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हौसलों से ऊड़ान है

हौसलों से ऊड़ान है

नदी के प्रवाह की तरह अविरल बहते जाना ही जीवन है। वक्त के पहिए के साथ जीवन निरंतर चलता रहता है। जीवन में चाहे कितनी भी रूकावटे आयें पर उनकी परवाह किये बिना जीवन को कैसे अलग-अलग परिस्थितियों में ढालते हुए आगे बढऩा चाहिए ये जीने की कला है। हर मनुष्य के जीवन में दुख और सुख के क्षण सिक्के के दो पहलू की भांति आते-जाते रहते हैं। पर हर परिस्थिति में खुद की भावनाओं पर नियंत्रित करते हुए आगे बढऩा ही जीवन जीने के सही मायने हैं।

पुस्तक ‘ये हौसला कैसे झुके’ जीवन के ऐसे ही सच की कहानी है जो जीवन में आने वाले उतार-चढ़ाव की अनुभूति को दर्शती है। पुस्तक में लेखक ‘अंकुर जैन’ की अपनी आत्मकथा है जिसमें उन्होंने अपने उस कठिन वक्त के अनुभवों को साझा किया है जब वह किडनी ट्रांस्प्लांट के कटु अनुभवों से जूझ रहे थे। लेखक ने अपने इन अनुभवों को बहुत ही सहज और सरलता से बयां किया है और लोगों का पथ प्रदर्शित किया है कि ऐसे वक्त में लोगों को कैसे हिम्मत से समस्याओं को मात देनी चाहिए। पुस्तक का हर एक पन्ना पढ़कर समझ आता है कि सच में एक मरीज के मन में किसी बीमारी के दौरान क्या विचार आते हैं और वह कैसे कठिनाईयों और मानसिक 10-04-2016अंतद्र्वंद का सामना करता है। रोग भले एक जैसा होता है, लेकिन उसे भोगने वाला हर व्यक्ति अलग-अलग अनुभवों  से गुजर रहा होता है। कुछ ऐसी परिस्थितियों में हार जाते हैं, जबकि कुछ ऐसे होते हैं जो ऐसी परिस्थियिों को हराने की कोशिश के साथ आगे बढ़ते हैं। ऐसे में लेखक ‘अंकुर जैन’ ने एक सर्वसामान्य मानसिक अंतद्र्वंद को बहुत ही सरल भाषा में इस पुस्तक में प्रस्तुत किया है। लेकिन, इस आसान शब्दावली के बीच उनकी सोच का स्तर बहुत ही ऊंचा रहा। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी बल्कि स्थिति से जूझते हुए उन्हें परास्त किया।

ये हौसला कैसे झुके !!!

लेखक                    : अंकुर जैन ”अंश’’

प्रकाशक             : रिगी पब्लिकेशन

मूल्य                        : 160 रु.

पृष्ठ                          : 138

जब तक लोगों को किसी बीमारी के लक्षण नजर नहीं आते तब तक लोग डॉक्टर के पास परीक्षण करवाने नहीं जाते, बल्कि मेडीकल जांच को गैर-जरूरी ही समझा जाता है। कई लोग डॉक्टर की सलाह नहीं मानते और तंत्र-मंत्र जैसी कई अवैज्ञानिक पद्धतियों के जाल में फंस जाते हैं और अपनी जान गंवा बैठते हैं। इसी तरह भारत में अंगदान न करने की प्रवृति भी कई लोगों को स्वास्थ्य लाभ से वंचित करती है। ऐसी कई भ्रांतियां और प्रवृतियां मनुष्य में विद्यमान है जो उसे और दूसरों को आरोग्य से वंचित करती है। लेकिन प्रस्तुत पुस्तक स्वानुभवों के आधार पर इन सभी के विरूद्ध तार्किक विवेचन प्रस्तुत करती है। वास्तव में इन सभी भ्रांतियों के बारे में जनजागरूकता फैलाने की जरूरत है जिसका प्रयास लेखक ने इस पुस्तक में किया है।

यह पुस्तक उपरोक्त समस्त जानकारियां देने के अलावा साहित्यिक सुख की अनुभूति देने वाली भी है जो किसी उपन्यास या कहानी पढऩे जैसी अनुभूति कराती है। पुस्तक में कई जगह लेखक की आपबीती और उनकी भावनाएं मन को छू लेती हैं। पुस्तक के केन्द्र में किडनी फैल्योर के दौरान लेखक के संघर्ष  की दास्तां को ही बताया गया है, लेकिन वास्तव में इसे सिर्फ एक बीमारी से जंग के बतौर ही समझना ठीक नहीं होगा। पुस्तक सही मायने में लोगों को नकारात्मक परिस्थितियों में खुद को कैसे संभाला जाये और कैसे जीने और जीतने के हर पहलू को पुष्ठ करने वाली है।

पुस्तक में ऐसे लोगों को हिम्मत देने की कोशिश की गई है, जो भयंकर बीमारियों से जूझ रहे है साथ ही जीवन में आने वाली तमाम समस्याओं के वक्त जो लोग धैर्य खो बैठते हैं उन्हें भी हिम्मत और साहस देने का प्रयास है। लेखक ने जैसे जीवन की कठिन परिस्थितयों का सामना किया है वह काबिले तारीफ है। साथ ही उन्होंने अपने इन अनुभवों को साझा कर लोगों को साहस देने की जो कोशिश की है वह भी सराहनीय है।

प्रीति ठाकुर

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