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महिलाओं की कम होती संख्या एक ज्वलंत समस्या

महिलाओं की कम होती संख्या एक ज्वलंत समस्या

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में महिलाओं की संख्या पुरूषों के अनुपात में घट रही है। इसी प्रकार चीन में भी वर्षों से महिलाओं और पुरूषों के अनुपात में भारी अंतर देखने को मिलते रहे हंै। समाज में जीने का अधिकार सभी को है। इसके लिए संविधान में अनेक मौलिक अधिकार सुनिश्चित किये गये हैं। जिसके तहत देश का कोई भी नागरिक  बिना लिंग, जाति, धर्म, भेद के आधार पर, देश के किसी भी कोने में रह सकता है, रोजगार  प्राप्त कर सकता है। यानी भारतीय समाज मे किसी भी व्यक्ति को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है।

इन मौलिक अधिकारों पर प्रश्नचिह्न गहराते जा रहे हैं। भारतीय समाज में लिंग के आधार पर महिलाओं से जीने का अधिकार लगभग छीना जा रहा है। चीन सहित भारत में महिलाओं की संख्या घटने का खास कारण है कि गर्भ में लिंग का पता लगते ही गर्भपात करा लिया जाता है। जाहिर है कि आज के सभ्य समाज में बर्बर-युग का जंगलीपन समाया हुआ है। तभी तो कन्या के जन्म के पूर्व से ही खतरे मंडराने लगते हैं। समूचे विश्व में, पुरूषों के अनुपात में महिलाओं की जो संख्या होनी चाहिए, उसमें करीब दस करोड़ की कमी आयी है। यह कमी स्वाभाविक है। भ्रूण हत्या, बालिका वध, दहेज हत्या, शोषण एवं जुल्म से महिलाओं की संख्या पुरूषों के मुकाबले कम होने की बात, अब किसी से छुपी नहीं है। यदि इसी प्रकार महिलाओं की आबादी घटती रही तो इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक तक पुरूषों के अनुपात में महिलाओं की संख्या आधी रह जाएगी। खासकर विकासशील देशों में महिलाओं की संख्या घट रही है, जहां शिशु जन्म के दौरान  ही हर वर्ष लगभग पांच लाख महिलाओं की मौत हो जाती है।

गृह कलह, शोषण, दहेज, हिंसा, अपहरण, बलात्कार, छेडख़ानी आदि आपराधिक वारदातों से लगभग सभी देशों की महिलाएं त्रस्त हैं। ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की कुल आबादी में हर सौ लड़कियों पर 133 लड़के हैं। इसी प्रकार चीन में 1990 की जनगणना के मुताबिक 1.2 अरब आबादी थी। उस समय जहां 15 साल के तीन लड़कों की तुलना में इसी उम्र की दो लड़कियों का अनुपात बैठता था। 30 साल से अधिक उम्र के पुरूषों के आंकड़े और चौंकाने वाले हैं। चीन में 30 साल से अधिक उम्र के 80 लाख लोग हैं, जो अविवाहित पुरूष हैं। यानी इसी उम्र की अविवाहित एक महिला की तुलना में ऐसे पुरूषों की संख्या दस निकलती है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन में लाखों लड़कियां जवानी की दहलीज पार करने के पहले ही दम तोड़ देती हैं। वे भुखमरी से मरती हैं या फिर बीमारी से। पुरूषों के मुकाबले जबान महिलाओं की मौतें अधिक हो रही हैं।

विकासशील देशों में गर्भधारण करने के उपरांत संतुलित आहार न मिल पाने की वजह से भी जीर्णकाय महिलाओं की मृत्यु बड़े पैमाने पर होती है। इन देशों में गर्भ के दौरान होने वाली परेशानियों से हर एक मिनट में एक महिला काल-कवलित होती है। हालाकि इस प्रकार की मौतें रोकी जा सकती हैं। संतुलित आहार, दवाओं और इलाज के जरिये गर्भवती महिलाओं की मौत पर काबू पाया जा सकता है। लेकिन, विकासशील देशों की सरकारों की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल होती है। अत: वे गर्भवती महिलाओं को बचाने में सक्षम नहीं हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक औद्योगिक देशों यानि, विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में गर्भ के दौरान मृत्यु की संभावना 13 गुना अधिक होती है।

भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति काफी चिंताजनक है। देश के सभी जिलों, शहरों, कस्बों, गांवों में स्त्रियों के ऊपर जो अत्याचार हो रहा है, वह सभ्य समाज के लिए शर्मनाक बात है। आज नारी दोहरी जिंदगी जीती हुई समाज के खोखले एवं रूढिग़त रिवाजों को ढोती जा रही है। यदपि देश की जनसंख्या में महिलाएं करीब 40 फीसदी हैं, लेकिन शिक्षा, रोजगार के क्षेत्र में वे अल्पसंख्यक सी दिखायी पड़ती हैं। इसकी वजह यह है कि शुरू से ही महिलायों को उनके अधिकारों, कर्तव्यों और शिक्षा आदि से वंचित रखा गया है।

आंकड़ों के मुताबिक भारत में महिलाओं की संख्या सन 1901 से ही घट रही है। 1901 की जनगणना में 1000 पुरूषों के अनुपात में 972 महिलाएं थीं। 20 वर्ष उपरांत यानि, 1921 की जनगणना में 1000 पुरूषों पर 955 महिलाएं थीं। जनसंख्या विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस वक्त 1000 पुरूषों पर 900 के आसपास महिलाओं का औसत बैठ रहा है। ये आंकड़े निश्चित रूप से समाज के मुंह पर करारा तमाचा है। क्योंकि, कोई भी समाज लिंग भेद करके समानता नहीं ला सकता है।

डॉ. विभा सिंह

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