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बीजू पटनायक और उनका डकोटा

बीजू पटनायक और उनका डकोटा

एक पायलट के नाते स्वर्गीय बीजू पटनायक के साहस की ख्याति दूर-दूर तक मिलती है। उनके हर जीवनी लेखक ने बतौर पायलट उनके कारनामों का वर्णन किसी पौराणिक चरित्र की तरह किया है। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू विमान उड़ाने की महारत के लिए उन्हें ”भारत का बुकानीयर (साहसी)’’ कहा करते थे।

बीजू पटनायक की इस महारत पर ओडिशा का हर आदमी गर्व महसूस किया करता था, लेकिन अफसोस यह है कि उनसे जुड़ी कहावतों में कई अतिश्योक्तियां और ऐसी किंवदंतियां भी जोड़ दी गई हैं जिनका सच्चाई से कोई लेनादेना नहीं है। कई जीवनियों में उन्हें लड़ाकू विमान का पायलट बताया गया है, जो पूरी तरह तथ्यों से परे है। सच्चाई तो यह है कि बीजू बाबू ने कभी भी लड़ाकू विमान में उड़ान नहीं भरी, वे तो सामान्य विमानों के ही पायलट थे।

लड़ाकू विमान के पायलट से कहीं अधिक कुशलता की दरकार सामान्य विमान के पायलट की होती है क्योंकि उस पर कई जिंदगियों को सुरक्षित मुकाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी होती है। बीजू पटनायक ने भी सामान्य विमान पायलट के नाते लोगों के जीवन को सुरक्षित किया। कहा जाता है कि उन्होंने इंडोनेशिया के पहले राष्ट्रपति सुकर्णो को डच हमले के दौरान जान बचाई थी, लेकिन, वह हकीकत से दूर है। वास्तव, में उन्होंने पहले सुकर्णो को नहीं, बल्कि इंडोनेशिया के उपराष्ट्रपति मुहम्मद हट्टा और उनके पहले सहयोगी सुतान सजहरीर को बचाया था। उन्हें अपने पहले विमान को 27 अक्टूबर, 1947 को श्रीनगर में उतारने का श्रेय दिया जाता है जबकि, इस बात में भी कहीं कोई सच्चाई नजर नहीं आती। उस दिन वे श्रीनगर के आसपास भी कहीं मौजूद नहीं थे और श्रीनगर में पहली लैंडिंग विंग कमांडर करोड़ीलाल भाटिया द्वारा की गई थी। यह जरूर है कि बीजू पटनायक ने अपनी उड़ानों के दौरान श्रीनगर में सैनिकों और हथियारों को वहां पहुंचाने में भी काफी मदद की, जिसकी वजह से कबायलियों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा था। यह भी याद किया जाना चाहिए कि कलिंग एयरलाइंस और डकोटा में पहली बार उड़ान भरने का उन्होंने रिकॉर्ड कायम किया था जो भारतीय विमानन इतिहास का गौरवशाली पहलू है। रॉयल इंडियन एयरफोर्स के ट्रांसपोर्ट विंग के साथ एक कॉन्ट्रैक्ट पायलट के रूप में उनका योगदान सराहनीय रहा। बीजू बाबू को दूसरे विश्व युद्ध के दौरान चीनी नागरिकों के बचाव अभियान ”हप्प’’ के लिये ‘हॉल ऑफ फेम ऑफ पायलट’ में शामिल किया गया था।

इस मिशन के दौरान प्रत्येक तीन में से एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ। इन दुर्घटनाग्रस्त विमानों की ध्वंसावशेष अभी भी अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ी पर खोजे जा रहे हैं। इस अभियान में भाग लेने वाले आधे से अधिक पायलटों को अपना जीवन त्याग कर मृत्यु को गले लगाना पड़ा। लेकिन, बीजू पटनायक खतरनाक मिशन के दौरान बिना किसी भय के पूरे साहस के साथ बस अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने में जुटे रहे। पिछले कुछ वर्षों में बीजू पटनायक के एक पायलट के रूप में शोध हुए हैं, उनके आधार पर मैं यह बात पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं।

27-03-2016

मैं उनसे पहली बार 1980 में गवर्नमेंट एविएशन ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट के एक कैडेट पायलट के रूप में भुवनेश्वर हवाई अड्डे पर मिला था, जिसे पहले ओडिशा फ्लाइंग क्लब के नाम से जाना जाता था। बीजू बाबू अक्सर विमानशाला में आया करते थे और अपनी उड़ान की कहानियां सुनाया करते थे। मैं भी अपनी उड़ान छोड़कर उनकी कहानियों को बड़े चाव से सुनने के लिए बैठ जाता था। फिर, मैं अक्सर नवीन निवास जाने लगा और उनके साथ वक्त व्यतीत करने लगा। मैं वक्त पर नवीन निवास के गेट पर पहुंच जाता और अगर बीजू बाबू लॉन में ही घूमते-फिरते मिल जाते, तो मैं नवीन निवास के द्वार पर तब तक खड़ा रहता, जब तक कि बीजू बाबू की नजर मुझ पर नहीं पड़ जाती। मैं अक्सर उनके पास जाने की कोशिश करता, लेकिन वे मुझे किसी न किसी बहाने खुद से दूर करने की कोशिश करते रहते और अकसर मुझे देख कर भुनभुनाने लगते थे ‘सबु दिनोई पलाई असूची’ यानी हर दूसरे दिन आ जाता है। उनका मुख्य सेवक मुझे अकसर उनसे दूर जाने के लिए कहता था, लेकिन कई बार बीजू बाबू का मन बदल जाता और वह मुझे वापस बुला लेते थे।

मुझे याद है कि वे अपने बगीचे में छोटे से घास के टीले पर विकर चेयर पर बैठे रहते थे और उनका अर्दली एक लंबी तार वाला टेलीफोन घर से खिंच कर लाता और एक छोटे से स्टूल पर उनके निकट रख देता था। मुझे याद है अनेक बार मैं उनके पैरों के पास जा कर बैठ जाता था और वे मेरे लिये चाय और बिस्कुट मंगवाते थे और साथ ही वे अपनी यादों को ताजा करते हुए मुझे अपनी जिंदगी से जुड़े कई किस्से सुनाया करते, बावजूद इसके मुझे यकीन है कि उनके जीवन से जुड़े बहुत से किस्से अनकहे ही रह गये हैं। बीजू बाबू अकसर अखबार पढ़ते हुए रुक-रुक कर अपने उड़ान के दिनों के किस्से सुनाया करते थे। इस दौरान अखबार पढ़ते हुए अगर उन्हें कुछ दिलचस्प पढऩे को मिलता तो वे पार्टी के किसी भी व्यक्ति को फोन करके उससे मामले के विषय में चर्चा करते थे।

उन्होंने मुझे अपनी उड़ान के कई किस्से सुनाये जिनमें से ज्यादातर मुझे अभी भी याद हैं। उन्होंने अनगिनत बार अपने डेकोटा (एयरक्राफ्ट) को उस वक्त सफलतापूर्वक हवा से उतारा, जब उसका ईधन शून्य के स्तर पर पहुंचने को होता था। उन दिनों ऐसा करने वाले पायलट को काफी बुद्धिमान समझा जाता था। आधा दर्जन बार उन्होंने केवल एक इंजन के सहारे लंबी दूरी तय की, जबकि दो बार विमान के पहियों के क्षतिग्रस्त होने के बावजूद सफलतापूर्वक लैंडिंग की।

मुझे एक किस्सा याद है जो उन्होंने मुझे बताया था, एक बार बीजू बाबू कॉकपिट में थे, विमान उड़ान भरने के लिए तैयार था और एक व्यक्ति बाहर से कुछ संकेत दे रहा था। वह विमान के इंजन की ओर संकेत कर रहा था और कह रहा था कि इसमें से कुछ लीक कर रहा है। इंजन की जांच करने के लिए पहले इसे बंद करना होगा। बीजू बाबू ने उस व्यक्ति को संकेत दिया कि इंजन से रिसने वाले तरल को अपनी अंजुली में थोड़ा सा इक्ट्ठा करके उस तरल को कॉकपिट में उन तक पहुंचाये। उस व्यक्ति ने बीजू बाबू को बताया कि इंजन में से ईंधन, पानी या तेल में से किसी चीज का रिसाव हो रहा है। उस व्यक्ति ने रिसते हुए तरल को इक्ट्ठा किया और एक स्टूल पर चढ़ कर उसे कॉकपीट में मौजूद बीजू बाबू तक पहुंचा दिया। उसने अपने हाथ में लेते हुए उस तरल को चख कर देखा भी कि वह क्या है। लेकिन, वह यह बता पाने में सक्षम नहीं था कि वह तरल क्या है, इसलिए बिना किसी देरी के विमान ने अपने गंतव्य स्थान के लिए उड़ान भरी।

बीजू बाबू की कलिंग एयरलाइंस और 16 डेकोटा के उड़ान की कहानी एक पुस्तक में मिल जायेगी जो कि मैं खुद लिख रहा हूं। मुझे उम्मीद है कि यह पुस्तक उनके अगले जन्मदिवस तक पूरी हो जायेगी। उनके डेकोटा की यात्रा वास्तविक रूप से दिलचस्प इतिहास को दर्शता है। बीजू बाबू के साथ जितने भी दूसरे लोग इस अभियान में शामिल हुए वे सभी दुनिया के किसी न किसी कोने में अपने विमान के साथ दुर्घटनाग्रस्त हो गये, कुछ को समाप्त कर दिया गया और एक दुर्घटनाग्रस्त डेकोटा को इंडोनेशिया में यादगार के रूप में रखा गया।

बीजू बाबू के 79वें जन्मदिवस पर एक पत्रकार ने उनसे पूछा कि वे किस तरह से अपने जीवन के अंतिम वक्त को देखते हैं तो उन्होंने जबाव दिया, ”मैं किसी लंबी बीमारी से जूझते हुए मृत्यु को गले लगाने की बजाये किसी विमान दुर्घटना में मरना पसंद करूंगा। मैं चाहता हूं कि मुझे अचानक मृत्यु मिले, मैं बस हवा में लहराता हुआ नीचे गिरूं और मेरे प्राण निकल जायें।’’

अनिल धीर

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