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जबतक जिओ सुख से जिओ चाहे कर्ज लेकर घी पिओ

जबतक जिओ सुख से जिओ  चाहे कर्ज लेकर घी पिओ

चार्वाक की इन पंक्तियों पर जानेमाने मगर विवादस्पद उद्योगपति विजय माल्या ने जिंदगीभर अमल किया। अपनी रईसी और आलीशान जीवनशैली के लिए पहचाने जानेवाले, ‘किंग ऑफ गुड टाइम’ के नाम से मशहूर विजय माल्या फिर सुर्खियों में हैं, मगर इस बार ‘किंग ऑफ बैड टाइम्स’ के तौर पर। अपनी चादर देखकर पांव फैलाने के बजाय कर्ज लेकर घी पीने की आदत ने उन्हें इस हालत में पहुंचा दिया कि आज उन पर देश के 17 बैंकों का करीब 7800 करोड़ रुपये का कर्ज है। कई बैंकों ने उन्हें डिफॉल्टर घोषित कर दिया है। उनके लोन रिकवरी की प्रक्रिया से बचने और देश छोडऩे की आशंका के मद्देनजर बैंकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर माल्या के देश से बाहर जाने पर रोक लगाने की गुहार लगायी, लेकिन कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने बताया कि माल्या तो बीते 2 मार्च को ही विदेश जा चुके हैं।

यह घटना केवल एक उद्योगपति के हजार करोड़ का कर्ज लेकर देश छोड़कर भाग जाने की घटना नहीं है। यह घटना इस तथ्य को भी रेखांकित करती है कि हमारा कानून गरीब के साथ अलग और अमीरों के साथ अलग किस्म का बर्ताव करता है। हाल ही की एक और घटना है। गांव तंजावुर के एक किसान ‘जी बालन’ ने बैंक से 4 लाख रुपये का कर्ज लिया था जिसमें से उसने 3 लाख 40 हजार रुपये चुका भी दिए थे। इस किसान का आरोप है कि आखिरी दो किश्तें न चुका पाने की वजह से इसकी पिटाई की गई और ट्रैक्टर जब्त कर लिया गया। हमारे देश में बैंक मजबूर किसानों से किस तरह लोन की वसूली करते हैं, ये घटना इसकी एक मिसाल है। दूसरी तरफ उद्योगपति विजय माल्या हैं। सवाल यह है कि जब एक किसान के कर्ज न चुका पाने पर बैंक उसे कोई रियायत नहीं देती तो फिर 9 हजार करोड़ रुपये न लौटाने वाले विजय माल्या पर इतनी उदारता क्यों दिखाई गई? हमारे देश की सरकार एक किसान और उद्योगपति विजय माल्या के बीच इतना फर्क क्यों करती है? माल्या का जीवन और कारोबारी सफर इस बात का गवाह है कि कैसे कुछ रसूखवाले लोग देश की जनता के पैसे हड़प कर अरबपति बनते हैं और ऐश करते हैं। एक तरफ किंगफिशर एयरलाइंस दम तोड़ती रही, उसके कर्मचारी वेतन के लिए तरसते रहे, दूसरी तरफ माल्या किंगफिशर कैलेंडर के लिए अपनी आलीशान नौकाओं में खूबसूरत मॉडलों के साथ फोटो खिंचाते, मौजमस्ती करते नजर आते रहे। जो बैंक मामूली कर्ज के लिए भी गारंटर और रेहन रखने की मांग करते हैं, उन्होंने किंगफिशर को हजारों करोड़ रुपये का कर्ज मंजूर करने से पहले कंपनी की माली हालत और मुनाफे की संभावनाओं की छानबीन की जरूरत नहीं समझी?

हालांकि पिछले दिनों कर्ज वसूली न्यायाधिकरण ने जहां माल्या को बहुराष्ट्रीय शराब कंपनी डियाजियो से मिलने वाली 515 करोड़ रुपये की रकम निकालने पर रोक लगा दी, वहीं प्रवर्तन निदेशालय ने उनके खिलाफ मनी लांड्रिंग अर्थात काले धन को सफेद करने और अवैध लेन-देन का मामला दर्ज किया है। लेकिन, क्या भारत छोड़ चुके माल्या पर कानूनी शिकंजा कस पायेगा?

विजय माल्या के खिलाफ सीबीआई ने लुकआउट सर्कुलर जारी किया हुआ है। लुक आउट सर्कुलर, इमिग्रेशन विभाग को सतर्क करने के लिए जारी किया जाता है, ताकि कोई भी ऐसा व्यक्ति बिना बताए देश से बाहर न जा पाए जिसके खिलाफ जांच चल रही है। फिर भी 1 मार्च को संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेने वाले विजय माल्या 2 मार्च को 12 बैग लेकर जेट एयरवेज की प्राइवेट फ्लाइट से देश से बाहर चले गए। जाहिर है जब विजय माल्या देश से बाहर जा रहे थे तो जरूर हमारे सिस्टम ने अपनी नजरें दूसरी तरफ घुमा ली होंगी।

देश के वित्त मंत्री अरुण जेटली ने संसद में देश को भरोसा दिया कि विजय माल्या से एक-एक पाई वसूली जाएगी, लेकिन सवाल ये है कि जो वित्त मंत्रालय विजय माल्या को देश से बाहर जाने से नहीं रोक पाया वो माल्या से कर्ज की रकम कैसे वसूलेगा। यह भी सवाल उठ रहा है कि विजय माल्या का पीछा 17 बैंक कर रहे हैं फिर भी जांच एजेंसियों और इमिग्रेशन विभाग के लिए उन्हें रोकना नामुमकिन कैसे हो गया? 9 हजार करोड़ रुपये का कर्ज ना चुकाने वाले विजय माल्या को देश से बाहर जाने देना तालमेल की कमी का नतीजा है या फिर ये मिल जुलकर की गई साजिश है? इमिग्रेशन विभाग का कहना है कि जब 2 तारीख को विजय माल्या विदेश जाने के लिए एयरपोर्ट पर पहुंचे तो इसकी सूचना सीबीआई को दी गई, लेकिन सीबीआई ने उन्हें रोकने के बारे में कोई आदेश नहीं दिया।

इस पेंच को समझने के लिए माल्या के जीवन का जायजा लेते हैं। बिजनेस टाइकून माल्या ने अमेरिका के साउथ कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में पीएचडी हासिल की है। उद्योगपति पिता बिट्ठल माल्या की मृत्यु के बाद वे यूनाइटेड ब्रेवरीज कंपनी के मालिक बन गये। विजय माल्या ने कारोबार का विस्तार करते हुए देश-विदेश में कई कंपनियां स्थापित कीं।

विजय माल्या एक समय दुनिया की सबसे बड़ी शराब बनानेवाली कंपनी यूनाइटेड स्प्रिट्स लिमिटेड के चेयरमैन थे। अमेरिका की बड़ी शराब कंपनी डियाजियो के साथ मिल कर यूनाइटेड स्प्रिट्स लिमिटेड अंतरराष्ट्रीय बियर बाजार में भारत का नेतृत्व करती थी।

जीवन भर माल्या की कोशिश यह रही है कि वे अपने कारोबार का दायरा बढ़ा कर अलग-अलग व्यवसायों को इसमें शामिल करें, ताकि उन्हें महज शराब उद्योग के दिग्गज के तौर पर नहीं, एक उद्योगपति के रूप में देखा जाए। लेकिन, झटके में नई कंपनियां खरीदने की उनकी आदत और कई बार तो बिना बही-खाते की जांच के ही फैसला लेने की वजह से माल्या की यह हालत हो गई है।

के.गिरिप्रकाश ने विजय माल्या पर ‘द विजय माल्या स्टोरी’, नाम से एक किताब लिखी है। उनके मुताबिक भारत में शराब व्यवसाय को अच्छी नजरों से नहीं देखा जाता। माल्या चाहते थे कि लोग उन्हें शराब के बड़े व्यवसायी नहीं, बल्कि एक उद्योगपति के रूप में जानें। इसलिए उन्होंने इंजीनियरिंग, उर्वरक, टेलीविजन और चार्टर विमान सेवा की कंपनियों में पैसे लगाए। शराब के व्यवसाय में 40 से 45 फीसदी तक का मुनाफा होता है। लेकिन, माल्या ने किंगफिशर एयरलाइंस शुरू करने का फैसला किया। इस क्षेत्र में पैसे कमाना मुश्किल होता है। मगर जब एयरलाइन शुरू हो गई तो माल्या ने खूब पैसे उड़ाए।

विजय माल्या की छवि ग्लैमर पसंद और हसीनाओं से घिरे रहनेवाले रईस के रूप में रही है। महंगी घडिय़ों और कारों के शौकीन माल्या उद्योग से इतर अपनी रंगीन मिजाज जीवनशैली के लिए हमेशा चर्चा में रहते हैं। अपने दम पर कई बार उन्होंने देशवासियों को गौरव का एहसास भी कराया है। 2004 में माल्या ने लंदन में हुई नीलामी के दौरान टीपू सुल्तान की तलवार एक लाख 75 हजार पाउंड में खरीदी थी। 2007 में उन्होंने फॉर्र्मूला वन स्पाइकर टीम खरीदी और बाद में इसका नाम बदल कर फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन रखा गया था। वर्ष 2009 में उन्होंने न्यूयॉर्क में हुई एक नीलामी में महात्मा गांधी के कुछ सामान के लिए तीन बिलियन डॉलर की बोली लगा दी थी।

यहां हम आपको बता दें कि किंगफिशर एयरलाइन को अंतरराष्ट्रीय विमानन कंपनी बनाने के लिए माल्या ने कैप्टेन गोपीनाथ की कंपनी एयर डेकन खरीदी थी। माल्या ने अपने यॉट से गोपीनाथ को फोन किया कि वो एयर डेकन खरीदना चाहते हैं। गोपीनाथ ने कहा, एक हजार करोड़ रुपए। माल्या ने एयर डेकन की बैलेंस शीट तक नहीं देखी और गोपीनाथ को डिमांड ड्राफ्ट भिजवा दिया। इस तरह कर्ज के पैसों से वे कंपनिया खरीदने का अंधा खेल खेलते रहे। और यही उनकी मौजूदा दिवालियेपन की वजह बन गया।

27-03-2016

शराब उद्योग को भारत में एक नया आयाम देने वाले विजय माल्या बैंक उद्योग के ‘नन परफॉर्मिंग एसेट’ यानी डूबत खाता संकट के प्रतीक बन गए हैं। आर्थिक मामलों के लेखक आलोक पुराणिक कहते हैं- माल्या लगातार बयान देते रहे हैं कि वह विलकुल डिफॉल्टर नहीं हैं। यानी उन्होंने जानबूझकर डिफॉल्ट नहीं किया है। कारोबार खराब हो गया, तो इसके लिए उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। कारोबार तो जोखिम का खेल है। जिन बैंकों ने उन्हें लोन दिया, उन्हें जोखिम समझना चाहिए। सरकारी बैंकों के कामकाज को समझने वाले जानते हैं कि कर्ज जोखिम विश्लेषण के आधार पर नहीं दिए जाते रहे हैं वरन ऊपर के आकाओं के इशारे पर दिए जाते रहे हैं। इस तरह की कर्जखोरी से तमाम सरकारी बैंकों पर ऐसे कर्ज खड़े हो गए हैं, जिनकी वापसी की कोई उम्मीद नहीं है। साफ-समझ में यह आना चाहिए कि माल्या भले ही वापस आ जाएं, ये 8000 करोड़ रुपये वापस नहीं आएंगे। इसकी ठोस तकनीकी वजह हैं। कंपनी कानून के हिसाब से- कंपनी और उसे चलाने वाले व्यक्तियों का व्यक्तित्व कानूनी तौर पर अलग-अलग माना जाता है। यानी किंगफिशर कंपनी अलग है और विजय माल्या अलग व्यक्तित्व हैं। यही वजह है कि कानूनी तौर पर यह संभव हो पाता है कि कंपनियां डूब जाती हैं और उनके संचालक लंदन के किसी फाइव स्टार स्विमिंग पूल में तैर रहे होते हैं। कंपनियों को दिया गया कर्ज कंपनियों को दिया गया कर्ज है

रे-बैन चश्मे और भारी, महंगे गहने पहनने वाले और अपनी स्पीडबोट में खूबसूरत महिलाओं के साथ दिखने वाले विजय माल्या की छवि लोगों के दिलो-दिमाग में बस गई। माल्या के कई घर हैं। न्यूयॉर्क सिटी के ट्रंप टॉवर्स में उनका घर है। फ्रेंच रिवियेरा के एक द्वीप पर उनका एक घर है। दक्षिण अफ्रीका और गोवा में भी माल्या की संपत्ति हैं। ये संपत्तियां हालांकि बेहद निजी हैं, लेकिन उनके बारे में सभी जानते हैं। यही फॉर्मूला उनके बैंगलोर के केंद्र में बनने वाले नए घर पर भी लागू होता है।

2005 में विजय माल्या की नेट वर्थ यानी कुल संपत्ति 6 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा थी जो 2014 में घटकर 2 हजार करोड़ रुपये हो गई। विजय माल्या को यह समझना चाहिए था कि उधार के पैसे पर फिजूलखर्ची किसी भी उद्योगपति के लिए फायदे का सौदा नहीं होती। विजय माल्या ने अपने शौक पूरे करने के लिए सरकारी और निजी बैंकों से उधार लेने की शुरुआत 2004 से की थी, तब देश में यूपीए की सरकार थी और 2012 में जब यह साफ हो गया कि विजय माल्या ने बैंकों के 9 हजार करोड़ रुपये डुबो दिए हैं तब भी देश में यूपीए की ही सरकार थी, लेकिन वो भी विजय माल्या के बेहिसाब खर्चों और उधार लेकर वापस न करने की प्रवृत्ति के बारे में नहीं जान पाई। 2004 और 2012 में पी.चिदंबरम देश के वित्त मंत्री थे, लेकिन इस दौरान वित्त मंत्रालय ने कभी भी विजय माल्या पर सख्ती बरतने की कोशिश नहीं की। 2014 में देश में एनडीए की सरकार आई है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं और वित्त मंत्री अरुण जेटली हैं। इसके बाद भी पिछले लगभग दो वर्षों में विजय माल्या पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। यानी सरकार बदलने का काई फर्क नहीं पड़ा।

सवाल यह भी है कि 2004 से 2012 के दौरान लगातार नुकसान में चल रही किंगफिशर एयरलाइंस को लोन क्यों दिए जाते रहे? 2011 में किसके कहने पर किंगफिशर को दिए गए लोन रि-स्ट्रक्चर्ड किए गए, यानी माल्या की वित्तिय हालत देखते हुए लोन चुकाने की शर्तों आसान कर दी गईं और कर्ज वसूली के लिए विजय माल्या पर कभी कोई बड़ा दबाव क्यों नहीं बनाया गया? क्या यूपीए की सरकार विजय माल्या को तब डिस्काउंट दे रही थी?

इसके अलावा बीजेपी की मौजूदा सरकार पर भी कई सवाल उठते हैं। बैंकों को जो नुकसान होता है उसकी भरपाई आम आदमी के टैक्स से ही की जाती है, वित्त मंत्री अरुण जेटली ने उन डिफॉलटर्स से कर्ज वसूलने के लिए कोई कड़े कदम क्यों नहीं उठाए जिन्होंने बैंकों से लाखों करोड़ रुपये उधार लिए हैं? सरकारी बैंको के बढ़ते एनपीए यानी नॉन पर्फार्मिंग असेट्स को देखते हुए सरकार ने माल्या जैसे उद्योगपतियों से कर्ज वसूलने की प्रक्रिया शुरू क्यों नही की? विडंबना यह है कि जो संसद देश के लोगों का प्रतिनिधत्व करती है, माल्या उसी संसद की कार्यवाही में देश के लोगों के 9 हजार करोड़ रुपये उड़ाने के बाद चैन से हिस्सा लेते रहे।

शराब और शबाब के कारण मशहूर हुए विजय माल्या के बारे में कहा जाता है- ‘किंग आफ गुड टाइम्स’। लेकिन कर्ज लेकर घी पीने की उनकी आदत उन्हें ले डूबी। अब उन्हे ‘किंग ऑफ बैड टाइम्स’ कहा जाता है। लेकिन, माल्या की घटना ने हमारे देश के बैंकिंग सिस्टम पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया है।

सतीश पेडणेकर

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