनुष्य के मन में, उसके अंदर ही है। भारतीय संतों और दार्शनिकों ने इसे हजारों साल पहले ही समझ लिया था और इसी के आधार पर भारत की संस्कृति और सभ्यता का विकास हुआ। विचार की यह शक्ति और व्यावहारिकता सार्वभौमिक है। इसका एक उदाहरण लेते हैं। यूनेस्कों ने 21वीं शताब्दी के प्रारम्भ में वैश्विक पटल पर शिक्षा के स्वरूप के निर्धारण के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय आयोग बनाया था। इसके अध्यक्ष फ्रांस के जैक देलोर्स थे तथा भारत के सम्माननीय विद्वान डॉ. कर्ण सिंह इसके सदस्य थे। अक्टूबर 1996 को जेनेवा में प्रस्तुत किये गए उस आयोग के प्रतिवेदन का शीर्षक है-”लर्निग:द ट्रजर विदिन’’। एक तरह से यह भारत की वैचारिक श्रेष्ठता की विश्व स्तर पर एक बार फिर स्वीकार्यता थी। हमारे युवाओं को इससे प्रेरणा मिलनी चाहिए। इस पर सारे विश्व में चर्चा हुई है और होती रहती है। आज इस प्रतिवेदन का लोगों के सामने आये 20 वर्ष पूरे हो रहें हैं, मगर इसमें निहित अनेक कथन आज भी आंखें खोलने वाले हैं। कार्यकारी जीवन में प्रवेश करने वाले हर युवा को जो विश्व मिल रहा है वह कई प्रकार के तनावों से जूझ रहा है। यही नहीं, जितना अविश्वास, हिंसा, आतंक, असुरक्षा, युद्ध और शोषण इस समय सारे विश्व में है और बढ़ रहा है, वह भयावह ही कहा जा सकता है। समाधान का रास्ता सभी को ज्ञात है, मगर उसका अनुसरण तो कोई नहीं कर रहा है, भारत भी नहीं कर रहा है जो आज भी गांधी को राष्ट्रपिता मानता है, मगर उनके जंतर को पूरी तरह भूल गया है। ”तुम्हें एक जंतर देता हूं, जब भी तुम्हें संदेह हो या तुम्हारा अहम तुम पर हावी होने लगे तो यह कसौटी अपनाओं- जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो की जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा। क्या उससे वह अपने जीवन और भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा? यानी क्या उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल सकेगा जिनके पेट भूखें हैं और आत्मा अतृप्त है? तब तुम देखोगे की तुम्हारा संदेह मिट रहा है और अहम समाप्त होता जा रहा है।’’ अपने चारों तरफ निगाह डालिए और उन नामीगिरामी लोगों को पहचानने का प्रयास करिए जिन्हें, आप को लगे की इस सूत्र के तत्व की समझ है। मैं कुछ नाम ले सकता हूं। डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद जब राष्ट्रपति पद से मुक्त होकर पटना लौटे, तब उनके रहने की व्यवस्था कांग्रेस के पटना कार्यालय में की गई। उनके स्टेट बैंक अकांउट में केवल कुछ सौ रूपये थे, आज भी बचे रह गए हैं। मैं लाल बहादुर शास्त्री का नाम ले सकता हूं, कर्पूरी ठाकुर और डॉक्टर राम सुभग सिंह का नाम मुझे भूलेगा नहीं। जब लाल बहादुर शास्त्री अपने राजनीतिक दल के महासचिव थे तो उन्हें 40 रूपये प्रतिमाह मिलते थे। एक बार महावीर त्यागी उनके घर कुछ रूपये उधार लेने गए। शास्त्री जी ने कहा रूपये नहीं है, महावीर त्यागी रो पड़े-आवश्यकता ही कुछ ऐसी थी। श्रीमती ललिता शास्त्री अंदर से कुछ रूपये ले आईं और बोलीं, ”मैं कुछ हर महीने बचा लेती हूं, कुल मिलकार इतना ही है, आप अपना काम चलायें।’’ यह सब देखकर आश्चर्यचकित रह गए लाल बहादुर जी कि मैं अपने दल से केवल घर खर्च के लिए पैसे ले सकता हूं, बचत के लिए नहीं। उन्होंने कार्यलय में जाकर लिख कर दिया कि आगे से उन्हें केवल 25 रूपये प्रतिमाह ही चाहिए। ऐसा कौन है जो इस प्रकरण को सुने और भूल जाये। और भी कई ऐसे नाम मैं ले सकता हूं। कई बार सोचता हूं आज के युवा किस का नाम लेते होंगे? हर तरफ चकाचौंध है, प्रसिद्ध नाम तो प्रतिदिन समाचार पत्रों तथा टेलीविजन पर लिए ही जाते हैं, इनमें कितने हैं आदर्श जीवन जीने वाले जो सम-सामयिक हों और आदर्श बन सकें? आप भी जानते हैं, मैं भी जानता हूं। इनके नाम न आप लेंगे न मैं लूंगा। हर युवा-मन सिद्धांतों और आदेशों को लेकर आगे बढऩा चाहता है। उसे हर कदम पर आज जो हर तरफ दिखाई देता है, वह प्राय: उसके मनोबल को क्षीण ही करता है। इस समय भौतिकता तथा आध्यात्मिकता के बीच जो तनाव या प्रतिस्पर्धा हर तरफ दिखाई देती है, वह मानव-मूल्यों के क्षरण का ही प्रस्तुतीकरण है और इससे हम सब भलीभांति परिचित हैं।

अपेक्षा तो यह थी कि एक वैश्विक समाज का निर्माण होने का वक्त आ गया है, मगर जो बिखराव तथा विभाजन देशों के बीच तथा देशों के अंदर भी फैल रहा है, वह शांति, भाईचारे, अहिंसा, सदाचरण के प्रयासों को ओझल करता दिखाई देता है। निराशा उत्पन्न करता है। सूचना और समझदारी ज्ञान लगातार बढ़ रहे हैं, मगर मनुष्य का विवेक क्या कम हो रहा है? क्या हमने स्वतंत्रता का सही अर्थ नहीं जाना? महात्मा गांधी ने यूनेस्को के डायरेक्टर जनरल जूलियन हक्सले को सन 1948 में लिखा था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति अपना कर्तव्य करे तो सभी को उनके अधिकार मिल जायेंगे। छोटे से पत्र में उन्होंने यह भी लिखा था कि यह उन्हें उनकी ”अनपढ़ किन्तु समझदार’’ मां ने बताया था। उच्चतम स्तर का आध्यात्म और चिंतन सामान्य व्यक्ति को कितना शिक्षित कर देता है यह प्रकरण उसका अप्रतिम उदाहरण है और इसे समझाने के लिए भारत की संस्कृति के मूल तत्व से परिचय आवश्यक है। मानवाधिकारों के लिए हमारे संविधान में एक पूरा अध्याय है, विस्तृत प्रावधान है, सैकड़ों संस्थाएं मानवाधिकारों के लिए कार्य करती हैं, मगर सफलता सीमित ही रह जाती हैं। भारत के हर उस युवा के लिए यह एक चुनौती है कि वह अपने कार्यकारी जीवन में ऐसा कुछ भी न करें जिससे किसी के अधिकारों का हनन हो रहा हो। इस मानव-मूल्य के रूप में जो स्वीकार कर उसे व्यावहारिक रूप दे सकता है, उसे ही शिक्षित मान जाना चाहिए। उसकी दीक्षा को परिपूर्णता की ओर अग्रसर होता हुआ स्वीकार किया जा सकता है। ऐसा व्यक्ति ही नीचे दिए मापदंड पर खरा उतर सकता है।

विद्या ददाति विनयं विनयाददाति पात्रताम्।

पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनाद् धर्मस्तत: सुखम्।।’’

अर्थात् विद्या वह है, जिसमें व्यक्ति जैसे-जैसे आगे बढ़े, उसकी विनम्रता बढ़ती जाय। अर्थात वह इस तथ्य को और समझे कि ज्ञान का सागर कितना विशाल है और उसमें से जो प्राप्त हो सका है, वह तो कण मात्र ही के समकक्ष माना जा सकता है। यह श्लोक ज्ञान परंपरा का वह सम्पूर्ण और समेकित वर्णन है जिसकी जड़े भारत की मिट्टी में गहरे तक गई हुई हैं और जिसके पुष्प-पल्लव हर तरफ से हवा-पानी तथा पोषण ले रहे हैं। सीखकर व्यक्ति सुपात्र बने, उसकी विनम्रता बढ़ती जाय, धन के अर्जन के लिए सुयोग्य बनकर उसे कर्तव्य माने परन्तु यह भी याद रखे कि सुख केवल धन-संग्रहण से नहीं मिलता है, धन और सुख का सेतु तो धर्म ही है और तदनुसार सदाचरण ही मनुष्य को सुख संतोष प्रदान कर सकता है। इसी सोच से यह समझ प्रस्फुटित होती है कि प्रकृति के पास सभी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए संसाधन उपलब्ध हैं, मगर किसी एक की भी लालसा और लालच की पूर्ति के लिए नहीं है। लौकिक समृद्धि आवश्यक है, जैसे स्वास्थ्य, रहन-सहन और घर-परिवार का भरण-भोषण आवश्यक है। अत: भौतिक अर्जन भी आवश्यक हैं, परन्तु इसे पाने की चाह किसी और के अधिकारों का हनन कर, अन्य को आतंकित कर या प्रकृति का अनावश्यक शोषण कर पूरी नहीं की जा सकती है। जो इस पर चिंतन कर सकता है, उसके अंत:करण में लोभ, अहंकार, आक्रामकता, संग्रहण और अन्याय-जैसे अवगुण स्वत:ही क्षीण हो जाते हैं। वह अपनी राह निर्धारित करने की क्षमता प्राप्त कर सफल जीवन जीने योग्य प्रस्तुत हो जाता है।

गुरूकुल में दी जाने वाली शिक्षा संपूर्ण कर जब स्नातक जीवन में प्रवेश की अनुमति लेता है, तब जो उपदेश और निर्देश उसे मिलने चाहिए, वे तैत्तिरीय उपनिषद में इतनी संपूर्णता से वर्णित हैं कि उस से अधिक सटीक ज्ञान, विधि और व्यवहार-सम्मत कुछ कहा ही नहीं जा सकता है। इस अवसर पर हम सब उसे न केवल याद करें वरन मन-मस्तिष्क में उतार लें और व्यवहार में लाने के लिए तत्पर हो जायें।

सत्यं वद, धर्म चर।

सत्यान्न प्रदितव्यम। धार्मान्न प्रमदितव्य।

मातृ देवो भव। पितृ देवो भव। आचार्य देवो भव।

अतिथि देवो भव।

यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि।

एष आदेश:, एष उपदेश:, एतदनुशासनम्।

(यह लेख लेखक द्वारा ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, कामेश्वरनगर, दरभंगा में, षष्ठम दीक्षांत समारोह में दिये गये भाषण पर आधारित हैं।)

जे. एस. राजपूत

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