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प्रकृति की गोद में

प्रकृति की गोद में

जब एक छोटा शिशु इस धरती पर जन्म लेता है, सर्वप्रथम उसका परिचय होता है उसके मां से, जिसके कोख से वह जन्म लेता है। फिर धीरे-धीरे उसकी पहचान उसके आस-पास रहने वाले बाकी लोगों से होती है। शिशु जैसे-जैसे बड़ा होता जाता है, वैसे-वैसे अन्य सभी चीजों का ज्ञान होता है। धीरे-धीरे शैशव से वाल्यावस्था, फिर वाल्यावस्था से यौवनवास्था फिर प्रौढ़ावस्था फिर वृद्धावस्था। इस तरह जीवन के भिन्न-भिन्न अवस्था में भिन्न-भिन्न ज्ञान लाभ करता है। जैसे-जैसे उसका आयु बढ़ता है वैसे-वैसे उसके ज्ञान का विकास होता है। कुछ समय तक उसका ज्ञान का विकास केवल माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों के द्वारा होता है। फिर विद्यालय में जाकर गुरुओं से कुछ शिक्षा मिल जाता है। कुछ ज्ञान जीवन आने वाले अनेक बाहरी लोगों से भी प्राप्त हो जाता है। लेकिन उनमें अनेक ज्ञान ऐसे है जो केवल उसके अपने तजुरबे और पर्यवेक्षण से प्राप्त होता है।

नियमित दिखने वाली हर चीजे हमारे मन पर कैसा प्रभाव डालती है, इसका अंदाज हमें खुद को भी नहीं होता। हमारी दृष्टि में नित्य आने वाली हर चीजे हमें अनेक कुछ सिखाती है। दृष्यमान प्रकृति का हर कोण ज्ञान से भरा हुआ है। हममें से बहुत लोग ऐसे हैं जो यह सब देखकर भी अनदेखा कर देते हैं, अगर हम प्रकृति को मन लगाकर देखे तो हमार दृष्टिकोण और भी अच्छा हो जायेगा साथ ही हर चीज के बारे में सोचने का नजरिया भी बेहतरीन हो जायेगा। प्रकृति यानि हमारा वातावरण को अपने मां के रूप में देखे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

जैसे मां धीरे-धीरे बच्चों के सरल दिमाग में अनेक चीजों का ज्ञान भरती है ठीक उसी तरह प्रकृति के गोद में खेलकूद कर हम जीवन के अनेक सच्चाइयों का सामना करने की शक्ति पा सकते हैं। प्रकृति से मिलती हुई ज्ञान हमें एक उत्तम मनुष्य बनाने में सक्षम होता है। बस जरूरत है तो केवल उसके पास जाने की। यह निर्भर करता है हर रोज के यह यांत्रिक दुनिया से कुछ समय निकाल कर प्रकृति रूपी मां के गोद में जाने की।

विशाल जगत में हम केवल एक दृष्टा बनना चाहिए। यह गगन के विशालता, नदी को प्रखरता, समन्दरता गंभीरता, पर्वतों के ऊंचाई हमारे दृष्य को प्रस्सथ बना सकता। कुछ समय मुक्त वातावरण में बैठने से मन अपूर्व उल्लास से भर जाता है। मुक्त वातावरण और मुक्त हवा ना केवल हमारे काया को स्पर्श करता है, हमारे ह्दय को शुद्ध बनाने में सक्षम हो जाता है। प्रकृति में दृश्यमान हर चीज अपने आप में महान है। आधुनिक युग में डॉक्टरों का भी यह मानना होता है कि एक शुद्ध वातावरण एक मरीज को भी रोगमुक्त कर सकता है। शुद्ध वातावरण हमारे जीवन को सुन्दर बना सकता है हमें कुछ समय छोटी-छोटी चीजों को अनुध्यान करने से अनेक शिक्षा मिल जाती है। नित्य उदितमान सूर्य को लक्ष्य करने से हमारे अन्दर कत्र्तव्य निष्ठा के भावना जाग्रत हो जाति है। प्रकृति के अन्दर सबसे सुन्दर चीज जो खिलता हुआ फूल, फूल के सौन्दर्य को अनुभव करने से हमारा मन भी फूल की तरह खिल उठता है। मन को विस्तृत बनाने के लिए प्रकृति का अनुध्यान एकान्त आवश्यक है। एक उदार मन ही जीवन को सही रूप से जी सकते है। एक संकीर्ण मन हमेशा दुविधा में रहते है, क्योंकि संतोष नहीं मिल पाता है। भगवान जब सबों को धरती पर भेजे हैं उसके साथ-साथ उसे सही रास्ता दिखाने के लिए अनेक उपादान भी भेजे हैं अगर हम उसको परख कर जान सकेंगे तो हम भी अपना जीवन स्वर्ग बना सकते हैं। इसलिए हर व्यक्ति कुछ क्षण प्रकृति के साथ समय बिताए। हम भी अपने आप को संतुष्ट रख सकेंगे।

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