ब्रेकिंग न्यूज़ 

कौन लिख रहा है गुलाम नबी की गुलाम वाणी की पटकथा?

कौन लिख रहा है गुलाम नबी की गुलाम वाणी की पटकथा?

गुलाम नबी आजाद जम्मू-कश्मीर के रहने वाले हैं। मूलत: कश्मीर घाटी से हैं, लेकिन उनके पुरखे कभी पीर पंजाल को पार कर जम्मू क्षेत्र में आ बसे थे। कुछ वक्त के लिए वे जम्मू- कश्मीर के मुख्यमंत्री भी रहे। काफी लंबे अरसे से सोनिया कांग्रेस में सक्रिय हैं और अपना शुमार पार्टी के वरिष्ठ नेताओं में करते हैं। सोनिया कांग्रेस ने उन्हें संसद का सदस्य भी बनाया हुआ है। ऐसा माना जाता है कि वे इस पार्टी की अध्यक्षा सोनिया जी के काफी करीब हैं। इसलिए वे जो कुछ बोलते हैं, उसे पार्टी की रणनीति का हिस्सा माना जाता है। जब से दुनिया भर में इस्लामी आतंकवाद और जिहादी गतिविधियों का प्रकोप बढ़ा है, तब से गुलाम नबी की चिंता बढ़ी हुई है। उनका अपना राज्य जम्मू-कश्मीर जिहादी गतिविधियों का सर्वाधिक शिकार है। इसलिए गुलाम नबी की चिंता समझी जा सकती है। अनेक इस्लामी तंजीमें, मसलन, लश्कर-ए-तैयबा, दुख्तरने मिल्लत, तालिबान वगैरह ‘इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह’ के नारे लगाते हुए निर्दोषों का संहार कर रहे हैं। इधर इन सभी को संगठित करके दुनिया में इस्लाम का परचम फहराने का स्वप्न लेकर एक नया संगठन खड़ा हो गया है, जिसका नाम आईएसआईएस है। इस संगठन ने सीरिया और ईराक के बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर रखा है और अब यह अपने आप को इस्लामिक स्टेट कहता है। इसका मानना है कि यह इस्लामिक स्टेट सारी दुनिया को इस्लाम की तालीम में दीक्षित करेगी और बाकायदा उस इस्लामी विश्व का एक खलीफा होगा। इस्लामिक स्टेट के अगुआ अल बगदादी ने फिलहाल अपने आप को खलीफा घोषित कर दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से समाप्त हो चुके उस्मानिया साम्राज्य और उसके खलीफा की पुन:स्थापना का यह इस्लामी आंदोलन है। अपने इस स्वप्न को पूरा करने के लिए यह स्टेट जो तरीके इस्तेमाल कर रहा है, उसको दोहराने की आवश्यकता नहीं है। बच्चों तक को इंशा अल्लाह, इंशा अल्लाह कहते हुए हत्या के जघन्य काम में लगा दिया गया है। आईएसआईएस के इस आंदोलन में दुनिया भर से मुस्लिम युवा शामिल हो रहे हैं। भारत से भी कुछ लोग गए हैं और ऐसा माना जाता है कि भारत में नए रंगरूटों की भर्ती के लिए इस संगठन ने अपना जाल फैला दिया है। भारत को तोडऩा और उसे इस्लामी साम्राज्य में शामिल करना इस संगठन के एजेंडे में है।

आईएसआईएस की इस रणनीति को देखते हुए गुलाम नबी की चिंता इस संगठन को लेकर जायज ही कही जायेगी। लेकिन, प्रश्न यह है कि गुलाम नबी की चिंता इस संगठन की बढ़ रही बदनामी को लेकर है या फिर इस संगठन से उत्पन्न खतरे को लेकर है? यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है। इस प्रश्न के उत्तर में ही गुलाम नबी के उस भाषण के तार छिपे हैं जिसको लेकर देश भर में हंगामा बरपा गया है। गुलाम नबी मुसलमानों की एक सभा में शामिल होने के लिए गए थे। उस सभा में इस मुल्क के मुसलमानों को पेश आ रही समस्याओं और उन्हें दूर करने के तौर-तरीकों पर विचार हो रहा था। स्वाभाविक है, जिहादी तंजीमें इस मुल्क में जो कर रही हैं, उससे आम भारतीयों के मन में इन मुस्लिम तंजीमों के बारे में नकारात्मक धारणा बन रही है। अचानक गुलाम नबी ने उस सभा में खड़े होकर घोषणा की कि वे आईएसआईएस का भी उतना ही विरोध करते हैं जितना राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का करते हैं। नीचे बैठे मुसलमानों ने तालियां बजाईं। मीडिया ने तुरंत जुमला चलाया -गुलाम नबी ने आरएसएस की तुलना आईएसआईएस से की है।

लेकिन क्या सचमुच ऐसा था?

गुलाम नबी स्वयं जानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रकृति और कार्यशैली की आईएसआईएस से कोई तुलना नहीं है। संघ भारत में राष्ट्रवादी चेतना का प्रतीक है। राष्ट्रवादी चेतना ही भारतीयता का मूलाधार है। लेकिन संघ और भारत की यह राष्ट्रवादी चेतना नकारात्मक और किसी के विरोध में नहीं है। इसका स्वाभाविक विकास समग्र मानवतावादी चेतना में होता है। यूरोपीय देशों की राष्ट्रवादी चेतना संकुचित व परस्पर विरोधी है। इसीलिए वहां हिटलर, मुसोलिनी और नेपोलियन का जन्म होता है। फ्रांस, इंग्लैंड, स्पेन और पुर्तगाल में इसी राष्ट्रवादी चेतना से साम्राज्यवाद का जन्म होता है, जो दूसरी जातियों को गुलाम बनाता है। लेकिन, भारत में इस राष्ट्रवादी चेतना से वसुधैव कुटुंबकम का घोष होता है, जो भारतभूमि में इरानियों, यहूदियों को शरण देता है और इतनी आत्मीयता से देता है कि ये कभी इस देश में अपने आप को अल्पसंख्यक महसूस नहीं करते। लेकिन, इसके विपरीत आईएसआईएस एक ऐसी दुनिया की रचना तलवार के जोर पर करना चाहता है जो चिंतन शून्य हो और उसके लोग खलीफा बगदादी के इशारों पर रोबोट की तरह चलें। भारत उसके निशाने पर है।

27-03-2016

ऐसी स्थिति में गुलाम नबी आईएस की तुलना संघ से करके उसे प्रतिष्ठा क्यों प्रदान करना चाहते हैं? यह क्या उनका व्यक्तिगत प्रलाप और प्रयास है या फिर सोनिया कांग्रेस की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? इसे समझने के लिए थोड़ा पीछे जाने की जरूरत पड़ेगी। 2010 में जूलियन असांज ने विकीलीक्स के लाखों संदेशों को सार्वजनिक कर दिया था। दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास के विभिन्न अधिकारियों की भारत के महत्वपूर्ण लोगों से जो बातचीत होती थी, वह वाशिंगटन में वहां के विदेश मंत्रालय को भेजी जाती थी। जब ये सूचनाएं सार्वजनिक हुईं तो पता चला कि सोनिया कांग्रेस के वर्तमान उपाध्यक्ष और प्रधानमंत्री पद पाने की प्रतीक्षा में व्याकुल राहुल गांधी ने अमेरिका को बताया था कि हिंदुस्तान को असली खतरा लश्कर-ए-तैयबा से नहीं है, बल्कि हिंदुओं में पैठ बना रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है। सोनिया कांग्रेस की भावी रणनीति का उससे ही संकेत मिलना शुरू हो गया था। उनकी नजर में इस देश की राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक संघ उनके लिए असली खतरा था। यानी इस देश की पहचान, इसकी संस्कृति, इसका संघर्षमय इतिहास ही सोनिया कांग्रेस को सबसे बड़ा खतरा दिखाई दे रहा था। लश्कर-ए-तैयबा भी भारत की इसी राष्ट्रीय चेतना और उसकी पहचान के खिलाफ लड़ रहा था। वह भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को अपना सबसे बड़ा शत्रु मानता है। सोनिया कांग्रेस भी संघ को ही अपना सबसे बड़ा शत्रु मानती हैं। शायद राहुल गांधी को इसी धरातल पर लश्कर-ए-तैयबा से समानता नजर आई होगी।

लेकिन सोनिया कांग्रेस का दुर्भाग्य यह है कि इस देश के लोग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को नहीं, बल्कि लश्कर-ए-तैयबा और दूसरे जिहादी संगठनों को भारत के शत्रु मानते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वैचारिक मतभेद हो सकते हैं और वह इस देश की प्रकृति और स्वभाव में ही निहित है। यही इस देश की लोकतांत्रिक चेतना है। लेकिन, संघ राष्ट्रघाती है, ऐसा उसके विरोधी भी कहने की हिम्मत नहीं रखते। राष्ट्रविरोधी की श्रेणी में आम भारतीय लश्कर-ए-तैयबा, तालिबान और आईएसआईएस को ही मानता है। सोनिया कांग्रेस की रणनीति इस भावना को बदलने की रही है। राहुल गांधी की अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत इसके संकेत देने लगी थी। उसके बाद ही यह रणनीति बनी होगी कि यदि इस्लामी आतंकवाद से लोगों का ध्यान हटाना है, तो किसी भी तरह हिंदू आतंकवाद की अवधारणा को गढऩा होगा और इतना ही नहीं बल्कि, उसको मीडिया की मदद से स्थापित भी करना होगा। इससे भी आगे जाकर मर रहे जिहादी आतंकियों को प्रतिष्ठित करके उन्हें नायक बनाना होगा और उनके प्रति आम जनता में करुणा का भाव पैदा करना होगा।

27-03-2016

इस काम के लिए जो ब्रिगेड बनाई गई उसका नेतृत्व अरसा पहले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने संभाला। उन्होंने सोनिया कांग्रेस की रणनीति के अनुरूप हर जगह जिहादी आतंकियों का बचाव किया और उन्हें पुलिस द्वारा मारे गए निर्दोष व्यक्ति घोषित किया गया। इस रणनीति के तहत दिग्विजय ने चिल्लाना शुरू किया कि 26/11 का मुंबई पर पाकिस्तानी आक्रमण, पाकिस्तानी आतंकवादियों ने नहीं किया था बल्कि यह तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की साजि़श थी। दिग्विजय अपनी यह थीसिस देश भर में घूम घूम कर सुनाते रहे। देशवासी तो उनकी इन बातों पर क्या विश्वास करते, लेकिन आतंकवादियों को इससे काफी लाभ हुआ। भारत में सक्रिय इस्लामी जिहादी संगठनों ने भी उच्च स्वरों में शोर मचाना शुरू कर दिया कि उन्हें बेमतलब बदनाम किया जा रहा है। भारत में आतंक फैलाने का काम तो हिंदू कर रहे हैं। यहां तक कि पाकिस्तान सरकार को राहत मिली। उसने भारत में सत्ता की कमान संभाले बैठी सोनिया कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता के वचनों को दुनिया भर में भुनाना शुरू कर दिया। इसके बाद तो एक शृंखला ही शुरू हो गई। दिल्ली के बाटला हाऊस में मारे गए आतंकी शहीद घोषित हो गए और उनसे लोहा लेते हुए अपने प्राण न्योछावर कर गए सिपाही मोहनलाल को अपराधी मान लिया गया। अहमदाबाद में लश्करे तैयबा की इशरत जहां मासूम छात्रा बन गई और उस लश्करे तैयबा के दस्ते को जान हथेली पर रख कर मारने वाले पुलिस अधिकारी जेलों में सडऩे लगे।

27-03-2016केरल में जिहादी गतिविधियों में पकड़े गए मदनी की रिहाई के लिए केरल विधानसभा ने बाकायदा एक प्रस्ताव पारित किया। उसे पारित करवाने में सोनिया कांग्रेस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। सोनिया कांग्रेस की रणनीति अब देशवासियों के सामने स्पष्ट हो गई थी। सत्ताधारी दल ही यदि जिहादी आतंकियों को महिमामंडित करता हुआ उनके पक्ष में खड़ा हो जायेगा तो देश में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे सशस्त्र बल निश्चय ही हतोत्साहित होंगे। इसलिए यह प्रश्न भी चर्चा में आ गया कि कहीं सशस्त्र बलों का मनोबल गिराने के लिए ही तो यह सारा काम नहीं किया जा रहा? 2014 तक आते आते देश में सोनिया कांग्रेस के इस किरदार को लेकर चर्चा जोरों पर थी। बाबा साहब आंबेडकर ने मरने से पहले आगाह किया था कि देश आजाद तो हो गया है लेकिन देश को तोडऩे वाली ताकतों से सावधान रहना होगा, नहीं तो देश फिर गुलाम हो सकता है। देश के लोग सावधान हो गए और लोकसभा की लगभग साढ़े पांच सौ सीटों में से सोनिया कांग्रेस केवल 44 सीटें प्राप्त कर सकी।   सोनिया कांग्रेस का सबसे बड़ा कष्ट सत्ता छिन जाने का नहीं था बल्कि देश की सत्ता राष्ट्रवादी ताकतों के हाथ में आ जाने का था। हिंदुस्तान में से जिस राष्ट्रवादी चेतना को समाप्त करके सोनिया कांग्रेस इस देश की पहचान को बदलने का प्रयास कर रही थी, उस रणनीति का परिणाम उल्टा हुआ और लोगों ने सत्ता ही राष्ट्रवादी ताकतों को सौंप दी।

तब लगता था कि पार्टी के पुराने नेता जो सोनिया गांधी द्वारा पार्टी पर कब्जा करने के पहले से कांग्रेस में सक्रिय हैं, शायद इक्कठे हो जाएं और पार्टी को अपनी पुरानी मूल लीक पर लाने का प्रयास करेंगे। लेकिन या तो उन्होंने प्रयास नहीं किया या फिर सोनिया गान्धी ने अपनी रणनीति से उनकी चलने नहीं दी। सोनिया कांग्रेस के लिए यदि मामला केवल सत्ता हथियाना होता तो यकीनन 2014 के इन चुनाव परिणामों के बाद वह अपनी नीति बदल लेती और जिहादी आतंकियों को महिमामंडित करने और उन्हें जननायक बनाने के प्रयास बंद कर देती। लेकिन ऐसा नहीं किया। पार्टी जिहादियों को महिमामंडित करने की अपनी पुरानी रणनीति पर चलती ही नहीं रही बल्कि उसको कुछ दूसरे समूहों के साथ मिलकर और धारदार बनाया। इसका अर्थ यह हुआ कि सोनिया कांग्रेस सत्ता से भी अलग किसी दूसरे एजेंडे की पूर्ति के लिए रणनीति बना रही थी और उसी को सफल बनाने के लिए अपने धुर विरोधियों से भी हाथ मिला रही है। मणिशंकर अय्यर और सलमान ख़ुर्शीद बाकायदा पाकिस्तान में जाकर उनसे गुहार लगाने लगे कि भारत में से नरेंद्र मोदी की सत्ता को हटाइए। जिहादियों को महिमामंडित करने का यह मोर्चा तो सोनिया कांग्रेस का है।

27-03-2016

उधर, एक दूसरा मोर्चा भी है। हैदराबाद के ओबैसी महाराष्ट्र के लातूर में जाकर अपने हम मजहब वालों से घिरे आग उगल रहे हैं- हम भारत माता की जय कभी नहीं बोलेंगे। हमारा जो बिगाडऩा है बिगाड़ कर देख लो। नीचे से उसी प्रकार तालियां बज रही हैं जैसी गुलाम नबी का भाषण सुनकर नीचे बैठे हम मजहब वाले बजा रहे थे। ओबैसी निजाम हैदराबाद के रजाकारों की बची जूठन की तरह व्यवहार कर रहे हैं जो रजाकारों के पराजित हो जाने के दर्द को अभी तक सीने में पाले हुए हैं और उसका बदला भारत माता का अपमान करके लेना चाहते हैं। एक तीसरे मचान पर अपने उत्तर प्रदेश के आजम खान डटे हुए हैं। फिलहाल प्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं। वे संयुक्तराष्ट्र को चिट्ठियां लिखते हैं कि भारत में मुसलमानों का रहना मुश्किल हो गया है। न्यूयॉर्क में बैठकर तमाशा ही देखते रहोगे या हमारे लिए कुछ करोगे भी? आजम खान अच्छी तरह जानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र पहले ही भारत सरकार को कहता रहता है कि जम्मू-कश्मीर में रायशुमारी करवाओ कि वहां के मुसलमान भारत में रहना चाहते हैं या हिंदुस्तान में? अब आजम खान पता नहीं संयुक्त राष्ट्र से हिंदुस्तान के मुसलमानों के बारे में किस प्रकार की दखलंदाजी चाहते हैं? अब इन्हीं मोर्चों में आपस में समन्वय के प्रयास हो रहे हैं ताकि भारत माता से लड़ाई साझा मोर्चा बनाकर लड़ी जाए।

27-03-2016

ओबैसी कहते हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरा जोर लगा ले, हमारी गर्दन पर छुरी भी रख दे, हम भारत माता की जय नहीं कहेंगे। गुलाम नबी शायद परोक्ष रूप से उसे ही आश्वस्त कर रहे हैं, हम भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का डट कर विरोध करेंगे। इस पूरे परिप्रेक्ष्य में गुलाम नबी आजाद के प्रलाप को और राहुल गांधी द्वारा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जाकर भारत को तोडऩे की साजिशें बना रहे गिरोहों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाने को देखना होगा। राहुल गांधी विश्वविद्यालय में जाकर भारत की संसद पर हमले की रणनीति के सूत्रधार अफजल गुरु को जन नायक बनाने की तांत्रिक साधना के साधकों की सभा में शामिल होते हैं। याकूब मेमन को शहीद घोषित करने की कोशिश करने वालों के साथ हैदराबाद विश्वविद्यालय में जाकर शामिल हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अफजल गुरु को कंधे पर उठाकर घूम रहे गिरोह की आवाज को ही वे हिन्दुस्तान के नौजवानों की आवाज बताते हैं। जाहिर है, राहुल गांधी यह सब कुछ हिन्दुस्तान के लोगों को नहीं सुना रहे बल्कि उनके श्रोता दुनिया भर के वे जिहादी हैं जिन्हें भारत में से इस प्रकार के समर्थकों की सबसे ज्यादा जरूरत है। एक मोर्चा राहुल गांधी ने संभाला हुआ है तो दूसरे मोर्चे पर सोनिया कांग्रेस ने गुलाम नबी को तैनात किया है। गुलाम नबी की जिम्मेदारी राहुल गांधी से भी ज्यादा है। राहुल गांधी को तो केवल अफजल गुरु और इशरत जहां को प्रतिष्ठित करना है, लेकिन गुलाम नबी को तो उस आईएसआईएस को प्रतिष्ठा देनी है जिसके अमानवीय कारनामे सारी दुनिया रोज टीवी पर देखती है। पर गुलाम नबी भी जीवट के जीव हैं। उन्होंने भी अपनी रणनीति बना ली है। उसकी शुरुआत उन्होंने आईएसआईएस की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से तुलना करके की है। बहुत ही शातिराना हमला है। दुनिया को छिपा हुआ संकेत है। आप आईएस को गालियां क्यों देते हो? उसकी तुलना संघ से करो। यदि संघ देशभक्त है तो आईएस भी है। यही सवाल गुलाम नबी धीरे-धीरे इस देश के लोगों से करेंगे। आईएस को क्यों गाली दे रहे हो? यदि हिंदुस्तान के कुछ युवा उसके साथ चले जा रहे हैं तो यह उनकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इंशा अल्लाह! इंशा अल्लाह! सोनिया कांग्रेस किस गुप्त एजेंडे पर काम कर रही है, इसकी जांच होनी चाहिए। गुलाम नबी तो महज उस रणनीति के अनुसार शतरंज की बिसात पर मोहरे चल रहे हैं। लेकिन यह शतरंज की विसात किसने बिछाई है? इसका भेद पा लेना जरूरी है। आखिर सोनिया कांग्रेस को आईएस की तुलना संघ से करने की जरूरत क्यों पड़ी? इसलिए यह सवाल महत्वपूर्ण है कि गुलाम नबी की गुलाम वाणी की पटकथा कौन लिख रहा है?

कुलदीप चन्द्र अग्निहोत्री

как привлечь посетителей на сайтукладка ламината на стену цена

Leave a Reply

Your email address will not be published.