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तिवाड़ी के तीखे तीर

तिवाड़ी के तीखे तीर

पहली बार ऐतिहासिक बहुमत से राजस्थान में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के शासन में उपेक्षित जमीनी कार्यकर्ताओं का खोया सम्मान लौटाने के लिए राजनीतिक संघर्ष का ऐलान कर चुके पार्टी के कद्दावर नेता पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी ने राज्य विधानसभा के बजट सत्र में राज्यपाल के अभिभाषण पर सवालिया निशान लगाकर अपनी ही सरकार को कठघरे में खड़ा कर दिया है। नौकरशाह के हाथों का खिलौना नहीं बनने की चेतावनी के साथ विधायिका की गौरव गरिमा को प्रतिष्ठित करने की भी नसीहत दी। इंदिरा गांधी की राजनीतिक विरासत की गजब की व्याख्या करते हुए उन्होंने कांग्रेस विधायकों को भी निरूत्तर कर दिया।

चौदहवीं विधानसभा के इस छठे सत्र की विशिष्टता यह थी कि सदन के 64 साल के इतिहास में पहली बार लीप ईयर में 29 फरवरी को राज्यपाल कल्याणसिंह के अभिभाषण से बजट सत्र का शुभारंभ हुआ। राष्ट्रपति के निर्देशानुसार 4 बिगुल वादन की गूंज के साथ राज्यपाल ने सदन में प्रवेश किया। पहली बार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, संसदीय कार्यमंत्री राजेन्द्र राठौर राज्य के मुख्य सचिव सी.एस. राजन भी विधानसभा अध्यक्ष कैलाशचन्द्र मेघवाल के साथ राज्यपाल की अगवानी में सम्मिलित हुए। अध्यक्ष आसन को रंग-बिरंगे फूलों तथा पीठिका को केसरिया, सफेद एवं हरे रंग के पुष्पों से तिरंगे के रूप में सुसज्जित किया गया था। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय दिल्ली के छात्र आंदोलन में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी की भूमिका पर भाजपा के दो विधायकों कैलाश चौधरी एवं ज्ञानदेव आहूजा की बयानबाजी से क्रुद्ध कांग्रेस विधायकों की नारेबाजी से हुए हंगामें के बीच राज्यपाल ने ऊंची आवाज में अभिभाषण पढऩा शुरू किया। संसदीय कार्य मंत्री के अनुरोध पर राज्यपाल ने आखिरी पैराग्राफ के रूप में ऋग्वेद का मंत्र और उसका भावार्थ पढ़कर अभिभाषण को पूरा पढ़े जाने की औपचारिकता निभायी।

अभिभाषण में भावार्थ सहित ऋग्वेद के इसी मंत्र को घनश्याम तिवाड़ी ने विधानसभा तथा सरकार के गले की फांस बना दिया है। राज्यपाल के अभिभाषण पर 1 मार्च को भाजपा विधायक मोहनलाल गुप्ता ने धन्यवाद प्रस्ताव प्रस्तुत किया, जिसका अनुमोदन प्रहलाद गुंजल ने किया। 3 मार्च को घनश्याम तिवारी को चर्चा में भाग लेने का अवसर मिला। बिहारी के दोहों की माफिक शब्दों की गहरी मार करने की अपनी विशिष्ट शैली और अंदाज में तिवाड़ी के कथन को समूचे सदन में ध्यान से सुना गया तथा प्रतिपक्ष को भी कई बार मेजे थपथपाने के लिए मजबूर किया। बीच में कई मर्तबा पार्टी के दिग्गजों पर पलटवार करने से भी वह नहीं चूके। संवैधानिक गरिमा को बहाल करने की वकालत के साथ तिवाड़ी का भाषण राजनीतिक परिपक्ता का भी परिचायक था।

अंत्येष्टि संस्कार के समय बोले जाने वाले मंत्र को अभिभाषण में शामिल करने संबंधी विवाद गहरा गया है। जगदगुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में आधुनिक संस्कृत पीठ के अध्यक्ष और भाषा विज्ञानी देवर्षि कलानाथ शास्त्री ने भी भाजपा विधायक घनश्याम तिवाड़ी की आपत्ति को सही ठहराया है। शास्त्री का कहना है कि विवादास्पद मंत्र ऋग्वेद के दसवें मंडल के सत्रहवें सूत्र का चौथा और अथर्ववेद के अठारहवें कांड के द्वितीय अनुवाक का 55वां मंत्र है जो मरणोत्तर क्रियाओं में पित्तरों के मोक्ष से जुड़ा हुआ है। वाराणसी के वेदाचार्य अनिल घोड़े की भी यही राय है। संस्कृत विश्वविद्यालय में वेदविभाग के अध्यक्ष लंबोदर मिश्र का कहना है कि यह मंत्र दोनों वेदों में शामिल है। इसमें जिस स्थान पर हमारे ऋषि पहुंचे, वहां पहुंचने के लिए सूर्यदेव से शक्ति देने की मंगल कामना की गई है। इसलिए यह अंतिम संस्कार से जुड़ा हुआ नहीं है। उधर, तिवाड़ी अपने दावे पर कायम हैं।

अभिभाषण के आखिरी 75वें पृष्ठ पर 164वें पैराग्राफ में राज्य सरकार के मूलमंत्र ”आओ साथ चलें’’ की चर्चा करते हुए

घनश्याम तिवाड़ी ने ऋग्वेद की ऋचा यानी मंत्र का पाठ किया-

आयुर्विष्वायु: परि पासति त्वा पूषा त्वा पातु प्रपथे पुरस्तात।

यत्रसेत सुकतों यत्र ते ययुस्तत्र त्वादेव: सविता दधातु।।

अर्थात सर्वत्र संचरणशील प्राणवायु आपका सभी प्रकार से संरक्षण करे (यह हवा हमारी संरक्षण करे)। श्रेष्ठ मार्गदर्र्शक और सबसे आगे रहने वाले पूषादेव (सूर्य) आपका संरक्षण करें। (सूर्य की रोशनी के बिना कुछ है नहीं)। जिस श्रेष्ठलोक में पुण्यात्माएं विराजमान (प्रतिष्ठित) हैं सविता देव आपको भी वहीं प्रतिष्ठित करें।

इस मंत्र और इसके भावार्थ को समझाते हुए तिवाड़ी ने कहा कि इसके तीन शब्दों ”यत्र ते ययहु’’ का अनुवाद नहीं हो पाया है। यत्र का अर्थ है जहां, ते का अर्थ है वे, ययहु का अर्थ है, चली गयी हैं। तो जहां वे आत्मा चली गईं हैं पुण्यलोक में, वहां आप सब लोग आओ साथ चले। सदस्यों की हंसी के बीच घनश्याम तिवाड़ी ने कहा कि मैं इसमें नहीं जाना चाहता। अपने तर्क के समर्थन में उन्होनें आचार्य श्रीराम लिखित ऋग्वेद संहिता तथा करीब 200 वर्ष पूर्व लिखित अंग्रेज विद्धान एच.एस.विल्सन की पुस्तक का उदाहरण दिया जिसमें कहा गया है कि मंत्र के तीन स्टेन्जा अंतिम समय में चिता पर अग्नि प्रज्ज्वलित करते समय पढ़े जाएं वो भी उनके जिन्होंने यज्ञोपवीत ले रखा हो। यह कथन सुनकर सदन एकबारगी स्तब्ध रह गया।

अभिभाषण तैयार किए जाने संबंधी प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए तिवाड़ी ने कहा कि चाहे किसी पार्टी का राज रहा हो इसकी एक प्रक्रिया तय हैं। सभी सचिवों से विभागों की उपलब्धियों को अलग-अलग पैराग्राफ में संकलित कर मंत्रिमंडल की उपसमिति के समक्ष रखा जाता है और कैबिनेट की मुहर के बाद विधानसभा में पढ़ा जाता है और जिस पर हम वाद-विवाद करते हैं। तिवाड़ी ने सदन को याद दिलाया कि वाद-विवाद के समय हम ध्यान रखें कि हमको यह ब्यूरोक्रेसी कहां ले जा रही है और इसमें परिवर्तन कहां कर रहे हैं। इस मूलभूत बात पर अगर ध्यान नहीं दिया तो हम विधायिका की गरिमा को भी कायम नहीं रख पायेंगे और अभिभाषण के महत्व को परिलक्षित नहीं कर पायेंगे। इसी तरह बजट बनाकर पारित कर दिया जाता है। इसलिए यह जरूरी है कि विधायिका की गरिमा को कायम करने के लिए आवश्यक कदम उठाये जायें। इस संबंध में विचाराधीन विधेयक को जब तक पारित नहीं किया जाएगा, तब तक विधायिका की गरिमा कायम नहीं होगी। यदि विधायिका की सुप्रीमेसी नहीं होगी तो जनप्रतिनिधियों द्वारा चाहे गये जनकल्याण के काम नहीं हो पायेंगे। इसलिए अभिभाषण पर विचार करने से पूर्व राजनीति से ऊपर उठकर इस बात पर विचार करें कि इस काम को ठीक कर पायेंगे या नहीं कर पायेंगे। तिवाड़ी का कहना था कि सदन और सरकार चाहे तो इस अभिभाषण को संशोधित कर लिया जाए। उन्होंने इस बारे में लिखित जानकारी आसन पर विराजमान उपाध्यक्ष राव राजेन्द्र सिंह को दी। उन्होंने ऋग्वेद के एक मंत्र-‘संगच्छघ्वं…’ का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार चाहे तो उपरोक्त मंत्र के स्थान पर इस नये मंत्र को जोड़ा जा सकता है।

तिवाड़ी ने रोचक अंदाज में अपनी बात शुरू की। आसन को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि इन दिनों मेरी तरक्की हुई है। पहली तरक्की तो यह कि मुझे 80 लाख में एक कार्यकर्ता माना गया। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पद पर दोबारा ताजपोशी के समय प्रेस कॉन्फ्रेंस में तिवाड़ी के बारे में पूछने पर अशोक परनामी ने कहा था कि वे हमारे 80 लाख कार्यकर्ताओं में एक हैं। दूसरी तरक्की यह हुई कि सचिव महोदय से विधानसभा में आने का नोटिस मिला तब यह लगा कि मैं 80 लाख नहीं 200 में हूं। विधायक दल की मीटिंग में बुलाया गया तो मुझे लगा कि मैं 160 में हंू। अब आपने मुझे 5वें नम्बर पर बोलने का मौका दिया तो लगा कि मैं 5वें नम्बर पर हूं। मैं कोशिश करूंगा कि मैं एक नम्बर पर आ जांऊ यह मेरी तरक्की होगी।

जेएनयू प्रकरण को लेकर लोकसभा तथा विधानसभा सहित देश भर में चल रहे बहस के दौरान हिन्दुत्व, भाजपा की फितरत इत्यादि शब्दों के प्रयोग के संदर्भ में तिवाड़ी ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें समाजवादी और पंथनिरपेक्ष शब्द इमरजेंसी के दौरान जोड़े गये थे। इसके पहले संप्रभुता संपन्न गणराज्य का उल्लेख था और वह सामाजिक-आर्थिक न्याय देगा, विचार की अभिव्यक्ति देगा, लेकिन राज्य की एकता, अखंडता को जहां चोट आएगी वहां विचार की अभिव्यक्ति को प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

जयपुर से गुलाब बत्रा

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