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‘भारतमाता’ की विकासयात्रा

‘भारतमाता’ की विकासयात्रा

पहले हमारे देश में वंदे मातरम गाने पर कुछ लोगों को ऐतराज था। यह विवाद आजादी की लड़ाई के समय से था मगर आज भी जारी है। यह पुराना विवाद सुलझा भले ही न हो मगर अब नया विवाद खड़ा हो गया है। अब ‘भारतमाता की जय’ कहना भी विवादों के घेरे में आ गया है। पिछले दिनों एमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि वे  ‘भारतमाता की जय’ नहीं  बोलेंगे, भले ही उनके गले पर चाकू क्यों न रख दिया जाए। इसके बाद से  ‘भारतमाता की जय ‘कहने को लेकर बखेड़ा खड़ा हो गया है। टीवी के जमाने में किसी भी तिल को ताड़ बनते देर नहीं लगती।

इस विवाद ने तब उग्र रूप धारण कर लिया जब महाराष्ट्र विधानसभा में एमआईएम के विधायक वारिस पठान के ‘भारतमाता की जय’ बोलने से इंकार करने पर उन्हें सारे सत्र के लिए विधानसभा से निलंबित कर दिया। बाकायदा दो पाले बन गए हैं। जिसमें एक तरफ वो लोग हैं जो कहते है सभी नागरिकों को भारतमाता की जय कहना ही चाहिए। दूसरे पाले में वो लोग है जो जिनका तर्क है कि भारतमाता की जय कहने को देशभक्ति की एकमात्र कसौटी नहीं माना जा सकता। इसके साथ ही भारतमाता शब्द की उत्पत्ति और उसके इतिहास पर भी बहस शुरू हो गई है। पुराना इतिहास खंगाला जा रहा है। इस बहस और चर्चा से एक बात उभरकर आती है कि आज भले ही कुछ लोग इसे हिन्दू सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश कर रहे हो मगर उन्नीसवी बीसवीं शताब्दि में आजादी की लड़ाई में उत्साह और उमंग का संचार करने के लिए ही भारतमाता की कल्पना की गई। भारत जैसे मूर्तिपूजकों के देश में इस विशाल और विविधतापूर्ण देश को भारतमाता के जरिये सगुण साकार रूप देने की कोशिश की गई। यहीं से शुरू हुई भारतमाता की यात्रा।

भारत में भूमि की माता के रूप में कल्पना करने की पुरानी प्राचीनकाल से परंपरा रही है। वेद कहते हैं – ‘माता भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्या:’ (भूमि माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूं।) वाल्मिकि रामायण में भगवान राम लक्ष्मण से कहते हैं कि यह स्वर्ण की लंका मुझे पसंद नहीं है, ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’ (जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी उपर है)। वेदों से चली आ रही यह परंपरा उन्नीसवीं-बीसवीं सदी तक निरंतर चलती रही। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में भारतमाता की छवि बनी। किरणचंद्र बंदोपाध्याय का नाटक भारत माता सन् 1873 में सबसे पहले खेला गया था। धरती को माता की तरह पूजना हिंदू धर्म का अभिन्न हिस्सा रहा है। लेकिन राष्ट्र को देवी मां मानने की आधुनिक अवधारणा सबसे पहले बंगाल में स्थापित हुई। भारत के इस हिस्से में शक्ति पूजा का चलन रहा है। काली मां, दुर्गा मां, चंडी देवी आदि उन देवियों के नाम हैं।

जन्मभूमि को देवी के रूप में निरूपित करने का शुरुआती मौलिक विचार हमें बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंद मठ में मिलता है। आनंदमठ में सन् 1882 में वंदेमातरम गीत सम्मिलित था जो शीघ्र ही स्वतंत्रता आन्दोलन का मुख्य गीत बन गया। रविंद्रनाथ टैगोर के भतीजे  और आधुनिक भारतीय चित्रकला के जनक अवनिंद्रनाथ टैगोर, ने 1905 में भारत माता का पहला चित्र बनाकर इसमें नया आयाम जोड़ा। शायद यह पहली बार था जब किसी ने भारत माता का चित्र बनाया। उन्होंने भारतमाता को चारभुजाधारी हिन्दू देवी के रूप में चित्रित किया जो केसरिया वस्त्र धारण किये हैं; हाथ में पुस्तक, माला, श्वेत वस्त्र तथा धान की बाली लिये हैं। स्वदेसी आंदोलन के दौरान इस इस चित्र को खूब छापा गया और आंदोलन के प्रचार के लिए इस्तेमाल किया गया। फिर तो देश भर में भारत माता की अनेक चित्र बनने लगे। क्रांतिकारी संगठनों ने भारत माता की तस्वीरों का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। छापों के दौरान भारत माता की तस्वीर मिलते ही अंग्रेजी हुकूमत चौकन्नी हो जाती थी। अनुशीलन समिति, युगांतर पार्टी भारत माता की तस्वीरों का इस्तेमाल करते हैं तो पंजाब में भारत माता सोसायटी, मद्रास में भारत माता एसोसिएशन  अपनी-अपनी भारत माता गढऩे लगे हैं लेकिन धीरे-धीरे चित्रों में भारत माता का रूप करीब-करीब स्थाई होने लगता है। भारत माता के चार हाथ की जगह दो हाथ हो जाते हैं। कई चित्रों में तिरंगा नजर आने लगा तो कहीं साथ में चरखा भी है। कहीं शेर भी है। कुछ चित्रों में शेर को इस तरह से भी देखा गया है कि भारत माता ताकतवर ब्रिटिश हुकूमत की सवारी कर रही हैं। कई चित्रों में भारत माता के हाथ में तिरंगा है। लेकिन आरएसएस जिस चित्र का उपयोग करता है उसमें भारतमाता के हाथ में  भगवा ध्वज है

आधुनिक राजनीतिशास्त्री कुछ भी कहें लेकिन भारत में राष्ट्र और नागरिकों का रिश्ता बनाने में धर्म की भूमिका रही है। दरअसल भारतमाता के चित्र के बड़ें पैमाने पर प्रचार प्रसार नें न केवल लोग भारतमाता की कल्पना कर पाए वरन उसका दर्शन भी कर सके। वैसे कई चिंतकों ने समय समय पर भारत माता की छवि कभी ऐसे खींची है। एक गुजराती राजनेता और लेखक केएम मुंशी ने 1905 में अरबिंदो घोष से एक सवाल पूछा था – ‘कोई व्यक्ति देशभक्त कैसे बन सकता है? भारत में हिंदू राष्ट्रवाद के जनक समझे जानेवाले व्यक्तियों में से एक घोष ने दीवार पर टंगे ब्रितानी भारत के मानचित्र की ओर इशारा करते हुए मुंशी से कहा, ‘क्या तुम यह मानचित्र देख रहे हो? यह मानचित्र नहीं है बल्कि भारत माता का चित्र है : इसके शहर, पर्वत, नदियां और जंगल माता के भौतिक शरीर का निर्माण करते हैं। सभी बच्चे उसकी छोटी-बड़ी शिराएं हैं… भारत को एक जीती-जागती मां के स्वरूप में समझा जाए… उसकी नवधा (नौ प्रकार से) भक्ति की जाए।’

कभी स्वामी रामतीर्थ ने भारत का कुछ ऐसा ही चित्र प्रस्तुत किया था – मैं भारतवर्ष, समस्त भारतवर्ष, हूं। भारत-भूमि मेरा अपना शरीर है। कन्याकुमारी मेरा पांव है। हिमाचल मेरा शिर है। मेरे बालों में श्री गंगा जी बहती हैं। मेरे शिर से सिन्धु और ब्रह्मपुत्र निकलते हैं। विन्ध्याचल मेरी कमर के गिर्द कमरबन्द है। कुरुमण्डल मेरी दाहिनी और मलाबार मेरी बाईं जंघा (टांगें) है। मैं समस्त भारतवर्ष हूं, इसकी पूर्व और पश्चिम दिशाएं मेरी भुजाएं हैं, और मनुष्य जाति को आलिंगन करने के लिए मैं उन भुजाओं को सीधा फैलाता हूं। आहा! मेरे शरीर का ऐसा ढांचा है? यह सीधा खड़ा है और अनन्त आकाश की ओर दृष्टि दौड़ा रहा है। परन्तु मेरी वास्तविक आत्मा सारे भारतवर्ष की आत्मा है। जब मैं चलता हूं तो अनुभव करता हूं कि सारा भारतवर्ष चल रहा है। जब मैं बोलता हूं तो मैं मान करता हूं कि यह भारतवर्ष बोल रहा है। जब मैं श्वास लेता हूं, तो महसूस करता हूं कि यह भारतवर्ष श्वास ले रहा है। मैं भारतवर्ष हूं, मैं शंकर हूं, मैं शिव हूं। स्वदेशभक्ति का यह अति उच्च अनुभव है, और यही ‘व्यावहारिक वेदान्त’ है।

– रामतीर्थ (स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली, भाग 7, पृष्ठ 126)

10-04-2016

अरबिंदो घोष ने 1905 में कहा था कि भारत माता की नवधा भक्ति होनी चाहिए। यह तथ्य बताता है कि भारत माता का विचार बीज उसी समय बोया गया था। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने भारत माता को पूर्ण रूप से हिंदू देवी में रूपांतरित कर दिया और उस भारत का प्रतीक बना दिया जो तब मुश्किल दौर में था। देश को देवी या माता के रूप में चित्रित करने की यह परंपरा मुस्लिम समाज के क बड़े हिस्से को रास नहीं आई। मुसलमानों के एक बड़े तबके का मानना है कि ‘भारत माता’ नाम की किसी देवी की जय बोलना एकेश्वरवादी इस्लाम की धार्मिक मान्यता के खिलाफ है। यही कारण है कि मुस्लिम समाज का एक बड़ा तबका पहले वंदे मातरम का विरोध करता था और अब भारतमाता का भी विरोध कर रहा है। इस तरह भारत माता की छवि भी सांप्रदायिक एकता की जगह मतभेद का कारण बन गई। समय-समय पर इसको रोकने की भी कोशिशें हुईं। 1937 में रवींद्रनाथ टैगोर ने तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सुभाषचंद्र बोस को पत्र लिखकर दलीलें दी थीं कि अपने धार्मिक झुकाव की वजह से वंदे मातरम को भारत का राष्ट्रगान नहीं बनाया जा सकता। इस पत्र में टैगोर लिखते हैं, ‘वंदे मातरम मूल रूप से देवी दुर्गा की आरती है : यह इतनी स्पष्ट बात है कि इस पर कोई तर्क-वितर्क नहीं हो सकता… किसी भी मुसलमान से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि देशभक्तिके लिए वह स्वदेश के रूप दर्शाई गई दस-भुजाधारी देवी की पूजा करे… आनंद मठ एक साहित्यक कृति है और इसलिए उसमें यह गीत उचित है। लेकिन संसद सभी धार्मिक समूहों के मिलने का स्थान है और इसलिए यह गीत उचित नहीं हो सकता…’ कांग्रेस ने टैगोर के इस विचार से सहमत होते हुए वंदे मातरम के उस हिस्से को हटा दिया जिसमें देवी दुर्गा की सीधी तुलना देश से की गई थी।

एक तरफ  यह विवाद चलता रहा। दूसरी तरफ भारतमाता की जय के नारे लगाने और गीत गाकर उसका वंदन करने का चलन शुरू हो गया। कवि सत्यनारायण मौर्य ने भारतमाता की आरती लिख है जिसे कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में गया जाता है। इसके साथ देश में जगह-जगह भारतमाता के मंदिर बने, कई जगह भारतमाता के पूजन की परंपरा शुरू हुई। देवाधिदेव, महादेव के त्रिशूल पर स्थित काशी में देवी-देवताओं के अनेक मन्दिर हैं। इन मन्दिरों के बीच एक ऐसा भी अद्वितीय मन्दिर है जिसमें किसी देवी-देवता की प्रतिमा की जगह राष्ट्र का भौगोलिकीय लघु प्रतिरूप मूर्तिमान रूप में विराजित है। ‘भारतमाता मन्दिर’ के नाम से चर्चित ‘राष्ट्रदेवता’ का यह मन्दिर सन् 1936 में  शिव प्रसाद गुप्त ने भारतमाता का मन्दिर निर्मित कराया। इस मन्दिर के निर्माण में कला, शिल्प और तकनीकी ज्ञान का उत्कृष्ट समन्वय हुआ है। हरिद्वार में 1983 में विश्व हिन्दू परिषद के नेता सत्यमित्रानंद गिरि ने भी भारतमाता का एक मन्दिर बनवाया।

ऐसे लोगों की भी कमी नहीं हैं जिनके लिए भारतमाता शब्द इस देश का रूपक है। सुमित्रानंदन पंत की कविता भारतमाता ग्रामवासिनी, कुछ इसी तरह रूप सामने लाती है। देखिए उसकी झलक -भारत माता ग्रामवासिनी। खेतों में फैला है

श्यामल धूल भरा मैला सा आंचल,

गंगा यमुना में आंसू जल,

मिट्टी कि प्रतिमा

उदासिनी।

नागार्जुन की यह कविता अपने तरीके से भारतमाता का उपयोग देश के रूपक के तौर पर ही करती है-पांच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार गोली खाकर एक मर गया, बाकी रह गए चार। इस तरह सभी ने भारतमाता को अपनी तरह से देखा है, जिसकी जैसी भावना थी भारतमाता वैसी ही नजर आई। कई जगह तो भारतमाता की तर्ज पर हिन्दमाता शब्द चलने लगा था। मुंबई में तो इस नाम का थियेटर भी था। भारतमाता की यह विकास यात्रा देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाती है कि कुछ लोगों को आज भले ही भारतमाता की जय कहने पर ऐतराज हो मगर इसने हमेशा देश में राष्ट्रीयता और देशप्रेम की भावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ओवैसी जैसे नेता भले ही भारतमाता की जय कहने का विरोध करते हों मगर तमाम मुसलमानों को कोई ऐतराज नहीं है। उनका धर्म इसमें आड़े नहीं आता तभी तो सूफी सम्मेलन में मोदी के भाषण के दौरान भारतमाता की जय के नारे लगे।

सतीश पेडणेकर    

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