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तहरीक-ए-तालिबान आतंकी पाकिस्तान का सबसे बड़ा आतंक

तहरीक-ए-तालिबान  आतंकी पाकिस्तान का सबसे बड़ा आतंक

पाकिस्तान भी बड़ा अजीब मुल्क है। एक तरफ वह आतंकवाद का स्पांसरर है दूसरी तरफ आतंकवाद का शिकार भी। पाकिस्तान के लश्करे तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठन तो पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजंसी आईएसआई के इशारे पर भारत में आतंकवाद फैलाने का काम करते हैं। दूसरी तरफ तहरीक-ए-तालिबान जैसा पाकिस्तान

आतंकी संगठन भी हैं जो पाकिस्तान की सरकार के खिलाफ आतंकी गतिविधियां करता है और वह अबतक कई दिल दहला देने वाला हमले कर चुका है। इसीलिए पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है तहरीक-ए-तालिबान।

हाल ही में पाकिस्तान का पंजाब प्रांत एक बार फिर आतंकवादी हमले से दहल उठा…राजधानी लाहौर में ईसाइयों के ईस्टर का उत्सव के दौरान एक भीड़-भाड़ वाले पार्क में हुए आत्मघाती विस्फोट में महिलाओं और बच्चों समेत 69 लोग मारे गए और 300 से ज्यादा लोगों के घायल हुए। यह जघन्य आत्मघाती हमला तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान से जुड़े एक समूह जमातुल अहरार ने किया। ऐसी कई आतंकी वारदातों अंजाम दे चुका है तहरीक-ए-तालिबान। इससे पहले उत्तरपश्चिमी पाकिस्तान में कलाशनिकोव रायफल से लैस तालिबान के आत्मघाती हमलावर एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में घुस गए और अंधाधुंध गोलीबारी की, जिससे कम से कम 21 लोग मारे गए। यह हमला 2014 में पेशावर के एक सेना स्कूल पर हुए नृशंस हमले की याद दिलाता है। जब तालिबानी आतंकवादियों ने पेशावर के आर्मी स्कूल पर हमला बोला और अंधाधुंध गोलियां बरसाते चले गए। इस हमले में करीब 140 लोगों की मौत हो गई। यह पाकिस्तान के इतिहास में  तहरीक-ए-तालिबान के आतंकवादियों का ये सबसे बडा हमला था।

पेशावर के हमले के बाद ही  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ भले ही आर- पार की जंग की घोषणा की थी लेकिन ये वही तहरीक-ए-तालिबान है जो कभी पाकिस्तान के हाथों की कठपुतली हुआ करता था लेकिन आज उसी को लेकर खौफ में जी रहा है पाकिस्तान। तहरीक-ए-तालिबान की ये कहानी जितनी खौफनाक है उतनी ही उलझी हुई भी है। क्योंकि खुद को पैदा करने वाले पाकिस्तान के लिए ही आज एक बददुआ बन चुका है तालिबान।

10-04-2016

अफगानिस्तान की सीमा से सटा ये पूरा इलाका पाकिस्तान के सीमाई सूबे नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस का हिस्सा है। वही जन्मभूमि है पाकिस्तानी तहरीक-ए-तालिबान की। ऊंचे ऊंचे पहाड़ो वाला ये इलाका जितना दुर्गम है उतना ही प्राकृतिक सौंदर्य परिपूर्ण भी है। पाकिस्तान की सीमा जहां अफगानिस्तान की सीमा से मिलती है पाकिस्तान के उस हिस्से को फाटा यानी फेडरली एडमिनिस्ट्रेटेड ट्रायब एरिया कहा जाता है। इसी ट्रायबल एरिया में अलग-अलग पख्तून कबीले आज भी मौजूद है। तहरीक-ए-तालिबान कई आतंकवादी संगठनों से मिलकर बना एक गठबंधन है जिसका गठन साल 2007 में हुआ था। इसका  इसका पहला मुखिया बैतुल्लाह मेहसूद था। तहरीक-ए-तालिबान ने गठन के बाद से दक्षिणी वजीरिस्तान और नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी।

तहरीक-ए-तालिबान की इस चुनौती को पाकिस्तान की सरकार शुरुवात में  नजरअंदाज करती रही जिसका नतीजा ये हुआ कि तहरीक-ए-तालिबान ने फाटा समेत पूरी स्वात घाटी में अपने पैर मजबूती से जमा लिए । साल 2009 आते-आते तहरीक-ए-तालिबान की ताकत इतनी बढ़ गई कि इस्लामी कानून को लेकर उसने अपने प्रभाव वाले इलाके में फरमान जारी करने शुरू कर दिए। लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी गई और स्कूलों पर हमले शुरू कर दिए। तालिबान 2009 से अब तक स्कूलों पर हजार से ज्यादा हमले कर चुका है, जिनमें ज्यादातर उत्तर-पश्चिमी पख्तूनख्वा प्रांत में हैं। इन वर्षों में जेहादियों के निशाने पर कई शहरों में आईएसआई के दफ्तर, कराची और कामरा में नौसेना और वायु सेना के अड्डे, कराची अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और यहां तक कि फौज का मुख्यालय भी रहे हैं।

दरअसल तहरीक-ए-तालिबान, पाकिस्तान को एक इस्लामिक राज्य बनाना चाहता है और अपने इस मकसद को आगे रख कर जब उसने पाकिस्तान की सरकार के खिलाफ बगावत का ऐलान किया तो पाकिस्तानी फौज के टैंकों ने स्वात घाटी को रौंदना शुरू कर दिया था। 5 अगस्त 2009 को जब तहरीक-ए-तालिबान का मुखिया बैतुल्लाह मेहसूद एक धमाके में मारा गया तो उसकी जगह तहरीक-ए-तालिबान की कमान हकीमुल्लाह मेहसूद ने संभाल ली  और इसी के बाद तहरीक-ए-तालिबान ने आमने-समाने की लड़ाई के बजाए आत्मघाती हमलों के जरिए एक नई जंग छेड़ दी। तहरीक-ए-तालिबान के दो शीर्ष कमांडरों के मारे जाने के बाद जो तीसरा कमांडर चुना गया वह पहली बार महसूद कबीले का नहीं था। वह स्वात घाटी से था। सितंबर 2013 में जब तहरीक-ए-तालिबान के दूसरे कमांडर हकीमुल्ला मसूद की हत्या हुई तब नया कमांडर पर मौलाना फजलुल्लाह को बनाया गया। अफगानिस्तान में जंग लड़ चुका फजलुल्लाह स्वात घाटी में अपने रेडियो मुल्ला के लिए ज्यादा जाना जाता था। हर आतंकी समूह की तरह मौलाना फजुलल्लाह भी शरीया लागू करने के बहाने अपना शासन चलाता था। तहरीक-ए-तालिबान का चीफ हो जाने के बाद स्वाभाविक तौर पर अंदर विरोध होना ही था। और वह हुआ। छह महीने के भीतर ही तहरीक-ए-तालिबान के दो टुकड़े हो गये। लेकिन अब तहरीक कई टुकड़ों में बंट गया है और सभी तहरीक-ए-तालिबान होने का दावा करते हैं।

तहरीक की शुरुआत के साथ ही पाकिस्तान में आतंकी समूहों की राजनीति में नया दौर शुरू हो गया। पंजाब के बिखरे हुए तालिबानी भी कुछ कुछ तहरीक-ए-तालिबान की तर्ज पर एक छतरी के नीचे आने की कोशिश करने लगे लेकिन फिलहाल पाकिस्तान में ताकतवर समूह  तहरीक-ए-तालिबान ही था जो खनन इलाकों में अपना जबर्दस्त प्रभुत्व रखता था। बाद में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के एक प्रभावशाली गुट ने संगठन के नेतृत्त्व से खुद को अलग करने की घोषणा की।

10-04-2016

इस गुट ने संगठन के नेतृत्त्व पर लड़ाई के लिये गैर इस्लामी तरीकों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। कई पर्यवेक्षक फूट की इस घोषणा को पाकिस्तानी सरकार की जीत बताने लगे लेकिन ये उम्मीद नाकाम ही साबित हुई।

पाकिस्तान के पहाड़ी इलाकों से उतर कर तहरीक-ए-तालिबान के आतंकवादियों ने साल 2009 में स्वात घाटी के बुनेर, मिंगोरा, प्योचार, दीर और मालकंड डिवीजन तक के एक बड़े इलाके पर अपना कब्जा जमा लिया। पाकिस्तानी सेना जब स्वात घाटी में दाखिल हुई थी उस वक्त उसे तहरीक-ए-तालिबान से जबरदस्त प्रतिरोध का सामना भी करना पड़ा था। इस जंग में पाकिस्तानी सेना ने बख्तरबंद गाडियों, टैंको और हेलीकॉप्टर से तालिबान के खिलाफ जम कर हमला बोला था। पाक सेना की इस कार्रवाई के दौरान स्वात घाटी से करीब पांच लाख लोगों को पलायन भी करना पड़ा था लेकिन जब स्वात में तालिबान के दूसरे सबसे बड़े गढ चारबाग और अलीगंज पाकिस्तानी फौज के कब्जे में आए तो उसके बाद से तालिबान की कमर टूट गई थी। लेकिन तालिबान अपने को फिर संवारने में कामयाब रहा।

अफगानिस्तान के तालिबान से पाकिस्तान के तहरीक-ए-तालिबान की दुनिया काफी हद तक मिलती-जुलती है। दोनों ही पख्तून समुदाय से संबंध रखते हैं लेकिन इन दोनों तालिबान का इतिहास और इनका मकसद अलग रहा है। दरअसल अफगानिस्तान में रुस के खिलाफ लड़ाई में तालिबान को खड़ा करने में पाकिस्तान और उसकी फौज का हाथ रहा है। यही वजह है कि अफगानिस्तान में मौजूद तालिबान ने कभी भी पाकिस्तानी फौज या सरकार को निशाना बनाने की कोशिश नहीं की वही तहरीक-ए-तालिबान ने पाकिस्तान को निशाने पर ले रखा है।

जहां अन्य आतंकी संगठनों का रवैया पाकिस्तान के प्रति उदार रहा है, वहीं तहरीक-ए-तालिबान का रूख पाकिस्तान के प्रति कटोर रहा है। उसका मानना है कि पाकिस्तान अमेरिका का गुलाम है और उसके नेता देश के गद्दार हैं। यही वजह है कि यह संगठन पाकिस्तानी नेताओं का दुश्मन नंबर वन है। पाकिस्तान के संघ शासित जनजातीय क्षेत्र (फाटा) की सभी सातों कबाइली एजेंसियों (जिलों) और खैबर पख्तून के कई जिलों में इसके सदस्य हैं। इसका मुख्यालय उत्तरी वजीरिस्तान में है। इसका नेटवर्क पूरे पाकिस्तान के चारों प्रांतों में फैला हुआ है, जहां इसके कमांडर स्थानीय चरमपंथियों को साथ लेकर काम कर रहे हैं।

जनवरी 2013 में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने घोषणा की थी कि वे भारत में भी शरिया-आधारित अमीरात चाहते हैं और वहां से लोकतंत्र और धर्म-निरपेक्षता खत्म करने के लिए लड़ेंगे। पाकिस्तानी फौज के तीन कमांडरों जनरल परवेज मुशर्रफ, जनरल अशफाक कयानी और जनरल रहील शरीफ ने भले ही पाकिस्तान के भीतर जेहादी असर को कम करने की कोशिशें की हैं, जिसमें फौजी अभियानों का भी सहारा लिया गया है, लेकिन उनकी कोशिशें देश की बुनियादी मान्यताओं के चलते हमेशा अधूरी रही हैं। पाकिस्तान के विचार और उसे जायज ठहराने के लिए वहां के स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले झूठे इतिहास ने समाज में शरीया, इस्लामी खिलाफत और इस्लामी राज्य के प्रति सहानुभूति पैदा की है। यही विचार उन 33 से ज्यादा दहशतगर्द समूहों के पक्ष में काम करता है जो पाकिस्तान में सक्रिय हैं। पाकिस्तान की नवाज शरीफ सरकार ने कभी हजारों बेगुनाह पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या करने वाले तहरीक-ए-तालिबान से शांति वार्ता करने का फैसला किया था। किसी भी आतंकवादी संगठन से वार्ता की पहल करने का आमतौर पर यही अर्थ लगाया जाता है कि या तो सरकार आतंकवाद से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है या वह ऐसे संगठनों के समक्ष अपने घुटने टेक रही है। लेकिन यह वार्ता नाकाम रही। फिर सरकार ने पेसावर कांड के बाद आतंकवाद के खिलाफ अभियान चलाया या लेकिन  जैसे बातचीत नाकाम रही वैसे ही सैनिक अभियान भी नाकाम रहा।वह भी तहरीक-ए-तालिबान को नहीं मिटा पाया।

10-04-2016

दरअसल पाकिस्तान में जिहादी विचारधारा को पालने पोसने की परंपरा बहुत पुरानी है। सऊदी अरब के वहाबी नेतृतव से प्रभावित होकर पाकिस्तान के फौजी हुक्मरान जिया-उल-हक ने पाकिस्तान में नफरत व कट्टरपंथी विचारधारा फैलाने का जो बीज बोया था वह अब इतना अधिक फल-फूल चुका है कि उसने पाकिस्तान की पहचान अब एक निरंतर हिंसा झेलने वाले व आतंकवादी देश के रूप में बना दी है। रही-सही कसर पाकिस्तान के अन्य शासकों ने उस समय पूरी कर दी थी जबकि शीतयुद्ध के दौरान इन्हीं तालिबानों को पाकिस्तान में अपना सिर छुपाने की जगह मिली। इतना ही नहीं बल्कि अफगानिस्तान पर  9/11 के बाद हुए अमेरिकी सैन्य आक्रमण के समय भी बावजूद इसके कि पाकिस्तान अमेरिका के साथ खड़ा नजर आ रहा था फिर भी तालिबानी गतिविधियों का संचालन पाकिस्तान से ही उस समय भी होता रहा। ऐसे माहौल में यदि पाकिस्तान में तालिबानी वर्चस्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है तो इसमें आश्चर्यचकित करने वाली कोई नई बात नहीं है। आतंकवाद के शेर की सवारी करनेवाला कभी कभी उसका भक्ष भी बनने लगता है। पता नहीं पाकिस्तान कभी इस सबक को सीखेगा या नहीं।

 सतीश पेडणेकर

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