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कांग्रेस का दिवालियापन

कांग्रेस का दिवालियापन

देश की सबसे पुरानी राजनैतिक पार्टी की एक दिन ऐसी दुर्दशा हो जाएगी, ऐसी कल्पना तो कभी उसके बिरोधियों ने भी नहीं की होगी। पार्टियां सत्ता में आती-जाती हैं लेकिन समाप्त तब होने लगती हैं, जब उनमें विचारकों और संघर्षशील नेताओं की कभी होने लगती है। कांग्रेस में आज न तो राजनैतिक विचारों के धनी नेता  बचे हैं, न ही संघर्षशील नेता। बची-खुची कमी विनाशकाले विपरीत बुद्धि ने पूरी कर दी है। जिस तरह की बयानबाजी कांग्रेस के शीर्ष नेतागण कर रहे हैं, उससे लगता है कि सत्ता से हटते ही पार्टी का थिंक टैंक सिंक टैंक बन गया है। नेशनल हेराल्ड कांड में पार्टी के कोषाध्यक्ष मोतीलाल बोरा की भूमिका से लेकर शशि थरूर का देशद्रोह के आरोपी जेएनयू के कन्हैया कुमार का महिमामंडन से तो ऐसा लगता है जैसे पार्टी का दिवाला निकल गया है।

अगर लोकसभा चुनाव से पहले की बात करें तो पार्टी ने सत्ता में रहते हुये अपना मनमानापन दिखाया था। जब उसके नेता मनीष तिवारी ने अण्णा हजारे के लिए घटिया शब्दों का इसतेमाल किया था। बाद में उसके लिए उन्हें माफी मांगनी पड़ी थी। पर पार्टी तब भी नहीं चेती और थोड़े से समय के अंतराल के बाद उन्हें फिर मिडिया की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

पार्टी के सत्ता मैं रहते हुए ही नेशनल हेराल्ड पर कब्जा करने की नीयत से हुआ गोरखधंधा का मामला अभी न्यायालय मैं है। पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी और अहमद पटेल पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठाई। पर बोरा जी के कथित कार्यकलापों ने पार्टी को दुर्गति की स्थित में ला दिया। बोरा जी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए इस बात के लिए चर्चित रहे कि वे मात्र प्राइमरी तक शिक्षित हैं। लंबे समय से पार्टी के कोषाध्य्क्ष हैं और उन्हीं के कारण आज सोनिया गांधी, राहुल गांधी को बईमानी के आरोप में अदालत का मुंह देखना पड़ा है। किरकरी झेल रही कांग्रेस अभी मनीष तिवारी, मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह के उल-जलूल बयानों से उबर भी नहीं पाई थी कि पूर्व केंदीय मंत्री आनंद शर्मा ने जेएनयू देशद्रोह कांड में राहुल गांधी को झोंक दिया। दोनों ने मिलकर उस घटना के विरोध में देशव्यापी शोर मचाया, जिसमें देश की अखंडता को मिटने के नारे लगाए गये थे।

हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला की आत्महया के मामले में राहुल गांधी पहले ही अपनी किरकरी करा चुके थे। जेएनयू में जाकर कन्हैया का समर्थन कर उन्होंने कांग्रेस पार्टी का कम्युनिस्टों के प्रति अपना बढ़ता हुआ प्रेम प्रदर्शित कर दिया, जिसकी बानगी पार्टी द्वारा बंगाल में कम्युनिस्टों के साथ मिल कर चुनाव लडऩे में दिख गई। चन्द सीटों की लालच मे बिहार में सजायाफ्ता नेता लालू यादव से हाथ मिलाने वाली पार्टी ने बंगाल मैं थोड़े से लालच के लिए कम्युनिस्टों से समझौता कर लिया।

बात सिद्धांतविहीन, अनैतिक समझौतों तक ही सीमित नहीं है, अब प्रशांत किशोर को, जो बिहार मे नीतीश कुमार की मदद कर रहे थे, उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की बागडोर थमायी जा रही है। कांग्रेसी अब उनकी सलाह पर चुनाव लड़ेगी, जिसकी सलाह पर नीतीश कुमार को लालू यादव की पार्टी से भी कम सीटें बिहार में मिली हैं और दो नंबर की पार्टी हो गई है। जिस पार्टी को राजनैतिक मंथन करके प्रभावी कार्यक्रम और संघर्षशील कार्यकर्ताओं को दिशा देना चाहिए, वह अब इवेंट मैनेजमेंट के विशेषज्ञों को तलाश कर रही हैं। यह पार्टी का दिवालियापन ही दर्शाता हैं।

कई बार केंदीय मंत्री और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके गुलाब नवी आजाद, जो आज भी राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं, वे कहते हैं कि आईएसआईएस किसी रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से कम नहीं है। आजाद को दोनों में कोई फर्क नजर नहीं आता हैं। आईएसआईएस एक आतंकवादी संगठन है, जो निर्दोष लोगों की हत्या करता है, जो हजारों लोगों को बिना वजह मौत के घाट उतार चुका है, जिसके आतंकी हमलावर पूरे विश्व मैं डर का माहौल पैदा कर रहे हैं, जिसके  लोग औरतों के साथ व्यभिचार में लिप्त हैं, जिसे अंतराष्ट्रीय स्तर पर आतंकी घोषित कर दिया गया है, उस संगठन को संघ के साथ जोडऩा या उसके समकक्ष कहने से लगता है कि कांग्रेसी नेताओं मे घटिया बयान देने की होड़ लगी हुई है।

जमात उल हिन्द द्वारा जेएनयू के विद्यार्थी उमर के समर्थन में बुलाई गई बैठक में आजाद ने सोनिया गांधी का पत्र भी पड़ा, जिसमें उन्होंने जमात उल हिन्द की जमकर तारीफ की थी। वे भूल गईं कि इस बैठक मैं उस उमर का समर्थन हो रहा है, जो देश के टुकड़े-टुकड़े करने का नारा लगा रहा था और अफजल गुरु की फांसी का बदला लेने की बात कर रहा था।

कांग्रेस शासन काल में पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री एवं वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम कहते है कि अफजल के साथ अन्याय हुआ है। और वे सुप्रीम कोर्ट के फांसी के निर्दय से इतिफाक नहीं रखते हैं। भले ऐसे कथित बयान भाजपा को निचा दिखाने के लिए दिये जा रहे हैं पर ये देश के लिए घातक हैं। सर्वोच्य न्यायालय के ऐसे फैसले पर सांप्रदायिक राजनीति किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण है। हाल ही में कांग्रेस शासन के पूर्व मंत्री सांसद शशि थरूर ने तो और भी हद पार कर दी, उन्होंने राष्ट्रद्रोह के आरोपी कन्हैया की तुलना अमर शहीद भगत सिंह से कर दी। कन्हैया जैसे माओवादी समर्थक का समर्थन करते-करते शहीद भगत सिंह का अपमान कर डाला, जिसे पूरा भारत नमन करता है। जिसने देश के लिए जान कुर्बान कर दी, उसकी तुलना उस कन्हैया से कर दी जो जमानत पर अदालत द्वारा इस शर्त पर छोड़ा गया है कि वह अच्छे चलन से देशप्रेम प्रदशित करेगा।

10-04-2016

विवेकसम्मत और संतुलित बोलने वाले जनार्दन द्विवेदी, अजीत जोगी और आरपीएन सिंह जैसे प्रवक्ताओं को कोने में डाल दिया गया है। सजाप्राप्त पार्टी के नेताओं की पार्टी राजद और खून-खच्चर करने वाले माओवादियों की सलाह पर कयुनिस्ट पार्टी के समझौता कर रही कांग्रेस के नेता कपिल सिब्बल का कथित बयान कि देश के खिलाफ नारा लगना तब तक जुर्म नहीं है, जब तक कोई तनाव न पैदा हो जाये या हिंसा न हो जाये, हास्यास्पद लगता है।

यह ऐसा ही है कि कत्ल करने का इरादा या प्रयास करने वाले को तब तक आरोपी नहीं बनाया जा सकता जब तक कि घटना न हो जाये। लोग कानून पैंतरे वाली भाषा नहीं जानते पर देश का हर नागरिक समझता है कि देश के विरोध में नारे लगाना देशद्रोह ही है। उनका कहना है कि यदि कोई आजादी चाहता है तो उसे कोई राष्ट्र विरोधी भले सोचे पर वह सही कह सकता है वह मात्र देश में कुछ जगह चाहता है। यदि इसे सही मान लिया जाय तो भिंडरावाले द्वारा देश के अंदर खालिस्तान मांगा जाना कैसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। इस तर्क से तो  इंदिरा गांधी द्वारा किया ब्लू स्टार ऑपरेशन गलत हो जायेगा। देश की वह अखंडता कायम रखने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी जान भी गंवाई है।

लगता है, कांग्रेस रास्ता भटक चुकी है  और उसके नेता बेलगाम हो गए हैं। राहुल गांधी के पास छुटभैयों का घेरा बन चुका  है। ऐसे में कांग्रेस दिशाविहीन पार्टी कही जाएगी तब कोई कुछ नहीं कह सकता। कांग्रेस को अपने इतिहास की तो याद कर लेनी चाहिए।

 डॉ. विजय खैरा

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