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वर्तमान चारित्रिक संकट समस्या और समाधान

वर्तमान चारित्रिक संकट समस्या और समाधान

चारित्रिक बहुभावनामूलक शब्द है। इसमें प्राय: सर्वमानवोचित गुणों का समावेश होता है। इसमें सत्य, त्याग, ईमानदारी, परदुखकातरता, स्वार्थहीनता, परोपकार, आत्मसंयम, राष्ट्र के प्रति प्रेम एवं राष्ट्र भावना इत्यादि गुणों का बोध होता है। यदि मानव में चरित्र नहीं है तो उसके पास अन्य सभी कुछ होते हुए भी वह सर्वथा खोखला अर्थात नर कंकाल है। ज्ञान जब आचरण में बदलता है तो वह चरित्र कहलाता है। यदि उसका आचरण समाज द्वारा निर्धारित नियमों के अनुरूप होगा तो उसे नैतिक और यदि उसके विपरीत होगा तो उसे अनैतिक कहा जाएगा। जो मानव जीवन को पशु जीवन से अलग करता है वह चरित्र ही है। चरित्र शब्द मनुष्य के संपूर्ण व्यक्तित्व को प्रकट करता है। अपने को पहचानो का अर्थ है अपने चरित्र को पहचानो। उपनिषदों ने जब कहा था-”आत्मा वारे श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य: नान्यतोऽस्ति विजानत:’’ तब इसी दुर्बोध मनुष्य चरित्र को पहचानने की प्रेरणा दी थी। यूनान के महान दार्शनिक सुकरात ने भी कहा था अपने को पहचानो।

श्रेष्ठ चरित्र ही मनुष्य का सबसे बड़ा धन है, जिसे पाकर वह कृतार्थ हो जाता है और सुखी-संपन्न होता है। व्यक्ति की सारी शिक्षा-दीक्षा चरित्र निर्माण के लिए है। जिसका चरित्र सुंदर नहीं उसके लिए सारे सुख-साधन बेकार हैं, क्योंकि संपूर्ण भौतिक सुख-साधनों के होते हुए भी वह अशांत तथा व्याकुल रहता है। चरित्रवान सदा प्रसन्न रहता है। यदि कोई उसकी निंदा भी करे तो वह दुखी नहीं होता। वह कठिनाइयों से घबराता नहीं, क्योंकि उसमें आत्मबल होता है। चरित्रवान व्यक्ति ही समाज एवं राष्ट्र का उत्थान कर सकता है, क्योंकि नैतिक भावना से ही चरित्र का निर्माण होता है इसलिए कहा गया है- ”कुल पवित्री कुरू सच्चरित्रे’’ अर्थात चरित्रवान बनकर कुल को पवित्र करो। चरित्रवान व्यक्ति न केवल अपने कर्तव्य के लिए, बल्कि दूसरों के प्रति भी पूर्णत: सच्चा और ईमानदार होता है। चरित्रवान व्यक्ति की आत्मा धोखा नहीं दे सकती और न वह आत्मवंचना कर सकता है। भारतीय संस्कृति ने भोग की अपेक्षा त्याग को अधिक महत्व दिया है। इसलिए उच्च स्तर पर खड़े लोगों का जीवन आत्मसमर्पण की भावना पर निर्मित है और यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र रहा है। यदि हम इतिहास के पृष्ट पलट कर देखें तो हमें अनेक ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके कारण आज भी हम विश्व में अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। उच्च चरित्र के उदाहरणों से हमारा प्राचीन इतिहास भरा पड़ा है-हरिश्चन्द्र का सत्यपालन, दधिचि का परोपकार अपनी अस्थियों का दान दे देना, जनक की अनासक्ति, कर्ण का दान, महात्मा बुद्ध तथा भगवान महावीर का त्याग आदि। शंकराचार्य का जन चेतना उत्पन्न करना तथा आधुनिक युग में भी स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, अरविन्द, तिलक, गांधी तथा शहीद चन्द्रशेखर आजाद आदि के जीवन चरित्र, चारित्र्य के एक-से-एक उदात्त एवं सुंदर उदाहरण हमारे समक्ष हैं। इन्हीं महापुरुषों के कारण हमारे यहां प्रथम ज्ञानोदय हुआ, विश्व में प्रथम बार हमारे देश में एक सुंदर समाज व्यवस्था ने जन्म लिया। इसी कारण देवता भी इस भूमि के लिए तरसते थे। वे भी भारत भूमि का गौरव गान करते थे।

चरित्र किसी को उत्तराधिकार में नहीं मिलता, अपने माता-पिता से हम कुछ व्यावहारिक बातें सीख सकते हैं, परंतु चरित्र हम स्वयं बनाते हैं। कभी-कभी, माता-पिता और पुत्र के चरित्र में समानता नजर नहीं आती जैसे हिरण्यकश्यप और प्रह्लाद के चरित्र में बिल्कुल असमानता है। तो कभी-कभी, माता-पिता और पुत्र के चरित्र में समानता नजर आती भी है। वह भी उत्तराधिकार के कारण नहीं बल्कि, परिस्थितिवश पुत्र में आ जाती है। कई बार तो एक ही घटना मनुष्य के जीवन को इतना प्रभावित कर देती है कि उसका चरित्र ही पलट जाता है। जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण ही बदल जाता है। निराशा का एक झोंका उसे सदैव के लिए निराशावादी बना देता है या अचानक आशातीत सहानुभूति का काम उसे सदा के लिए परोपकारी बना देता है। यही हमारी प्रकृति या चरित्र बन जाता है। इसलिए यह कहना ठीक है कि परिस्थितियां हमारे चरित्र को नहीं बनाती, बल्कि उनसे जो मानसिक प्रतिक्रियाएं होती हैं, उन्ही से हमारा चरित्र बनता है। इन्हीं नित्यप्रति के प्रभावों से चरित्र बनता है। यही चरित्र बनने की प्रक्रिया है। इसी प्रक्रिया में कुछ लोग संयमशील, तो कुछ आत्मविश्वासी, तो कुछ शारीरिक सुख भोगों में लिप्त रहने वाले विलासी, तो कुछ नैतिक सिद्धांतों में दृढ़ रहने वाले तपस्वी, तो कुछ लोग अपने स्वार्थ की पूर्ति करने वाले देशद्रोही बन जाते हैं। प्रवृत्तियों का संयम ही चरित्र का आधार है। संयम के बिना मनुष्य अपने विचार शुद्ध नहीं कर सकता, प्रज्ञावान नहीं बन सकता। गीता में कहा गया है कि इन्द्रियों की प्रवृत्तियां जिसके वश में हैं उसी की प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है। प्रज्ञा तो सभी मनुष्यों में होती है बुद्धि का वरदान मनुष्य मात्र को प्राप्त है, किन्तु प्रतिष्ठित प्रज्ञा या स्थितिप्रज्ञ वही होगा, जिसकी प्रवृतियां उसके वश में होंगी। यही प्रज्ञा है जो परिस्थितियों की दासता स्वीकार न करके मनुष्य का चरित्र बनाती हैं। जिसकी बुद्धि स्वाभाविक प्रवृत्तियों, विषय- वासनाओं को वश में नहीं कर सकेंगी वह कभी सच्चरित्र नहीं बन सकता।

बड़े दुख की बात है कि वर्तमान में हमारे चरित्र पर पक्षघात-सा हो गया है। आज लोगों के मन को स्वार्थपरता, बेईमानी और दुर्भावना जैसे अभिशापों ने बुरी तरह से जकड़ लिया है। वास्तव में, भारतीय समाज आज एक ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है, जिसमें सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था चकनाचूर हो गई है उसमें आधारभूत परिवर्तन हो रहे हैं। आज नैतिक मूल्यों का पतन हो चुका है। समाज में चरित्र नाम की कोई चीज दिखाई नहीं देती और हमारे समाज में चारित्रिक संकट गहराता जा रहा है। व्यक्ति चाहे किसी भी समाज से संबंध रखता हो अपने स्वार्थ के लिए राष्ट्रहित को बलि देने में भी नहीं हिचकता, आतंकवादियों द्वारा किए जा रहे हमले चाहे वह 26/11 का हो या गुरुदासपुर हमला या फिर पठानकोट हमला हो सारे इसके ज्वलंत प्रमाण हैं। इन्होंने हमारे देश की चूलें हिला दी हैं। यह हमारी, हमारे समाज की नैतिकता और चरित्रता का मापदंड है। हमने अपने पूर्वजों के गौरव को हास्यास्पद बना कर छोड़ दिया। हमने एक महत्वपूर्ण संपदा प्राप्त करके नष्ट कर दी उसका उपयोग न किया जाना कितने लज्जा की बात है। आजकल मनुष्यों में व्यक्तिनिष्ठता और संकीर्ण स्वार्थ बढ़ता जा रहा है। यह व्यक्तिनिष्ठता सामाजिक संगठन में बड़ी भारी बाधा है। जिस देश या समाज में व्यक्तिनिष्ठता/स्वार्थ की भावना बढ़ती है, वहां व्यापक असंतोष फैल जाता है तथा सुख शान्ति हवा हो जाती है। चोरी, घूसखोरी, चोरबाजारी, अनुचित मुनाफाखोरी के कारण मनुष्यों में व्यक्तिनिष्ठता बढ़ती है। जब सहानुभूति सहयोग तथा सामाजिकता की भावना का ह्रास होता है तो समाज में व्यक्तिनिष्ठता, स्वार्थ भावना का विकास होता है जिसे चारित्रिक पतन कहा जाता है।

देश में आई प्राकृतिक आपदा या युद्धकाल में किसी व्यक्ति की देशभक्ति की सर्वोत्तम परीक्षा होती है। इन दिनों देशभक्ति का अर्थ जनता में एकता एवं त्याग से लिया जाता है। ऐसे दिनों में व्यापारी वर्ग से यह आशा की जाती है कि काला बाजार या अनैतिक धंधों द्वारा उन्हें जनता को नहीं लूटना चाहिए, क्योंकि ऐसे कार्यों से देश की जनता पर दोहरी मार पड़ती है जो देश के लिए घातक सिद्ध होता है। परन्तु ऐसे समय वे देश की जनता की विवशता का लाभ उठाने में कतई नहीं हिचकते। उस समय जमाखोर कृत्रिम अभाव पैदा कर के जनता एवं सरकार दोनों को धोखा देने में नहीं चूकते। भ्रष्टाचार, मिलावट, घूसखोरी आदि का जो रोग समाज को लगा है उसके कारण राष्ट्र में हो रहे निमार्ण के कार्य बेकार जा रहे हैं या फिर उनसे जितना लाभ मिलना चाहिए, वह लाभ नहीं मिल पाता। अपने लाभ एवं स्वार्थ के लिए मनुष्य इतनी नीचता कर सकता है कि खाद्य पदार्थों में मिलावट करना उसका आम धंधा बन गया है चाहे उसे खाकर कितने ही व्यक्तियों को बेमौत क्यों न मरना पड़े इसकी उन्हें कोई चिंता नहीं। यहां तक कि अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर वे खून में मिलावट करने से भी नहीं हिचकते। जरा सोचिए यह कितना घिनौना अपराध है। इससे अधिक चारित्रिक पतन हमारा और क्या हो सकता है? समाचार पत्रों में प्रतिदिन ऐसे समाचार प्रकाशित होते रहते हैं कि अमूक व्यक्ति मिलावटी दवाई, मिलावटी खून या ग्लूकोज के कारण यमलोक पहुंच गया। खाने के चावलों में चीन से आयात प्लास्टिक के चावल समाचार-पत्रों में पढऩे को मिल रहे हैं। इस प्रकार ये व्यापारी मौत का व्यापार करते हैं। बहुमंजिला इमारतों में कम सीमेंट मिलाना या नदी पर बन रहे पुल या फ्लाईओवर ब्रिज में तय मात्रा से कम सीमेंट लगा कर निर्माण कार्य करना एक साधारण बात हो गई है, ये निर्माण कार्य कितने दिन चल पाएंगे और फिर उनसे कितनी जनहानि होगी इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

27-03-2016

जो भ्रष्ट साधनों को नहीं अपनाता वह भौतिक सुखों की दौड़ में पीछे रह जाता है और यही भौतिक सुखों की दौड़ उसे चारित्रिक पतन की ओर ले जाती है। पहले एक उक्ति होती थी- ईमानदारी एक सर्वश्रेष्ठ नैतिकता है- आज यह उक्ति अर्थहीन हो गई है। हममें केवल निजी स्वार्थ साधना की भावना प्रबल हो गई है। हमारा निजत्व संकुचित हो गया है। हमारी सामाजिक कल्याण की भावना दब गई है। हम यह आधारभूत बात भूल जाते हैं कि मनुष्य जिस समाज का सदस्य है उसके प्रति उसकी शुभकांक्षा उसके आचरण का मुख्य अंग है, अपने लाभ के लिए दूसरों का शोषण करना अनागरिकता तथा अनैतिकता है। जो आचरण हमारे पड़ोसियों देशवासियों के हित के सर्वथा विरुद्ध हैं वे सब अनैतिक आचरण है। हमारा कर्तव्य है कि हम दूसरों के जीने में बाधक नहीं सहायक बने, हमारा आचरण लोकहित के अनुकूल होना चाहिए। उसके अंदर यह भावना होनी चाहिए कि हम सबका हित एक है। क्यूबा, जापान, इजरायल जैसे छोटे-छोटे देशों ने थोड़े ही समय में अपने राष्ट्रीय चरित्र के बल पर असाधारण प्रगति की है। क्यूबा छोटे-छोटे 3715 द्वीपों में फैला हुआ है। प्राकृतिक संपदा बहुत कम है। उसे 300 कि.मी की गति से चलने वाले समुद्री तूफानों को झेलना पड़ता है,लेकिन वहां के नागरिकों की राष्ट्रीय चरित्र के कारण वहां तीव्रगति से प्रगति हुई। सन 1959 में क्यूबा के विद्यालयों में छात्रों की संख्या मात्र 10 लाख थी, सन 1961 में राष्ट्रपति कास्त्रो ने शिक्षा वर्ष घोषित करके शिक्षा क्रांन्ति का नारा दिया, शिक्षा की व्यावहारिक नीति अपनाई और लागू की, शिक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य संरक्षण कुटीर उद्योग एवं समाज सेवा की शिक्षा अनिवार्य कर दी। विद्यालयों की सफाई, मरम्मत छात्र स्वयं करने लगे। छुट्टियों में वे गांवों में जाकर खेतों में काम करने लगे, प्रौढ़ों को पढ़ाने लगे। नतीजा यह हुआ कि सन 1976 में छात्रों की संख्या 31 लाख से ऊपर हो गई। उनकी राष्ट्रीय भावना ने देश को प्रगति-पथ पर पहुंचा दिया।

जापान भी द्वीपों का देश है, वहां भूकंप आते रहते हैं। दूसरे विश्व युद्ध में अणु बमों की त्रासदी झेलनी पड़ी जिसके कारण जापान नष्ट हो गया था, परन्तु वहां के नागरिकों के राष्ट्रीय चरित्र, निष्ठा, श्रम सहकारिता एवं प्रामाणिकता जैसे गुणों के कारण जापान आज विश्व की 10 प्रतिशत आर्थिक गतिविधियों को नियंत्रित करता है। इजरायल भी छोटा-सा देश है, रेगिस्तानी भूमि तथा चारो ओर से विरोधी शत्रु देशों से घिरे होने के बावजूद वहां के नागरिकों के राष्ट्रीय चारित्र के आधार पर अपनी असाधारण पहचान बनाए हुए हैं।

शारीरिक शक्ति मनुष्य के लिए आवश्यक है, परन्तु वह चरित्र के साथ ही शुभ हो सकती है। चरित्र के अभाव में शारीरिक शक्ति पशुबल मात्र रह जाती है। देवताओं और दानवों में यही अंतर है चरित्र के बल पर देवता, देवता हैं और चरित्र के अभाव के कारण दावन, दानव कहलाये रावण इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

चारित्र्य को साधारणतया सदाचार के नाम से भी पुकारा जाता है। चरित्र के उत्थान के लिए आत्मनिरीक्षण की वृत्ति का होना आवश्यक है। आत्मनिरीक्षण से ही मनुष्य को अपनी आंतरिक दुर्बलताओं का ज्ञान होता है। इस ज्ञान से वह अपनी दुर्बलताओं को दूर करने का प्रयास करता है। आत्मशोध और आत्मशुद्धि ही चरित्र निर्माण के साधन है। आत्मशुद्धि के लिए बाह्यत्याग की अपेक्षा आंतरिक त्याग की आवश्यकता है उसमें अन्त:करण का योग होना ही चाहिए। जो व्यक्ति दान करता है या दूसरों की सहायता करता है तथा उसका गुणगान करता है उसे श्रेष्ठ चारित्र्य नहीं कह सकते। चरित्र एक ऐसा वृक्ष है जिसकी जड़ें अवश्य मनुष्य के अपने व्यक्तित्व में गड़ी होती हैं किन्तु उसका विकास समाज के खुले आकाश में होता है, जिसकी शाखाएं दुनिया की खुली हवा में फैलती हैं और जिसके फल दुनिया के दूसरे लोग खाते हैं। चरित्र वह जलधारा है जो व्यक्तित्व के गर्भ से निकल कर पृथ्वी पर फैली हुई क्यारियों को सींचती हुई विश्व के विशाल सागर में लुप्त हो जाती है। चरित्र की स्थिति मनुष्य के व्यक्तित्व में ही है, परन्तु उसका लक्ष्य सामाजिक कल्याण ही है। पर्वत की एकांत गुफा में बैठकर कोई व्यक्ति चरित्र निर्माण नहीं कर सकता। दुनिया से दूर अध्यात्मिक आश्रमों के दुर्ग में भी चरित्र निर्माण नहीं हो सकता। सामाजिक चेतनाशून्य आत्मा हमारी प्रवृतियों का नेतृत्व कभी नहीं कर सकती।

चरित्र निर्माण ऐसा निर्माण कार्य नहीं जैसा चित्रकार चित्र का निर्माण करता है। जैसा विचार करोगे वैसा बन जाओगे-इस उक्ति में गहरा सत्य छिपा हुआ है। गौतम बुद्ध ने भी यही कहा था, ईसा मसीह ने भी यही कहा था। विचार ही मनुष्य की प्रेरक शक्ति है और विचार ही मनुष्य का भाग्य निर्माता। विचारों को स्वतंत्रता दीजिए, विचार कामनाओं का रूप धारण कर लेंगे। कामनाओं को स्वतंत्र मार्ग दीजिए वे कार्य में परिणत हो जाएंगी।

कार्यों को स्वतंत्रता दीजिए वे आदतें बन जाएगीं। आदतें ही कुछ दिनों में चरित्र के रूप में प्रकट होगी, फिर वही चरित्र मनुष्य के भाग्य का निर्माण करेगा। चरित्र बल ही मानव सभ्यता का दीपक होता है, जो हमें अंधकार में प्रकाश दिखाता है। परन्तु आज इसके प्रति उदासीनता बरती जा रही है। हमारी शिक्षा प्रणाली भी इसके प्रति उदासीन है। अनैतिकता ही सब बुराइयों की जड़ है, यदि शिक्षा द्वारा अनैतिकता को समाप्त कर दिया जाए तो सभी समस्याओं का अंत हो सकता है। अभिमन्यु को मां के गर्भ से ही शिक्षा मिली थी, इसलिए आज ऐसी शिक्षा प्रणाली की आवश्यकता है जो बच्चों को भारतीय संस्कृति का ज्ञान कराने के साथ-साथ उनमें चारित्रिक गुणों का भी विकास करे और वह देश का सच्चा नागरिक बन कर समाज एवं देश के प्रति अपने कर्तव्य एवं दायित्व का निर्वाह कर सके।

श्रीकृष्ण मुदगिल

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