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आत्मबल ही सर्वस्व

आत्मबल ही सर्वस्व

By उपाली अपराजिता रथ

मनुष्य एक निर्भरशील प्राणी है। इस धरा पर जन्म लेते ही तत्क्षणात वह माता-पिता पर निर्भर करने लगता है। उसके लिए उसकी मां सब कुछ होती है। उन्हीं के सलाहों से वो उसका हर कार्य संपापित करता है। अन्य सभी प्राणियों की तुलना में मनुष्य में यह प्रवृत्ति अधिक होती है। एक पक्षी अपने सबक को सिखते हुए कुछ ही दिनों में उडऩा सीख जाता है। वह कुछ ही दिनों में अपना खाद्य खुद ही ग्रहण करने लगता है और अपनी सुरक्षा करना भी सीख जाता है। लेकिन, मनुष्य के साथ ऐसा नहीं होता।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यह सत्य है, लेकिन समाज में रहकर अपने वजूद को समझना भी जरूरी होता है। एक मानव शिशु जन्म लेते ही अपनी मां को अपना सब कुछ मानने लगता है। धीरे-धीरे उसके लिए उसका पिता, उसके परिवार वाले, उसकी बहन सब कुछ हो जाते हैं। उन सभी में वह अपनी शक्ति महसूस करता है। उन सबमें वह अपना वजूद खोजता है। जब तक अपने मन को हम दृढ़ नहीं करते, तब तक हम पूर्ण रूप से विकसित नहीं हो पाते हैं।

दुनिया में रहने वाला हर व्यक्ति अलग-अलग सोच में रहता है। ऐसे बहुत से लोग हैं जो यह मानते हैं कि ‘अर्थ बलं बिना नान्य बलं’। ऐसे व्यक्ति अपने अर्थ बल को सर्वोच्च मानते हैं। अर्थ के द्वारा वे सब कुछ अपने वश में रखने का प्रयास करते हैं। लेकिन, एक समय आता है जब उनका समस्त अर्थ बेकार हो जाता है। उनका बल क्षीण हो जाता है। कुछ व्यक्ति मानते हैं कि ‘भ्रातृ बलं बिना नान्य बलं’। ऐसे व्यक्ति अपने आत्मीय स्वजनों को ही अपना सब कुछ मानते हैं। वे अन्य दूसरे व्यक्तियों के लिए कुछ करने से कतराते हैं। वैसा इंसान न ही किसी को अपना बना पाते हैं और न ही कोई व्यक्ति उन्हें अपना बना पाता है। समय आने पर कभी उनको अपनों से दूर रहना पड़ता है तो वे टूट जाते हैं। कुछ  इंसान मानते हैं कि ‘बाहु बलं बिना नान्य बलं’। ऐसे व्यक्ति अपने बाहुबल को बढ़ाने में ही अपना जीवन बिता देते हैं। अपना बाहुबल को बल मानने वाले व्यक्ति इस दुनिया में बहुत हैं। बाहुबल के द्वारा बहुत कुछ करना संभव है, लेकिन एक समय ऐसा भी आता है जब मनुष्य की समस्त शक्तियां निष्क्रिय हो जाती हैं। बाहुबली होकर भी जब कोई कार्य संपन्न नहीं हो पाता, तब मनुष्य हारकर बैठ जाता है।

ऐसा देखा गया है कि जिस इंसान का मनोबल अधिक होता है वह किसी भी परिस्थिति में स्वयं को दृढ़ रखता है। हर हालात का सामना करने के लिए उसके अंदर एक अदम्य साहस पैदा हो जाता है। कठिन से कठिन समय को बहुत आसानी से वह पार कर लेता है। उसका मनोबल उसको पराजित होने नहीं देता। हम यह जरूरत मान सकते हैं कि ‘मनो बलं बिना नान्य बलं’।

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